गांधीवादी विचारक , दार्शनिक शिक्षाविद एवं राजनीतिक समाजसेवी पद्मश्री प्रो. रामजी सिंह : आत्मीय संस्मरण, शोध-प्रेरणा और कृतज्ञता अभिव्यक्ति
प्रो. रज्जन कुमार
सेवानिवृत्त प्रोफेसर, दर्शनशास्त्र विभाग
पूर्व विभागाध्यक्ष एवं संकायाध्यक्ष (Head & Dean),
प्रोफेसर ऑफ एमिनेन्स (Professor of Eminence) एम.जे.पी. रोहिलखंड विश्वविद्यालय, बरेली
सीनियर फेलो, भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (ICPR), नई दिल्ली
वंदनीय व्यक्तित्व
संसार में कुछ विभूतियाँ ऐसी होती हैं, जिनका व्यक्तित्व केवल उनके अकादमिक ज्ञान से नहीं, बल्कि उनके सहज आचरण, सादगी और जीवन-मूल्यों से परिभाषित होता है। श्रद्धेय पद्मश्री प्रो. रामजी सिंह सर एक ऐसे ही अप्रतिम और बहु प्रतिभासंपन्न व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने आधुनिक युग में गांधी, विनोबा और जयप्रकाश नारायण के त्रिविध दर्शन को केवल पढ़ा या पढ़ाया नहीं, बल्कि उसे अक्षरों से बाहर निकालकर अपने हाड-मांस के जीवन में साक्षात उतारा है। जब मुझे यह ज्ञात हुआ कि उनके अवदानों को रेखांकित करते हुए एक ‘अभिनंदन ग्रंथ’ का प्रकाशन किया जा रहा है, तो मेरे अंतस की स्मृतियों का झरोखा स्वतः ही खुल गया। उनके साथ बिताए गए पल, उनका वात्सल्यमयी मार्गदर्शन और उनका वह विराट अकादमिक वैभव मेरी चेतना में एक अमिट थाती की तरह सुरक्षित है। दर्शनशास्त्र के एक विद्यार्थी और शिक्षक के रूप में, इस पावन अवसर पर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करना मेरे लिए केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि एक परम सौभाग्य और आंतरिक संतोष का विषय है।
विज्ञान से दर्शन की ओर यात्रा और ‘गांधी-मीमांसा’ का प्रभाव
मेरे जीवन की अकादमिक यात्रा एक विशेष मोड़ से गुजरी है। मूलतः मैं विज्ञान का विद्यार्थी था । स्कूली शिक्षा पैतृक गाँव बडहिया से प्राप्त करने के पश्चात उच्च अध्ययन हेतु बाबा विश्वनाथ का धाम काशी जो वाराणसी के नाम से विख्यात है 1977 में आया । मैंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से पी यू सी. (p u c ) , बी.एस-सी. (B.Sc.) की उपाधि प्राप्त की थी। विज्ञान के तार्किक धरातल से निकलकर सत्य और चेतना की गहरी खोज मुझे दर्शनशास्त्र की ओर ले आई, जिसके बाद मैंने दर्शनशास्त्र में प्रवेश लिया।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अपने एम.ए. (M.A.) और पी-एच.डी. (Ph.D.) के शोध काल के दौरान, ज्ञान की इसी पिपासा ने मुझे श्रद्धेय प्रो. रामजी सिंह सर की सुप्रसिद्ध कृति ‘गांधी-मीमांसा’ से परिचित कराया। उस समय तक सर से मेरा कोई व्यक्तिगत परिचय नहीं था; वे मेरे लिए केवल एक लेखक और महान विचारक थे। ‘गांधी-मीमांसा’ पुस्तक को पढ़ते हुए मैं उनके विचारों की गहराई, गांधीवादी दर्शन की सूक्ष्म व्याख्या और उनके तार्किक प्रतिपादन का समझने का प्रयास किया । उस पुस्तक ने दर्शनशास्त्र के एक शोधार्थी के रूप में मेरे अंतस पर अमिट छाप छोड़ी और सर के प्रति मेरे मन में एक परोक्ष श्रद्धेय भाव जाग्रत हो गया था।
प्रथम साक्षात दर्शन: पार्श्वनाथ विद्यापीठ (PV), वाराणसी
