मेरी शोध संघर्ष यात्रा : राख में दबी चिंगारी से ज्ञान-साधना तक
मेरी शोध संघर्ष यात्रा : राख में दबी चिंगारी से ज्ञान-साधना तक
-डॉ. आलोक टंडन
जब मेरे बचपन के मित्र डॉ. कमल कान्त द्विवेदी ने मुझसे अपनी शोध-यात्रा लिखकर देने का आग्रह किया, तो मेरी पहली प्रतिक्रिया कुछ संकोच और असहमति की थी। मन में प्रश्न उठा-आखिर अपनी ही यात्रा का इतना विस्तार से वर्णन क्यों किया जाए? क्या यह आत्ममुग्धता या आत्मप्रचार का एक रूप नहीं होगा? हजारों-लाखों लोग पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त करने के लिए अध्ययन करते हैं। इसमें ऐसा विशेष क्या है कि उसे लिखकर दूसरों के सामने रखा जाए?
लेकिन कुछ देर विचार करने के बाद लगा कि उपाधि भले ही एक हो, उसे पाने की यात्राएँ कभी एक जैसी नहीं होतीं। किसी की राह सीधी और सहज होती है- अच्छी श्रेणी में परास्नातक पूरा किया, विश्वविद्यालय में शोधार्थी के रूप में प्रवेश लिया और कुछ वर्षों में डॉक्टरेट प्राप्त कर ली। किसी की राह में अनेक मोड़, ठोकरें, निराशाएँ और अप्रत्याशित सहारे होते हैं। कुछ लोगों को अपनी मंजिल तक पहुँचने के लिए सचमुच बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं।
मुझे लगा कि मेरी यात्रा भी ऐसी ही रही है। इसमें संघर्ष है, असफलता है, आशा है, मित्रों का सहयोग है और ऐसे गुरुजनों का स्नेह है, जिन्होंने समय-समय पर मेरे लिए बंद दरवाजों के बीच कोई खिड़की खोल दी। यदि इस यात्रा का वर्णन किसी दूसरे शोधार्थी को निराशा के क्षणों में थोड़ी प्रेरणा दे सके, तो इसे लिखना सार्थक होगा। इसी विचार के साथ मैंने अपनी शोध-यात्रा को शब्दों में बाँधने का निर्णय लिया।
एक अधूरा सपना : डॉक्टरेट तक पढ़ने का सपना मेरे मन में बहुत पहले से था, लेकिन स्नातक स्तर पर विज्ञान की पढ़ाई में मैं लड़खड़ा गया। कई वर्षों तक असफलताओं का सामना करना पड़ा। किसी तरह भौतिक विज्ञान में स्नातक की डिग्री तो प्राप्त कर ली, लेकिन अंक इतने अच्छे नहीं थे कि परास्नातक की पढ़ाई जारी रख सकूँ। आगे के रास्ते बंद दिखाई देने लगे। जिस भविष्य की कल्पना की थी, वह अचानक धुँधला पड़ गया और मैं गहरी निराशा में डूब गया।
उसी समय बैंकों के राष्ट्रीयकरण के बाद सरकारी बैंकों में बड़े पैमाने पर भर्ती हुई। मुझे अपने ही शहर में आसानी से नौकरी मिल गई। नौकरी, वेतन और पारिवारिक जिम्मेदारियों ने जीवन को एक नई दिशा दे दी। बैंक की नौकरी मेरे लिए जीवन की आवश्यकताओं को पूरा करने का साधन थी; उसके कैरियर को लेकर कोई बहुत बड़ी महत्त्वाकांक्षा नहीं थी। बाहर से जीवन व्यवस्थित दिखाई देता था, लेकिन भीतर आत्मचिंतन और आत्मानुशीलन की प्रक्रिया चलती रहती थी।
मेरी प्रवृत्ति शुरू से ही कुछ अन्तर्मुखी रही थी। मन के किसी कोने में पढ़ाई की इच्छा अब भी जीवित थी। वह राख के ढेर में दबी चिंगारी की तरह थी- ऊपर से बुझी हुई, लेकिन भीतर कहीं गर्म। एक दिन वही चिंगारी फिर से सुलग उठी। नौकरी करते हुए मैंने निजी विद्यार्थी के रूप में समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र में एम.ए. की डिग्री प्राप्त कर ली।
