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BNMU। सम्मानित किए गए प्रोफेसर डाॅ. बहादुर मिश्र

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डाॅ. बहादुर मिश्र का सम्मान

ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा में शुक्रवार को तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर में हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार प्रोफेसर डॉ. बहादुर मिश्र को अंगवस्त्रम् एवं स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर प्रधानाचार्य प्रोफेसर डाॅ. के. पी. यादव एवं दर्शनशास्त्र विभाग के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष डाॅ. सुधांशु शेखर ने बताया कि डाॅ. मिश्र को गत दिनों दर्शन परिषद्, बिहार के अधिवेशन में आमंत्रित किया गया था, लेकिन वे अपरिहार्य कारणों से इस आयोजन में शिरकत नहीं कर पाए थे। हमारा सौभाग्य है कि आयोजन के ठीक एक माह बाद वे यहाँ अनौपचारिक रूप से ही सही पधारे और हमें आशीर्वाद दिया।

मालूम हो कि डाॅ. मिश्र पूरे उत्तर भारत के वरिष्ठतम प्रध्यापक हैं। आप मार्च 1979 में व्याख्याता और 1995 में प्रोफेसर बने। इसके बाद स्नातकोत्तर विभाग के अध्यक्ष और मानविकी संकायाध्यक्ष भी रहे। आपकी हिंदी के अलावा अंग्रेजी एवं संस्कृति में भी समान गति है।

आपकी कई पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। इनमें ‘पंडित नेहरू : मुक्तिबोध के नजरिए से’, ‘हिंदी काव्य में अप्रस्तुत विधान’, ‘भाषा, साहित्य और संस्कृति’ एवं ‘कविता आज तक’ प्रमुख समीक्षा कृति हैं। इसके अलावा ‘मुकरियां’,
‘रवींद्रनाथ टैगोर साहित्यकारों के नजरिए से’, ‘कवि दृष्टि में कवि’ एवं
‘चुनी हुई कहानियां’ संपादित पुस्तकें हैं।

इस अवसर पर डाॅ. बहादुर मिश्र ने कहा कि टी. पी. काॅलेज, मधेपुरा के परिसर में प्रवेश करते हुए मुझे सुखद अनुभूति हुई। स्वच्छता और सौंदर्य-चेतना का मुखर प्रदर्शन देख मुझे आंतरिक आनंद प्राप्त हुआ। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि ऐसा परिवेश मैंने किसी अन्य अंगीभूत इकाई में नहीं देखा। महाविद्यालय के प्रधानाचार्य डाॅ. के. पी. यादव में निष्ठावान एवं भविष्यद्रष्टा प्रशासक की छवि दिखाई पड़ी। ये उदार हृदय के साथ प्रशासन-प्रबंधन में विश्वास रखते हैं। इन्होंने इस धारणा को झुठला दिया है कि भाषा-साहित्य का शिक्षक प्रशासकीय क्षमताओं में कम होता है। आशा ही नहीं, विश्वास है कि यह महाविद्यालय दिनानुदिन प्रगति करेगा।

उन्होंने शिक्षकों एवं विद्यार्थियों से अपील की कि वे बिहार में अध्ययन-अध्यापन का माहौल बनाने में योगदान दें। सभी शिक्षण संस्थानों में नियमित रूप से ऑफलाइन/ ऑनलाइन कक्षाओं का संचालन हो।

उन्होंने कहा कि गुरु या किसी भी जानकार की बातों को सुनना और स्वाध्याय ज्ञान के दो मुख्य साधन हैं।इन दोनों का कोई दूसरा विकल्प नहीं है। विद्यार्थियों को इन दोनों साधनों का भरपूर सदुपयोग करना चाहिए।

BNMU। दर्शन परिषद् के अधिवेशन में शामिल कलाकारों का सम्मान

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प्रमाण पत्र वितरण समारोह
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संस्कृति प्रतीकात्मक संप्रेषण है। इसके प्रतीकों में समूह विशेष के कौशल-ज्ञान, उसकी प्रवृत्तियाँ, उसके मूल्य एवं उसकी अभिप्रेरणाएँ शामिल हैं। इन प्रतीकों के अर्थों को सीखा जाता है और समाज में इसकी संस्थाओं द्वारा इनकी निरन्तरता बनाये रखी जाती है। यह बात दर्शनशास्त्र विभाग तिलकामांझी विश्वविद्यालय भागलपुर के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. प्रभु नारायण मण्डल ने कही।

वे दर्शन परिषद् बिहार के तीन दिवसीय अधिवेशन में सांस्कृतिक कार्यक्रम में अपनी शानदार प्रस्तुति से अधिवेशन को यादगार बनाने वाले कलाकारों, नाट्य व संगीत से जुड़े संगठनों के सम्मान में आयोजित समारोह का उद्घाटन कर रहे थे। समारोह विश्वविद्यालय केंद्रीय पुस्तकालय सभागार में आयोजित हुआ। इसमें सभी कलाकारों को अतिथियों द्वारा प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। इस दौरान सभी कलाकारों ने एक स्वर में आयोजन को यादगार बताया और बेहतर व्यवस्था हेतु आयोजन समिति को साधुवाद दिया।

डाॅ. मंडल ने कहा कि संस्कृति वह अवधारणा है जिसमें परिष्कारक और उन्नायक तत्त्व शामिल हैं, जो प्रत्येक समाज के ज्ञात और विचारित उन तत्त्वों का भण्डार है, जो सर्वोत्तम-सर्वश्रेष्ठ हैं। संस्कृति का किसी राष्ट्र या राज्य के साथ एक तीव्र भावनात्मक सम्बन्ध हुआ करता है। यह किसी राष्ट्र की विशेष पहचान होती है।

उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति सामासिक है। जिस तरह भारत की संस्कृति भारत की पहचान है, उसी तरह सामासिकता भारतीय संस्कृति की पहचान है। भारतीय संस्कृति को सामासिक कहने का अर्थ यह है कि इसमें अनेक संस्कृतियाँ धुलमिल कर एकरूप हो गयी है।

उन्होंने कहा कि दर्शन परिषद् के तीन दिवसीय अधिवेशन में दो दिवसीय सांस्कृतिक संध्या बहुत ही शानदार एवं यादगार रहा। उन्होंने बताया कि उन्होंने इतना बेहतर आयोजन बहुत कम जगहों पर देखा है।

गांधी विचार विभाग तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. विजय कुमार ने कहा कि संस्कृति कार्यक्रम स्वस्थ मनोरंजन के साधन मात्र नहीं हैं। यह अपनी अस्मिता की अभिव्यक्ति भी है। अधिवेशन के दौरान सांस्कृतिक कार्यक्रम में स्थानीय, प्रांतीय व राष्ट्रीय सांस्कृतिक विरासत से रूबरू होने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि यहां के बच्चों ने विपुल प्रतिभा है, जो प्रस्तुति के माध्यम से देखने को मिला। इन प्रतिभाओं को उचित मंच देने की जरूरत है।

अकादमिक निदेशक प्रोफेसर डॉ. एम. आई. रहमान ने कहा कि ऐसे आयोजनों से अपनी संस्कृति से जुड़ने का अवसर प्राप्त होता है। यहां के बच्चों को इसी प्रकार उत्साहित करने की जरूरत है।

सिंडीकेट सदस्य डाॅ. जवाहर पासवान ने कहा कि इस आयोजन से मधेपुरा एवं कोसी की प्रतिष्ठा बढ़ी और इस क्षेत्र के बारे में लोगों की नकारात्मक धारणाएँ बदलीं। उन्होंने कहा कि भविष्य में ऐसे और आयोजनों की जरूरत है।

