हम रामजी बाबु के अंडर में पीएचडी कर रहे थे। उनका घर मेरे पड़ौस में ही था। एक चेप्टर लिखते थे और उन्हें दिखाने उनके घर पर चले जाते थे।
एक दिन सुबह उनके घर पर अपनी पीएचडी की फाईल लेकर गए। सुबह का समय था। रामजी बाबु दाढ़ी बना रहे थे। उनके मुँह पर साबुन लगा था। हाथ में छोटा सा आईना था। दाढ़ी बनाने वाले ब्रश से वह अपने मुंह पर साबुन लगा रहे थे।
इसीबीच हम पहुँच गए। हमें देखकर बैठने के लिए उन्होंने कहा। हम बैठ गए और इंतज़ार करने लगे कि वह दाढ़ी बना कर फ्रेश हो जाएंगे, तब हम जो लिखकर लाए हैं, उनपर बात करेंगे।
रामजी बाबु ब्लैड से दाढ़ी बना रहे थे। रेजर से गाल पर लगे साबुन के सफेद झाग साफ हो रहे थे। अचानक उनके मन में जो चल रहा था, वह उनके मुँह से यूँ निकला,
सामबे! युनिवर्सिटी में सब हमको भूमिहारे समझता है। जब सब हमको भूमिहारे समझता है, तब हम भी अपने आपको भूमिहार क्यों नहीं मानें!”
यह बोलकर उन्होंने आईने से अपने चेहरे को हटा कर चेहरा मेरे तरफ किया और मुस्कुराने लगे। पता नहीं, किस प्रकार के उत्तर की अपेक्षा वो हमसे कर रहे थे। लोग उनको भूमिहार समझते हैं, यह बात हमें अजीब सी नहीं लगी। हम बिहार में रहते हैं और लोगों की पहली पहचान उनकी जाति ही होती है। मगर रामजी बाबु ने तो अपनी अलग पहचान बनाई है। देश दुनिया में लोग उनको गांधीवादी विचारक के रूप में जानते हैं। परंतु यूनिवर्सिटी की राजनीति के चलते ये खुद को क्या❓ मानने लगे हैं। यह हमें अच्छा नहीं लगा। हमारे मुँह से तत्काल निकला- सर! लोग हमें कुत्ता कहेंगे, तो क्या हम भी खुद को कुत्ता मान लेंगे?
हमारा जबाब सुनकर रामजी बाबु का रेजर उनके गाल से अलग हो गया था और आईने के सामने उनके चेहरे दांये बांये घुमने लगे थे। लग रहा था कि इस प्रकार के उत्तर की अपेक्षा उन्हें नहीं थी और हमने भी कोई सोचकर यह उत्तर नहीं दिया था। सरल और सहज ढंग से हमारे भीतर से यह जबाब निकला था। उनकी अवस्था देखकर एक पल हमें लगा कि हमें इस प्रकार का जबाब नहीं देना चाहिए था। आखिर वह हमारे पीएचडी गाइड हैं। पीएचडी कराने में हमें नुकसान भी पहुँचा सकते हैं। हमारे मन में इस प्रकार की भय आशंका घर करने लगी।
फिर मेरे भीतर का पत्रकार जागा और खुद से कहा कि कह दिया सो कह दिया। कौन सी गलत बात कही! कौन सी पीएचडी की चिंता हमें थी! हम तो पीएचडी रजिस्ट्रेशन करा कर बंबई चले गए थे पत्रकारिता करने। इन्होंने ही पत्र लिखकर हमें बुलाया था कि पहले पीएचडी कर लीजिए। फिर पत्रकारिता होती रहेगी। उनकी बात मेरी भी समझ में आई।
साथ- साथ यह भी बात समझ में आई कि गाँधी फिलासफी ऑफ सेक्स पर मेरे अलावा और कोई पीएचडी कर भी नहीं सकता है। यह सब सोच कर हमने खुद को आस्वस्त किया।
इस प्रकार का व्यवहार कोई पीएचडी करने वाले छात्र अपने पीएचडी गाइड के साथ नहीं कर सकता है। हम उनके छात्र बाद में बने। पहले तो जेपी आंदोलन में उनके साथ आंदोलनकारी के रूप में जुड़े थे और इसलिये उनके मुँह लग्गू भी थे।
रामजी बाबु का बड़प्पन था कि इस प्रकार के विमर्श के बीच हमारा पीएचडी बहुत जल्द पूरी हुई। शायद सबसे कम समय में तीन साल के भीतर ही। ओपन भायवा हुआ था। पीएचडी थीसिस पुणे यूनिवर्सिटी और शांतिनिकेतन भेजा गया था। रामजी बाबु को हम पर भरोसा था। स्टुडेंट्स और टीचर सभी सवाल पूछ रहे थे और हम सहजता से उन तमाम सवालों के जबाब दे रहे थे। रामजी बाबु बहुत खुश थे। हमारी पीएचडी पूरी हुई और हम से ज्यादा खुशी उनको हुई।
– डा. सामबे, भागलपुर, बिहार।
(‘गाँधी-विचार की विरासत : डॉ. रामजी सिंह अभिनंदन ग्रंथ’ में प्रकाशनाधीन संस्मरण)