यह मेरे लिए केवल एक शैक्षिक उपलब्धि नहीं थी। यह उस विश्वास की वापसी थी कि जीवन में एक बार रास्ता बंद हो जाए, तो इसका अर्थ यह नहीं कि आगे कोई रास्ता बचा ही नहीं।
शोध की तलाश और बंद दरवाजे : एम. ए. के बाद मैंने पीएच. डी. करने का इरादा बनाया और कई प्रोफेसरों के दरवाजे खटखटाए। लेकिन किसी ने मुझे गंभीरता से नहीं लिया। कानपुर के एक नामी डिग्री कॉलेज के स्वनामधन्य प्रोफेसर के पास तो मैं पैंतीस पृष्ठ लिखकर अपना शोध-विचार दिखाने गया था, पर उन्होंने मुझे दरवाजे से ही विदा कर दिया।
उनके लिए यह समझना कठिन था कि एक अच्छी- खासी नौकरी करते हुए किसी व्यक्ति को डॉक्टरेट करने की सूझ कैसे सकती है। शायद उन्हें लगता था कि मैं कोई सनकी व्यक्ति हूँ। उस समय मेरे मन में ज्ञान के समाजशास्त्र से संबंधित एक विषय को लेकर बहुत उत्साह था, लेकिन उत्साह और योग्यता के बावजूद मुझे कोई मार्गदर्शक नहीं मिल रहा था।
इन्हीं दिनों Social Scientist पत्रिका में लखनऊ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. एस. सी. वर्मा का एक लेख पढ़ा। लेख ने मुझे विचार करने के लिए प्रेरित किया। मैंने उस पर अपनी लंबी प्रतिक्रिया लिखकर उन्हें भेज दी। उनकी ओर से प्रशंसा के साथ उत्तर आया। मैंने उनसे मिलने की अनुमति माँगी और उनसे मिलने लखनऊ पहुँच गया।
जब मैंने उनके सामने शोध करने की इच्छा व्यक्त की, तो उन्होंने अपने पास शोधार्थी के रूप में लेने के बजाय आईआईटी कानपुर में प्रवेश लेने की सलाह दी। उन्होंने वहाँ कला संकाय के तत्कालीन अध्यक्ष से मेरी सिफारिश करने का आश्वासन भी दिया। मैंने आवेदन-पत्र भर दिया। लगा कि वर्षों से बंद पड़ा एक दरवाजा अब खुलने वाला है।
लेकिन जीवन की अपनी योजनाएँ थीं। उसी दौरान देश में आपातकाल लागू हो गया और मेरी बैंक में पोस्टिंग बाराबंकी जिले के एक गाँव में ग्रामीण बैंक खुलवाने के काम में हो गई। वह गाँव शहर से लगभग पचपन किलोमीटर भीतर था। बिजली भी कभी-कभी ही आती थी। शोध की संभावना फिर दूर चली गई। नौकरी की जिम्मेदारियाँ सामने थीं और मेरे सपने को एक बार फिर प्रतीक्षा करनी पड़ी।
उस दौर ने मुझे यह भी सिखाया कि केवल डिग्री प्राप्त कर लेना ही पर्याप्त नहीं होता। अध्ययन के प्रति रुचि, विषय से लगाव और निरंतर प्रयास भी आवश्यक हैं। शोध के लिए विषय चुनना और उसके साथ लंबे समय तक जुड़े रहना अपने आप में कठिन साधना है।
बीमारी, मित्रों का सहारा और दर्शन की ओर वापसी : कुछ वर्ष निराशा और उससे जुड़ी बीमारी से जूझने के बाद, मित्रों के सहयोग से मैंने फिर कमर कसने का निर्णय लिया। इस बार मैंने दर्शनशास्त्र में निजी विद्यार्थी के रूप में एम.ए. करने की ठानी। यह मेरा पुराना सपना था। स्नातक स्तर पर खराब प्रदर्शन के बाद मैंने कभी लखनऊ विश्वविद्यालय में नियमित विद्यार्थी के रूप में दर्शनशास्त्र पढ़ने की कल्पना की थी, लेकिन पिताजी से आर्थिक सहयोग न मिलने के कारण वह सपना अधूरा रह गया था।