उप खेल पदाधिकारी डाॅ. शंकर मिश्रा ने कहा कि दर्शन परिषद् के अधिवेशन में सांस्कृतिक कार्यक्रम ने राज्यस्तरीय तरंग प्रतियोगिता की याद ताजा कर दीं।

प्रांगण रंगमंच के सुनीत साना ने कहा कि इस आयोजन में बहुत कुछ सीखने को मिला जो आगे काम आएगा।

नवाचार रंगमंच के अमित अंशु ने इसे यादगार आयोजन बताते हुए इसे भविष्य में भी जारी रखने की जरूरत है।

राष्ट्रीय कला मंच की शिवानी अग्रवाल ने कहा कि इस सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल होकर बहुत कुछ सीखने व समझने को मिला।

कला मन्दिर के वकील वाका ने कहा कि इस आयोजन में आयोजन समिति और दर्शकों का जो प्यार मिला वो बहुत खास रहा।

हीप हॉप डांस एकेडमी के कार्तिक कुमार ने कहा कि यह आयोजन लंबे समय तक एक सफल आयोजन के रूप में याद किया जाएगा।

शिव राजेश्वरी युवा सृजन क्लब के हर्षवर्द्धन सिंह राठौर ने कहा कि जिले में पहली बार ऐसा आयोजन हुआ। इसमें आलग-अलग सांस्कृतिक संगठनों को एक मंच पर प्रस्तुति देने का सुअवसर प्राप्त हुआ। यह भविष्य के लिए शुभ संकेत है।

सृजन दर्पण के विकास कुमार ने कहा कि सास्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन से स्थानीय कलाकारों अपनी प्रतिभाओ के प्रदर्शन का अवसर मिला।

सम्मान समारोह का संचालन करते हुए आयोजन सचिव डाॅ. सुधांशु शेखर ने सभी कलाकारों एवं सांस्कृतिक संगठनों और मधेपुरा के सभी नागरिकों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि सबके सहयोग से ही दर्शन परिषद् के तीन दिवसीय अधिवेशन सफल हुआ और यह न केवल शैक्षणिक दृष्टि से, बल्कि कला- संस्कृति की दृष्टि से भी यादगार रहा। उन्होंने कहा कि वे सांस्कृतिक कार्यक्रम की यादों को सहेजने के लिए शीघ्र ही एक योजना की घोषणा करेंगे।

इस अवसर पर गरिमा उर्विषा, शिवांगी, सुभम, शांतनु यदुवंशी, सारंग तनय, सौरभ कुमार, बिमल कुमार, गौरब कुमार सिंह, डेविड यादव आदि उपस्थित रहे।

BNMU। विश्व दर्शन दिवस पर तीन व्याख्यानों का आयोजन*

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तीन व्याख्यानों का आयोजन

राष्ट्र मात्र एक भौगोलिक इकाई नहीं है और न ही यह सत्ता का एक केंद्र मात्र है। वास्तव में राष्ट्र एक सांस्कृतिक एवं मूल्यात्मक इकाई और भावनात्मक एवं आत्मिक संरचना है। यह संरचना राष्ट्र के सभी नागरिकों से मिलकर बनती है। कोई भी राष्ट्र व्यक्तियों का सम्मिलित पूंज है।

यह बात कार्यक्रम के उद्घाटनकर्ता भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. रमेशचन्द्र सिन्हा ने कही। वे भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् द्वारा संपोषित व्याख्यान माला का उद्घाटन कर रहे थे। यह आयोजन स्नातकोत्तर दर्शनशास्त्र विभाग द्वारा विश्व दर्शन दिवस के उपलक्ष्य में गुरुवार को केंद्रीय पुस्तकालय सभागार में आयोजित हुआ।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक राष्ट्र की अपनी-अपनी अस्मिता होती है। यह अस्मिता ही राष्ट्र की असली पहचान हैं। इसलिए राष्ट्रीय अस्मिता के लिए किसी राष्ट्र के सभी नागरिकों का राष्ट्र के प्रति भावनात्मक लगाव या राष्ट्रभक्ति जरूरी है। किसी भी समान्य मनुष्य का अपनी राष्ट्रीयता से ऊपर उठना संभव नहीं है। राष्ट्रीयता को छोड़ना किसी वृक्ष के अपनी जड़ों से कटने और शरीर से आत्मा के अलग होने के समान है।उन्होंने कहा कि सांस्कृतिक मूल्यों के कारण ही विभिन्न देश की भिन्न-भिन्न राष्ट्रीयता है। किसी भी राष्ट्र का एक चरित्र होता है और उस चरित्र को उसके मूल्यों के द्वारा ही हम जानते हैं। भारतवर्ष में अध्यात्मिकता पर अधिक बल है और पश्चिम में भौतिकता पर अधिक बल है।उन्होंने कहा कि भारतीय राष्ट्रवाद पश्चिम के राष्ट्रवाद से काफी भिन्न एवं व्यापक है। भारतीय राष्ट्रवाद में वसुधैव कुटुंबकम् एवं सर्वेभवन्तु सुखिनः की भावना का समावेश है। इसमें हिंसा एवं विस्तारवाद के लिए कोई जगह नहीं है।कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए बीएनएमयू, मधेपुरा के कुलपति प्रोफेसर डॉ. राम किशोर प्रसाद रमण ने कहा कि शिक्षा ही मानव को पशु से अलग करती है। अतः हमें सभी व्यक्तियों तक शिक्षा को पहुँचाने की जरूरत है।उन्होंने कहा किनैतिक जीवन ही जीने योग्य है। क्योंकि नैतिकता में आंतरिक शक्ति होती है और यही असली शक्ति है।

उन्होंने कहा कि आज हमें प्राचीन मूल्यों एवं आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के बीच समन्वय करने की जरूरत है। हमें यह देखना होगा कि आधुनिकता की दौड़ में हम अपनी जड़ों से नहीं कटें और अपने नैतिक मूल्यों को दरकिनार नहीं करें। अतः शिक्षा में नैतिकता का समावेश करने की जरूरत है। यदि विद्यार्थियों का चरित्र-निर्माण नहीं होगा, तो शिक्षा अर्थहीन हो जाएगी।

उन्होंने कहा कि गाँधी अंतिम व्यक्ति की आवाज थे। गाँधी-दर्शन में ही दुनिया की सभी समस्याओं का सबसे बेहतर एवं कारगर समाधान है। गाँधी विचार के आधार पर हम आतंकवाद, पर्यावरणीय असंतुलन, आर्थिक मंदी आदि सभी चुनौतियों का मुकाबला कर सकते हैं।

इस अवसर पर तीन व्याख्यानों का आयोजन किया जाएगा। प्रथम व्याख्यान भारतीय अस्मिता का पुनरावलोकन विषय पर बीएनएमयू, मधेपुरा की प्रति कुलपति प्रोफेसर डॉ. आभा सिंह का हुआ। उन्होंने कहा कि भारतीयता का अर्थ मानवता है। भारत ने दुनिया को मानवता का संदेश दिया है। भारतीय धर्मों ने कभी भी दुनिया के किसी धर्मों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया।

उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में कई उच्च आदर्श एवं मूल्य रहे हैं। यही आदर्श एवं मूल्य हमारी अस्मिता का मूलभूत आधार हैं। हमें इन उदात्त मूल्यों को आगे बढ़ाना चाहिए और जो अनुपयोगी परंपराएँ हैं, उन्हें हमें छोड़ देना चाहिए। साथ ही नवीन मूल्यों का सृजन भी होना चाहिए। शिक्षा को मूल्यों से जोड़ना चाहिए।