वह परोक्ष श्रद्धा साक्षात अनुभव में तब बदली, जब मुझे पार्श्वनाथ विद्यापीठ (PV), वाराणसी में सर को पहली बार देखने और सुनने का सौभाग्य मिला। ‘गांधी-मीमांसा’ के लेखक को जब मैंने अपने सामने साक्षात खड़ा पाया, तो वह क्षण मेरे लिए अत्यंत विस्मयकारी और प्रेरणादायी था।
सर की वह परम सात्विक वेश-भूषा—धवल खादी के वस्त्र, सादगी से ओतप्रोत व्यक्तित्व और उनका वह धाराप्रवाह वाचन सीधे आत्मा को छू गया। दर्शन के गूढ़ रहस्यों और गांधी के विचारों पर जब वे धाराप्रवाह बोल रहे थे, तो पूरा सभागार मूक-बधिर सा उन्हें सुन रहा था। उनकी वाणी की विद्वत्ता और व्यवहार की सरलता का ऐसा अद्भुत संगम मैंने पहले कभी नहीं देखा था। उस पहले साक्षात दर्शन और उनके ओजस्वी वचनों ने मुझे भीतर तक गहराई से प्रभावित किया। यहीं से उनके प्रति मेरी निष्ठा और गहरी हुई, जिसने आगे चलकर ‘जैन आश्रम’ में उनके व्यक्तिगत सानिध्य का मार्ग प्रशस्त किया।
जैन आश्रम, वाराणसी और ‘जैन बायोलॉजी’ पर शोध की प्रेरणा
मेरी स्मृतियों का अगला पावन अध्याय बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी में अवस्थित ‘जैन आश्रम, वाराणसी’ से आगे बढ़ता है। यह वह दौर था जब मैंने अपनी पी-एच.डी. (Ph.D.) की उपाधि पूर्ण कर ली थी। मेरे पी-एच.डी. (Ph.D.) का टॉपिक है “ जैन धर्म में समाधिमरण की अवधारणा”। मेरे इस टॉपिक पर sir ने बहुत तरह के प्रश्न किए और सुधार हेतु परामर्श भी दिया और मुझे ‘भोगीलाल लहरचंद इंस्टीट्यूट ऑफ इंडोलॉजी’ (B.L. Institute of Indology) , दिल्ली के अंतर्गत पोस्ट डॉक्टोरल फेलो (PDF) के रूप में ‘जैन बायोलॉजी’ (जैन जीव विज्ञान) जैसे अत्यंत गूढ़, विशिष्ट और वैज्ञानिक विषय पर अनुसंधान कार्य कर रहा था उस विषय पर भी सारगर्भित परामर्श दिया ।
इसी शोध कार्य के दौरान जैन आश्रम में श्रद्धेय प्रो. रामजी सिंह सर से मेरी गहन मुलाकातें हुईं। जब मैंने उनके समक्ष अपने शोध विषय की रूपरेखा प्रस्तुत की, तो उनकी आँखों में एक विशेष उत्साह और चमक दिखाई दी। वे स्वयं दर्शनशास्त्र के प्रकांड विद्वान थे, इसलिए उन्होंने न केवल मेरे इस अनूठे विषय की भूरि-भूरि प्रशंसा की, बल्कि मुझे इस दिशा में गहराई से काम करने के लिए अत्यंत उत्साहित किया। सर ने स्वयं आगे बढ़कर मेरा अकादमिक मार्गदर्शन किया और कई ऐसे दार्शनिक व वैज्ञानिक दृष्टिकोण सुझाए, जिसने मेरे पोस्ट डॉक्टोरल शोध कार्य को एक वैश्विक और प्रामाणिक धरातल प्रदान किया। एक नवोदित अध्येता के रूप में उन्होंने मुझे जिस आत्मीयता से सुना और जो संबल दिया, उसने मेरे भीतर अकादमिक क्षेत्र में कुछ बेहतर करने की ललक जगा दी। उन्होंने मेरे पी-एच.डी. (Ph.D.) तथा पोस्ट डॉक्टोरल फेलो (PDF) जैसे नवीन और innovative विषय पर आगे भी कार्य करने को कहा जिसकी परिणति icpr के minor research project ‘Santhara : An Art of Pursing Death” के रूप में पूर्ण हुई ।
JVBI लाडनूं और अकादमिक जीवन का नया अध्याय