राख में दबी चिंगारी फिर से जल उठी : अब वही इच्छा फिर जाग पटकउठी। राख में दबी चिंगारी ने एक बार फिर आग पकड़ ली। मैंने दर्शनशास्त्र में एम. ए. किया और लगभग 54-55 प्रतिशत अंक लेकर द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। निजी विद्यार्थी होने के कारण मुझे कुछ नुकसान भी उठाना पड़ा। विश्वविद्यालय में लेक्चरर की पोस्ट के लिए आवश्यक अंक-प्रतिशत प्राप्त नहीं हो सका। मैंने उस दिशा में आगे बढ़ने का विचार छोड़ दिया और अपनी शैक्षिक यात्रा को पूरा करने का निश्चय किया। अब लक्ष्य स्पष्ट था-डॉक्टरेट करना।
लेकिन दर्शनशास्त्र में शोध-निर्देशक खोजना समाजशास्त्र से भी कठिन था। उस समय दर्शनशास्त्र कम ही कॉलेजों में पढ़ाया जाता था। नौकरी के साथ नियमित रूप से किसी विश्वविद्यालय में जाना, आने-जाने का समय निकालना और शोधकार्य करना-इन सबकी अपनी सीमाएँ थीं।
कुछ वर्ष और बीत गए। फिर मित्रों के सहयोग से मैंने दर्शनशास्त्र में पीएच.डी. करने का संकल्प दृढ़ किया। अपने शहर के एक डिग्री कॉलेज में समाजशास्त्र के पुराने शिक्षक प्रो. एस. ए. वाजपेयी से संपर्क किया। उन्होंने अपने एक परिचित और हितैषी विद्वान का पता बताया। वे कानपुर में दर्शनशास्त्र के शिक्षक थे।
एक संस्तुति-पत्र ने शोध की राह खोल दी : डॉ. बाजपेयी ने अपने परिचित रिश्तेदार डॉ. एच. एन. मिश्र, जो कानपुर के डी. ए. वी. कॉलेज में दर्शनशास्त्र पढ़ाते थे, के नाम मेरे लिए एक संस्तुति-पत्र लिखा। उन्होंने सलाह दी कि मैं वह पत्र लेकर डॉ. मिश्र से मिलूँ। वह मुलाकात मेरी शोध-यात्रा का वास्तविक टर्निंग पॉइंट साबित हुई।
डॉ. एच. एन. मिश्र- शोध-यात्रा का निर्णायक मोड़ : डॉ. मिश्र से पहली मुलाकात में ही उनके व्यक्तित्व की विद्वत्ता और सहजता ने मुझे प्रभावित किया। सामान्य परिचय के बाद उन्होंने पूछा कि मैं किस विषय पर शोध करना चाहता हूँ। मेरे पास उस समय कोई स्पष्ट उत्तर नहीं था, क्योंकि दर्शनशास्त्र में मेरा अध्ययन अभी नया था।
कुछ बातचीत के बाद उन्होंने स्वयं एक विषय सुझाया- “Man and His Destiny with Special Reference to Marx and Sartre.”
उन्होंने इस विषय से संबंधित कुछ पुस्तकें और लेख पढ़ने को दिए। मेरे लिए यह एक नई बौद्धिक दुनिया का द्वार था। जिस शोध-यात्रा के लिए मैं वर्षों से भटक रहा था, उसकी दिशा अब धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगी थी।
डॉ. मिश्र का व्यक्तित्व विद्वत्तापूर्ण होने के साथ-साथ आत्मीय भी था। वे शोधार्थी को केवल निर्देश देने वाले शिक्षक नहीं थे; वे उसके भीतर विचार करने की क्षमता विकसित करना चाहते थे। उनके साथ अध्ययन, चर्चा और मार्गदर्शन का सिलसिला शुरू हुआ।
लंबी बस-यात्राओं के बीच शोध का रास्ता : सुबह उठकर पाँच-छह घंटे की बस-यात्रा करके कानपुर पहुँचना और फिर शाम को लौटना धीरे-धीरे मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया। जब तक शोध-यात्रा पूरी नहीं हुई, कानपुर आना-जाना जारी रहा। कभी विश्वविद्यालय, कभी पुस्तकालय और कभी अपने मार्गदर्शक से मिलने का अवसर मिलता।
शोध-विषय की पृष्ठभूमि तैयार करने, दर्शनशास्त्र के विचारकों को पढ़ने, नोट्स बनाने और विषय के विभिन्न पक्षों पर विचार करने में काफी समय लगा। पीएच.डी. के आवेदन और अन्य औपचारिकताएँ भी पूरी करनी थीं। मित्रों और शुभचिंतकों का सहयोग इस पूरी प्रक्रिया में मिलता रहा।