उन्होंने कहा कि व्यापक अर्थों में संस्कृति जीवनशैली का नाम है। हमारी संस्कृति ने दुनिया को सत्यं शिवम् सुन्दरम् का संदेश दिया है।

शिक्षा, समाज एवं नैतिकता विषय पर द्वितीय व्याख्यान प्रोफेसर डॉ. प्रभु नारायण मंडल, पूर्व अध्यक्ष दर्शनशास्त्र विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर का हुआ। उन्होंने कहा कि समाज नियमों से चलता है। एक व्यवस्था एवं नैतिकता ही समाज को संचालित करता है। नैतिक जीवन ही श्रेष्यष्कर है।

उन्होंने कहा कि नैतिक कर्मों का परिणाम सुखद एवं हितकारी होता है। अनैतिक कर्म दुखदायी होते हैं। नैतिक कर्मों का पालन करने से हमारा जीवन बेहतर होता है और हमें आत्मसंतुष्टि भी मिलती है। अतः हमें समाज में नैतिकवानों का सम्मान करना चाहिए, अनैतिक लोगों का नहीं।

उन्होंने कहा कि व्यक्ति के अस्तित्व की निरन्तरता, उसकी सुरक्षा एवं संरक्षा, गरिमा के साथ जीवन जीना-मुख्य रूप से ये ही वे उद्देश्य हैं जिनके लिए समाज का निर्माण हुआ है। वस्तुतः समाज व्यक्ति के लिए एक अनिवार्यता है, क्योंकि इसके बिना वह जीवित नहीं रह सकता, गरिमा के साथ जीने की बात तो दूर।

उन्होंने कहा कि बेहतर भविष्य के निर्माण के लिए नए मूल्यों को भी स्वीकारने की जरूरत है और साथ ही अतीत के उन मूल्यों का परित्याग करने की भी आवश्यकता है जो भविष्य में बेहतर समाज के निर्माण में बाधक होते हैं।

तीसरे व्याख्यानकर्ता गाँधी विचार विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. विजय कुमार समकालीन चुनौतियाँ और गाँधी विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि आज की पहली सबसे बड़ी चुनौती है कि हम उच्च विचारों को यथार्थ की धरातल पर उतारें और दूसरी चुनौती है कि हम अपनी मुक्ति से आगे बढ़कर सर्वमुक्ति की ओर बढ़ें।

उन्होंने कहा कि आज पूँजी का पाप, हिंसा का श्राप एवं धरती का ताप बढ़ता जा रहा है।

उन्होंने कहा कि आज गाँधी के विचारों की प्रासंगिकता बढ़ गई है। आज गाँधी को अपनाना हमारी मजबूरी हो गई है। क्योंकि गाँधी दर्शन में ही आतंकवाद, पर्यावरणीय असंतुलन, आर्थिक मंदी आदि सभी चुनौतियां का समाधान निहित है।

उन्होंने कहा कि आज गाँधी विचार की आलोचना या गुणगान करने का समय नहीं है।आज गाँधी विचार को जीवन में उतारने का समय है। गाँधी का जीवन एवं विचार हमारे लिए चुनौती है। हम इसे जितना आत्मसात कर सकेंगे, देश-दुनिया का उतना ही भला होगा।

स्वागत भाषण एवं विषय प्रवेश की जिम्मेदारी पूर्व कुलपति प्रोफेसर डॉ. ज्ञानंजय द्विवेदी ने किया। उन्होंने कहा कि विश्व दर्शन दिवस प्रत्येक वर्ष नवंबर महीने के तीसरे गुरूवार को मनाया जाता है। यह महान मानवतावादी विचारक सुकरात सहित उन सभी दार्शनिकों के सम्मान में मनाया जाता है, जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व को स्वतंत्र विचारों के लिए स्थान उपलब्ध कराया। इस दिवस का उद्देश्य दार्शनिक विरासत को साझा करने के लिए विश्व के सभी लोगों को प्रोत्साहित करना और वैचारिक सहिष्णुता को बढ़ावा देना है। यह विरोधी विचारों का भी सम्मान करने और समसामयिक चुनौतियों के समाधान हेतु विचार-विमर्श करने की प्रेरणा देता है।

आयोजन सचिव सह जनसंपर्क पदाधिकारी डाॅ. सुधांशु शेखर ने बताया कि बीएनएमयू, मधेपुरा में विश्व दर्शन दिवस का आयोजन काफी खुशी की बात है। यह आयोजन वर्ष 2019-20 में ही होना था। लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण अब तक नहीं हो पाया था। अब दर्शन परिषद्, बिहार के सम्मेलन की सफलता के बाद इसे आयोजित करने का निर्णय लिया गया है। इस बावत शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत संचालित आईसीपीआर, नई दिल्ली से अनुमति पत्र प्राप्त हो चुका है।

कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर की। अतिथियों का अंगवस्त्रम् एवं पुष्पगुच्छ से स्वागत किया गया। प्रश्नोत्तर कार्यक्रम में वक्ताओं ने प्रतिभागियों के सवालों का जवाब दिया। धन्यवाद ज्ञापन स्नातकोत्तर दर्शनशास्त्र विभाग के अध्यक्ष शोभाकांत कुमार ने किया।

इस अवसर पर अकादमिक निदेशक प्रोफेसर डॉ. एम. आई. रहमान, सीनेटर प्रोफेसर डॉ. नरेश कुमार सिंडिकेट सदस्य डाॅ. जवाहर पासवान, डाॅ. अरूण कुमार, प्रज्ञा प्रसाद, डाॅ. शंकर कुमार मिश्र, शंभू नारायण यादव, डाॅ. शिवेन्द्र प्रताप सिंह, डाॅ. फिरोज मंसुरी, राॅबिन्स कुमार, गुड्डू कुमार, रूची सुमन, रंजन कुमार, सौरभ कुमार, सारंग तनय, बिमल कुमार, माधव कुमार, डाॅ. दीपक कुमार सिंह, गौरब कुमार सिंह, डाॅ. लखन कुमार यादव, डेविड यादव आदि उपस्थित थे।

व्याख्यान माला आज

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तीन व्याख्यानों का आयोजन 25 को (आज)

विश्व दर्शन दिवस के उपलक्ष्य में भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् द्वारा संपोषित एक व्याख्यान माला 25 मार्च, 2021 गुरुवार को पूर्वाह्न 10 : 30 बजे से केंद्रीय पुस्तकालय सभागार में सुनिश्चित है। इसके अंतर्गत तीन व्याख्यानों का आयोजन किया जाएगा। प्रथम व्याख्यान भारतीय अस्मिता का पुनरावलोकन विषय पर बीएनएमयू, मधेपुरा की प्रति कुलपति प्रोफेसर डॉ. आभा सिंह
का होगा। शिक्षा, समाज एवं नैतिकता विषय पर द्वितीय व्याख्यान प्रोफेसर डॉ. प्रभु नारायण मंडल, पूर्व अध्यक्ष दर्शनशास्त्र विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर का होगा। तीसरे व्याख्यानकर्ता
गाँधी विचार विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. विजय कुमार समकालीन चुनौतियाँ और गाँधी विषय पर व्याख्यान देंगे।

