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BNMU। डा. उत्पलकांत सिंह को श्रद्धांजलि

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बड़े शौक से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं सो गए दास्तां कहते-कहते।
चिठ्ठी ना कोई संदेश जाने कहाँ आप चले गये हो ?

देश ने आज एक कोहिनूर खो दिया। एशिया के चर्चित शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ उत्पलकांत सिंह अब हमारे बीच नहीं रहे मुझे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा।

डा. उत्पलकांत सिंह जी से मुलाकात
आज भी मुझे याद है डॉ. उत्पलकांत सिंह जी का क्लिनिक नाला रोड पटना में हुआ करता था। मैं बचपन से ही बहुत बीमार रहता था। मेरा बचपन से ही इलाज डॉ. उत्पल कांत सिंह जी के क्लिनिक में ही हुआ करता था। वो मनहूस दिन मुझे आज भी याद है मैं कालाजार की बीमाड़ी से पीड़ित था। बिहार के करीब करीब सभी डॉ. मुझे रेफर कर दिया था, लेकिन डॉ. उत्पलकांत सिंह जी ने मुझे बिल्कुल ठीक कर दिए।

लगातार मेरा ट्रीटमेंट बचपन से 15 वर्ष तक इनकी ही देखभाल में हुआ। सच में मैं कह सकता हूँ कि वे डाक्टर नहीं भगवान थे।
मैं अगर आज जिंदा हूँ, तो सिर्फ डाक्टर उत्पलकांत सिंह जी के ही बदौलत।

– डेविड यादव, जंतु विज्ञान विभाग, बी. एन. मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा, बिहार

BNMU। बैठक 8 जनवरी, 2021 को

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बैठक 8 जनवरी, 2021 को

विश्वविद्यालय छात्र संघ के पदाधिकारियों और विश्वविद्यालय क्षेत्रान्तर्गत सभी छात्र एवं युवा संगठनों के प्रतिनिधियों की एक आवश्यक बैठक 8 जनवरी शुक्रवार को अपराह्न एक बजे से केंद्रीय पुस्तकालय सभागार में कुलपति प्रोफेसर डॉ. आर. के. पी. रमण की अध्यक्षता में सुनिश्चित है। इसमें विश्वविद्यालय के विकास से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। जनसंपर्क पदाधिकारी डाॅ. सुधांशु शेखर ने बताया कि इस बावत सभी संबंधित व्यक्तियों को वाट्सप के माध्यम से सूचना दी गई है।

सेवा में,
*अध्यक्ष/ सचिव*
विश्वविद्यालय छात्र संघ और सभी छात्र-युवा संगठन
बी. एन. मंडल विश्वविद्यालय क्षेत्रान्तर्गत

महाशय,
निदेशानुसार सूचित करना है कि
विश्वविद्यालय छात्र संघ के पदाधिकारियों और विश्वविद्यालय क्षेत्रान्तर्गत सभी छात्र एवं युवा संगठनों के प्रतिनिधियों की एक आवश्यक बैठक 8 जनवरी शुक्रवार को अपराह्न एक बजे से केंद्रीय पुस्तकालय सभागार में कुलपति प्रोफेसर डॉ. आर. के. पी. रमण की अध्यक्षता में सुनिश्चित है। इसमें विश्वविद्यालय के विकास से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की जाएगी।

अतः, सादर अनुरोध है कि ससमय इस बैठक में भाग लेने का कष्ट करें।

माननीय कुलपति महोदय के आदेशानुसार

*डाॅ. सुधांशु शेखर*
जनसंपर्क पदाधिकारी

BNMU। सीनेट की बैठक की तैयारियों की समीक्षा

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सीनेट की बैठक की तैयारियों की समीक्षा

मधेपुरा ही मेरी जन्मभूमि एवं कर्मभूमि दोनों है। ऐसे में मेरी एकमात्र निष्ठा मधेपुरा के प्रति ही है। मैं यहीं का शिक्षक हूँ और यहीं विभिन्न रूपों में काम करने के बाद कुछ महीनों से इस नई जिम्मेदारी को निभाने का प्रयास कर रहा हूँ। यह विश्वविद्यालय ही हमारे लिए मंदिर है।

यह बात कुलपति कुलपति प्रोफेसर डॉ. राम किशोर प्रसाद रमण ने कही। वे गुरूवार को केंद्रीय पुस्तकालय सभागार में आयोजित सभी पदाधिकारियों की बैठक की अध्यक्षता कर रहे थे।

यह बैठक आगामी 12 जनवरी को आयोजित सीनेट की बैठक की तैयारियों की समीक्षा को लेकर आयोजित की गई। इसमें सीनेट के सफल आयोजन हेतु विभिन्न कमेटियों का गठन किया गया। इसमें स्वागत एवं प्रेक्षागृह व्यवस्था समिति, सामग्री वितरण समिति, साफ-सफाई समिति, भोजन एवं अल्पाहार समिति, सुरक्षा समिति, लेखनी एवं कार्यालय कार्य समिति, यात्रा भत्ता एवं वित्त शाखा संबंधी समिति, प्रेस समिति आदि का गठन किया गया।

कुलपति ने कहा कि हमें अपने अतीत से प्रेरणा एवं सीख लेनी है और वर्तमान को संवारना है। हमें मालूम है कि हमारा सिर्फ वर्तमान पर अधिकार है। हम अपने वर्तमान को सजाएंगे-संवारेंगे, तो भविष्य भी उज्ज्वल बनेगा। वर्तमान पर ही भविष्य भी निर्भर करता है। इसलिए हम सब मिलकर विश्वविद्यालय के वर्तमान को बेहतर बनाने का प्रयास करें। सभी पदाधिकारी, शिक्षक, कर्मचारी एवं विद्यार्थी अपनी-अपनी जिम्मेदारियों को निभाएँ और अपने-अपने स्वधर्म का पालन करें। जो जहाँ हैं, वहाँ विश्वविद्यालय के बारे में सोचें और विश्वविद्यालय के हित में काम करें। हम सब मिलकर काम करें- कदम मिलाकर चलें।

कुलसचिव डाॅ. कपिलदेव प्रसाद ने बताया कि सीनेट के पूर्व 9 जनवरी को सिंडिकेट की बैठक सुनिश्चित है। उन्होंने सभी पदाधिकारियों से अपील की कि वे अविलंब सीनेट की गत बैठक से संबंधित अनुपालन प्रतिवेदन कुलसचिव कार्यालय में जमा कराएँ। उन्होंने बताया कि सीनेट की बैठक के बाद शीघ्र ही दीक्षांत समारोह के आयोजन को लेकर एक आवश्यक बैठक आयोजित की जाएगी।

बैठक में वित्तीय परामर्शी सुरेशचन्द्र दास, डीएसडब्लू डाॅ. अशोक कुमार यादव, कुलानुशासक डाॅ. विश्वनाथ विवेका, कुलसचिव डाॅ. कपिलदेव प्रसाद, वित्त पदाधिकारी रामबाबू महतो, अकादमिक निदेशक प्रोफेसर डॉ. एम. आई. रहमान, परीक्षा नियंत्रक डाॅ. नवीन कुमार, एआईक्यूसी निदेशक मोहित कुमार घोष, बीएओ एम. एस. पाठक, महाविद्यालय निरीक्षक कला एवं वाणिज्य डाॅ. ललन प्रसाद अद्री, महाविद्यालय निरीक्षक विज्ञान डाॅ. उदयकृष्ण, परिसंपदा पदाधिकारी डाॅ. गजेन्द्र कुमार, नोडल पदाधिकारी डाॅ. अशोक कुमार सिंह, एनएसएस पदाधिकारी अभय कुमार, केंद्रीय पुस्तकालय के प्रोफेसर इंचार्ज डाॅ. अशोक कुमार, खेल पदाधिकारी डाॅ. अबुल फजल, डाॅ. शशि भूषण, डाॅ. अमरेन्द्र मिश्र, आरपी राजेश, डाॅ. शंकर कुमार मिश्र, जनसंपर्क पदाधिकारी डाॅ. सुधांशु शेखर आदि उपस्थित थे।

BNMU। डाॅ. अमरेन्द्र का जन्मदिवस

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हिन्दी और अंगिका साहित्य की अनेक विधा कविता, गीत, ग़ज़ल, नाटक, उपन्यास, महाकाव्य,समीक्षा आदि में लगभग 70 पुस्तकों के रचयिता भागलपुर निवासी विद्वान डा. अमरेन्द्र को 72 वां जन्मदिवस पर बधाई एवं शुभकामनाएं।

BNMU। कोशी के लाल डॉ. परमेश्वर प्रसाद यादव को नमन/ डेविड यादव

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कोशी के लाल डॉ. परमेश्वर प्रसाद यादव को नमन/ डेविड यादव

कहा गया है कि जिसकी कीर्ति होती है, वह हमेशा जीवित रहता है। सचमुच इंसान इस धरती पर आते हैं और कुछ दिनों में चले जाते हैं। लेकिन उनके विचार एवं कार्य हमेशा हमारे बीच किसी न किसी रूप में मौजूद रहते हैं। कोशी के लाल डॉ. परमेश्वर प्रसाद यादव उर्फ अश्वनी बाबू ( 5 जनवरी, 1957-04 सितंबर, 2012) भी अपने विचारों एवं कार्यों के कारण हमारे बीच आज भी मौजूद हैं। आप अपने विचारों एवं कार्यों के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। विशेष रूप से मधेपुरा एवं सुपौल जिले में शिक्षा के विकास में आपके द्वारा किए कार्य हमेशा अविस्मरणीय रहेंगे। आपने अपने जीवन काल में कई पदों को सुशोभित किया।

किसान और राजनीतिक पृष्ठभूमि वाले परिवार में आपका जन्म 5 एक 1957 को हुआ। माता का नाम श्रीमती सुशीला देवी और पिता का नाम श्री मिश्रीलाल यादव था। आप माता- पिता के जेष्ठ पुत्र थे और इस कारण आप हमेशा उनके दुलारे रहे। माता-पिता का आशीर्वाद और दुआएं हमेशा आपके साथ रहा। शायद इसी वजह से आप लगातार सफलता की सीढ़ियां चढ़ते रहे और अपने ज्ञान एवं कौशल का सदुपयोग समाज की उन्नति के लिए किया।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी अश्वनी बाबू की प्रारंभिक शिक्षा अपने पैतृक गांव में हुई। पुनः मैट्रिक स्तर की शिक्षा टीपी कॉलेजिएट स्कूल, मधेपुरा से हुई। विज्ञान विषय में बचपन से आपकी गहरी अभिरुचि थी, जिसकी वजह से आपने विज्ञान संकाय में टीपी कॉलेज, मधेपुरा से इंटर किया‌ पुनः बीएससी जूलॉजी ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की। आप अपने शिक्षण कार्यक्रम को जारी रखते हुए स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए कानपुर चले गए जहां के डीएवी कॉलेज, कानपुर से आपने एमएससी जूलॉजी में प्रथम श्रेणी में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की।

आप बचपन से ही अपने बड़े पापा पूर्व सांसद, पूर्व कुलपति एवं पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. महावीर प्रसाद यादव के सानिध्य में रहे।आपके जीवन पर उनकी जीवनशैली का गहरी छाप रही। आपने अपने परिश्रम और संस्कार की बदौलत जो भी ज्ञान हासिल किया उसे आप जनों में बांटना चाहते थे‌। आप चाहते थे कि कोसी क्षेत्र के पिछड़े इलाके के छात्र-छात्राएं अपने आप को शिक्षित कर अपने जीवन स्तर को ऊंचा उठाएं। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आपने अपना प्रयास जारी रखा और तत्कालीन त्रिवेणीगंज कॉलेज, त्रिवेणीगंज में जंतु विज्ञान विभाग के व्याख्याता एवं विभागाध्यक्ष नियुक्त किए गए‌। यहां के स्थानीय विधायकों और पूर्व मंत्री श्री अनूप लाल यादव का निरंतर आपको आशीर्वाद मिलता रहा‌‌। आपने हमेशा इस महाविद्यालय के ढांचागत व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन लाने का प्रयास किया। इसमें शत-प्रतिशत सफल भी रहे। आप हमेशा महाविद्यालय के तत्कालीन प्रखर वक्ता प्रोफेसर सोनेलाल कामत को अपने मित्रों और सहयोगियों के साथ इस पुनीत कार्य में सहयोग करते रहे। आपकी प्रबंधन क्षमता और कौशल की सराहना हमेशा संपूर्ण महाविद्यालय के कर्मचारियों अध्यापकों समाज के सभी वर्गों के बीच मुक्त कंठ से होती रही‌। आपके अद्भुत नेतृत्व कौशल, प्रबंधन क्षमता और शैक्षणिक उपलब्धियों को देखते हुए कॉलेज सर्विस कमिशन, पटना, बिहार द्वारा आपको इस महाविद्यालय का प्रचार्य नियुक्त किया गया। आपकी अद्भुत कार्य शैली ने इस महाविद्यालय को एक नए मुकाम पर लाकर खड़ा किया। एक नई पहचान दी। आप यहीं रुकने वाले नहीं थे आप हमेशा यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन, नई दिल्ली के संपर्क में रहें। यहां से वित्तीय अनुदान प्राप्त कर आप इसे महाविद्यालय के चौमुखी विकास में लगे रहे। आपने इस महाविद्यालय को एक नए स्वरूप में लाकर खड़ा किया। शिक्षा के साथ-साथ खेलकूद एवं सांस्कृतिक गतीविधियों की उन्नति के लिए आप निरंतर प्रयासरत रहे। महाविद्यालय की ख्याति समस्त मिथिलांचल में फैल गई यहां के छात्र-छात्राएं अब डॉक्टर, इंजीनियर, पब्लिक सर्विस कमीशन में जाने लगे। महाविद्यालय की उपलब्धियां से प्रभावित होकर एक तरह से क्षेत्र का तमाम शिक्षाविद इससे जुड़े। यह महाविद्यालय शिक्षा का हब बन गया। आपने अपने प्रधानाचार्य काल में महाविद्यालय को यूजीसी से 2 एफ और 12 बी की मान्यता दिलाई।

