जब मैं बच्चा था : यादों में बसा 1959 का भागलपुर
परसों मैं भागलपुर स्टेशन चौक को नई नजरों से निहार रहा था। आखिर क्यों? इसका कारण था कथाकार रंजन जी Ranjan Kumar की पुस्तक ‘जब मैं बच्चा था’ को पढ़ना। पुस्तक पढ़ने के बाद मन 1959 के आसपास के भागलपुर को तलाशने लगा।
यह पुस्तक मुख्यतः लेखक ने अपने और अपने परिवार के बारे में लिखी है, लेकिन इसके माध्यम से पुराने भागलपुर की अनेक ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं, जिन्हें जानना और याद करना जरूरी है। जैसे स्टेशन चौक पर स्थित कलकत्ता सैलून, जहाँ मैंने भी कभी बाल कटवाए थे, लेकिन अब वह नहीं है। यह बात तो परसों ही ध्यान में आई। इससे पहले कभी इस ओर गौर नहीं किया था। वहाँ कभी कलकत्ता मेडिकल शॉप और एक कोलकाता होटल भी हुआ करता था।
इस पुस्तक में एक प्रसंग ऐसा है, जिसने मुझे विशेष रूप से आकर्षित किया और सोचने पर विवश कर दिया। हम कुछ लोग आज भागलपुर में गांधी जी की एक प्रतिमा स्थापित करने की मांग जिला पदाधिकारी से लेकर प्रदेश के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री तक से कर रहे हैं। वहीं, इस पुस्तक में वर्णित है कि 1959 से पहले स्टेशन चौक के पास एक घुड़साल हुआ करता था। इस घुड़साल को मैंने भी देखा था। लेकिन रंजन जी बताते हैं कि उस घुड़साल के पास महात्मा गांधी की एक आदमकद प्रतिमा स्थापित थी और उस स्थान को महात्मा गांधी के नाम से जाना जाता था।
यह जानकर मन में सहज ही प्रश्न उठता है कि आखिर गांधी जी की उस प्रतिमा को किसने और क्यों हटाया? एक ओर आज हम भागलपुर में गांधी जी की प्रतिमा स्थापित करने की मांग कर रहे हैं, वहीं कभी इस शहर में उनकी आदमकद प्रतिमा मौजूद थी। भागलपुर के इतिहास और गांधी स्मृतियों से जुड़ा यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। क्या उस प्रतिमा को हटाए जाने के पीछे कोई विशेष कारण था? इस पर शोध और प्रामाणिक जानकारी सामने आनी चाहिए। गांधी जी की वह प्रतिमा केवल एक मूर्ति नहीं थी, बल्कि वह शहर की ऐतिहासिक स्मृति और गांधी जी के साथ उसके जुड़ाव का प्रतीक रही होगी।
रंजन जी की यह पुस्तक मुख्यतः साहित्य, फोटोग्राफी और उनके बचपन की स्मृतियों पर आधारित है। पुस्तक बताती है कि उनके चित्रशाला में देश के अनेक मूर्धन्य साहित्यकारों का जमावड़ा हुआ करता था। एक जगह वे लिखते हैं कि उन दिनों वहाँ एक शास्त्री जी ठहरे हुए थे। उनकी कोई पुस्तक शारदा प्रेस में छप रही थी। लेकिन जब भी वे कोठरी में जाते, उन्हें लिखते हुए नहीं देखते। वे कागज पर रेखाएँ खींचते और उँगलियों पर कुछ गिनते रहते। बाद में समझ में आया कि वे जन्म-टिप्पण बना रहे थे। लेखक की धुंधली स्मृति में वे उन्हें गोद में बैठाकर बातें करते दिखाई देते हैं। उनसे मिलने वालों का आना-जाना भी लगा रहता था। वे तीन महीने से अधिक वहाँ रहे। बहुत बाद में पता चला कि शारदा प्रेस से उनकी ‘वयं रक्षामः’ और ‘वैशाली की नगरवधू’ प्रकाशित हुई थीं। वे थे आचार्य चतुरसेन शास्त्री। यह भागलपुर के साहित्यिक इतिहास का गौरवपूर्ण प्रसंग है।
पुस्तक में हंसकुमार तिवारी का भी उल्लेख है, जो बंगला साहित्य का हिंदी अनुवाद करते थे। बनफूल, फणीश्वरनाथ रेणु, रामधारी सिंह दिनकर और अनेक साहित्यकारों से जुड़ी स्मृतियाँ भी लेखक ने अपने बचपन के अनुभवों के माध्यम से संजोई हैं। उस समय के बंगाली समाज और उसकी सांस्कृतिक गतिविधियों का भी सुंदर चित्रण मिलता है।