कार्यक्रम का उद्घाटन भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. रमेशचन्द्र सिन्हा और अध्यक्षता बी. एन. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के कुलपति प्रोफेसर डॉ. राम किशोर प्रसाद रमण करेंगे। स्वागत भाषण एवं विषय प्रवेश की जिम्मेदारी पूर्व कुलपति प्रोफेसर डॉ. ज्ञानंजय द्विवेदी निभाएँगे।

*खास अवसर*
कुलसचिव डाॅ. कपिलदेव प्रसाद एवं आयोजन सचिव डाॅ. सुधांशु शेखर ने ने बताया कि यह आयोजन विश्वविद्यालय के लिए एक खास अवसर है। इसमें भाग लेने के लिए कुलपति एवं प्रति कुलपति सहित सभी अतिथियों की सहमति प्राप्त हो चुकी है। इसमें सभी संकायाध्यक्षों, विभागाध्यक्षों, शिक्षकों एवं शोधार्थियों को भी विशेषरूप से आमंत्रित किया गया है। शोधार्थियों को सहभागिता प्रमाण-पत्र भी दिया जाएगा।

स्नातकोत्तर दर्शनशास्त्र विभाग के अध्यक्ष शोभाकांत कुमार ने बताया कि बीएनएमयू, मधेपुरा में विश्व दर्शन दिवस का आयोजन काफी खुशी की बात है। यह आयोजन वर्ष 2019-20 में ही होना था। लेकिन कोरोना संक्रमण के कारण अब तक नहीं हो पाया था। अब दर्शन परिषद्, बिहार के सम्मेलन की सफलता के बाद इसे आयोजित करने का निर्णय लिया गया है। इस बावत शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत संचालित आईसीपीआर, नई दिल्ली से अनुमति पत्र प्राप्त हो चुका है।

*दिवस का महत्व*
विश्व दर्शन दिवस प्रत्येक वर्ष नवंबर महीने के तीसरे गुरूवार को मनाया जाता है। यह महान मानवतावादी विचारक सुकरात सहित उन सभी दार्शनिकों के सम्मान में मनाया जाता है, जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व को स्वतंत्र विचारों के लिए स्थान उपलब्ध कराया। इस दिवस का उद्देश्य दार्शनिक विरासत को साझा करने के लिए विश्व के सभी लोगों को प्रोत्साहित करना और वैचारिक सहिष्णुता को बढ़ावा देना है। यह विरोधी विचारों का भी सम्मान करने और समसामयिक चुनौतियों के समाधान हेतु विचार-विमर्श करने की प्रेरणा देता है।

BNMU बिहार के विकास में है कोसी की महती भूमिका : कुलपति

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बिहार दिवस पर हुआ सेमिनार

बिहार ने देश के इतिहास में महती भूमिका निभाई है और बिहार के विकास में कोसी की महती भूमिका है। कोसी क्षेत्र बिहार के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक विकास में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।

यह बात कुलपति प्रोफेसर डॉ. राम किशोर प्रसाद रमण ने कही। वे बिहार दिवस के उपलक्ष्य में सोमवार को विश्वविद्यालय केंद्रीय पुस्तकालय सभागार में उद्घाटनकर्ता सह अध्यक्ष के रूप में बोल रहे थे। सेमिनार का विषय सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक परिप्रेक्ष्य में बिहार के विकास में कोसी का योगदान था। उन्होंने कहा कि कोसी में प्रतिभाओं का खजाना है। यहाँ के लोगों में धारा के विपरीत चलने और नई राह बनाने का साहस है।

मुख्य अतिथि प्रति कुलपति प्रोफेसर डॉ. आभा सिंह ने कहा कि बिहार एवं कोसी की धरती ने दुनिया में नारी शक्ति के जागरण और सामाजिक न्याय का संदेश दिया है। इस धरती पर कई महान ॠषियों, साधकों, दार्शनिकों, विद्वानों एवं साहित्यकारों ने जन्म लिया है।

उन्होंने कहा कि कोसी की दार्शनिक एवं सांस्कृतिक विरासत काफी समृद्ध एवं गौरवशाली है। इसे संरक्षित एवं संवर्धित करने की जरूरत है।

मुख्य वक्ता इतिहास विभाग, पश्चिमी परिसर, सहरसा के प्राध्यापक डाॅ. विद्यानंद मिश्र ने कहा कि 1912 मे बिहार बंगाल से अलग हुआ। 1935 में बिहार से उड़ीसा अलग हुआ और 2000 में झारखंड बना। हम छोट छोटे टुकड़ों में बनते हैं और हमारे एकीकरण का भी प्रयास हो रहा है।

उन्होंने कहा कि कोसी ने बिहार के विकास में महती भूमिका निभाई है। यहाँ के लोगों का न केवल सभी मनुष्यों के साथ, बल्कि पशु-पक्षियों एवं प्राकृति-पर्यावरण के साथ भी तादात्म संबंध था।

उन्होंने कहा कि कोसी आपदा नही है, यह अवदान है। कोसी दुखदायनी नहीं है, जीवनदायनी है।

डीएसडब्लू प्रो. (डॉ.) अशोक कुमार यादव ने कहा कि कोसी की गौरवशाली इतिहास एवं परंपरा है। इसका बिहार एवं पूरे देश ही नहीं, बल्कि विश्व के विकास में योगदान है।

कुलानुशासक डॉ. बी. एन. विवेका ने कहा कि बिहारी अपनी बुद्धिमत्ता एवं मेहनत से दुनिया में परचम लहरा रहे हैं।

कुलसचिव डॉ. कपिलदेव प्रसाद ने कहा कि हमें बिहार पर गर्व है। हमें गर्व है कि हम बिहारी हैं। हमारी सभी क्षेत्रों में आलग पहचान है। बिहार में कई युग परिवर्तनकारियों ने जन्म लिया है।

कार्यक्रम का संचालन शिक्षाशास्त्र विभाग के प्रोफेसर इंचार्ज प्रोफेसर डॉ. नरेश कुमार ने किया। धन्यवाद ज्ञापन आयोजन सचिव सह अकादमिक निदेशक प्रोफेसर डॉ. एम. आई. रहमान ने दिया। इसके पूर्व अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत की। अतिथियों को अंगवस्त्रम् से सम्मानित किया गया। प्रांगण रंगमंच की शशिप्रभा जायसवाल ने बिहार गीत प्रस्तुत कर सबों का दिल जीत लिया।

इस अवसर पर जनसंपर्क पदाधिकारी डाॅ. सुधांशु शेखर, डॉ. बी. एन. यादव, डाॅ. सिद्धेश्वर काश्यप, डाॅ. शंकर कुमार मिश्र, शिवेन्द्र प्रताप सिंह, डॉ. राजीव रंजन, देवेन्द्र प्रसाद यादव, रंजन कुमार, माधव कुमार, सारंग तनय, अमरेश कुमार अमर, बिमल कुमार, डेविड यादव, रौशन कुंवर, लक्ष्मण कुमार, मो. अरमान अली, डॉ. एम. एस. रहमान उर्फ बाबुल, पृथ्वीराज यदुवंशी, सुशील कुमार, मो. सरफराज, पवन कुमार, राम सिंह यादव, चंदन कुमार, मुकेश कुमार, ललन कुमार, रजनीकांत, संतोष, शैलेन्द्र यादव, रामशरण, सुमेध आनंद, सुनील कुमार आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम में कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए निर्धारित सभी दिशानिर्देशों का पालन किया गया। सभागार को सेनेटाइज किया गया। सभी प्रतिभागियों ने मास्क एवं सेनेटाइजर का प्रयोग किया। कार्यक्रम का यू-ट्यूब पर लाइव प्रसारण भी किया गया।

