मधेपुरा। बीएन मंडल विश्वविद्यालय के पीजी मैथिली विभाग में साहित्य अकादमी से प्रकाशित तथा शिवशंकर श्रीनिवास एवं अतुलेश्वर झा द्वारा संपादित पुस्तक धीरेन्द्र : रचना संचयन का लोकार्पण कार्यक्रम आयोजित किया गया। पुस्तक विमोचन कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के डीएसडब्ल्यू सह विश्वविद्यालय भौतिकी विभागाध्यक्ष प्रो. उमाशंकर चौधरी ने किया।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में विश्वविद्यालय मैथिली विभाग के अध्यक्ष डॉ. नरेंद्र नाथ झा ने विस्तार से अपनी बात रखी। अतिथियों का स्वागत मैथिली विभाग के डॉ. कृष्ण मोहन ठाकुर ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सोनू कुमार झा ने किया।
पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में डीएसडब्ल्यू ने कहा कि पुस्तक लेखन और संकलन आने वाली पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण होता है। डॉ. अतुलेश्वर झा ने अपने पिता के मूल रचना को पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर आम लोगों के लिए पठनीय सामग्री को प्रस्तुत कर पितृ पक्ष में अपने पिता को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की है। उन्होंने कहा कि पुस्तक में मिथिला के आंचलिक स्थिति, मिथिला में औद्योगिक संस्कृति, आधुनिक शिक्षा का आकर्षण, सामंती मानसिकता का और उग्र होना और अपनों-परायों की दूरी से संवेदना पर लगती चोट पर आधारित यह पुस्तक आने वाली पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण होगा।
डॉ. अतुलेश्वर झा ने कहा कि धीरेन्द्र का रचना संसार इतना व्यापक है कि सबको एक पोथी में समेटना कठिन था, इसलिए उनके मूल स्वर को सामने लाने वाली चुनिंदा रचनाओं को इस संचयन में रखा गया है। उन्होंने कहा कि बहुविधा रचनाकार डा. धीरेन्द्र ने कथा, कविता, गीत, महाकाव्य, नाटक, बाल साहित्य और उपन्यास सभी में अपनी गहरी छाप छोड़ी है। इसी साहित्यिक विरासत को समेटते हुए धीरेन्द्र का चयनित संचयन तैयार किया गया है, जिसमें उनकी लोकप्रिय कविताओं-कथाओं के साथ उनके तीनों प्रसिद्ध उपन्यासों भोरुकवा, कादो आ कोइला और ठुमुकि बहु कमला को शामिल किया गया है। भोरुकवा’ में उन्होंने मिथिला की खेती-बाड़ी और मजदूर पलायन का चित्रण कर कहा था कि शिक्षा के प्रचार से शोषण स्वतः समाप्त होगा। कादो आ कोइला में उनका मत था कि शहर हो या गांव, शोषण एक ही है इसलिए पलायन नहीं, शोषण के विरुद्ध खड़ा होना जरूरी है। वहीं ठुमुकि बहु कमला में शोषित के विजय का आख्यान है।
इस अवसर पर डॉ. शंभू राय, डॉ. सचिंद्र नाथ, डॉ. संजय कुमार परमार, डॉ. रौशन कुमार यादव, डॉ. गौतम कुमार , प्रो.अरुण कुमार झा, प्रो. सुनील कुमार प्रो. मनोज कुमार, ललिता कुमारी, पुष्पा कुमारी, सुगंधा कुमारी शशांक राज, मिंटू कुमार तथा शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में विश्वविद्यालय मैथिली विभाग के अध्यक्ष डॉ. नरेंद्र नाथ झा ने विस्तार से अपनी बात रखी। अतिथियों का स्वागत मैथिली विभाग के डॉ. कृष्ण मोहन ठाकुर ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. प्रमोद कुमार सिंह ने किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. सोनू कुमार झा ने किया।
पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में डीएसडब्ल्यू ने कहा कि पुस्तक लेखन और संकलन आने वाली पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण होता है। डॉ. अतुलेश्वर झा ने अपने पिता के मूल रचना को पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर आम लोगों के लिए पठनीय सामग्री को प्रस्तुत कर पितृ पक्ष में अपने पिता को सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित की है। उन्होंने कहा कि पुस्तक में मिथिला के आंचलिक स्थिति, मिथिला में औद्योगिक संस्कृति, आधुनिक शिक्षा का आकर्षण, सामंती मानसिकता का और उग्र होना और अपनों-परायों की दूरी से संवेदना पर लगती चोट पर आधारित यह पुस्तक आने वाली पीढ़ी के लिए महत्वपूर्ण होगा।
डॉ. अतुलेश्वर झा ने कहा कि धीरेन्द्र का रचना संसार इतना व्यापक है कि सबको एक पोथी में समेटना कठिन था, इसलिए उनके मूल स्वर को सामने लाने वाली चुनिंदा रचनाओं को इस संचयन में रखा गया है। उन्होंने कहा कि बहुविधा रचनाकार डा. धीरेन्द्र ने कथा, कविता, गीत, महाकाव्य, नाटक, बाल साहित्य और उपन्यास सभी में अपनी गहरी छाप छोड़ी है। इसी साहित्यिक विरासत को समेटते हुए धीरेन्द्र का चयनित संचयन तैयार किया गया है, जिसमें उनकी लोकप्रिय कविताओं-कथाओं के साथ उनके तीनों प्रसिद्ध उपन्यासों भोरुकवा, कादो आ कोइला और ठुमुकि बहु कमला को शामिल किया गया है। भोरुकवा’ में उन्होंने मिथिला की खेती-बाड़ी और मजदूर पलायन का चित्रण कर कहा था कि शिक्षा के प्रचार से शोषण स्वतः समाप्त होगा। कादो आ कोइला में उनका मत था कि शहर हो या गांव, शोषण एक ही है इसलिए पलायन नहीं, शोषण के विरुद्ध खड़ा होना जरूरी है। वहीं ठुमुकि बहु कमला में शोषित के विजय का आख्यान है।
इस अवसर पर डॉ. शंभू राय, डॉ. सचिंद्र नाथ, डॉ. संजय कुमार परमार, डॉ. रौशन कुमार यादव, डॉ. गौतम कुमार , प्रो.अरुण कुमार झा, प्रो. सुनील कुमार प्रो. मनोज कुमार, ललिता कुमारी, पुष्पा कुमारी, सुगंधा कुमारी शशांक राज, मिंटू कुमार तथा शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।