इसके बाद मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक मोड़ वर्ष 1993 में आया, जब हमारी स्मृतियों का केंद्र ‘जैन विश्व भारती संस्थान’ (JVBI), लाडनूं (राजस्थान) बना। उस समय आदरणीय प्रो. रामजी सिंह सर इस प्रतिष्ठित मानद विश्वविद्यालय के कुलपति (Vice Chancellor) के गरिमामयी पद को सुशोभित कर रहे थे। उसी वर्ष संस्थान में ‘सहायक प्रोफेसर’ (Assistant Professor) के रूप में मेरा जीवन विज्ञान एवं प्रेक्षा ध्यान विभाग में चयन हुआ। साक्षात्कार के दौरान और चयन के पश्चात जब मैं एक औपचारिक दायित्व के साथ उनके सानिध्य में आया, तब मुझे उनके प्रशासनिक कौशल और अकादमिक दूरदर्शिता का साक्षात अनुभव हुआ।
लाडनूं पहुँचते ही सर ने मुझ पर अगाध विश्वास जताया। उन्होंने मुझे एक कनिष्ठ शिक्षक मानकर केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं रखा, बल्कि विश्वविद्यालय के विकास और उसकी प्रशासनिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए बहुत सारे महत्वपूर्ण दायित्व सौंप दिए। कुलपति के सर्वोच्च पद पर रहते हुए भी वे संस्थान के सबसे कनिष्ठ शिक्षक के लिए भी उतने ही सुलभ और सहृदय थे, जितने कि किसी वरिष्ठ विद्वान के लिए। उनके द्वारा दिए गए उन दायित्वों ने मेरे भीतर के नेतृत्व कौशल और संस्थागत प्रबंधन की क्षमताओं को निखारने का अभूतपूर्व काम किया।
समानता और सादगी : विश्वविद्यालय की साझी मेस (Mess)
लाडनूं प्रवास के दौरान सर के जीवन का एक ऐसा प्रसंग मेरे मानस पटल पर अंकित है, जो आज के समय में अकादमिक और प्रशासनिक जगत में पूरी तरह अकल्पनीय है। उस समय विश्वविद्यालय में हम सभी शिक्षक, विद्यार्थी और कर्मचारी मिलकर एक साझा मेस (Mess) चलाते थे। विश्वविद्यालय के सर्वोच्च पद पर आसीन कुलपति प्रो. रामजी सिंह सर किसी पृथक या विशिष्ट व्यवस्था के बजाय, उसी मेस में हम सभी के साथ बैठकर अत्यंत साधारण तरीके से भोजन ग्रहण करते थे।
इतना ही नहीं, उन्होंने कभी भी कुलपति होने के विशेषाधिकार का लाभ नहीं लिया; वे उस मेस में एक ‘जनरल मेंबर’ (साधारण सदस्य) की तरह रहते थे और हर महीने होने वाले भोजन के कुल खर्च में एक सामान्य सदस्य की भांति ही आर्थिक रूप से पूरा कंट्रीब्यूट किया करते थे। समाजवाद और समता का यह व्यावहारिक रूप देखकर मैं उनके प्रति आदर से भर जाता था। उनका यह आचरण सिखाता था कि पद केवल दायित्व के लिए होता है, अहंकार के लिए नहीं।
‘अहिंसा वाहिनी’ का गठन और बस्तियों में सेवा-साधना
प्रो. रामजी सिंह सर का स्पष्ट मानना था कि यदि विश्वविद्यालय का ज्ञान समाज के सबसे पिछड़े और उपेक्षित तबके के काम न आए, तो वह शिक्षा व्यर्थ है। व्यावहारिक गांधीवाद और सर्वोदय के इसी सिद्धांत को क्रियानवित करने के लिए उन्होंने विश्वविद्यालय में ‘अहिंसा वाहिनी’ (Ahimsa Vahini) का गठन किया। सर ने इस अहिंसा वाहिनी के माध्यम से मुझ जैसे युवा एवं नवप्रशिक्षित को विशेष रूप से निर्देशित किया और यह महत्वपूर्ण सामाजिक दायित्व सौंपा कि मैं युवाओं और विद्यार्थियों की टोली लेकर लाडनूं की सबसे पिछड़ी और उपेक्षित बस्तियों में जाऊँ और वहाँ जाकर प्रत्यक्ष सेवा कार्य करूँ।
उनके मार्गदर्शन में हमने बस्तियों में जाकर स्वच्छता, साक्षरता और व्यसनमुक्ति के अनेक रचनात्मक कार्य किए। वह अनुभव मेरे लिए किसी विश्वविद्यालयी पाठ्यक्रम से कहीं बड़ा था, जिसने मुझे समाज की जमीनी हकीकतों से रूबरू कराया।