BNMU नाथपंथ में महत्वपूर्ण है योग की अवधारणा : प्रति कुलपति

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नाथपंथ में योग की विचारधारा मुख्यतः हठयोग पर आधारित है। इसमें योग साधना का मुख्य उद्देश्य कुंडलिनी शक्ति का जागरण है। जब व्यक्ति कुंडलिनी का जागरण कर लेता है, तभी उसका ही जीवन सही मायने में सार्थक होता है। यह बात प्रति कुलपति प्रोफेसर डॉ. आभा सिंह ने कहीं। वे शनिवार को नाथ पंथ का वैश्विक प्रदेय विषयक अन्तराष्ट्रीय वेबिनार-सह-संगोष्ठी में नाथपंथ में योग की अवधारणा विषय पर बोल रही थीं। कार्यक्रम का आयोजन दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्विद्यालय, गोरखपुर के तत्वावधान में किया गया था।

उन्होंने कहा कि आमतौर पर पूरी दुनिया में महर्षि पतंजलि का योग दर्शन ही प्रचलित है। लेकिन योग के आदि प्रणेता योगेश्वर भगवान शिव हैं। नाथ संप्रदाय भी शिव को ही आराध्य मानती है। इस संप्रदाय में कई महान योगी हुए हैं, जिनमें गुरू गोरखनाथ का महत्वपूर्ण स्थान है।

उन्होंने कहा कि नाथ संप्रदाय का मानना है कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड की सृष्टि शिव आदिनाथ की उर्जा से हुई है, जिसे शक्ति की संज्ञा दी गई है। इसी शक्ति के सबसे छोटे भाग को कुंडलिनी की संज्ञा दी गई है और यह माना गया है कि यह शक्ति मानव में सुप्त रूप में विद्यमान है।

उन्होंने बताया कि आमतौर पर योग के आठ अंग माने गए हैं। लेकिन नाथपंथ में प्रारंभिक दो अंग यम एवं नियम को विशेष महत्व नहीं दिया गया है। इसकी मान्यता है कि यदि व्यक्ति ध्यान की क्रिया में दक्षता प्राप्त कर लेता है, तो वह स्वतः यम एवं नियम का पालन करने लगता है। इस पंथ के अनुसार योग के छः अंग हैं- शारीरिक मुद्रा, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि।

उन्होंने कहा कि नाथपंथ में योग की अवधारणा काफी बहुआयामी है। इसमें हठयोग, कुंडलिनी योग, मंत्र योग एवं भक्ति योग आदि समाविष्ट है। साथ ही इसके परिणाम भी अपेक्षाकृत तीव्र गति से प्राप्त होता है।इसमें योग का उद्देश्य शक्ति का शिव से मिलन है, जो मोक्ष की अवस्था है। यही भारतीय दर्शन के अनुसार मानव जीवन का चरम पुरुषार्थ भी है।

कार्यक्रम में भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद् के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. रमेशचन्द्र सिन्हा सहित कई गणमान्य व्यक्तियों ने अपने विचार व्यक्त किए।

BNMU। भावी पीढ़ी के निर्माता होते हैं शिक्षक : प्रति कुलपति

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नई शिक्षा नीति की यह बड़ी विशेषता है कि यह रटंत विद्या को छोड़कर रचनात्मकता पर जोर देती है। रचनात्मकता की शुरूआत बचपन से ही होती है। अतः स्कूली शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। हमें पाठ्यक्रमों में सम्यक् परिवर्तन लाना होगा और मूल्याकंन पद्धति में आमूल-चूल बदलाव लाने होंगे।

यह बात बीएनएमयू, मधेपुरा के प्रति कुलपति प्रोफेसर डॉ. आभा सिंह ने कही। वे राष्ट्रीय शिक्षण मंडल एवं नीति आयोग के संयुक्त तत्वावधान में संदीप विश्वविद्यालय, मधुबनी में आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार में बीज वक्तव्य दे रहे थे। यह वेबिनार राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षकों की भूमिका विषय पर आयोजित की गई थी।

उन्होंने कहा कि शिक्षण-प्रक्रिया में तीन बातें महत्वपूर्ण हैं- गुरू या शिक्षक, शिष्य या विद्यार्थी एवं शिक्षण प्रणाली। गुरु शिष्य के मार्गदर्शक की भूमिका निभाता है। वही भावी पीढ़ी का निर्माण करता है।

  1. उन्होंने कहा कि शिक्षण में शिक्षक के साथ-साथ अभिभावक एवं परिवार की भी भूमिका महत्वपूर्ण है। बच्चों के लिए पहले माँ-पिता एवं अग्रज और फिर शिक्षक आदर्श होते हैं। बच्चे इन सबों का अनुसरण करते हैं। अतः हम जो बच्चों से अपेक्षा रखते हैं, उसे हमें खुद करके दिखाना होगा। उन्होंने कहा कि हमें बच्चों को शुरू से ही नैतिक नियमों की शिक्षा देनी होगी। बच्चों को व्यावहारिक जगत से जोड़कर ये शिक्षाएँ दी जा सकती हैं। हमेशा सत्य बोलें, कभी किसी को कष्ट मत पहुँचाएँ, कभी किसी को धोखा नहीं दें और बड़ों का सम्मान करें आदि इसके कुछ उदाहरण हैं।

उन्होंने कहा कि आज बहुतेरे लोग साक्षर हैं, लेकिन शिक्षित नहीं हैं। हमारी मौजूदा शिक्षण-प्रणाली एवं मूल्याकंन प्रणाली दोनों दोषपूर्ण है। इसमें रटंत विद्या को बढ़ावा देता है। हम जो रटते हैं, उसे ही परीक्षा हाॅल में उगल देते हैं। नई शिक्षा नीति में इसे बदलते हुए सतत मूल्याकंन पर जोर दिया गया है।उन्होंने कहा कि शिक्षकों को विषय में होने वाले नीत नए-नए प्रयोगों एवं विकासों का ज्ञान होना चाहिए। जब शिक्षक स्वयं को अपटूडेट रखेंगे, तभी उनके ज्ञान के प्रकाश से विश्व प्रकाशित होगा।

इस अवसर पर प्रोफेसर डॉ. मनोज दीक्षित, डाॅ. अमरेन्द्र प्रकाश चौबे, शिवलाल कुमार साहनी, रामाकर झा आदि उपस्थित थे।

BNMU एम. आई. रहमान के जन्मदिन पर माई बर्थ माई अर्थ मिशन के तहत पौधारोपण एवं परिचर्चा

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विश्वविद्यालय के निदेशक (शैक्षणिक) एवं स्नातकोत्तर मनोविज्ञान विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. एम. आई. रहमान ने हर साल की भांति इस वर्ष भी अपना जन्म दिवस जो कि 9 मार्च को था धूम धाम से मनाया। कार्यक्रम का आयोजन विश्विद्यालय सेवा शिक्षक संघ द्वारा संचालित मिशन “माई बर्थ मई अर्थ” के तहत किया गया। इस अवसर पर अकादमी शाखा के सामने पचास से अधिक अशोका, पाम, एक्समस आदि के पौधे लगाए गए।
साथ ही “पर्यावरण और हम” विषयक एक परिचर्चा भी आयोजित की गई।

