इस ‘लोभ’ को मैं क्या नाम दूँ!
—–
आज विश्वविद्यालय गाँधी-विचार विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में कई गुरुजनों, अग्रजों एवं मित्रों से मुलाकात हुई और इस क्रम में कुछ ऐसी बातें हुई जिसने दिल को छू लिया।
कार्यक्रम दस बजे से निर्धारित था। मैं ससमय बहुद्देशीय प्रशाल में पहुंच गया। यह वही प्रशाल है, जिसमें मैंने पहले भी कई कार्यक्रमों को आयोजित कराने में महती भूमिका निभाई है और एक-दो परीक्षाएं भी दी हैं।
खैर कार्यक्रम में विलंब था। मैं कुर्सियों की कतार के बाद लगे बैंच की दूसरी कतार में बैठ गया। मित्रवर भाई डॉ. संजय कुमार रजक जी ने अनुरोध किया कि कुर्सी पर आएं। लेकिन मैंने विनम्रतापूर्वक मना कर दिया, तो वे भी मेरे बगल वाली बैंच पर आकर बैठ गए। चंद मिनटों में पूर्व विभागाध्यक्ष गुरुवर प्रो. विजय कुमार सर आगे की कुर्सी को छोड़कर भी हमारे पास आ गए। उन्होंने आते ही कहा, “सुधांशु से बातचीत करने के लोभ में इधर आ गए।” उनकी इस बात को सुनकर मेरा दिल भर आया।
मालूम हो कि प्रो. विजय मेरे गुरु एवं अभिभावक हैं। मैंने इनके भाषण एवं लेखन से बहुत कुछ सीखा है। आज भी इनसे मिलकर एवं बातचीत कर मैं अपने आपको तरोताजा महसूस कराता हूँ। ऐसे गुरु अपने एक साधारण शिष्य से बातचीत करने के लोभ में आगे की कुर्सी को छोड़कर पीछे बैंच पर बैठने आ जाएं, तो जो अनुभूति होती है, वह ‘अनिर्वचनीय’ है! मैं इस संबंध में ज्यादा कुछ कहने में अपने आपको असमर्थ पा रहा हूँ। मैं बस ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे ऐसे ‘लोभी गुरु’ का सानिध्य हमेशा मिलता रहे।आप लोग ही बताएं कि अपने गुरु के इस ‘लोभ’ को मैं क्या नाम दूँ!