वैश्विक मंचों पर गांधीवाद का उद्घोष: धर्म संसद (अमेरिका) और इंग्लैंड प्रवास
प्रो. रामजी सिंह सर का ज्ञान और उनका प्रभामंडल केवल भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पटल पर भी देश और गांधीवादी दर्शन का गौरव बढ़ाया। जब वे जैन विश्व भारती संस्थान, लाडनूं के कुलपति थे, उसी दौरान वे अमेरिका में आयोजित ऐतिहासिक ‘विश्व धर्म संसद’ (Parliament of the World’s Religions) में भाग लेने गए। वहाँ उन्होंने भारतीय दर्शन, जैन अहिंसा और अनेकांतवाद के सिद्धांतों को इतने प्रखर और वैज्ञानिक रूप में वैश्विक मंच पर रखा कि अंतरराष्ट्रीय विद्वत समाज चमत्कृत रह गया।
इसके साथ ही उन्होंने इंग्लैंड का भी लंबा प्रवास किया और वहाँ के विभिन्न विश्वविद्यालयों में व्याख्यान दिए। इन वैश्विक व्यस्तताओं और बड़े प्रवासों के बावजूद, सर का जुड़ाव अपने संस्थान और हम जैसे सहयोगियों से कभी कम नहीं हुआ। वे विदेशों में रहते हुए भी पत्र व्यवहार या संदेशों के माध्यम से हमारा हौसला बढ़ाते रहे और हमें निरंतर अकादमिक व व्यक्तिगत मार्गदर्शन देते रहे। उनका यह वैश्विक रूप हमें गर्व से भर देता था कि हमारे कुलपति अंतरराष्ट्रीय फलक पर भारतीय मनीषा का सफल नेतृत्व कर रहे हैं।
लाडनूं से वाराणसी वापसी: पार्श्वनाथ विद्यापीठ (PVRI) में नया सफर
जैन विश्व भारती संस्थान, लाडनूं के पश्चात मेरे जीवन की यात्रा में एक बार फिर परिवर्तन आया और मैं पुनः वाराणसी लौट आया। यहाँ आकर मैंने प्रतिष्ठित ‘पार्श्वनाथ विद्यापीठ शोध संस्थान’ (PVRI), वाराणसी में व्याख्याता (Lecturer) के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। संस्थान बदलने के बाद भी जो बात पूरी तरह अपरिवर्तित रही, वह था श्रद्धेय प्रो. रामजी सिंह सर का मेरे प्रति अगाध वात्सल्य और स्नेह।
वाराणसी आने के बाद भी मुझे वहाँ उनका निरंतर मार्गदर्शन मिलता रहा। वे जब भी वाराणसी आते, पीवीआरआई में चल रहे शोध कार्यों की प्रगति के बारे में अवश्य पूछते थे और उन्होंने मुझे ‘जैन बायोलॉजी’ के सिद्धांतों को दार्शनिक धरातल पर और आगे बढ़ाने के लिए निरंतर प्रेरित किया। मेरा अकादमिक सफर आगे बढ़ता गया, मैं एम.जे.पी. रोहिलखंड विश्वविद्यालय, बरेली में दर्शनशास्त्र विभाग का प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष और संकायाध्यक्ष (Head & Dean) बना, तत्पश्चात प्रोफेसर ऑफ एमिनेन्स और भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (ICPR) में सीनियर फेलो के रूप में कार्य करने का अवसर मिला, किंतु मेरे इस संपूर्ण दार्शनिक और अकादमिक विकास की नींव में जैन आश्रम वाराणसी और लाडनूं में सर द्वारा रोपे गए विचार-बीज और उनका सतत मार्गदर्शन ही रहा है।
जे.एन.यू. में वर्ल्ड फिलॉसफी कांग्रेस (वर्ष 2000-01) और सर का ‘दिशाबोध’
मेरे अकादमिक जीवन का एक और अत्यंत महत्वपूर्ण मील का पत्थर और ऐतिहासिक प्रसंग वर्ष 2000-01 के दौरान का है। जब मैं एम.जे.पी. रोहिलखंड विश्वविद्यालय (MJPRU), बरेली में ‘रीडर’ (Reader) के पद पर कार्यरत था, उसी दौरान नई दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में प्रतिष्ठित ‘WORLD PHILOSOPHY CONGRESS’ का आयोजन हुआ। इस अंतरराष्ट्रीय दार्शनिक महाकुंभ के एक महत्वपूर्ण सत्र में मैं अपना शोध-पत्र प्रस्तुत (Paper Reading) कर रहा था। उस वैश्विक मंच पर श्रद्धेय प्रो. रामजी सिंह सर भी अग्रिम पंक्ति में उपस्थित थे।