मुख्य अतिथि कुलपति प्रोफेसर डॉ. राम किशोर प्रसाद रमण ने कार्यक्रम की भूरी-भूरी प्रशंशा की और डाॅ. रहमान को जन्मदिन की शुभकामनाएं और आशीर्वाद दिये। उन्होंने बताया कि हमें अपने पर्यावरण को अपने जीवन से जोड़ कर देखने की आवश्यकता है। वृक्ष के बगैर हम अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। हमें जल, जीवन और हरियाली के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता हैं। उन्होंने कहा कि हमारा कैंपस ग्रीन कैंपस के रुप में जाना जाए और इस मिशन को जन जन तक फैलाया जाए।

विशिष्ट अतिथि विश्वविद्यालय प्रति कुलपति प्रोफेसर डॉ. आभा सिंह ने कहा कि साफ सफाई हमारा धर्म है। स्वच्छ वातावरण और स्वस्थ पर्यावरण की आवश्यकता सभी को है। उन्होंने कहा कि हम शिक्षित हैं, तो हमारी सोच भी सार्थक होनी चाहिए। उन्होंने विश्वविद्यालय में सूखे पत्तों को वृक्षों के नीचे जलाने पर रोक लगाने और उन पत्तों से कंपोस्ट बनाने की जरूरत बताई। साथ ही इस बावत उनके प्रस्ताव पर सिंडिकेट में लिए गए निर्णय के अविलंब अनुपालन पर जोर दिया।

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के डाॅ. अफाक हाशमी एवं डॉ. जी. एम. अंसारी ने कहा कि माई बर्थ भाई अर्थ मिशन अनुकरणीय है। वे अपने विश्वविद्यालय में भी इस मिशन की शुरूआत करने की पहल करेंगे।

परिचर्चा का सफल संचालन बी एन एम यू सेवा शिक्षक संघ के महा सचिव प्रोफेसर डॉ. नरेश कुमार ने किया। उन्होंने पर्यावरण एवं जीवन पर विस्तृत प्रकाश डाला और माई बर्थ माई अर्थ के उद्देश्य को लोगों के सामने रखा। उन्होंने इस लोगो को आईपीआर से पंजीकृत होने की सूचना सदन को दी तो तालियों लोगों ने अभिनंदन किया। इस लोगो का भारत सरकार से ट्रेड मार्क होना बीएनएमयू के इतिहास में एक बड़ी उपलब्धि के रुप में माना गया। स्वच्छ वातावरण के लिए हरियाली आवश्यक है और इस मिशन विश्वविद्यालय के सभी कैंपस को स्वच्छ और हरा भरा बनाना है।

धन्यवाद ज्ञापन करते हुए डॉ. एम. आई. रहमान ने कहा कि हमारी सांसें स्वच्छ वातावरण और पर्यावरण की मोहताज हैं। यदि हम वृक्ष नहीं लगाएंगे तो हम समय से पहले ही समाप्त हो जायेंगे।

उन्होंने कुलपति एवं प्रति कुलपति को पवित्र कुरान पाक भेंट किया और बताया कि यह ग्रंथ पर्यावरण संरक्षण का उपदेश देता है।

इस अवसर पर कुलानुशासक डाॅ. बी. एन. विवेका, सीसीडीसी डॉ. इम्तियाज अंजुम, खेल सचिव डॉ. अबुल फजल, पीआरओ डाॅ. सुधांशु शेखर, मनोविज्ञान विभाग के शिक्षक डाॅ. शंकर कुमार मिश्र सहित विश्वविद्यालय के अन्य शिक्षक, पदाधिकारी, शिक्षेत्तार कर्मचारी और बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित थे।

BNMU। दर्शन परिषद् के अधिवेशन का शुभारंभ

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मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह सामाज में रहता है और अपने क्रियाकलापों का निर्वहन करता है। समाज में आर्थिक, राजनीति, धार्मिक, शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक रूप से मानव का संबंध स्थापित होता है। इन संबंधों को मजबूत बनाने में शिक्षा की भूमिका होती है और शिक्षा संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन में भी भूमिका निभाती है।

यह बात कुलपति प्रोफेसर डॉ. राम किशोर प्रसाद रमण ने कही वे दर्शन परिषद्, बिहार के 42वें अधिवेशन में उद्घाटन वक़्तव्य दे रहे थे। भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली द्वारा संपोषित यह त्रिदिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन स्नातकोत्तर दर्शनशास्त्र विभाग के तत्वावधान में ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा में आयोजित किया जा रहा है। इसका मुख्य विषय “शिक्षा, समाज एवं संस्कृति” था।

कुलपति ने कहा कि शिक्षा जीवन की ज्योति है। यह समाज का प्राण वायु है। शिक्षा के बिना समाज, संस्कृति एवं जीवन अधूरा है।

उन्होंने कहा कि प्राचीन भारत में शिक्षा की सुदृढ़ व्यवस्था रही है। हमारे नालंदा, विक्रमशिला एवं तक्षशिला विश्वविद्यालय की दुनिया में प्रसिद्धि है और अपने ज्ञान एवं दर्शन के कारण ही हम विश्वगुरू के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं। लेकिन आज शिक्षा में कमी आ गई है। हमें इस कमी को दूर करना है और सबको मिलकर पुनः भारत को विश्वगुरू बनना है। इसकी जिम्मेदारी सभी शिक्षकों एवं विद्यार्थियों पर है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा नीतियों के
प्रभावी क्रियान्वयन के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार के बीच सहयोग एवं समन्वय की जरूरत है। मौजूदा कानूनों में सुधार करने और कई नए कानूनों का निर्माण करना भी आवश्यक है। वित्तीय संसाधनों में वृद्धि एवं उसका समुचित प्रबंधन करने, पाठ्यक्रमों में बदलाव, नए शिक्षण संस्थानों की स्थापना और योग्य शिक्षकों की नियुक्ति एवं उनका समुचित प्रशिक्षण भी जरूरी है।

सभाध्यक्ष प्रोफेसर दर्शनशास्त्र विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. केदारनाथ तिवारी ने कहा कि आज शिक्षा एवं संस्कृति में कई विडम्बनाएँ एवं विरोधाभास आ गया है। इसमें समाज बुरी तरह फंस गया है। इन्हीं कारणों से समाज में विकृति आ गई हैं। समाज दिशाहीन एवं दिग्भ्रमित है। हमें इसका निदान खोजना होगा और इसके लिए सभी स्तरों पर नैतिकता के कवज को मजबूत करना जरूरी है।

मुख्य अतिथि भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रमेशचन्द्र सिन्हा ने कहा कि भारतीय दर्शन एवं संस्कृति मूल्यों पर आधारित है। इन्हीं प्राचीन जीवन मूल्यों को अपनाकर हम समाज, राष्ट्र एवं विश्व का कल्याण कर सकते हैं।

उन्होंने कहा कि आज शिक्षा का काफी विकास हुआ है। लेकिन आज भी वंचितों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पा रही है। हमें समतामूलक एवं शोषणविहीन समाज बनाने के लिए शिक्षा के क्षेत्र में समता लाने की जरूरत है। भारतीय जीवन मूल्यों को केंद्र में रखकर शिक्षा नीति बनाने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में मातृभाषा पर काफी ध्यान दिया गया है। मातृभाषा के माध्यम से ही सृजनात्मकता आती है। अन्य भाषाओं में सृजनशिलता नहीं आ पाती है। टी एस इलियट की तरह का कोई भारतीय अंग्रेजी में नहीं लिख पाया। संस्कृत में कालीदास, वाचस्पति मिश्र, मंडन मिश्र एवं गंगेश उपाध्याय की रचनाओं का काफी महत्व है। यदि ये लोग अंग्रेजी में लिखते तो शायद यह नहीं हो सकती।