आप यहीं नहीं रुके अपने ज्ञानार्जन और शोध के कार्य को आगे बढ़ाते हुए आपने बी. एन. मंडल यूनिवर्सिटी, मधेपुरा से पी-एच. डी. की उपाधि प्राप्त की। आप हमेशा क्षेत्र के गरीब छात्र-छात्राओं की चिंता करते रहे। उनके आर्थिक हालात को शिक्षा प्राप्त करने के मार्ग में कभी अवरोध बनने नहीं दिया। जहां तक संभव हो पाया, अपने सीमित संसाधनों में भी उन्हें सारी सुविधा मुहैया कराने की भरपूर कोशिश की‌। आप छात्र-छात्राओं के भविष्य के प्रति हमेशा चिंतित रहते थे। आपके मन में शिक्षक साथियों के लिए स्नेह और सम्मान का भाव रहता था। इसलिए आप अपने मित्रों के बीच काफी लोकप्रिय रहे। आप सामाजिक सोच के समग्र विकास के लिए समर्पित रहे। इसकी वजह यह भी कि आपने सिर्फ अपने कॉलेज, बल्कि क्षेत्र के तमाम महाविद्यालयों के विकास की चिंता करते थे और उसकी समस्यायों का समाधान ढूंढने का भी भरसक प्रयास करते थे। शायद यही वजह है कि आप को सर्वसम्मति से संबंद्ध डिग्री महाविद्यालय प्रधानाचार्य संघ का अध्यक्ष चुना गया। इस जिम्मेदारी का आपने बखूबी निर्वह्ण किया। आपके काम करने का दायरा काफी बढ़ गया। विश्वविद्यालय स्तर पर आपकी सलाह ली जाने लगी। आप सबके चहेते बन गए।शिक्षा खेल और सामाजिक कार्यों के क्षेत्र में इनके द्वारा स्थापित प्रतिमान हमें आज भी प्रेरित करते हैं।

आप छात्र-छात्राओं के भविष्य के प्रति हमेशा चिंतित रहते थे। आपके मन में शिक्षक साथियों के लिए स्नेह और सम्मान का भाव रहता था। आप सामाजिक सोच के समग्र विकास के लिए समर्पित रहे। 4 सितंबर, 2012 को आप महाविद्यालय के कार्य से पटना में थे और अचानक आप हमें छोड़ कर चले गए। लेकिन आपने कोसी क्षेत्र में शिक्षा के विकास के लिए जिस प्रकार काम किया वह हमेशा अविस्मरणीय रहेगा। बेशक आज आप सशरीर हमारे बीच मौजूद नहीं हैं, लेकिन आप सशरीर न हो कर भी विचारों के रूप में हमारे बीच मौजूद हैं। आपकी यश, कीर्ति एवं ख्याति हमेशा बनी रहेगी। आप हमेशा हमारी स्मृतियों में जीवित रहेंगे। आज की नवीं पुण्यतिथि पर आपको शत-शत नमन। आपके लिए पक्षियों में कुछ परिवर्तन करना करते हुए कहना चाहूंगा, ”बड़े गौर से सुन रहा था जमाना/ तुम्हीं चल दिए दास्तां कहते-कहते।”

BNMU। चला जाना नन्दकिशोर नवल का

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चला जाना नन्दकिशोर नवल का

2 सितंबर, 1937 को हाजीपुर के पास के गाँव चाँदपुरा में जन्म लेनेवाले नवल जी ने प्रयाण-दिवस मंगलवार, तदनुसार 12 मई, 2020 को अपने जीवन के 82 साल, 8 माह और 10 दिन पूरे किये थे। निराला-काव्य के विशेषज्ञ नवल जी लम्बी बीमारी के कारण शरीर छोड़ने के पूर्व लगभग दो दर्जन से अधिक पुस्तकें (मौलिक और संपादित)हम पाठकों को सौंप गये। उनमें अधिकतर काव्यालोचन-विषयक हैं। उन्होंने अपनी पी-एच.डी. की उपाधि ‘निराला का काव्य-विकास’ शीर्षक विषय पर शोध-कार्य संपन्न कर प्राप्त की थी। कुछ समय पहले उन्हें कालदेवता की पदचाप सुनाई पड़ी थी। उन्होंने पदचाप सुनकर कालदेवता को आश्वस्त भी किया था कि यदि कुछ मोहलत दे सकते हो तो दे दो, ताकि मैं कुछ अधूरा छोड़कर न जाऊँ। मैं भलीभाँति जानता हूँ कि यह दुनिया एक सराय है- एक मुसाफिरखाना। बटोही थोड़ी देर तक यहाँ अपनी थकन मिटाकर मंजिल की तरफ बढ़ जाता है। कोई आज तो कोई कल। मुसाफिरखाना तो मुसाफिरखाना है-
‘‘इस सरा में हूँ मुसाफिर, नहीं रहने आया।
रह गया थक के अगर आज तो कल जाऊँगा।।
आखिरकार वे चले गये वहाँ, जहाँ से कोई लौटकर नहीं आता। वे पुनर्जन्म को नहीं मानते थे। लेकिन, भारत के अधिकांश लोग मानते हैं और उनका विश्वास बार-बार कहता है कि वे फिर आएँगे- एक नयी सजधज के साथ।
अमर कुमार चौधरी ने डाॅ. योगेन्द्र के शोध-निर्देशन में ‘नन्दकिशोर नवल की आलोचना दृष्टि’ शीर्षक विषय पर पी-एच.डी. – उपाधि के निमित्त अपना शोध-प्रबंध समर्पित कर रखा है। मौखिकी शेष है। यह विषय मैंने ही सुझाया था। प्रारूपीकरण भी किया था। जाने की इतनी जल्दी होगी, हमें इसका तनिक भी भान नहीं था। ज्ञातव्य है कि नवलजी के परमादरणीय गुरु और मेरे धर्मपिता (स्व.) दशरथ राजहंस ने (से.नि. प्रधानाचार्य; बोकारो स्टील सिटी काॅलेज) बार-बार तकाजा किया था कि नवल पर कोई शोध-कार्य इस विश्वविद्यालय में हुआ कि नहीं? यदि नहीं तो करा या करवा दीजिए। यह विषय उन्हीें के तकाजों का परिणाम है।
स्वर्गीय राजहंस (दो वर्ष पूर्व फरवरी, 2018 में दिवंगत) ने नवल जी को हाईस्कूल में पढ़ाया था। मुरारका काॅलेज, सुलतानगंज आने के पूर्व कुछ समय तक वे नवलजी के गृह-जनपद के एक उच्चविद्यालय में पदस्थापित हुए थे। दोनों आजीवन गुरु-शिष्य का संबंध निभाते रहे। शिष्य ने प्रायः अपनी हर महत्त्वपूर्ण पुस्तक अपने गुरु को भेंट की। ऐसी दो पुस्तकें मेरे पास हैं- पहली, निराला: कृति से साक्षात्कार ( राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली; पहला संस्करण: 2009 ई.) और दूसरी, ‘मैथिलीशरण’ (वही; 2011 ई.) दोनों पुस्तकों के समर्पण-शब्द इस प्रकार हैं – ‘‘श्रद्धेय गुरुदेव श्री दशरथ राजहंस के प्रीत्यर्थ नंदकिशोर नवल/28.10.09 (9334343483) इसके साथ उन्होंने अपना मोबाइल नम्बर भी लिख दिया था। दूसरी पुस्तक के शब्द भी लगभग ऐसे ही हैं- ‘‘श्रद्धेय गुरुदेव, प्राचार्य श्री दशरथ राजहंस के अमित स्नेह को‘‘ – नंदकिशोर नवल /25.3.11
मेरी पत्नी ने जब अंगिका लोकगाथा ‘लचिका रानी’ पर आधारित पहला उपन्यास ‘प्रतिशोध’ शीर्षक से लिखा तो बाबू जी उसकी एक प्रति नवल जी के अवलोकनार्थ दे आए। ज्ञातव्य है कि इस लोकगाथा को लेकर डाॅ. विद्यारानी और अनिरुद्ध प्र. विमल ने भी उपन्यास-लेखन किया है। नवल जी ने आशीर्वाद स्वरूप लिखा- ‘‘प्रतिभा का लिखा उपन्यास ‘प्रतिशोध’ पढ़ा। प्रथम प्रयास जानकर अतीव प्रसन्नता हुई। अत्यंत प्रांजल भाषा में लिखे गये इस उपन्यास में आपकी शिक्षा-दीक्षा और व्यक्तित्व की छाप है। पुराने कथानक में युगीनबोध इस उपन्यास की विशेषता है। लिखती रहे। आशीर्वाद!’’
ज्ञातव्य है कि इस उपन्यास का फ्लैप-मैटर श्रद्धेय गुरुवर डाॅ. विजेन्द्र नारायण सिंह ने लिखा है।
डाॅ. नवल से मेरा प्रथम संक्षिप्त साक्षात्कार टी.एन. काॅलेज के तत्त्वावधान में 1980 में प्रो. रविभूषण के संयोजकत्व में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में हुआ था। उसमें हंसराज रहबर, काशीनाथ सिंह, पारसनाथ तिवारी महेश्वर, नचिकेता, खगेन्द्र ठाकुर प्रभृति विद्वान इकट्ठे हुए थे। वह संगोष्ठी बहुत अकादमिक नहीं थी। हिन्दी की चुनौतियाँ और निदान’ कुछ ऐसा विषय था। हंसराज रहबर और विजेन्द्र बाबू के बीच कुछ कहा-सुनी हो गयी थी। मैं हाल ही में ल. ना. मि. वि. वि., दरभंगा से यहाँ आया था।
डाॅ. नवल से दूसरा साक्षात्कार 1985 के मार्च में मारवाड़ी काॅलेज, भागलपुर के प्रशाल में राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान हुआ था। कुछ समय पहले मैं टी. एन. बी. काॅलेज से स्थानान्तरित होकर यहाँ आया था। स्वनामधन्य प्रधानाचार्य डाॅ. विष्णु किशोर झा ‘बेचन’ ने यू.जी.सी. की आर्थिक सहायता से छह दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया था। इसके सह-निदेशक डाॅ. खगेन्द्र ठाकुर और डाॅ. राजेन्द्र पंजियार बनाये गये थे तो उप-समायोजक क्रमशः डाॅ. बी.एन. अग्रवाल तथा डाॅ. बहादुर मिश्र। मुझ पर दैनिक प्रतिवेदन तैयार करने की जिम्मेदारी थी। 1985 के 13 मार्च से 18 मार्च तक चलनेवाले इस राष्ट्रस्तरीय अकादमिक अनुष्ठान का विषय था – ‘हिन्दी शिक्षण एवं व्याख्यान विधि’। इसके उद्घाटनकर्त्ता थे डाॅ. नामवर सिंह। इसमें भाग लेनेवाले विद्वानों के नाम हैं- डाॅ. लक्ष्मीनारायण मित्तल (उत्तर प्रदेश), डाॅ. सदानन्द सिंह (कोलकाता), डाॅ. नागेश्वर लाल (हजारीबाग), डाॅ. सिद्धनाथ कुमार, डाॅ. बालेन्दुशेखर तिवारी, डाॅ. उमेश प्र. शास्त्री (राँची), डाॅ. अवधेश्वर अरुण (मुजफ्फरपुर), डाॅ. गोपाल राय तथा डाॅ. नन्दकिशोर नवल (पटना), डाॅ. श्यामसुन्दर घोष (गोड्डा) प्रभृति। स्थानीय लोगों में, डाॅ. शशिशेखर तिवारी, डाॅ. तपेश्वरनाथ, (डाॅ.) रविभूषण, डाॅ. देवेन्द्र सिंह प्रभृति।
13 मार्च के अपराह्ण में उद्घाटन-सत्र को संबोधित करते हुए डाॅ. नामवर सिंह ने अपना बीज वक्तव्य दिया था। उन्होंने कहा कि जिसतरह किताबों से तैराकी के नुस्खे सीखकर तैराकी नहीं की जा सकती, उसीतरह हिन्दी शिक्षण की कोई पूर्वनिश्चित विधि नहीं होती है। मेधावी शिक्षक मेधा और कौशल के बल पर पढ़ाना सीख जाता है।
16 मार्च के प्रथम सत्र के तृतीय वक्ता डाॅ. नन्दकिशोर नवल (रीडर: हि. वि.; पटना वि. वि.) थे, जबकि प्रथम और द्वितीय क्रमशः डाॅ. खगेन्द्र ठाकुर तथा डाॅ. तपेश्वरनाथ। इस सत्र की अध्यक्षता डाॅ. नागेश्वर लाल ने की थी। डाॅ. नवल के लिखित वक्तव्य का शीर्षक था- ‘‘कविता का अध्यापन’’।
मंच-संचालक द्वारा आमंत्रित किये जाने के क्षणोपरान्त बग-बग सफेद कुर्ता-पाजामा में एक गोरा-बुर्राक सौम्य-सुदर्शन पुरुष-विग्रह प्रकट हुआ। यही थे डाॅ. नवल। उन्होंने अपने वक्तव्य की शुरुआत इन शब्दों में की- ‘‘कविता के अध्यापन की सर्वाधिक प्रचलित पद्धति यह है कि कविता पढ़ाई जाए, पर उस पर कुछ न कहा जाए, जो भी कहा जाए, वह उसके बारे (कविता के बारे में) में हो।’’ उनका आशय यह था कि कविता और उसके कवि और उसके देशकाल आदि के बारे में कहकर न उलझाया जाए। आगे उन्होंने कहा कि कविता मानवीय व्यक्तित्व को समृद्ध करने का सबसे बड़ा साधन है। यदि हमने कविता के मोहक संसार में विद्यार्थियों को उतारकर उसकी भावनाओं और विचारो से समृद्ध नहीं किया तो फिर अध्यापन बेकार है। दिनकर की कोई कविता स्वाधीनता की चेतना के किस स्तर को उद्बुद्ध करती है, बल्कि कहेंगे कि दिनकर की कविता अंगारों पर खिला हुआ इन्द्रधनुष है। प्रसाद की कविता पढ़नी हो तो कहेंगे – प्रसाद की कविता पूर्णिमा की रात्रि में समुद्र की लहरों पर फिसलती हुई चाँदी की तश्तरी है। गोया यह कि कविता के भीतर एक कविता सिरजनी चाहिए।
आगे उन्होंने कहा कि कविता की प्रभाववादी शैली इन दिनों ह्रास पर है। इसमें अध्यापक कविता को दो भागों में बाँट देते हैं – भावपक्ष और कलापक्ष। यह पद्धति यांत्रिक (Mechanised) है। हेगेल ने कहा कि वस्तु रूप का अमूर्त रूप है और रूप वस्तु का मूर्त रूप। इससे कविता में रूप और वस्तु की एकता को समझा जा सकता है।
पिछले दिनों कविता की एक नई पद्धति सामने आई है। वह अमरीकी पद्धति है। इसके अनुसार कविता एक रूप है, एक संरचना है। उन्होंने कविता की समाज शास्त्री की शैली पर भी विचार किया। थोड़ी देर के लिए हाॅल में तब खुसुर-पुसुर शुरू हो गई, किसी-किसी कोने से तेज विवादी स्वर उभरा, जब उन्होंने निराला की कविता ‘तोड़ती पत्थर’ में प्रयुक्त ‘सामने तरुमालिका अट्टालिका’ का संबंध पं. नेहरु के आवास ‘आनन्द भवन’ से जोड़ दिया। यह निराधार भी नहीं था; क्योंकि आचार्य नंददुलारे वाजपेयी ने यही अर्थ निकाला था। वाजपेयी जी ने मजदूरिन को आनंद भवन के सामने दोपहर की झुलसाने वाली गर्मी में पत्थर तोड़ते देखा था। कुछ लोगों को एतराज हुआ। नवलजी ने टिप्पणी की कि ऊपर से यह कविता एक मामूली प्रगतिशील कविता के स्तर से ऊपर उठकर कांग्रेस के सुधारवादी पूँजीवादी नेतृत्व में चलनेवाले स्वाधीनता-आंदोलन की तीखी आलोचना बन जाती है।
दो एक की आपत्ति यह थी कि यह आनंदभवन नहीं, स्वराज भवन है। दोनों को एकमेक करना ठीक नहीं। मैंने स्वयं देखा है कि स्वराज भवन आनन्दभवन से ज़रा हटकर अवस्थित है, लेकिन उसी परिसर में। यहाँ सुराजियों की जमघट लगा करती थी। खैर, जो हो। मंच से उतरने के बाद नवलजी ने डाॅ. रविभूषण से पूछा कि भई, स्वराजभवन और आनन्दभवन का क्या मामला है? वक्तव्य का समाहार करते हुए नवलजी ने कहा कि कविता एक बहुत ही नाजुक चीज है। उसका अध्यापन संवेदनशीलता के साथ किया जाना चाहिए। वर्ग में संप्रेष्य संवेदना ही होनी चाहिए, कुछ और नहीं।
डाॅ. नवल बहुतों की तरह मेरे भी अप्रत्यक्ष गुरु थे; क्योंकि उनकी किताबें पढ़कर अपनी समझदारी बेहतर बनाई है।
अपने समस्त पाठकों के साथ हमदोनों पति-पत्नी डॉ.नदंकिशोर नवल के प्रति विनम्र श्रद्वांजलि अर्पित करते हैं।
बहादुर मिश्र
13.05.2020