शोध-पत्र वाचन के उपरांत सत्र के विमर्श के दौरान सर के साथ मेरा अत्यंत गंभीर और गहन अकादमिक संवाद हुआ। सर ने मेरे शोध-पत्र के प्रमेयों पर जो सूक्ष्म, तार्किक और आलोचनात्मक विश्लेषण (Critical Analysis) प्रस्तुत किया, वह मेरे लिए एक युगांतरकारी बौद्धिक अनुभव था। उनकी समीक्षा केवल त्रुटियाँ रेखांकित करने वाली नहीं थी, बल्कि उसमें शोध को एक नई ऊंचाई और सही दार्शनिक धरातल देने की अद्भुत अंतर्दृष्टि थी। उनके उस प्रखर चिंतन और विश्लेषण ने दार्शनिक अनुसंधान के क्षेत्र में मुझे एक नया ‘दिशाबोध’ प्रदान किया। उसने मुझे सिखाया कि दर्शनशास्त्र में विचारों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन और वैचारिक गहराई किस प्रकार स्थापित की जाती है। एक अत्यंत वरिष्ठ मनीषी द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने कनिष्ठ सहयोगी के विचारों को इतनी गंभीरता से जाँचना और फिर उसे वात्सल्यपूर्ण मार्ग दिखाना सर के विराट और औदार्यपूर्ण दार्शनिक चरित्र का परिचायक है।
वर्ष 2015: अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी और ‘स्वच्छ एवं समर्थ भारत’ का वैचारिक विमर्श
मेरे और श्रद्धेय सर के अकादमिक सह-अस्तित्व का एक और अविस्मरणीय अध्याय 12-13 मार्च 2015 को जुड़ा। इस दौरान आयोजित “International Seminar on Clean and Capable India Of Gandhi’s Dream: Concept and Challenges” (गांधी के सपनों का स्वच्छ और सक्षम भारत: अवधारणा और चुनौतियां) विषयक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी जो राजघाट गांधी समाधि , न्यू दिल्ली द्वारा आयोजित की गई थी , के एक विशेष सत्र में मैंने अपना शोध-पत्र प्रस्तुत किया, जिसका शीर्षक था—”Gandhi on Clean and Capable Bharata (India)”। जब मैं गांधी जी के स्वच्छता और आत्मनिर्भरता (सामर्थ्य) के अंतर्संबंधों पर दार्शनिक दृष्टिकोण रख रहा था, तब सर ने मुख्य अतिथि और वरिष्ठ मनीषी के रूप में मेरे व्याख्यान को अत्यंत ध्यानपूर्वक सुना। सत्र के उपरांत उन्होंने मेरे शोध-पत्र की सराहना करते हुए रेखांकित किया कि गांधी की दृष्टि में ‘स्वच्छता’ केवल बाह्य परिवेश का परिमार्जन नहीं, बल्कि अंतस की शुचिता का प्रतीक है, और ‘सामर्थ्य’ देश के अंतिम व्यक्ति के सशक्तिकरण से आता है। समसामयिक भारत के संदर्भ में सर के उस सारगर्भित वक्तव्य और मेरे शोध पर दी गई उनकी मूल्यवान टिप्पणियों ने मुझे इस विषय को आगे और अधिक विस्तार देने की नई ऊर्जा प्रदान की।
पद्मश्री अलंकरण : एक हृदयस्पर्शी संवाद