विशिष्ट अतिथि नवनालंदा महाविहार के कुलपति प्रोफेसर डॉ. बैद्यनाथ लाभ ने कहा कि भारत में गुरूकुल शिक्षा पद्धति चल रही थी। हमारी यह प्राचीन शिक्षा पद्धति काफी विकसित थी। हमारे संस्कृति, पाली एवं प्राकृत के ग्रंथों में ज्ञान का भंडार छिपा है।
लेकिन अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति ने हमारी शिक्षा-पद्धति को हाशिये पर ला खड़ा किया और हमारे साहित्य, दर्शन एवं पूरी ज्ञान परंपरा को काफी नुकसान पहुंचाया।

उन्होंने कहा कि हमें भारत एवं भारतीयता को केंद्र में रखकर शिक्षा व्यवस्था का पुनर्गठन करने की जरूरत है। हमें यूरोपीय एवं पश्चिम की दृष्टि से सोचना-समझना बंद करना होगा और हीनभावन से मुक्त होकर अपना राष्ट्रीय गौरवबोध जगाना होगा।

विशिष्ट अतिथि बीएनएमयू, मधेपुरा की प्रति कुलपति प्रो. (डॉ.) आभा सिंह ने कहा कि साधरण तौर पर एक जगह पर कुछ लोग रहने लग जाते हैं, तो समूह बन जाता है। परन्तु वास्तव में समाज तब बनता है, जब एक जगह वस्थित लोग हों या एक जगह ना भी हो, दूर-दूर ही क्यों ना हो, लेकिन नैतिक मूल्यों को शेयर करते हो, तब समाज बनता है और समाज के ये नैतिक मूल्य उसके साहित्य, उसकी कलाओं, विज्ञान आदि में प्रकाशित होते है।

उन्होंने कहा कि समाज से संस्कृति तक की यात्रा में शिक्षा का महत्वपूर्ण योगदान होता है। शिक्षा ही वह कड़ी हैं, जो समाज को संस्कृति के रूप में रूपांतरित करती है। शिक्षा के द्वारा उन मूल्यों का सम्प्रेषण होता है, जो समाज को सुसंस्कृत करने में सहायक होते हैं। शिक्षा का सम्बन्ध व्यक्ति एवं समाज दोनों होता है। व्यक्ति और समाज दोनों के निर्माण में शिक्षा का योगदान होता हैं।

उन्होंने कहा कि भारत की मूल विशेषता उसकी आध्यात्मिकता है। आध्यात्मिकता एवं दर्शन ही रचनात्मकता का आधार है।

पूर्व मंत्री डाॅ. रवीन्द्र कुमार एवं कुलसचिव डाॅ. कपिलदेव प्रसाद ने सम्मानित अतिथि के रूप में आयोजन की सराहना की।

इसके पूर्व अतिथियों का लेफ्टिनेंट गुड्डू कुमार के नेतृत्व में एनसीसी के कैडेट्स ने गार्ड ऑफ ऑनर दिया। कार्यक्रम की शुरुआत अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर की। उस दौरान खुशबू शुक्ला ने संस्कृति में मंगलाचरण किया। अतिथियों का अंगवस्त्रम्, पुष्पगुच्छ एवं मोमेंटो से स्वागत किया गया।

स्मारिका, दार्शनिक अनुगूँज पत्रिका और डाॅ. मृत्युंजला कुमारी की पुस्तक बौध साधना पद्धति का विमोचन किया गया। इस अवसर पर प्रोफेसर डाॅ. प्रभु नारायण मंडल को प्रोफेसर सोहनराज लक्ष्मी देवी तातेड़ लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्ड और डाॅ. कमलेंद्र कुमार को सर्वश्रेष्ठ पुस्तक पुरस्कार प्रदान किया गया।
रमेश झा महिला महाविद्यालय के संगीत के शिक्षक डाॅ. गिरिधर श्रीवास्तव पुटीस के नेतृत्व में छात्राओं ने स्वागत गान, कुलगीत एवं होली गीत प्रस्तुत किया। राष्ट्रगान जन गण मन के सामूहिक गायन के साथ उद्घाटन समारोह संपन्न हुआ।

स्वागत भाषण पूर्व प्रभारी कुलपति प्रोफेसर डॉ. ज्ञानंजय द्विवेदी और संचालन जनसंपर्क पदाधिकारी डाॅ. सुधांशु शेखर ने किया। धन्यवाद ज्ञापन प्रधानाचार्य डाॅ. के. पी. यादव ने की। दर्शन परिषद्, बिहार के अध्यक्ष प्रोफेसर बी. एन. ओझा ने परिषद् का परिचय और महामंत्री डाॅ. श्यामल किशोर ने प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।

इस अवसर पर प्रोफेसर डॉ. नरेश प्रसाद तिवारी, प्रोफेसर डॉ. शंभू प्रसाद सिंह, डॉ. पूनम सिंह, डॉ. शैलेश कुमार सिंह, डॉ. किस्मत कुमार सिंह, डॉ. शैल कुमारी, डॉ. मधुबाला मिश्र, डॉ. वीणा कुमारी, डॉ. मुकेश कुमार चौरसिया, डॉ. नीरज प्रकाश, आदि उपस्थित थे।

कार्यक्रम के आयोजन में डॉ. जवाहर पासवान, डाॅ. सुभाष पासवान, डाॅ. राजकुमार रजक, डॉ. शंकर कुमार मिश्र, डाॅ. प्रत्यक्षा राज, डाॅ. पूजा कुमारी, डाॅ. अमरेन्द्र कुमार, डाॅ. रणधीर कुमार सिंह, डाॅ. पंकज कुमार, डाॅ. स्वर्ण मणि, सौरभ कुमार, रंजन कुमार, माधव कुमार, दिलीप कुमार दिल, इशा असलम, बिमल कुमार, डाॅ. प्रियंका सिंह, अमरेश कुमार अमर, सारंग तनय, सौरभ कुमार चौहान, मनीष कुमार, डेविड यादव आदि ने सहयोग किया।

BNMU। नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन की चुनौतियों एवं संभावनाओं पर विमर्श

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*नई शिक्षा नीति पर सेमिनार/ वेबिनार आयोजित

क्रांतिकारी परिवर्तन की शुरूआत है नई शिक्षा नीति : कुलपति

भारत की नई शिक्षा नीति भारत सरकार द्वारा 29 जुलाई, 2020 को घोषित की गई है। यह शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन की शुरूआत है। हमें इसके सम्यक् क्रियान्वयन के लिए विभिन्न स्तरों पर ठोस पहल करने की जरूरत है।

यह बात कुलपति प्रो. (डॉ.) राम किशोर प्रसाद रमण ने कही वे शनिवार को भारतीय शिक्षण मंडल एवं नीति आयोग के संयुक्त सौजन्य से शिक्षाशास्त्र विभाग, भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा में आयोजित सेमिनार/ वेबिनार में अध्यक्षीय अभिभाषण दे रहे थे। इसका विषय “नई शिक्षा नीति का क्रियान्वयन : चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ” था।

उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार के बीच सहयोग एवं समन्वय की जरूरत है। मौजूदा कानूनों में सुधार करने और कई नए कानूनों का निर्माण करना भी आवश्यक है। वित्तीय संसाधनों में वृद्धि एवं उसका समुचित प्रबंधन करने, पाठ्यक्रमों में बदलाव, नए शिक्षण संस्थानों की स्थापना और योग्य शिक्षकों की नियुक्ति एवं उनका समुचित प्रशिक्षण भी जरूरी है।