पुस्तक में एक रोमांचक भूतिया कहानी भी है, जो लेखक के पिता हरि कुंज जी के साथ घटित हुई थी। एक और घटना में एक ऐसा बच्चा, जो लावारिस अवस्था में स्टेशन पर भटक रहा था, उनके घर पहुँचता है। वह परिवार का हिस्सा बन जाता है और लेखक का मामा कहलाने लगता है। आगे चलकर वही पटना का एक बड़ा फोटोग्राफर बनता है। इस तरह की अनेक छोटी-बड़ी घटनाएँ पुस्तक को रोचक बनाती हैं।
रंजन जी ने भागलपुर के फोटो स्टूडियो के इतिहास की भी विस्तार से चर्चा की है। वे यह बताने में संकोच नहीं करते कि उनकी प्रतिष्ठान चित्रशाला भागलपुर का पहला फोटो स्टूडियो नहीं था। उनके अनुसार, पहला स्टूडियो एन.एन. सिंह एंड संस था। इसके बाद शहर में खुले अनेक फोटो स्टूडियो और उनके उत्थान-पतन की कहानी भी पुस्तक में दर्ज है।
इसी क्रम में एक स्वतंत्रता सेनानी परिवार का उल्लेख विशेष रूप से ध्यान खींचता है। यह परिवार था ठाकुर भागवत सिंह का। उन्होंने अपने पुत्रों के नाम भी ऐसे रखे थे, जिनसे उनके स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव और विचारधारा का परिचय मिलता था। पहले घर से उनके ज्येष्ठ पुत्र थे ‘स्वराज्य सिंह’। उनसे छोटे थे ‘संगठन सिंह’। दूसरे घर से हुए पुत्र का नाम उन्होंने ‘सत्याग्रह सिंह’ रखा था। ये तीनों ही फोटोग्राफी के क्षेत्र से जुड़े थे।
स्वराज्य बाबू ने डी.एन. सिंह रोड में ‘सत्यवती आर्ट स्टूडियो’ खोला। संगठन बाबू बिहार सरकार में चीफ फोटोग्राफर बने और सत्याग्रह सिंह ने बाद में इसी सड़क पर ‘रूप छाया’ नाम से अपना स्टूडियो स्थापित किया।
ठाकुर भागवत सिंह द्वारा अपने पुत्रों के नाम स्वराज्य, संगठन और सत्याग्रह रखना अपने आप में एक उल्लेखनीय प्रसंग है। इन नामों में स्वतंत्रता आंदोलन के आदर्शों और राष्ट्रीय चेतना की झलक दिखाई देती है। भागलपुर के स्वतंत्रता आंदोलन और उससे जुड़े परिवारों के इतिहास को सामने लाने के लिए ऐसे प्रसंगों का दस्तावेजीकरण बहुत जरूरी है।
पुस्तक में उल्टा पुल के पास एक सिनेमा घर होने का भी जिक्र है। चांद मिश्र, मुकुटधारी अग्रवाल, पृथ्वीराज कपूर और अनेक अन्य लोगों के लेखक के बचपन के दिनों में भागलपुर आने की स्मृतियाँ भी इसमें दर्ज हैं।
बहुत कुछ है इस पुस्तक में, जिसे लिखना और विस्तार से बताना इस छोटी-सी समीक्षा में संभव नहीं है। लेकिन इतना जरूर कहूँगा कि यह पुस्तक केवल रंजन जी के बचपन की यादें नहीं हैं, बल्कि 1956 तक के भागलपुर के सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक जीवन का भी एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसमें शहर की बदलती तस्वीर, पुराने प्रतिष्ठान, साहित्यकार, फोटोग्राफर, बंगाली समाज, सिनेमा और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े परिवारों की स्मृतियाँ एक साथ मिलती हैं।
भागलपुर के लोगों के लिए यह पुस्तक विशेष रूप से पढ़ने योग्य है। रंजन जी बताते हैं कि पुस्तक में उनकी स्मृतियाँ मुख्यतः 1956 तक की हैं। यदि वे इसके आगे के समय को लेकर भी लिखने की योजना बना रहे हों, तो उनसे मेरा एक अनुरोध है कि भागलपुर के उस दौर के राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तनों को भी अपनी स्मृतियों में स्थान दें। हालांकि यह पूरी तरह लेखक का अपना क्षेत्र और उनकी इच्छा का विषय है।
रंजन जी को भागलपुर की इन बिखरी हुई स्मृतियों को पुस्तक के रूप में संजोने के लिए बहुत-बहुत बधाई।
– डॉ. मनोज मीता, वरिष्ठ लेखक एवं गांधीवादी कार्यकर्ता