BNMU। अनुस्यूत बनाम अनुस्युत

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अनुस्यूत बनाम अनुस्युत

यह विषय मेरी प्राथमिकता सूची में नहीं था। एक दिन मैं पी-एच्.-डी. संचिका निबटा रहा था। एक विश्वविख्यात विश्वविद्यालय के ख्यात प्राचार्य का प्रतिवेदन पढ़ रहा था। उसमें एक स्थल पर ‘अनुस्युत’ का प्रयोग देखकर हतप्रभ रह गया; क्योंकि छात्र और शिक्षक- दोनों रूपों में उनकी यशस्विता असंदिग्ध रही है। पहले सोचा कि दूरभाष पर ही उनका भ्रम-निवारण कर दूँ। फिर विचार आया कि ‘पोस्ट’ ही डाल देता हूँ। इससे अन्य पाठक भी लाभान्वित हो जाएँगे। अन्यत्र इसके अनियंत्रित प्रयोग देख-देख कुढ़ ही रहा था कि उक्त महाशय की इस भाषिक विच्युति ने एतद्विषयक विमर्श के लिए तत्क्षण विवश किया। यह शब्द-विमर्श उसी चिन्ता की प्रसूति है।
अनु+षिवु(तन्तुसन्ताने) >सिवु (आदेश)> सि (व् >ऊ) सि+ऊ (यण् सन्धि)= स्य् +ऊ = स्यू+ क्त > त = अनुस्यूत का अर्थ होता है– अच्छी तरह सिला हुआ/ गज्झिन बुना हुआ/ सुशृंखलित/ सुषक्त/ नियमित तथा अबाध रूप से सटा-सटाकर बुना हुआ/well woven/well fabricated/well knitted ।

निवेदन कर दूँ कि ‘अनुस्यूत’ मूलतः बुनकरी-क्षेत्र (weaving field) का शब्द है। भाषा में यह वहीं से चलकर आया है। जब शब्दों, वाक्यों,महावाक्यों (प्रोक्तियों) या अनुच्छेदाें में तनिक भी बिखराव न हो, अर्थात् भाषा की सभी इकाइयाँ परस्पर सम्बद्ध हों, संग्रथित हों या सुगुम्फित हों, तब अनुस्यूति की स्थिति बनती है।
‘अनुस्यूत’ का ‘अनु’, जैसा कि आप जानते हैं, पूर्व प्रत्यय, अर्थात् उपसर्ग (prefix) है। इसका अर्थ पीछे या पश्चात्/ साथ-साथ/ पास-पास/ के बाद/ भाग (हिस्सा)/ आवृत्ति इत्यादि होता है। यहाँ ‘पश्चात् और पास-पास’ वाला अर्थ अभीष्ट होगा। इसमें क्रमिकता के साथ-साथ अनवरतता का भाव भी अन्तर्भुक्त है। ‘अनुस्यूत’ के सन्दर्भ में लगातार एक धागे के पीछे बिल्कुल सटाकर दूसरा, दूसरे के पीछे तीसरा, चौथा, पाँचवाँ, छठा धागा इसतरह टाँकना, सीना, बुनना या गूँथना कि दो धागों के बीच से हवा भी न निकल पाए। इससे न केवल सुदृढ़़ता आती है, बल्कि सुघरता भी। इसतरह, ‘अनु’ उपसर्ग यहाँ क्रिया की बारम्बारता के साथ-साथ संहिता, संपृक्तता या सघनता का भी अर्थद्योतन करता है; यथा- अनुकरण, अनुसरण, अनुधावन, अनुरणन, अनुगुञ्जन, अनुश्रवण, अनुवर्तन इत्यादि।
‘षिवु’ दिवादिगणीय परस्मैपद धातु है, जिसका अर्थ सिलाई करना होता है। ‘षिवु’ का पूर्वार्ध ‘षि’ ‘धात्वादेः षः सः’ (अष्टा.: 6/1/62) से ‘सकार’ आदेश होकर ‘सिवु’ बन गया, जिसका धात्वर्थ ‘सिवु तन्तुसन्ताने’ (4/2, प. सीव्यति) होता है। (द्रष्टव्य: संस्कृत-धातुकोषः ; सं.- युधिष्ठिर मीमांसक; पृ. 131) अगले चरण में यह ‘सिवु’ ‘उ’ लोप से ‘सिव्’ बन जाता है, फिर ‘सिऊ’। प्रश्न है, ‘सिऊ’ का परार्ध ‘ऊ’ कहाँ से आ गया? उत्तर होगा- ‘श् ऊठ् आदेश विधिसूत्रम्’ के अन्तर्गत ‘छ्-वोः’ शूडनुनासिके च ‘‘(अष्टा.: 6/4/19) सूत्र के अनुपालन से। आखिर क्या कहता है यह सूत्र? सूत्र कहता है कि ’’च्छ् व इत्येतयोः स्थाने यथासंख्य श् ऊठ् इत्येतौ आदेशौ भवतोऽनुनासिकादौ प्रत्यये परतः, क्वौ झलादौ चविक्ति’’, अर्थात् अनुनासिक, क्वि तथा झलादि कित् डि्.त् प्रत्ययों के परे रहते ‘च्छ्’ एवं ‘व’ के स्थान पर यथासंख्य करके शूठ् ‘श’ और ‘ऊठ्’ आदेश होते हैं। उदाहरणार्थ – वकारस्य ऊठ् स्योनः। वकारस्य क्वौ अक्षद्यूः आदि। ‘यथासंख्यमनुदेशः समानाम्’ परिभाषा से ये आदेश क्रमशः होते हैं। दूसरे शब्दों में, ‘छ्’ का ‘श्’ तथा ‘व्’ का ‘ऊठ्’ आदेश होता है। चूँकि, यहाँ ‘सिव्’ वकारान्त है, इसलिए इसमें ‘ऊठ्’ प्रत्यय लगेगा। ‘ऊठ्’ से ‘ठ्’ का लोप होकर ‘ऊ’ शेष रह जाता है। आगे ‘यण्’ स्वर सन्धि बनाने में सहायता करने वाले सूत्र ‘इको यणचि’ (अ.; 6/1/77) से ‘सिऊ’ = स्य्+ऊ = स्यू में परिणत हो गया।
‘अनुस्यूत’ ने अबतक कई कठिन चरण पार कर लिये हैं। यहाँ तक आते-आते ‘अनुस्यू’ मात्र बन पाया । अब उसे ‘त’ की प्राप्ति करनी पड़ेगी, अतः उसे भूतकालिक कृदन्त प्रत्यय ‘क्त’ का आवाहन करना होगा। लीजिए, ‘अनुस्यू’ ने आवाहन किया नहीं कि ‘क्त’ उससे सटकर खड़ा हो गया। फलस्वरूप, ‘अनुस्यू + क्त = ‘अनुस्यूक्त’ तो हो गया, किन्तु ‘अनुस्यूत’ नहीं बन पाया। इसके लिए उसे एकबार पुनः विनती करनी होगी। और विनती किससे? ‘क्त’ के ‘क्’ से – ‘‘मुझे, सुघर और जनप्रिय रूप् देने के लिए हे ‘क्’ महोदय! ‘त’ का साथ छोड़ दीजिए।’’ ‘क्’ ने उसका कहा मानकर ‘त’ को स्वतन्त्र कर दिया, ताकि ‘अनुस्यू’ के साथ जुड़कर सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सके।
जिसतरह मोती स्वयं को छिदवाकर किसी का गलहार बनता है, उसीतरह ‘अनुस्यूत’ भी कई चरणों की ठुकाई-पिटाई के बाद भाषा-प्रेमियों का लाड़ला बनता है।
अब मैं कुछ प्रयोग सामने रख रहा हूँ, ताकि किसी के मन में कोई संशय न रह जाए। देखिए –
* ‘‘ऊतं स्यूतमुतं चेति त्रितयं तन्तु सन्तते’’ – अमरकोषः (रामाश्रमी भाष्य); पृ. 383
* स्यूतः प्रसेवके ; वही
* स्यूत प्रसेवौ ; वही; पृ. 310
* ‘‘स्यूतं स्यूतं पुनरपि च यच्छीर्यते धार्यमाणं
गात्रे क्लृप्तं कथमपि तथाऽच्छादने नालमेव।
धृत्वा देहे हिममयमितं श्वेतकार्पासवस्त्रं
पृथ्वी शेते विकलकरणा निर्धना गेहिनीव।। (राधावल्लभ त्रिपाठी)
(दरिद्र गृहिणी की तरह व्याकुल इन्द्रियों वाली धरती ठंढे सफेद सूती वस्त्र को धारण कर सो रही है। बार-बार सीये जाने (स्यूतं-स्यूतं) के कारण वस्त्र धारण करने पर फटा जा रहा है। फलस्वरूप, वह न तो अंग ढँकने के काम आ रहा है और न ही ओढ़ने के काम।
छंद का प्रारंभ ‘स्यूतं-स्यूतं’ से हुआ है। उनमें ‘अनु’ उपसर्ग लगा दीजिए तो ‘अनुस्यूतं अनुस्यूतं’ की सृष्टि हो जाएगी।
इदमित्थं, सिद्ध हुआ कि ‘अनुस्यूत’ ही साधु प्रयोग है, न कि ‘अनुस्युत’। अतः, ‘अनुस्युत’ के प्रयोग को निन्द्य मानते हुए सदा और सर्वत्र ‘अनुस्यूत’ का ही प्रयोग किया जाना चाहिए।

घर से जब भी निकलें, मुखावरण/मुखच्छद/नासावरण/नासाच्छद पहनकर ही निकलें।

-प्रो. (डाॅ.) बहादुर मिश्र, पूर्व अध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिंदी विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार
21 मई, 2020