उन्होंने कहा कि शिक्षा ही किसी भी देश एवं उसके नागरिकों की प्रगति का मुख्य आधार है। इसलिए भारत सरकार ने मौजूदा शिक्षा प्रणाली में अपेक्षित बदलावों के लिए नई शिक्षा नीति की घोषणा की है। यह विद्यार्थियों को जाब सीकर नहीं, बल्कि जाॅब क्रिएटर बनाएगी।

 

भारतीयता पर आधारित है नई शिक्षा नीति : मुख्य अतिथि

मुख्य अतिथि नीलाम्बर-पीताम्बर विश्वविद्यालय, डालटनगंज (झारखंड) के कुलपति प्रो. (डॉ.) राम लखन सिंह ने कहा कि युगों-युगों से भारत में गुरूकुल शिक्षा पद्धति चल रही थी। हमारी यह प्राचीन शिक्षा पद्धति काफी विकसित थी और हम विश्वगुरू कहलाते थे। 1830 में केवल बिहार एवं बंगाल में एक लाख से अधिक गुरूकुल थे।

उन्होंने कहा कि अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति ने हमारी शिक्षा-पद्धति को हाशिये पर ला खड़ा किया। विशेषकर 1835 में आई मैकाले की शिक्षा नीति ने भारतीय शिक्षा नीति को काफी नुकसान पहुंचाया। अब पुनः भारत एवं भारतीयता को केंद्र में रखकर एक शिक्षा नीति बनाई गई है। यह नई शिक्षा नीति वास्तव में राष्ट्रीय शिक्षा नीति है। यह हमारी प्राचीन शिक्षा नीति को पुनः प्रतिष्ठत करने का प्रयास है। इस शिक्षा नीति का क्रियान्वयन हमारी मुख्य चुनौति है। इसके क्रियान्वयन के लिए हमें शिक्षण संस्थानों में आधारभूत संरचनाओं का विकास करना होगा और शिक्षकों कमी दूर करनी होगी।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारत की भाषा, संस्कृति एवं परिवेश पर काफी ध्यान दिया गया है। हम मातृभाषा में शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे और अपने परिवेश का प्रकटीकरण कर सकेंगे।

उन्होंने विवेकानन्द को उद्धृत करते हुए कहा कि शिक्षा का मुख्य उद्देश्य हमारे अंदर अतर्निहित क्षमताओं का प्रकटीकरण है।

भारतीय संस्कृति पर आधारित है नई शिक्षा नीति : उद्घाटनकर्ता

उद्धाटनकर्ता भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के अध्यक्ष प्रो. (डॉ.) रमेशचन्द्र सिन्हा ने कहा कि नई शिक्षा नीति में भारतीय दर्शन एवं संस्कृति पर काफी ध्यान दिया गया है। यह भारतीय जीवन मूल्यों को केंद्र में रखकर बनाई गई है।

उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति में मातृभाषा पर काफी ध्यान दिया गया है। मातृभाषा के माध्यम से ही सृजनात्मकता आती है। अन्य भाषाओं में सृजनशिलता नहीं आ पाती है। टी एस इलियट की तरह का कोई भारतीय अंग्रेजी में नहीं लिख पाया। संस्कृत में कालीदास, वाचस्पति मिश्र, मंडन मिश्र एवं गंगेश उपाध्याय की रचनाओं का काफी महत्व है। यदि ये लोग अंग्रेजी में लिखते तो शायद यह नहीं हो सकती।

रचनात्मकता केंद्रीय है नई शिक्षा नीति : प्रति कुलपति 

विशिष्ट अतिथि बीएनएमयू, मधेपुरा की प्रति कुलपति प्रो. (डॉ.) आभा सिंह ने भारत की मूल विशेषता उसकी आध्यात्मिकता है। आध्यात्मिकता एवं दर्शन ही रचनात्मकता का आधार है।

उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति की यह बड़ी विशेषता है कि यह रटंत विद्या को छोड़कर रचनात्मकता पर जोर देती है। रचनात्मकता की शुरूआत बचपन से ही होती है। अतः स्कूली शिक्षा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि सभी बच्चों को समान एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करानी होगी। पाठ्यक्रमों में सम्यक् परिवर्तन लाना होगा और मूल्याकंन पद्धति में आमूल-चूल बदलाव लाने होंगे। हमें श्रेष्ठ प्रतिभाओं को शिक्षण पेशे से जोड़ना होगा। इसके लिए शिक्षण पेशे को प्रतिष्ठा के साथ-साथ सुविधाओं से भी जोड़ना होगा।

उन्होंने कहा कि आज पारंपरिक शिक्षा हाशिए पर है। वोकेशनल एवं प्रोफेशनल कोर्स की बाढ़ आ गई है। लेकिन इन कोर्सों के बाद भी विद्यार्थियों को कोई अच्छा रोजगार नहीं मिल पाता है।

नई शिक्षा नीति से विश्वगुरू बनेगा भारत : मुख्य वक्ता

मुख्य वक्ता कोलहन विश्वविद्यालय, धनबाद (झारखंड) के डॉ. सुशील कुमार तिवारी ने कहा कि नई शिक्षा नीति का मूलमंत्र मानता है। शिक्षा में स्वदेशी भाव का जागरण ही इसका मुख्य उद्देश्य है। यह शिक्षा के क्षेत्र की सभी समस्याओं के सम्यक् समाधान का प्रयास है।

उन्होंने कहा कि भारत में पुनः विश्व गुरु बनने की क्षमता है। नई शिक्षा नीति पुनः भारत को शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी बनाएगी। भारतीय शिक्षा का पुनरुत्थान करेगी और नालंदा, विक्रमशिला एवं तक्षशिला के गौरब को पुनः स्थापित करेगी।

उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षक को आचार्य कहते हैं। हमारे यहाँ आचार्यों का महत्व राजाओं से भी अधिक था। हमें पुनः शिक्षकों के अंदर आत्म गौरवबोध लाना है और समाज में शिक्षकों को समुचित प्रतिष्ठा दिलानी है।

इस अवसर पर सम्मानित वक्ता के रूप में भारतीय शिक्षण मंडल के ओमप्रकाश सिंह, मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) उषा सिन्हा, पूर्व डीएसडब्लू प्रो. (डॉ.) नरेन्द्र श्रीवास्तव एवं अकादमिक निदेशक प्रो. (डॉ.) एम. आई. रहमान ने भी अपने-अपने विचार व्यक्त किए।

इसके पूर्व कार्यक्रम की शुरुआत में पार्वती विज्ञान महाविद्यालय की हेमा कुमारी ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। अतिथियों का स्वागत शिक्षाशास्त्र विभाग के प्रोफेसर इंचार्ज प्रो. (डॉ.) नरेश कुमार एवं धन्यवाद ज्ञापन महाविद्यालय निरीक्षक कला डाॅ. ललन प्रसाद अद्री ने की। संचालन जनसंपर्क पदाधिकारी डाॅ. सुधांशु शेखर ने किया।

इस अवसर पर डाॅ. जितेन्द्र कुमार सिंह, डाॅ. विनय कुमार चौधरी, डाॅ. अरूण कुमार, डाॅ. राम सिंह यादव, शिक्षण मंडल के विस्तारक आनंद कुमार, शोधार्थी सौरभ कुमार, अमरेश कुमार अमर, सौरभ कुमार चौहान, माधव कुमार, संजीव कुमार, मुकेश कुमार, संतोष कुमार आदि उपस्थित थे।

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