श्रद्धेय सर के विराट व्यक्तित्व की निरहंकारिता और उनके वात्सल्य का सबसे हृदयस्पर्शी अनुभव मुझे तब हुआ, जब वर्ष 2020 में भारत सरकार द्वारा उन्हें देश के प्रतिष्ठित ‘पद्मश्री’ सम्मान से अलंकृत किया गया। संपूर्ण अकादमिक जगत और दार्शनिक बिरादरी इस गौरवपूर्ण क्षण से प्रफुल्लित थी। जब मैंने अत्यंत हर्ष और आदर के साथ सर को दूरभाष पर इस सर्वोच्च सम्मान के लिए अपनी भावपूर्ण बधाई (Congratulations) प्रेषित की, तो प्रत्युत्तर में उन्होंने जो कहा, वह मेरे अंतस को पूरी तरह अभिभूत, आंदोलित और आत्ममुग्ध कर गया। सर ने अपनी चिरपरिचित सहजता और स्नेहिल गंभीर वाणी में कहा—”रज्जन जी, यह पद्मश्री सिर्फ मेरा नहीं है, बल्कि यह आप जैसे युवा दर्शन के अध्येताओं का भी सम्मान है।” सर के मुख से निकले ये शब्द किसी महामंत्र की तरह मेरे हृदय में अंकित हो गए। एक ऐसा मनीषी जो दर्शनशास्त्र में तीन-तीन डॉक्टरेट (PhD, D.Litt.) रखता हो, जिसने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व किया हो, वह अपने सम्मान को अपने से कनिष्ठ सहयोगी और शिष्य के साथ इतनी सहजता से साझा कर दे—यह केवल एक सच्चे गांधीवादी और सर्वोदयी साधक के ही वश की बात है। उनका यह कथन न केवल उनके बड़प्पन का परिचायक है, बल्कि यह हमारे देश की महान सनातन गुरु-शिष्य परंपरा का चरम उत्कर्ष है, जिसने मुझे अकादमिक जीवन में सदैव विनम्र बने रहने का अप्रतिम पाठ सिखाया।
स्मृतियों का अनंत आकाश: शब्दों की सीमा और लेखनी की विवशता
श्रद्धेय प्रो. रामजी सिंह सर के साथ बीते तीन दशकों से अधिक के कालखंड में अकादमिक विमर्श, व्यक्तिगत संवाद और आत्मीय सानिध्य के ऐसे अनगिनत और अमूल्य प्रसंग रहे हैं, जिन्हें इस संक्षिप्त आलेख में पूरी तरह समेट पाना या शब्दों की परिधि में बांधकर लेखनीबद्ध करना सर्वथा असंभव है। उनके व्यक्तित्व की विराटता और उनके स्नेह का विस्तार इतना असीम है कि जीवन का हर वह क्षण जो उनके सानिध्य में बीता, अपने आप में एक स्वतंत्र अध्याय है। यह संस्मरण तो उनके प्रति मेरी अगाध श्रद्धा और कृतज्ञता के सागर की कुछ बूंदें मात्र हैं। उनके विचारों का पाथेय और उनके स्नेह की थाती मेरे जीवन और दार्शनिक यात्रा में रची-बसी है, जो समय और शब्दों की किसी भी सीमा से परे है।
मंगलकामना
प्रो. रामजी सिंह सर का संपूर्ण जीवन ही एक खुली किताब और प्रेरणा का जीवंत स्रोत है। दर्शनशास्त्र में तीन-चीन डॉक्टरेट (PhD और D.Litt.) की उपाधियाँ अर्जित करने वाले सर ने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन और 1975 में आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए कारावास की यातनाएं भी सहीं। भागलपुर विश्वविद्यालय में गांधी विचार विभाग की स्थापना से लेकर देश की संसद तक, उनका हर रूप अनुकरणीय रहा है। वर्ष 2020 में भारत सरकार द्वारा उन्हें प्रदान किया गया ‘पद्मश्री’ अलंकरण वास्तव में उनके उसी निस्वार्थ सामाजिक और अकादमिक अवदान का सम्मान है।
अंत में, इस ऐतिहासिक अभिनंदन ग्रंथ के माध्यम से मैं परमपिता परमेश्वर से यही प्रार्थना करता हूं कि श्रद्धेय प्रो. रामजी सिंह सर दीर्घायु हों, पूर्णतः स्वस्थ रहें और उनका स्नेहिल साया हम सभी अध्येताओं, दार्शनिकों और समाज पर सदैव बना रहे। वे हमारे युग के वे विरल प्रकाश-पुंज हैं, जिनकी आभा से आने वाली कई पीढ़ियाँ आलोकित होती रहेंगी।
उनके चरणों में कोटिशः नमन और कृतज्ञता ।
(‘गाँधी-विचार की विरासत : डॉ. रामजी सिंह अभिनंदन ग्रंथ’ में प्रकाशनाधीन संस्मरण)