BNMU। ‘सोहर’ की विविधरूपात्मक यात्रा

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‘सोहर’ की विविधरूपात्मक यात्रा

प्रो. (डाॅ.) बहादुर मिश्र, पूर्व अध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिंदी विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार

‘सोहर’ लोकगीत का वह जनप्रिय रूप है, जो शिशु-जन्म (विशेषतः पुत्र-जन्म) के अवसर पर परिवार तथा टोले-मोहल्ले की स्त्रियों द्वारा हर्षातिरेक में गाया जाता है।
व्यावहारिक दृष्टि से ‘सोहर’ के दो प्रकार मिलते हैं – पहला, गर्भाधान से लेकर शिशु-जन्म के पूर्व तक गाया जानेवाला और दूसरा, शिशु-जन्म के बाद गाया जाने वाला। ‘सोहर’ का यही दूसरा प्रकार प्रचलन में है।
बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना से 1969 ई. में प्रकाशित ‘अंगिका संस्कार गीत’ की शुरुआत सोहर से ही हुई है। इसमें कुल 85 सोहर संकलित हैं, जिन्हें संकलयिता ने तीन खण्डों में विभक्त कर रखा है; यथा – प्रथम खण्ड में 47 सोहर हैं तो द्वितीय और तृतीय में क्रमशः 26 तथा 12 । ‘सोहर’ भारत की लगभग प्रत्येक लोकभाषा में उपलब्ध है, चाहे वह मैथिली हो या भोजपुरी, मगही हो या बज्जिका, अवधी हो या ब्रजभाषा, राजस्थानी हो या बुन्देलखण्डी।
सन्तानहीन माता-पिता की क्या मनोदषा होती है, उसकी एक झलक इस अंगिका-सोहर में देखी जा सकती है-
पिअवा, एकेगो अमोलवा तों लगैता कि टिकोलवा हम चाखतें हे।
….. ….. ….. ….. ….. …. ….. ….. …..
धनि, एकेगो बलकवा तों विऐतिहऽ, सोहरवा हम सुनतें हे
…. …. …. ….. ….. ….. ….. ….. …..
अँगना बोहारइत तोहें चेरिया छेकी, औरे नउरिया छेकी हे।
ललना, अपन बलकवा पैंचा देहो, पिया रे सुनत सोहर हे।।
रानी, गोदी के बलकवा नहिं पैंचा, कि पैंचा नहिं मिलत हे।।
…. …. …. …. …. …. …. …. …
गोतिनी, अपनो बलकवा पैचा देहो, पिया रे सुनत सोहर हे।
गोतनी, गोदी के बलकवा नहिं पैंचा, कि पैंचा नहिं मिलत हे।।
…. ….. ….. ….. ….. ….. ….. ….. …. ….
बड़ही, काठ के बलकवा तों बनावऽ पिया रे सुनत सोहर रे।
अर्थ यह कि एक संतानहीन स्त्री अपने पति से आम का पेड़ लगाने कहती है, ताकि टिकोला (अमिया) खा सके। टिकोला खाने की इच्छा प्रायः गर्भवती स्त्रियों की होती है। पति को मालूम है कि उसकी पत्नी गर्भवती नहीं है। इसपर वह पत्नी का उपहास करता हुआ कहता है कि यदि तुमने अपनी कोख से एक बेटा पैदा किया होता तो आज मैं सोहर सुनता। इसपर वह स्त्री बारी-बारी घर की नौकरानी, गोतनी तथा ननद से उसका बेटा माँगती है, ताकि उसका पति सोहर सुन सके। तीनों यह कहकर झिड़क देती हैं कि बालक कोई नमक-तेल तो है नहीं कि पैंचा (उधार) दिया जा सके। तब वह बढ़ई से कहकर एक कठपुतला (काष्ठपुत्र) बनवा लेती हैं। कठपुतला तो कठपुतला होता है, अर्थात् बिलकुल बेजान। अन्त में, सासु माँ की सलाह पर वह सूर्याराधन में लग जाती है, ताकि उसे बेटा खेलाने का मौका मिले और पति को सोहर सुनने का।
यह ‘सोहर’ साबित करता है कि भारतीय परिवार में पुत्र-जन्म के बाद ही सोहर गाने-सुनने की प्रथा थी। परिवार में कन्या-जन्म का स्वागत ‘सोहर’ से नहीं, भारी मन होता था। देखिए अगला सोहर –
‘‘जैसे कासी के लोगवा सिवजी के पूजले हो
वैसे हि पूजले हमरो हरिजीत, कि बबुआ जनम लिहले
जैसे दहहि बिच पुरइन के पात काँपेलि हो।
वैसे हि काँपेला हमरो हरिजीत, कि धिअवा जनम लिहले हो।’’
इस सोहर में पुत्र का रुतबा काशीनाथ शिव का-सा है तो पूत्री का इसके ठीक उलट पुरइन के पात-जैसा। प्रकारान्तर से यह सोहर समाज में लिंग-भेद पर श्वेतपत्र जारी करता नजर आता है।
अब मैं सोहर के प्रथम रूप, अर्थात् शिशु-जन्म के पूर्व की स्थिति से आपका साक्षात्कार कराना चाहता हूँ।
एक गर्भवती स्त्री है, जिसके पास इस समय न तो पति है और न ही सास-ननद। पति कमाने के लिए विदेश गया है तो सासु माँ अपने नैहर, जबकि ननद अपनी ससुराल बस रही है। इस समय घर में मात्र एक अबोध देवर है। सुनिए तो अपना दुखड़ा कैसे सुना रही है-
‘‘परभु मेरा बसै बिदेस, कि दूर देस बसै न रे।
ललना रे, केकरा कहब दिल के बात चढ़ल मास तेसर रे।।
सासु मोरा बसै नैहर, ननद सासुर बसै रे।
ललना रे, घर में देवर छै नदान, चढ़ल मास चारिम रे।।
बाह-बटोहिया से तहुँ मोरा भैया न रे।
ललना रे, लेने जाहो पिया के समाद, चढ़ल मास पाँचम रे।।
इसतरह, वह स्त्री अपने गर्भ के पूरे नौ महीनों का लेखा-जोखा रख देती है।
मैं यह दिखाना चाह रहा था कि जैसे-जैसे गर्भ पुष्ट होता जाता है, वैसे-वैसे सोहर भी शुरू होता जाता है। कभी तो स्वयं गर्भिणी घबराहट में या फिर माँ बनने की खुशी में सोहर गाती है और कभी घर तथा आसपास की स्त्रियाँ सोहर गाने लगती हैं। उपरिलिखित सोहर गर्भिणी के मुख से निस्सृत है।
ज्ञातव्य है कि जन्मपूर्व ‘सोहर’ का सम्बन्ध मान्यता प्राप्त सोलह संस्कारों में से प्रथम चार सस्कारों – गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन तथा जातकर्म से है।
गर्भिणी पुत्र को ही जन्म दे, इसके लिए पुत्रेच्छुक पुरुषों को अर्धरात्रि के बाद अष्टमी को छोड़ सम रात्रियों; यथा-चतुर्थी, षष्ठी, दशमी, द्वादशी, चतुर्दशी इत्यादि तिथियों में ही गर्भाधान करने की सलाह दी गयी है।
गर्भ के तीसरे माह में पुंसवन संस्कार के बाद ‘सोहर’ गाने की परम्परा शुरु हो जाती है। यह संस्कार मंगलकारी पुष्य नक्षत्र में सम्पन्न किया जाता था। रात में वटवृक्ष की छाल का रस गर्भिणी के दाएँ नासिका-छिद्र में डाला जाता था, ताकि गर्भपात न हो, साथ ही, शिशु हृष्ट-पुष्ट और सुन्दर हो।
गर्भ के चौथे माह में सीमन्तोन्नयन-संस्कार सम्पन्न कराने की परम्परा रही है। इसमें गर्भिणी के केशों को सुगन्धित तेल से सिक्त कर ऊपर की ओर सँवारा जाता था। सीमन्त+उन्नयन = सीमन्तोन्नयन का शाब्दिक अर्थ यों तो ‘माँग’ को ऊपर की ओर उठाना है, किन्तु ‘सीमन्त’ शब्द यहाँ सामने की केश-राशि का वाचक बनकर आया है। यह संस्कार मूलतः गर्भस्थ शिशु को दुष्ट शक्तियों से बचाने के लिए किया जाता था। एक और वैदिक मन्त्रोक्त विधान होता था, जिसमें गर्भिणी खिचड़ी की आहुति देती थी, साथ ही, खिचड़ी ही खाती थी।
उपस्थित बड़ी-बुजुर्ग महिलाएँ ‘वीरप्रसू’, अर्थात् वीर पुत्र की माता बनने का आशीर्वाद दिया करती थीं। लोक-परम्परा में यह चीज ‘सोहर’ के रूप में सामने आयी।
पुत्र-जन्म के पश्चात् जातकर्म-संस्कार सम्पन्न होता था। मनुस्मृति के अनुसार, नाल (नार) काटने के पूर्व यह संस्कार कराया जाता था। शिशु का पिता स्नानोपरान्त विधि-विधानपूर्वक ‘नान्दीमुख’ नामक अनुष्ठान किया करता था। परिजन-पुरजन के साथ-साथ पुरोहित नवजात शिशु को आशीर्वादित करते थे। कालान्तर में इसके समानान्तर वैदिक और लौकिक का मिश्रित रूप प्रचलन में आया। ‘सोहर’ संभवतः इसी का सर्वथा लोकान्तरित रूप है।
अब प्रश्न खड़ा होता है कि ‘सोहर’ शब्द आया कहाँ से? ‘शब्द’ के रूप में इसके जन्म को लेकर लोकसाहित्य के लेखकों-विचारकों में मतभेद है।
विद्वानों का एक वर्ग मानता है कि ‘सोहर’ शब्द का विकास ‘सूतिकागृह’ या ‘सौरगृह’ से हुआ है। इस वर्ग में डाॅ. गोविन्द चातक, डाॅ. अमरेन्द्र प्रभृति आते हैं। पहले इस मत की पड़ताल कर लें, तब फिर अन्य अभिमतों की।
सूतिकागृह से सोहर की विकास-यात्रा:
सूत+कन्+टाप्, इत्वम् = सूतिका का अर्थ होता है वह स्त्री, जिसने कुछ काल पूर्व शिशु को जन्म दिया है। ग्रह+क् =गृह (म्) का अर्थ होता है- घर, भवन आदि। दूसरे शब्दों में, शिशु को जन्म देनेवाली स्त्री का भवन। इसतरह, ‘सूतिकागृह’ एक समस्त पद है। यह षष्ठी तत्पुरुष समास का उदाहरण हैं
अब प्रश्न है ‘सूतिकागृह’ का पूर्वार्ध (सूतिका) ‘सोहर’ के ‘सो’ तथा उत्तरार्ध (गृह) ‘हर’ में कैसे परिवर्तित हो गये? चलिए देखते हैं।
सूतिका > सूइआ (व्यंजनध्वनिलोप में) > स्वेआ (इकोयणचि, अर्थात् यण् स्वरसन्धि) > स्वे (ध्वनिलोप) > सो (?)
गृह > ऋह > रिह (मुख-सुख) > रह (स्वरलोप) > हर (वर्ण-विपर्यय)
इसतरह, ‘सोहर’ शब्द की व्युत्पत्ति-प्रक्रिया मानी जा सकती है। ‘गृह’ से ‘हर’ बनने की प्रक्रिया तो सहज प्रतीत होती है, किन्तु सूतिका से ‘सो’ की निर्माण-प्रक्रिया विश्वसनीय प्रतीत नहीं होती।
2. सौरगृह से ‘सोहर’ की विकास-यात्रा:
‘सौरगृह’ भी समस्त पद है। इसका पहला पद ‘सौर’ विशेषण है, जबकि उत्तरपद ‘गृह’ विशेष्य। विशेष्य-विशेषण सम्बन्ध होने से यह समानाधिकरण तत्पुरुष समासान्तर्गत कर्मधारय का उदाहरण है – ‘विशेषणं विशेष्येण बहुलम्’ (अ.: 2/1/67), अर्थात् यदि प्रथम पद विशेषण हो और द्वितीय पद विशेष्य तो उस समस्तपद को विशेषणपूर्वपद कर्मधारय कहते हैं।
सूर (सूर्य) +अण् (प्रत्यय) = सौर के कई अर्थ होते हैं; यथा – सूर्य-सम्बन्धी दिव्य, सूयोपासक, सूर्य की सन्तान (यम, यमी, मनु, शनि, ताप्ती, अश्विनी कुमार), सौर दिन, सौर मास, सौरलोक (जिसमें 30 बार सूर्योदय और 30 बार सूर्यास्त होता है।) इत्यादि।
‘सौरगृह’ से ‘सोहर’ की विकास-प्रक्रिया इसतरह दिखाई जा सकती है-
सौर > सोर (मुख-सुख से) > सो (व्यंजन ध्वनिलोप से) = सो
अथवा
सौर > सौअ (व्यंजन-लोप) > सौ (स्वर-लोप) > सो (मुख-सुख) = सो
गृह > ऋह > रिह (मुख-सुख) > रह (स्वरलोप) > हर (वर्ण विपर्यय) = हर
जिज्ञासा होती है कि सूर्य से जच्चाघर का क्या संबंध? उत्तरस्वरूप दो संभावनाएँ बनती हैं, जो निम्नलिखित हैं –
(क) सूर्य की मूल पत्नी ‘सरण्यू’ (संज्ञा) ने जिस स्थान पर यम-यमी नामक जुडु़वाँ बच्चों को जन्म दिया होगा, वह स्थान सौरगृह कहलाया होगा अथवा सूर्य की दूसरी पत्नी ‘सरण्यू’ की अनुकृति ‘सवर्णा’/‘छाया’ ने जिस स्थान पर मनु (पुत्र), शनि (पुत्र) और ताप्ती (पुत्री) का प्रसव किया होगा, वह सौरगृह कहलाया होगा।
कालान्तर में, अर्थविस्तार’ होने के कारण हर आम या खास जन्मस्थल सौरगृह के नाम से ख्यात या रूढ़ हो गया होगा।
फलस्वरूप, सौरगृह का अर्थ हो गया- जन्मस्थान।
पूरी संभावना है कि नवजात शिशुओं को वैदिक मन्त्रों/सूक्तों से अभिमन्त्रित किया गया होगा। इसी मन्त्रोच्चार/सूक्तोच्चार ने लौकिक आचार में ‘सोहर’ का रूप ले लिया। आशीर्वाद का तरीका बदला। वेद पीछे छूट गया और उसकी जगह ‘लोक’ शब्द क्रमश: प्रतिष्ठित होता गया।
(ख) धरती पर ‘सौर’ (सूर्य) का प्रतिनिधित्व अग्नि करती है। दीपक भी रात्रिकालीन प्रतिनिधि कहलाता है। जच्चाघर में अग्नि/दीपक का प्रज्वलन प्रकारान्तर से सौरलोक/सौरशक्ति का प्रख्यापन है।
सारांश यह कि ‘सौरगृह’ से ‘सोहर’ का विकास माना जा सकता है।
डाॅ. कृष्णदेव उपाध्याय प्रभृति खोजी विद्वानों ने ‘सोहर’ को दो स्रोतों से व्युत्पन्न माना है। एक स्थल पर वे इसका संबंध ‘शोभिल’ से जोड़ते हैं, जबकि दूसरे स्थल पर ‘शोभन’ से।
3. ‘शोभिल’ से ‘सोहर’ की विकास-यात्रा:
शोभा (विशेष्य)+ इलच् (प्रत्यय) = शोभिल (विशेषण) का अर्थ शोभायुक्त/शोभावान्/शोभनीय होता है। व्याकरण की दृष्टि से ‘साधु’ (प्रशस्त) होते हुए भी इसका प्रयोग न तो वैदिक साहित्य और न ही लौकिक साहित्य में मिलता है। अस्तु, जटा+इलच्=जटिल, पंक+इलच्=पंकिल जैसे शब्द प्रयोग में हैं। प्रश्न है, जब शोभिल का प्रयोग मिलता ही नहीं है, तब ‘सोहर’ का विकास उससे कैसे मान लिया गया? जो हो, इसकी विकास-प्रक्रिया यों दिखाई जा सकती है:
शोभिल > सोहिल > सोहल > सोहर
घर-परिवार में बच्चे का जन्म शोभाकारक होता है। वह स्वयं में भी शोभा है। हर्षपूर्वक शोभाकारक पदार्थों से घर-द्वार को सुसज्जित करना, जच्चे-बच्चे तथा नाल काटनेवाली बुआ को नये परिधान और आभूषण पहनाकर सम्मानित करना-जैसी शोभनीय गतिविधियाँ इसके प्रमाण हैं। कुछ जनपदीय लोकगीतों में सोहिल/सोहल/सोहेला/सोहिले का प्रयोग मिलना इसकी ओर संकेत करता है।
4. शोभन से सोहर की विकास-यात्रा:
शुभ>ल्युट् = शोभन (विशेषण) के कई अर्थ होते हैं; जैसे- सुन्दर, मनोहर, शुभ्र, चमकीला, शानदार, सौभाग्यशाली, सुसज्जित इत्यादि।
‘शुभ’ के तीन धात्वर्थ होते हैं-
पहला, ‘शुभ् दीप्तौ’ (अ. 1/501), आत्मनेपद धातु अर्थात् चमकना, प्रकाशित होना, देदीप्यमान होना इत्यादि के अर्थ में प्रयुक्त ‘शुभ्’ आत्मनेपद धातु है, जिसका रूप यों चलेगा-
शोभते-शोभेते- शोभन्ते।
दूसरा, ‘शुभ् शोभार्थे’ (6/33), परस्मैपद धातु
अर्थात् शोभना, शोभित/शोभायमान होना आदि के अर्थ में प्रयुक्त ‘शुभ्’ परस्मैपद धातु है, जिसका रूप यों चलेगा-
शुभति-शुभतः-शुभन्ति।
तीसरा, ‘शुभ् भाषणे’ (1/295), परस्मैपद धातु
अर्थात् बोलने, भाषण करने आदि के अर्थ में प्रयुक्त परस्मैपद धातु ‘शुभ्’ का रूप इसतरह चलेगा-
शोभति-शोभतः-शोभन्ति
उपरिविवेचित तीनों धात्वर्थों में दूसरा, अर्थात् शोभार्थक ‘शुभ्’ प्रसंगोचित प्रतीत होता है। शिशु के आगमन से घर की शोभा बढ़ जाती है, सबके मुखमण्डल पर प्रसन्नता छा जाती है। यही इसका औचित्य है।
आइए, ‘शोभन’ से ‘सोहर’ की विकास-यात्रा पर विचार करें:
शोभन > सोभन (मुख-सुख से) > सोहल (मुख-सुख से; यथा- नम्बरदार से लम्बरदार, नंगा से लंगा) > सोहर (रलयोऽर्भेदः; यथा- हल्दी से हरदी, दीवाल से दीवार आदि)
इसतरह, शोभार्थक विशेषण शब्द ‘शोभन’ से ‘सोहर’ का विकास-क्रम अपेक्षाकृत अधिक स्वाभाविक प्रतीत होता है; फलस्वरूप, स्वीकार्य भी।
5. ‘सुघर’ से ‘सोहर’ की विकास- प्रक्रिया:
कोई-कोई विद्वान् ‘सोहर’ का विकास ‘सुघर’ से निश्चित करते हैं। वास्तविकता यह है कि स्वयं ‘सुघर’ शब्द संस्कृत के ‘सुघट’ से विकसित हुआ है। ‘सुघट’ का अर्थ ‘अच्छी तरह बना हुआ/रचा हुआ’ होता है। इसका अन्य अर्थ सुन्दर/मनोहर होता है। जो चीज अच्छी तरह बनी होती है, प्रायः सुन्दर/मनोहारी होती है। इसका सम्पूर्ण विकास-क्रम इसप्रकार स्वरूपित होता है
सुघट(विशेषण) > सुघड़(उत्क्षिप्तीकरण) > सुघर (मुखसुख) > सुहर (व्यंजनलोप) > सोहर (मुख-सुख से कण्ठोष्ठीकरण)।
आप देख रहे हैं कि ‘सुघर’ शब्द बिल्कुल मध्य में स्थित है- दो आगे, दो पीछे। सच पूछिए तो ‘सुघर’ का सम्बन्ध निर्माण-प्रक्रिया से है। यह रूपात्मक अधिक है, भावात्मक कम। दूसरी ओर ‘सोहर’ का सम्बन्ध भाव/संवेग (इमोशन्स) से होता है। संभवतया जो लोकगीत अच्छी तरह छन्दोबद्ध या लयबद्ध हो, उसे ‘सोहर’ कहा जाता। किन्तु, इसतरह तो कई लोकगीतों का विकास ‘सुघर’ से जोड़ना होगा। आप ध्यान से ‘सोहर’ की बनावट-बुनावट पर विचार करेंगे तो पाएँगे कि मात्राओं की रक्षा नहीं हो सकी है या नहीं हो सकती। पर, दो बातों पर अमल होता ही है- पहली, ‘ललना’ की टेक और दूसरी, तुकान्त।
इसलिए, मेरे मतानुसार, ‘सुघर’ से सोहर का विकास मानना उचित नहीं होगा।
यह मेरे लिए एक कठिन ‘टास्क’ था। इसके समाधान में मैं कहाँ तक सफल हो सका, पता नहीं। आगे फिर मिलूँगा। तब तक कोरोना से बचिए और बचाइए। नमस्ते!
डाॅ. बहादुर मिश्र