शोध के लिए केवल पुस्तकों को पढ़ लेना पर्याप्त नहीं था। अपने विषय को समझना, विचारों को व्यवस्थित करना और स्वतंत्र निष्कर्षों तक पहुँचना भी आवश्यक था। मैं धीरे-धीरे यह सीख रहा था।
शोध-पंजीकरण और पुस्तकालय की तलाश : मेरा पीएच.डी. में पंजीकरण हो गया, लेकिन शोधकार्य की राह में एक बड़ी कठिनाई सामने थी। मेरे विषय से संबंधित पुस्तकों का संग्रह बहुत सीमित था और आसपास ऐसी कोई अच्छी लाइब्रेरी नहीं थी जिसका नियमित उपयोग कर सकूँ। एक-दो बार आईआईटी कानपुर की लाइब्रेरी गया, लेकिन दूरी और नौकरी की व्यस्तता के कारण बार-बार वहाँ जाना संभव नहीं था।
लखनऊ की लाइब्रेरी- ज्ञान की तलाश को मिला ठिकाना : मेरे शोध-निर्देशक डॉ. मिश्र ने सुझाव दिया कि मैं लखनऊ में भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद-इंडियन काउंसिल ऑफ फिलॉसॉफिकल रिसर्च के अकादमिक केंद्र से संपर्क करूँ। वहाँ एक अच्छी लाइब्रेरी थी। यह सूचना मेरी शोध-यात्रा का दूसरा बड़ा मोड़ बनी।
मेरे लिए वह पुस्तकालय केवल पुस्तकों का संग्रह नहीं था। वहाँ दर्शनशास्त्र की नई-नई पुस्तकें थीं, विदेशी शोध-पत्रिकाएँ आती थीं और नवीनतम बौद्धिक विमर्शों की जानकारी मिलती थी। वहाँ जाने का अनुभव किसी साधक के लिए तीर्थस्थल पहुँचने जैसा था। जिस ज्ञान की तलाश में मैं वर्षों से भटक रहा था, उसे अब एक ठिकाना मिल गया था।
लाइब्रेरी की साधना जी, प्रीति जी और अन्य कर्मचारियों से मिला सहयोग मेरे लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। कम खर्च में फोटोकॉपी कराने और आवश्यक सामग्री डाक से मँगवाने की सुविधा ने मेरी कठिनाइयाँ बहुत कम कर दीं। नौकरी के कारण मैं बार-बार छुट्टी लेकर लखनऊ नहीं जा सकता था। ऐसे में यह व्यवस्था मेरे शोधकार्य की जीवनरेखा बन गई।
उस समय भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद (ICPR) के मेंबर सेक्रेटरी प्रो. अशोक वोहरा ने मुझे लाइब्रेरी का सदस्य भी बना दिया। अब मैं पुस्तकें इश्यू करवाकर घर ले जा सकता था और अपनी सुविधानुसार पढ़ सकता था। यह मेरे लिए किसी वरदान से कम नहीं था।
केंद्र में नियमित रूप से सेमिनार और विद्वत्-चर्चाएँ भी होती थीं। उनमें भाग लेने से देश के विभिन्न हिस्सों से आए विद्वानों के विचार सुनने और उनसे परिचित होने का अवसर मिलता। इन चर्चाओं ने मेरी सोच को व्यापक बनाया और शोध के लिए नए दृष्टिकोण प्रदान किए।
अब तक मेरी शोध-यात्रा अनेक बाधाओं, निराशाओं और अनिश्चितताओं से गुजर चुकी थी। लेकिन इस पुस्तकालय और वहाँ मिले सहयोग ने ज्ञान के नए द्वार खोल दिए। मेरा शोधकार्य सचमुच गति पकड़ने लगा था।
शिलॉन्ग की यात्राः मित्रता से मिला शोध-सहयोग : इसी दौरान एक ऐसी महत्त्वपूर्ण घटना घटी, जिसका उल्लेख किए बिना मेरा यह वृत्तांत अधूरा रहेगा। मेरे एक मित्र, जिनका जिक्र मैं प्रारंभ में कर चुका हूँ, नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी, शिलॉन्ग में रसायनशास्त्र के प्रोफेसर थे। मैं उनसे मिलने और शिलॉन्ग घूमने के इरादे से वहाँ गया था। बातचीत के दौरान मैंने उन्हें अपने शोधकार्य के बारे में बताया।