BNMU। क्या ‘दिवंगत आत्मा’ का प्रयोग उचित है?

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क्या ‘दिवंगत आत्मा’ का प्रयोग उचित है?

श्री प्रभाकर मिश्र ने जानना चाहा है कि क्या किसी मृत व्यक्ति के लिए ‘दिवंगत आत्मा’ का प्रयोग सही है? लगभग ऐसा ही प्रश्न प्रो. गणेशानन्द झा के दोनों नातियों ने भी किया है। इन दोनों बच्चों ने जिज्ञासा रखी है कि आत्मा जब एक है, तब प्राणियों में अनेक कैसे हो जाती है?
सर्वप्रथम ‘दिवंगत आत्मा’ की व्याकरणिक विचिकित्सा करते हैं, फिर दार्शनिक विमर्श।
यहाँ ‘दिवंगत’ शब्द विशेषण है, जबकि ‘आत्मा’ विशेष्य। दिवम-स्वर्गम् गतः दिवंगतः, अर्थात् स्वर्ग गया (हुआ) अथवा जो स्वर्ग चला गया। इसीलिए, इन्द्र को ‘दिवस्पति’ भी कहते हैं।
सतत गमन के अर्थ में प्रयुक्त परस्मैपद धातु ‘अत्’ (अत् सातत्यगमने: अ.-1/31) में ‘मनिण्’ प्रत्यय के योग से ‘आत्मन्’ शब्द बनता है, जो कर्त्ताकारक एकवचन में ‘आत्मा’ का रूप ग्रहण कर लेता है; यथा – आत्मा (एकवचन)-आत्मानौ (द्विवचन)-आत्मानः (बहुवचन)। संस्कृत में आत्मा शब्द पुलिंग है, जबकि हिन्दी में स्त्रीलिंग। किन्तु, हिन्दी में लिखित दर्शन की लगभग सारी पुस्तकों में ‘आत्मा’ का प्रयोग पुलिंग में हुआ है। जो हो, यहाँ ‘सातत्य-गमन’ का प्रयोग आत्मा की सतत गतिशीलता या चलायमानता के अर्थ में हुआ है। दूसरे शब्दों में, कहा जा सकता है कि आत्मा कहीं सदा के लिए टिकती-ठहरती नहीं। दर्शन की भाषा में इसे स्थानान्तरण या लोकान्तरण कहते हैं, अर्थात् एक जगह से दूसरी जगह चला जाना।
मृड्. > मृ+त्युक् = मृत्यु का धात्वर्थ भी शरीर/प्राण का परित्याग होता है। प्रश्न है, शरीर/प्राण का परित्याग कौन करता है? इसका एकमात्र उत्तर होगा- आत्मा। गीता के अनुसार, आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नये शरीर को उसीतरह धारण कर लेती है, जिसतरह मनुष्य पुराना वस्त्र उतारकर नया वस्त्र पहन लेता है। यही आत्मा की गतिशीलता/चलायमानता अथवा अविनश्वरता है।
जब आत्मा अजर-अमर है, तब उसके लिए ‘मृत’ (मृतात्मा) अथवा ‘दिवंगत’ विशेषण का प्रयोग कैसे युक्तिसंगत होगा? मेरे फेसबुक-मित्र प्रभाकर मिश्र जी की यही मुख्य चिन्ता है।
चलिए, इसे तनिक विस्तार से समझाता हूँ।
उपनिषदों में आत्मा दो प्रकार की मानी गयी है- (1) वैयक्तिक आत्मा, अर्थात् जीवात्मा और (2) परमात्मा (ब्रह्म)। वैयक्तिक आत्मा/जीवात्मा कर्मबन्धन के कारण जन्म-मृत्यु के चक्कर में पड़कर दुख भोगती है। इससे मुक्ति के लिए उसे परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त करना पड़ता है। वैशेषिक दर्शन (कणाद) भी आत्मा के दो भेद मानता है- जीवात्मा और परमात्मा। जीवात्मा अनित्य (नाशवान) है तथा शरीर-भेद से अनंत भी। परमात्मा नित्य और एक है। जीवात्मा के चौदह गुण होते हैं। इनमें पाँच सामान्य (संख्या, परिणाम, पृथकत्व, संयोग तथा विभाग)होते हैं, जबकि नौ (बुद्धि, सुख, दुख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, भावना, धर्म तथा अधर्म) विशेष गुण। जीवात्मा के बंधनमुक्त हो जाने पर ये विशेष गुण भी लुप्त हो जाते हैं। रह जाते हैं सिर्फ सामान्य गुण।
कणाद का वैशेषिक दर्शन आत्मा को असाधारण गुण चैतन्य से युक्त द्रव्य मानता है। प्राण-अपान नामक प्रयत्नों, उन्मेष-निमेष नामक कार्यों,
इस शरीर रूपी घर का अधिष्ठाता, मन सहित सभी इन्द्रियों का स्वामी तथा सुख-दुख, इच्छा-द्वेष इत्यादि मनोभावों की सूचक आत्मा है। यही कारण है कि वैशेषिक को अनेकान्तवादी दर्शन भी कहा जाता है।
जीवात्मा को अन्यत्र शरीरस्थ आत्मा भी कहा गया है। यह परमात्मा से भिन्न है। आत्मा की दो स्थितियाँ बताई गई हैं- अनुभवगम्य और वास्तविक। अनुभवगम्य (जीवात्मा) के तीन लक्षण माने गये हैं- (1) शारीरिक (2) मानसिक तथा (3) नैतिक।
आत्मा के शारीरिक लक्षण के अनुसार जीव जब संसार में प्रवेश करता है, तब उसे तीन प्रकार के शरीरों को धारण करना पड़ता है- स्थूल, सूक्ष्म तथा कारण शरीर। स्थूल शरीर माता-पिता से प्राप्त होता है, जो क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर नामक पाँच तत्त्वों से बना होता है। यह अन्न द्वारा पुष्ट होने के कारण ‘अन्नमय कोष’ कहलाता है।
‘सूक्ष्म शरीर’ का दूसरा नाम ‘लिंग शरीर’ है; क्योंकि यह एक चिह्न के रूप में काम करता है। हम इसे बाहरी इन्द्रियों से नहीं देख सकते। जीवात्मा का यह सूक्ष्म शरीर मन, बुद्धि, पाँच ज्ञानेन्द्रियों तथा पाँच प्राणों, अर्थात् कुल सत्रह तत्त्वों से निर्मित होता है। जीवात्मा मृत्यु की स्थिति में स्थूल शरीर का तो त्याग करती है, किन्तु सूक्ष्म शरीर का नहीं। वह इसे अपने साथ लेकर नए शरीर में प्रवेश कर जाती है। पूर्व जन्म के संस्कारों, आचार-विचार, इच्छा-कर्म इत्यादि के अनुरूप उसे अगला स्थूल शरीर प्राप्त होता है।
‘कारण शरीर’ जीवात्मा का मूलाधार है। इसी से उसके स्थूल और सूक्ष्म शरीर उत्पन्न होते हैं। ‘कारण शरीर’ गहरी निद्रावस्था की आनंदमयी अनुभूति की चरमावस्था है। जीवात्मा जब इन तीनों शरीरों से छुटकारा पा जाती है, तब विशुद्धावस्था में पहुँच जाती है।
जीवात्मा के मानसिक लक्षण भी तीन होते हैं; जैसे – ज्ञानात्मक, भावात्मक और क्रियात्मक। इच्छा, क्रिया और ज्ञान जीवात्मा की शारीरिक शर्त्तें हैं।
आत्मा की चेतना चार प्रकार की होती है- जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीयावस्था। जाग्रतावस्था में वह देशकाल की द्रष्टा है। स्वप्नावस्था में वह ‘तेजस’ कहलाती है। तेजस का अर्थ होता है- सूक्ष्म शरीर की अचेतन अवस्था की इच्छा और संस्कारों का प्रभाव। स्वप्नावस्था में वह प्रज्ञा कहलाती है। तुरीयावस्था विशुद्धावस्था का नाम है।
कायिक, मानसिक तथा वाचिक ये आत्मा के तीन गुण हैं। तीनों त्रिगुण से युक्त होते हैं।
नित्य, मुक्त और बद्ध। सदैव मुक्तावस्था में रहने वाली जीवात्मा नित्य कहलाती है। देवर्षि नारद, भक्त ध्रुव, प्रह्लाद प्रभृति इसके उदाहरण हैं। एकबार बंधन में पड़ जाने के बाद शीघ्र ही मुक्त हो जानेवाली आत्मा मुक्त कहलाती है; जैसे – राजर्षि जनक, महर्षि वसिष्ठ प्रभृति। सांसारिक बंधनों (वासना, इच्छा, राग-द्वेष इत्यादि) में बँधी आत्मा ‘बद्ध’ कहलाती है। फलस्वरूप, वह जन्म-मरण के चक्र से छूट नहीं पाती।
मुण्डकोपनिषद् ने इसे एक रूपक के सहारे समझाया है। मनुष्य-शरीर एक वृक्ष है, जिसमें हृदय रूपी घोसला स्थित है। उसमें जीवात्मा और परमात्मा नामक दो पक्षी परस्पर सखा-भाव से रहते हैं। जीवात्मा-पक्षी तो उस शरीर रूपी वृक्ष में फले सुख-दुख आदि फलों को स्वाद लेकर खाता रहता है, किन्तु परमात्मा-पक्षी मात्र उसे खाते हुए देखता रहता है। आशय यह कि जीवन संसार की विविध आसक्तियों में लिप्त है, जबकि परमात्मा पूरी तरह निर्लिप्त-निर्विकार। देखिए-
‘‘द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया/ समानं वृक्षं परिष्वजाते।/ तयोरन्यः पिपप्लं स्वाद्वात्त्यनषश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ।।1।।
लगभग सभी विचारधाराओं ने आत्मा का अपनी-अपनी तरह से विवेचन किया है। विस्तार में नहीं जाकर यहाँ मैं न्याय दर्शन (गौतम), सांख्य (कपिल) तथा अद्वैत वेदान्त (शंकराचार्य) के आत्म-चिन्तन को आपके समक्ष रखना चाहूँगा।
न्याय दर्शन अत्यन्त प्राचीन दर्शन होने के बावजूद तर्कवादी दर्शन है। तर्कशास्त्र का अस्तित्व बौद्ध दर्शन से पहले का है। इसका पुराना नाम ‘आन्वीक्षकी’ है, जिसका अर्थ होता है- प्रत्यक्ष तथा आगम के द्वारा प्राप्त ज्ञान (प्रत्यक्ष) तथा शब्द के द्वारा उपलब्ध विषय का अवलोकन। न्याय का अर्थ ही होता है, जिसके द्वारा प्रतिपाद्य विषय को सिद्ध कर किसी निश्चित सिद्धांत पर पहुँचा जा सके।
न्याय दर्शन के अनुसार, आत्मा स्पर्श आदि गुणों से रहित चैतन्य (ज्ञान) का अमूर्त्त आश्रय है, अर्थात् निराकार है, देशकाल के बंधनों से मुक्त है, अनादि और अनंत है।
ससीम शरीर के साथ उसका संयोग पूर्वजन्म के कर्माें का फल है, अर्थात् शरीर का भोगायतन (आत्मनो भोगायतनं शरीरम्) है।
न्याय आत्मा के दो भेद मानता है- जीवात्मा और परमात्मा। जीवात्मा अनेक है, अर्थात् शरीर की भिन्नता के कारण भिन्न-भिन्न है। इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुख और ज्ञान इसके छह गुण हैं। जबतक जीवात्मा शरीर के बंधन से मुक्त नहीं हो जाती, तबतक ये सारे गुण जीवात्मा में बने रहते हैं। मोक्ष के बाद जीवात्मा शांत और निर्विकार हो जाती है। दूसरी ओर परम आत्मा एक है और सदैव निर्विकार-निर्गुण भाव से विराजती है। न्याय दर्शन आत्मा को सारथी और शरीर को रथ मानता है। इसके विपरीत ‘कठोपनिषद्’ में ‘आत्मा’ को रथी बताया गया है, जबकि ‘बुद्धि’ को सारथी। देखिए तृतीय वल्ली का तीसरा छन्द – ‘‘आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु/ बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च।।3।।
गीता यही बात पहले ही कह चुकी है।
सांख्य के प्रवर्त्तक महर्षि कपिल उपनिषद्-काल के विचारक माने जाते हैं। उन्होंने आत्मा को ‘पुरुष’ नाम दिया है, जो प्रकृति के सहयोग से सृष्टि की रचना करता है। वह प्राणवान है। वही ज्ञान की ग्रहीता और चैतन्यस्वरूप है।
पुरुष या आत्मा एक है या अनेक, इसे लेकर दार्शनिकों में मतभेद है। वेदान्ती एक मानते हैं तो सांख्य के अनुयायी अनेक। उनका तर्क है कि यदि आत्मा एक है तो शरीर के नष्ट हो जाने पर एक ही साथ सभी शरीरों को नष्ट हो जाना चाहिए था। इतना ही नहीं, एक शरीर के जन्म लेने पर एक ही साथ सभी शरीरों को जन्म लेना चाहिए था। एक शरीरधारी व्यक्ति के लूला-लंगड़ा-अंधा हो जाने पर सभी व्यक्तियों को हो जाना चाहिए था। पर, ऐसा देखा नहीं गया। इससे साबित होता है कि जिसतरह शरीर अनेक हैं, उसी तरह आत्माएँ भी अनेक हैं।
छान्दोग्य उपनिषद् (अयमात्मा ब्रह्म = यह आत्मा ही ब्रह्म है।) तथा वृहदारण्यकोपनिषद्’ (य आत्मनि तिष्ठन्) की तरह अद्वैत वेदान्त भी कहता है- जीवो ब्रह्मैव नापरः (शंकराचार्य), अर्थात् जीव ही ब्रह्म(परमात्मा) है। दोनों में कोई भेद नहीं; वह आनंदस्वरूप है, ज्ञानस्वरूप है, सत्य है, नित्य है, शुद्ध-बुद्ध है, मुक्त है। तीनों अवस्थाओं में उसकी अवस्थिति एक-सी है।
जीवात्मा ही परमात्मा है, यही बात गीता में श्रीकृष्ण के मुख से निकली है- ‘‘अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशय स्थितः”।
(हे निद्राजयी अर्जुन!सारे जीवों के भीतर आत्मा के रूप में मैं ही विराजता हूँ।) अतः, आत्मा और परमात्मा के बीच कोई अन्तर नहीं।
इसी विमर्श के आलोक में अपने जिज्ञासु मित्रों की जिज्ञासाओं के शमन की चेष्टा कर रहा हूँ।
‘दिवंगत आत्मा’ में जो ‘आत्मा’ प्रयुक्त हुई है, वह जीवात्मा/शरीरस्थ आत्मा है। शरीर धारण करने के परिणामस्वरूप उसे तमाम शारीरिक या सांसारिक दुख-सुख, शुभ-अशुभ भोगने पड़ते हैं। सांसारिक बंधन से मुक्ति के लिए उसमें छटपटाहट भी होती है। उसे नारकीय कष्ट से भय लगता है तो स्वर्गिक सुख के प्रति दुर्निवार आकर्षण भी। इसके लिए उसे सत्कर्म करने पड़ते हैं। जन्म-मरण के चक्र में न फँसना पड़े, इसके लिए तदनुरूप आचरण करती है। ऐसा करके वह परमात्मा के सालोक्य, सायुज्य, सारूप्य-सुख की प्राप्ति कर सकती है। जब ऐसी आत्मा अथवा मनुष्य शरीर/प्राण त्यागती है, तब उसके लिए ‘दिवंगत आत्मा’ का प्रयोग अनुचित नहीं कहलाएगा। लेकिन, आश्चर्य तो तब होता है, जब पापी से पापी व्यक्ति (मृत्यु के बाद) के लिए भी ‘स्वर्गीय’ या ‘दिवंगत’ विशेषण का प्रयोग होता है। परंपरा भी यही है। किसी मृत पापी मनुष्य के लिए ‘नारकीय’/‘नरकीय’ अथवा ‘नरकंगत’ विशेषण का प्रयोग होते नहीं देखा है। रावण, कंस, अजामिल- जैसे पापात्माओं के लिए भी नहीं; क्योंकि पहले दोनों जीव भगवान के हाथों मारे गये तो अजामिल ने अंतिम समय में ‘नारायण’ का नामोच्चार कर अपने लिए स्वर्ग सुरक्षित करा लिया। इसीलिए, स्वर्गंगत/दिवंगत कहलाए।
स्व. प्रो. गणेशानन्द झा के दौहित्र-द्वय के प्रश्न का उत्तर वैशेषिक, न्याय और सांख्य के विमर्श में ही निहित है। शरीर-भेद-आत्मा की अनेकता है।
आशा करता हूँ, उपरिनिर्दिष्ट जिज्ञासु मित्रों के साथ-साथ अन्य मित्रों की सम्बद्ध जिज्ञासाओं का भी यथासंभव शमन हुआ होगा।
फिलहाल आपसे विदा लेता हूँ। नमस्ते!

# प्रो. (डाॅ.) बहादुर मिश्र, पूर्व अध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिंदी विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार
3 जुलाई 2020

BNMU। हिमालय का कवि : गोपाल सिंह नेपाली

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हिमालय का कवि : गोपाल सिंह नेपाली

आज 11 अगस्त है, यानी हिमालय का कवि और भारत की ‘वन मैन आर्मी’ कहलाने वाले गोपाल सिंह नेपाली (11.8.1911-17.4.1963) की 110वीं जन्म-तिथि। चीन को भारत का ‘नम्बर वन दुश्मन’ साबित करने करने वाले देश के इस ‘पहरुआ’ को गये 57 साल बीत गये। तबसे लेकर आज तक चीन ने न तो अपनी नीति बदली और न ही नीयत। उसके दाँत और नाखून पहले से कहीं अधिक तीखे हो गये हैं। हमारा हिमालय फिर एकबार चीनियों द्वारा पदाक्रान्त हुआ हैै। उसने अपनी विस्तारवादी नीतियों द्वारा विश्व को महायुद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है।
भौगोलिक दृष्टि से हिमालय भले ही टेथीज सागर में घटित अज्ञात, भू-हलचल के कारण आविर्भूत पर्वत-शृंखला मात्र हो, लेकिन हम भारतीयों के लिए न केवल धर्म, दर्शन, काव्यादि का आलम्बन है, अपितु हमारी समग्र सांस्कृतिक चेतना का हिमावृत्त शुभ्र विग्रह भी। महादेवी वर्मा अनुचित नहीं कहती हैं- ‘‘संसार के किसी भी पर्वत की जीवन-कथा इतनी रहस्यमयी न होगी, जितनी हिमालय की है। उसकी हर चोटी, हर घाटी हमारे धर्म, काव्य से ही नहीं, हमारे जीवन के सम्पूर्ण निःश्रेयस से जुड़ी हुई है। वह मानो भारत की संश्लिष्ट विशेषताओं का ऐसा अखण्ड विग्रह है, जिस पर काल कोई खरोंच नहीं लगा सका।’’ (भारतीय संस्कृति के स्वर(भारतीय संस्कृति की पृष्ठभूमि); पृ. 27-28)
जीवन-सागर की अतल गहराई से अपनी विशिष्ट मेधा के साथ उभरने वाले वैदिक मनुष्य की तरह ही पृथ्वी के किसी गुरु-गम्भीर प्रकंप के परिणामस्वरूप हिमालय भी अस्तित्व में आया, यह भौगोलिक सत्य जितना विश्वसनीय है, उतना ही विश्वसनीय है यह तथ्य कि पृथ्वी और पर्वत–दोनों में यह विस्फोटजन्य प्रकंपन कुछ काल तक शेष रहा होगा, अन्यथा ऋग्वैदिक कवि यह बिल्कुल नहीं लिखता-
‘‘यः पृथिवीं व्यथमानादृंदृद्यः पर्वतान्प्रकुपितां अरम्णात।
यो अन्तरिक्षं विममेवरीयो यो द्यामस्तम्नात्स जानस इन्द्र।। ’’( ऋग्वेद,2.12.2)
अर्थात् जिसने कम्पित पृथ्वी को दृढ़ किया,जिसने क्षुब्ध पर्वतों को शान्त किया,जिसने विस्तृत अंतरिक्ष को फैलाया और जिसने आकाश को स्थिर किया, हे जनो ! वह इन्द्र है।
अथर्ववैदिक कवि भी पृथ्वी को सम्बोधित करता हुआ लगभग यही बात कहता है –
‘‘गिरयस्ते पवतः हिमवन्तोsरण्यंते पृथिवी स्योन्मस्तु’’
अर्थात् हे पृथ्वी ! तेरे पर्वत, तेरे हिमावृत्त शल्य, तेरे अरण्य सुखदायी हों !
वैदिक ऋषियों का यह ‘हिमवंत’ आदि कवि वाल्मीकि के युग तक आते-आते ‘शैलेन्द्र’ या ‘शैलराट्’ बन जाता है। इससे अनुप्रेरित महाभारतकार हिमालय का स्मरण ही नहीं करता, वरन् रक्तरंजित विजय से क्षुब्ध पाण्डवों को प्रायश्चित्तस्वरूप उसके हिमशीतल अंक में सुला भी देता है। कालिदास के काव्यों में तो हिमालय सुख-दुख के अनेकानेक उच्छ्वासों में स्पंदित हो उठता है। ‘पृथ्वी का मानदण्ड’ और ‘देवात्मा'(कुमारसम्भवम्) की उपाधियाँ पाने वाले हिमालय की पुत्री पार्वती कठोर तपश्चर्या द्वारा शिव का वरण कर अपराजेय कुमार कार्त्तिकेय को जन्म देती है। गर्व से सिर ऊँचा कर खड़ा रहने वाला हिमालय तुलसीदास तक आते-आते इतना विनम्र हो जाता है कि उसे सद्यः परिणीता पुत्री पार्वती और जामाता शिव का चरण-स्पर्श करने में भी ग्लानि-बोध नहीं होता। देखिए रामचरितमानस के बालकाण्ड की ये पंक्तियाँ –
‘तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे।।

’ ’ ’
‘दाइज दियो बहु भाँति पुनिकर जोरि हिमभूधर कह्यो।
का देउँ पूरनकाम संकर चरण पंकज गहि रह्यो। ’

आगे चलकर कवियों-कलाकारों-चित्रकारों ने अपनी-अपनी तरह से हिमालय का प्रशस्ति-गान किया। तब से आज तक शिव के राशीभूत अट्टहास-सा उज्ज्वल पर्वत भारतीय साहित्य, कला आदि का सहचर रहा है। इस पर दृष्टि पड़ते ही कवि के हृदय में अनंत भावनाओं की घटाएँ उमड़ आती हैं और चित्रकारों की आँखों से विविध रंगमय स्वप्न बरस पड़ते हैं। मूर्त्तिकार को इसमें जीवन की विराटता प्रत्यक्ष हो जाती है। स्वरकार के आरोह-अवरोह इसकी परिक्रमा करने लगते हैं और नृत्यकार इसमें महाकाल के ताण्डव और लास्य की चाप सुन लेता है।
ऐसे कवियों/कलाकारों में प्रसाद( हिमाद्रि तुंग-शृंग से….), दिनकर (मेरे नगपति मेरे विशाल), पंत (हिमाद्रि ), महादेवी वर्मा (हे चिर महान् ), माखनलाल चतुर्वेदी (वह हिमाद्रि, आज चीन को मजा चखा दें ), राजकुमार चतुर्वेदी (हिमालय की पुकार ), राममोहन त्रिपाठी(झुकना नहीं हिमालय), रामविलास शर्मा, इन्दौर(हिमालय का आह्वान), वीरेंद्र मिश्र( हिमालय छीन ले), पद्मसिंह शर्मा कमलेश (ओ हिमालय के सपूतो ), विद्यानिवास मिश्र (अस्ति की पुकार हिमालय (निबंध)), रोरिक (हिमालय पर आधारित ढेरों चित्र बनाने वाला पश्चिमी चित्रकार) प्रभृति के नाम आदर के साथ लिये जा सकते हैं।
एक ऐसे ही कवि-गीतकार का नाम है गोपाल सिंह ‘नेपाली’ । औरों ने तो हिमालय पर मात्र एक या दो कविताएँ/ गीत लिखकर इतिहास में अपना नाम सुरक्षित करा लिया, जबकि नेपाली ने ‘हिमालय ने पुकारा’ (1963) नाम से प्रकाशित अपना पूरा काव्य- संग्रह ही हिमालय को समर्पित कर दिया। इस संग्रह की चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा, हिमालय और हम, इन चीनी लुटेरों को हिमालय से निकालो, भारत माता की प्रभाती, है ताज हिमालय सिर पर, तुम उसको गोली दो, हिन्दुस्तान की ललकार के अतिरिक्त ‘पंचमी’ से ‘हिमांचल’ (1942), ‘नीलिमा’ (1944) से ‘तरु वृक्षों की पाँति घनी यह’, उमंग (1934) से ‘नवीन नेपाल’ उनकी उल्लेखनीय हिमालय-विषयक रचनाएँ हैं।
इनमें से अधिकांश कविताएँ तब की हैं, जब देश संकट की स्थिति से गुजर रहा था। यह संकट था भारत के लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश (नेफा) पर चीन का अप्रत्याशित व विश्वासघाती हमला। इसका आभास उन्हें पहले ही हो गया था। इसीलिए तो जुलाई, 1957 में रचित कविता ‘नजर है नई तो नजारे पुराने’ की इन पंक्तियों के माध्यम से कहना प्रारम्भ कर दिया था-
‘‘हुआ देश की खातिर, जनम है हमारा
कि कवि हैं, तड़पना करम है हमारा
कि कमजोर पाकर मिटा दे न कोई
इसी से जगाना धरम है हमारा
कि मानें न मानें, हमें आप अपना
सितम से हैं नाते हमारे पुराने
नई रोशनी को मिले राह कैसे
नजर है नई तो, नजारे पुराने।’’

अप्रैल, 1959 में रचित ‘चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा’ शीर्षक गीत प्रथम चीनी आक्रमण की पृष्ठभूमि पर आधारित अपेक्षाकृत लम्बी रचना है। लोकप्रिय धारणा है कि चीन ने अक्टूबर, 1962 में पहला आक्रमण किया था। लेकिन, सचाई यह है कि चीनियों ने पहला हमला 1959 में ही किया था। कविता के प्रतिपाद्य पर विमर्श करने के पूर्व इतिहास के इस दुखद पहलू पर दृष्टिपात करना अप्रासंगिक न होगा।
1947 में भारत विदेशी दासता से मुक्त हुआ। इसके ठीक दो साल बाद 1949 में चीन भी साम्राज्यवादी शक्ति से मुक्त होकर गणतांत्रिक राज्य बना। दोनों की पीड़ाएँ एक-सी थीं। इसलिए, यह प्रत्याशित था कि दोनों मिलकर रहेंगे और लोगों की बेहतरी के लिए काम करेंगे। इसी आलोक में 1954 का पाँचसूत्री सिद्धांत पर आधारित ‘पंचशील’ नामक समझौता अस्तित्व में आया। इस पर दोनों देशों के तत्कालीन प्रधानमंत्रियों– पं. जवाहरलाल नेहरु तथा चाऊ-एन-लाई के हस्ताक्षर थे। ये सिद्धांत थे – (1) एक दूसरे के क्षेत्रों तथा प्रभुसत्ता का आदर, (2) अनाक्रमण की नीति पर अमल (3) एक दूसरे के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप न करने के साथ-साथ समानता तथा आपसी लाभ की नीति पर चलने का निर्णय तथा (4) शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का अनुसरण।
‘पंचशील’ के अस्तित्व में आने के चार साल पूर्व ही चीन ने भारत को विश्वास में लिये बगैर तिब्बत को हथिया लिया। भारतीय नेतृत्व की नपुंसकता तब और उजागर हुई, जब विश्व-नेता का सपना देखनेवाले पं. जवाहरलाल नेहरु ने तिब्बत पर चीन की एकतरफा कार्रवाई को विधिवत् मान्यता दे दी। हद तो तब और हो गई, जब भारतीय प्रधानमंत्री ने वानडुंग में आयोजित एशिया-अफ्रीका कांफ्रेंस में चाऊ-एन-लाई को बिना किसी शर्त्त के अपना समर्थन दे डाला। इसका सिला यह मिला कि 1959 में साम्यवाद-रूपी भेंड़ की खाल ओढ़कर साम्राज्यवाद रूपी धूर्त्त भेंड़िये की तरह ‘पंचशील’ के रूप में तैनात पहरेदार को धता बताते हुए लद्दाख के कोगंका दर्रे पर खूनी हमला कर दिया। तब भी हमारा नेतृत्व शांतिकामी और सहिष्णु बना रहा। उल्टा उसने भारतीय नेतृत्व पर आरोप मढ़ दिया कि उसने चीन के शत्रु और स्वतंत्र तिब्बत के समर्थक दलाई लामा को शरण दे रखी है। भारत को अंतिम धक्का लगना अभी बाकी था। 20 अक्टूबर, 1962 को चीन ने नेफा, अर्थात् अरुणाचल प्रदेश पर आक्रमण कर न केवल हमारे दर्जनों सैनिकों को मार गिराया और देश को पीछे हटने के लिए बाध्य किया, बल्कि कई चौकियाँ भी हथिया लीं। आज भी हजारों वर्गमील जमीन उसके कब्जे में है। जब पं. नेहरू ने 9 नवम्बर, 1962 को अमेरिका और ब्रिटेन को अलग-अलग पत्र लिखकर सैनिक सहायता माँगी, तब कहीं जाकर दुष्ट चीन पीछे हटा। लेकिन, उसकी साम्राज्यवादी नीति आज भी ज्यों-की-त्यों कायम है। आए दिन लद्दाख और अरुणाचल में उसकी घुसपैठ होती रहती है। वह लद्दाख, अरुणाचल और आसाम की 50 हजार वर्गमील जमीन को अपने नक्शे में दिखा रहा है। गोपाल सिंह नेपाली जैसे सजग और राष्ट्रवादी कवि-गीतकार ने इसी परिप्रेक्ष्य में अपनी महत्त्वपूर्ण हिमालय-विषयक रचनाएँ कीं। उनकी दृष्टि में हिमालय भारत का गर्वोन्नत भाल है। उस पर किसी तरह का आक्रमण भारत के अस्तित्व पर आक्रमण है।
पाँच-पाँच पंक्तियों के बारह बंधों में रचित आलोच्य कविता के केंद्र में लद्दाख पर चीनी आक्रमण से उत्पन्न सात्विक आक्रोश ही तो है-
‘कह दो कि हिमालय तो क्या पत्थर भी न देंगे
लद्दाख की क्या बात है, बंजर भी न देंगे
आसाम हमारा है रे मरकर भी न देंगे
है चीन का लद्दाख तो तिब्बत है हमारा
चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।

इस गीत में कवि ने हिमालय को ‘हिंद की दीवार’, ‘शांति की मीनार’, ‘धरती का मुकुट’, ‘भारत का अचल भाग्य’ जैसे विशेषणों से सम्बोधित किया है। फिलहाल इसे ‘लाल’ चीन की कुदृष्टि लग गई है, जिस से बचने के लिए भारत को अहिंसक नीति को छोड़कर बन्दूक उठानी पड़ी-
इतिहास पढ़ो समझो तो यह मिलती है शिक्षा
होती न अहिंसा से कभी देश की रक्षा

’ ’ ’

संग्राम बिना जिन्दगी आँसू की लड़ी है
तलवार उठा लो तो बदल जाये नजारा

कवि ने देश भर में घूम-घूमकर यह गीत गाया था। मुजफ्फरपुर के एक कवि-सम्मेलन में तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन इस गीत को सुनकर इतने प्रभावित हुए कि इसे भारत भर में हिंदी के अलावा उर्दू में छपवाकर वितरित करने की इच्छा जताई। यही नहीं, आसाम रायफल्स के तत्कालीन कमांडर-इन-चीफ ने अपने सैनिकों के सामने इस रचना के पाठ के लिए नेपाली जी को लिखित आमंत्रण भेज दिया। देखते-देखते यह भारत का प्रयाण-गीत (मार्चिंग सोंग) बन गया।
जनवरी,1958 में रचित ‘हिमालय और हम’ शीर्षक कविता में नेपाली ने गिरिराज हिमालय को चालीस करोड़ भारतवासियों के अक्षय व आत्मीय प्रेरणा-स्रोत के रूप में प्रस्तुत किया है। इसमें उन्होंने भारत के साहित्यिक सौंदर्य के साथ-साथ ऐतिहासिक तथा आध्यात्मिक समृद्धियों व छटाओं को एक साथ दिखाया है।
देखिए-
गिरिराज हिमालय से भारत का कुछ ऐसा ही नाता है।
चालीस करोड़ों का जत्था, गिर-गिरकर भी उठ जाता है।

कवि ने हिमालय की सर्वोच्च चोटी को ‘सकल धरती का सरताज’, ‘अरुणोदय और संध्या की लाली’, ‘भारत का ऊँचा शीश’, ‘उत्तर की मीनार’, ‘जगत भर का पहरेदार’, ‘लाखों लोगों के सुखों का रखवाला’, ‘मन का दानी’, ‘गूँगे का मुख’, ‘गौरीशंकर का निवास-स्थल’, ‘गंगा का उद्गम-स्रोत’- जैसे विशेषणों से भूषित गौरवराट् के रूप में प्रस्तुत किया है।
आगे कवि ने हिमालय के पराक्रम का बखान करते हुए लिखा कि इससे टकराने वाले बादल पानी-पानी हो जाते हैं। प्रतीकार्थ यह कि भारत के दुश्मनों का हौसला पस्त हो जाता है। कुल मिलाकर, हिमालय हमारा गौरव है, हमारी पहचान है। अपनी आँखों में जो व्यक्ति इसे बसा लेता है, वह अपने सिर पर समस्त ‘गगन’ को उठा लेता है। ऐसे हिमगिरि को भूलने वाला देश निश्चित ही, परतंत्र होकर दयनीय जीवन जीता है–
हम कभी हिमालय को भूले, तो दीन हुए, परतंत्र हुए
फिर पुण्य जगा बलिदानों का, तो आगे बढ़े, स्वतंत्र हुए

कविता की वर्ण्य वस्तु से पता चलता है कि तब तक चीन ने हिमालय-प्रांत को पददलित नहीं किया था, लेकिन घुसपैठ की योजना बना ली थी।
‘टकराते हैं इससे बादल, तो खुद पानी हो जाते हैं
तूफान चले आते हैं तो, ठोकर खाकर सो जाते हैं’-
इस कवितांश में प्रयुक्त ‘बादल’ और ‘तूफान’ चीन और पाकिस्तान-जैसे
घातक मंसूबों वाले भारत के दुश्मन देशों की तरफ साफ-साफ इशारा करते हैं।

‘इन चीनी लुटेरों को भारत से निकालो’ शीर्षक कविता चीनी आक्रमण के ठीक बाद की लिखी प्रतीत होती है। इसके रचना-काल के स्थान पर अक्टूबर, 1962 उल्लिखित है। ज्ञातव्य है कि चीनी आक्रमण 20 अक्टूबर को हुआ था। इसका सीधा अर्थ है कि यह कविता 20 से 31 के बीच की किसी तारीख को लिखी गई है।
ध्यातव्य है कि चीनियों का पहला आक्रमण लद्दाख पर हुआ था, जबकि दूसरा नेफा (आज का अरुणाचलप्रदेश) पर। कवि ने गुस्से में लिखा-
‘‘लद्दाख चलो, चीन जहाँ घुसके अड़ा है,
नेफा को चलो, चोर जहाँ छुपके खड़ा है।’’

ध्यातव्य है कि चीन आज भी लद्दाख में घुसा हुआ है।
25 छंदों में रचित यह लम्बी कविता एकतरह से प्रयाण-गीत है। सम्भवतः सीमा-समस्या पर रचित कविताओं में सर्वाधिक प्रभविष्णु व प्रतिनिध्यात्मक है, जिसमें कवि ने भारतीयों को जाति, धर्म, सम्प्रदाय, भाषा, क्षेत्र इत्यादि की क्षुद्र सीमाओं से निकलकर चीनियों से लड़ने हेतु आह्वान किया है-

‘‘मंदिर से चलो थाम के बंदूक पुजारी
मस्जिद से चलो साथ ले तलवार दुधारी
राजपूत चलो, सिक्ख चलो, जाट चलो रे
घर जिसने जलाया है चिता उसकी जला लो
इन चीनी लुटेरों को हिमालय से निकालो।’’

यह वक्त का तकाजा है कि अहिंसा और शांति के पुजारी भारत को, कुछ समय के लिए ही सही, अहिंसा-सिद्धांत को जेब में रख लेना चाहिए- ‘‘कुछ दिन को अहिंसा का नाम जेब में रख लो’’ क्योंकि, ‘‘लातों के पुजारी कभी बातों से नहीं माने।’’
उधर दिनकर भी अहिंसावादी का युद्धगीत/1962’ कविता के माध्यम गरज रहे थे-
‘‘देशवासी! जागो/जागो/ गाँधी की रक्षा करने को गाँधी से भागो!/ रुधिर में रखें शीत या ताप?/अहिंसा वर है अथवा शाप?/ युद्ध है पुण्य या कि पाप?/ आज सारा विवाद त्यागो/ गाँधी की रक्षा करने को गाँधी से भागो/’’
नेपाली ने चीनी नेतृत्व को ‘चोर’, ‘कम्युनिज्म को बदनाम करने वाला’, ‘साम्यवाद की आड़ में साम्राज्यवाद की नींव डालनेवाला’, धूर्त्त और विश्वासघाती कहकर तीखी भर्त्सना की है। जो हो, लेकिन केन्द्र में है हिमालय ही।
नवम्बर, 1961 में रचित ‘हिन्दुस्तान की ललकार’ चीनी आक्रमणजन्य देशव्यापी आक्रोश से उत्पन्न महत्त्वपूर्ण प्रयाण-गीत है। इस कविता की अतिरिक्त विशेषता यह है कि इसमें कवि ने गढ़वाल और नेपाल–दोनों का एक साथ उल्लेख किया है। इन दोनों जगहों से उनका संबंध भी रहा है।
जो हो, इस प्रयाण-गीत में हिमालय का मात्र एक बंद में उल्लेख हुआ है। इसमें उसे भारत के द्वार और ढाल (रक्षक) के रूप में दिखाया गया है–
‘‘जब से हुई दुनिया शुरु
चन्दा बना तारे बने
नदियाँ, हिमालय, सिन्धु
हिन्दुस्तान के द्वार बने
तब से हिमालय है खड़ा सटकर हमारी ढाल से
ओ चीनियो! जाओ निकल लद्दाख से नेपाल से।’’ (वही, 106)

कहना न होगा कि चीन पाकिस्तान और नेपाल — दोनों देशों में घुसकर भारत के खिलाफ काम कर रहा है।
‘ है ताज हिमालय के सिर पर’ (जुलाई , 1958 शीर्षक कविता भारत की तत्कालीन देशी रियासतों में वास्तविक जनतंत्र स्थापित होने के ठीक बाद रची गई थी। कहते हैं, भारत के इन देशी राज्यों ने भारत के राष्ट्रीय, सामाजिक और आर्थिक जीवन में कई तरह की कुरूपताएँ पैदा कर रखी थीं; जैसे- विपन्नता, ऊँच-नीच की भावना आदि। ये देशी रियासतें शोषण और भेदभाव पर टिकी थीं। इतना ही नहीं, इन रियासतों के तथाकथित ताज विदेशी हुकूमत के पिट्ठू बने हुए थे। भारत के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल की दूरदर्शिता से इन सैकड़ों रियासतों का भारतीय संघ में विलय हो गया था। इससे देश में हर्ष का वातावरण छा गया था। गरीबों ने राहत की साँस ली थी। आलोच्य कविता इसी भावना की सुन्दर अभिव्यक्ति है। देखिए–
“आजाद परिन्दों से कह दो, अब यहाँ विदेशी राज नहीं
है ताज हिमालय के सिर पर, अब और किसी का ताज नहीं।’’
कवि ने कहना चाहा है कि अब देश का एक ही ताज है और वह है हमारा सरताज हिमालय। हिमालय यहाँ समस्त भारत का प्रतीक बनकर आया है– हमारी एकता, हमारे समेकित बंधुत्व का प्रतीक।
‘तुम उसको गोली दो’ (नवम्बर, 1962) चीनी आक्रमण के ठीक बाद की रचना है। अपनी तरह के छोटे छंद में रचित इस कविता का केन्द्रीय स्वर राष्ट्रीय पौरुष की अभिव्यक्ति है, जिसका माध्यम पुनः एक बार हिमालय बना है। उन्मीलक पंक्तियाँ देखिए-
‘‘आज बाँह फड़की है, छाती भी धड़की है
गोद में हिमालय की, रण-बिजली कड़की है।’’
(हिमालय ने पुकारा /39)

कवि ने इसमें लापरवाहों, भीरुओं और धनलोलुपों को कड़े शब्दों में फटकारा है–
‘‘चर्चा तू करता है, साम्यवाद, हिंसा की
सर्वोदय, पंचायत, ट्रस्ट की, अहिंसा की
लुटती है आजादी, तुझको न चिन्ता है
सोते में जगते में, तू रुपये गिनता है।
दौड़ चलो नेफा को, देश जहाँ लुटता है
खून सी धरती पर, नाम जहाँ उठता है
तिब्बत की सीमा से, हिन्द यहीं मिलता है।’’
(हिमालय ने पुकारा/ 42)
कवि ने इन पंक्तियों में लद्दाख और नेपाल को हिमालय की गोद कहकर अभिहित किया है।
फरवरी, 1963 में रचित नेपाली की अत्यंत लोकप्रिय कविताओं में एक ‘भारत माता की प्रभाती’ में कवि ने हिमालय को घायल, पददलित और अपमानित रूप में दिखाया है। कहा जा चुका है कि भारतीयों के लिए हिमालय पर्वतराज मात्र नहीं, अपितु भारतीयता का, उसके समग्र अस्तित्व का प्रतीक है। इसलिए, हिमालय को लगने वाली कोई भी चोट समस्त भारत की चोट होती है। शांति भंग होती है हिमालय की और अशांत हो उठता है भारत। इसी से पता चलता है कि कितना महत्त्वपूर्ण है हमारा हिमालय! नेपाली की यही पीड़ा इन पंक्तियों में छलक पड़ी है-
‘‘तुम लाल सोते रह गये, शंकर भी सोते रह गये
घायल हिमालय रोया, तुम घाव धोते रह गये
इतना न सोना बेटो, बिस्तर कबर हो जाये
अपना हिमालय लुटके, कल को उधर हो जाये।’’ ( वही, 36)

कहते हैं, यह जागरण-गीत ईरान की एक प्रसिद्ध लोकधुन पर आधारित है। कई स्थलों पर सशक्त प्रतीकों के प्रयोग के कारण कविता और भी महत्त्वपूर्ण बन गई है।
‘तरु-वृक्षों की पाँति घनी यह’ नेपाली के कविता-संग्रह ‘नीलिमा’ में संकलित हिमालय विषयक अपेक्षाकृत छोटी कविता है– मात्र अठारह पंक्तियों की। छन्द भी काफी छोटा है। रचना-क्रम (1939) की दृष्टि से ‘नीलिमा’ कवि का चौथा संग्रह है, किन्तु प्रकाशन की दृष्टि से पाँचवाँ। 1944 ई. में मशहूर साम्यवादी नेता रामदेव शर्मा ने इसे वैशाली निकुंज, मुजफ्फरपुर से प्रकाशित कराया था। यह संकलन मूलतः उनके प्रेम व प्राकृतिक सौन्दर्य-बोध का अभिव्यंजन था।
‘तरु-वृक्षों की पाँति घनी यह’ कवि के प्रकृति-प्रेम और देश-प्रेम का मीलित उदाहरण है, जिसमें उन्होंने हिमालय को भारत की महानता, उदारता, सुन्दरता और मुखरता का आधार बताया है। देखिए–
‘‘सुन्दर है जग में यदि भारत,
तो आधार हिमालय है।
करुणा की पाषाणी पिघली
महाविजन में गंगा निकली
नीचे हिम ऊपर घन उज्ज्वल
यह संसार हिमालय है।

…भारत को जो कुछ कहना है
उसका उद्गार हिमालय है।’’

इस पूरी कविता में कवि ने भारत को हिमालयमय और हिमालय को भारतमय दिखाते हुए दोनों में अद्वैत का सम्बन्ध दिखाया है।
वर्ण्य वस्तु से स्पष्ट है कि हिमालय-विषयक यह कविता नेपाली के द्वारा युद्ध-काल में रचित अन्य कविताओं से भिन्न है। राष्ट्रीयता का पुट दोनों में ही है। अंतर सिर्फ इतना है कि युद्ध-काल-पूर्व रचित हिमालय-विषयक कविताओं में राष्ट्रीयता का सांस्कृतिक रूप दृष्टिगत है तो परवर्त्ती रचनाओं में राष्ट्रीयता का उद्दात रूप।
‘पंचमी’ (1942) में संकलित ‘हिमांचल’ कविता ‘तरु-वृक्षों की पाँति घनी यह’ की ही भाँति प्रथमतः और अंततः प्राकृतिक सौन्दर्योन्मीलन की रचनात्मक प्रस्तुति है। हिमांचल साधारण पर्वत नहीं है। वह तो धरा का गर्वोन्नत भाल है, जिससे कंकड़ को किंकणी बनाती हुई सुरसरि की पतली-सी धारा प्रवाहित होती रहती है, जिसके आश्रय में बसता है विहग-किन्नरियों से सदैव मुखर रहने वाला मानसरोवर। हिमांचल ऐसा गजराज है, जो ‘धरा पर घट भर-भर जल डाल रहा है।’ ऐसे उदारचित्त हिमगिरि को निहारना सदैव सुखकर व प्रीतिकर प्रतीत होता है।
गोपाल सिंह ‘नेपाली’ न केवल स्वयं को, बल्कि कवि मात्र को हिमगिरि-दर्शन हेतु आमंत्रित करते हैं–
‘‘आज धरा से ऊपर उठकर
कवि विशाल हिमगिरि को देखो।’’

# प्रो. (डाॅ.) बहादुर मिश्र, पूर्व अध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिंदी विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार
11/08/2020

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