नॉर्थ ईस्टर्न हिल यूनिवर्सिटी, शिलॉन्ग में मित्रता ने शोध को नई दिशा दी। शिलॉन्ग विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र का एक समृद्ध विभाग था। वहाँ डॉ. मल्ला, डॉ. डेनियल और डॉ. जगतपाल जैसे विद्वान अध्यापक थे, जो टीचर्स कॉलोनी में ही रहते थे। डॉ. द्विवेदी से उन सभी का परिचय था। उनसे मिलकर और अपने शोध-विषय पर चर्चा करके मुझे बहुत लाभ हुआ।
वे मुझे विश्वविद्यालय और अन्य पुस्तकालयों में ले जाते, मेरे विषय से संबंधित पुस्तकों और शोध-सामग्री से परिचित कराते। मैं आवश्यक सामग्री की फोटोकॉपी कराकर भविष्य में थीसिस में उपयोग के लिए सँभालकर रखता। धीरे-धीरे मेरे पास पर्याप्त सामग्री एकत्र हो गई और मैंने थीसिस लिखने का कार्य प्रारंभ कर दिया।
इस काम में डॉ. द्विवेदी, डॉ. रेखा और उनके परिवार ने जिस तरह प्रेरणा और सहयोग दिया, वह अतुलनीय था। उनके स्नेह और प्रोत्साहन ने मेरी शोध-यात्रा को नई ऊर्जा दी। यही कारण था कि जब मेरी थीसिस पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई, तो मैंने उसे उन्हीं को समर्पित किया।
शोध का काम भले ही एक व्यक्ति के नाम से पूरा होता हो, लेकिन उसके पीछे अनेक लोगों का सहयोग और सद्भावना छिपी होती है। मेरे लिए शिलॉन्ग की यह यात्रा उसी सत्य का अनुभव थी।
थीसिस पूरी हुई, लेकिन एक नई कठिनाई सामने आई : मेरे लिए भी यह समय धैर्य की परीक्षा था। पन्ने-पन्ने जुड़कर शोध-प्रबंध बनता गया। धीरे-धीरे शोध-लेखन पूरा होने लगा। लेकिन थीसिस को टाइप करवाने की समस्या सामने थी। हमारे छोटे शहर में इस काम की समुचित व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी। शोध-प्रबंध की प्रतियाँ तैयार करवाना, उन्हें जाँचना और विश्वविद्यालय की आवश्यक औपचारिकताओं को पूरा करना भी आसान नहीं था।
आखिरकार परिचितों और शुभचिंतकों की मदद से टाइपिंग और अन्य आवश्यक काम आगे बढ़े। पन्ने दर पन्ने सामग्री टाइप होती, फिर उसे देखकर सुधार किया जाता। इस प्रक्रिया में समय लगा, लेकिन धीरे-धीरे शोध-प्रबंध तैयार हो गया।
प्रतियाँ जमा कराने के बाद मौखिक परीक्षा-वाइवा की प्रतीक्षा शुरू हुई। एक ओर इतने वर्षों की मेहनत के अंतिम चरण तक पहुँचने की प्रसन्नता थी, तो दूसरी ओर परीक्षक की रिपोर्ट और मौखिक परीक्षा को लेकर स्वाभाविक चिंता भी थी। शोधार्थी के लिए यह प्रतीक्षा बेचैन करने वाली होती है; वह अपने काम का परिणाम जानने के लिए उत्सुक रहता है।
डॉ. देवराज से मुलाकातः बौद्धिक जीवन का नया अध्याय : इसी दौरान एक सुखद संयोग भी हुआ। डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी कानपुर विश्वविद्यालय के नए कुलपति बनकर आए। पदभार सँभालते ही उन्होंने प्रेस में बयान दिया कि विश्वविद्यालय में शोधकार्य का स्तर बहुत निम्न है और उसे ऊँचा उठाने के लिए गंभीर प्रयास किए जाने चाहिए।
इसी प्रयास के क्रम में, संयोगवश मेरी थीसिस उनके मित्र डॉ. देवराज के पास परीक्षक के रूप में भेज दी गई। डॉ. देवराज दर्शन-जगत की जानी-मानी हस्ती थे, हालाँकि उनका नाम मेरे सुपरवाइजर द्वारा सुझाए गए परीक्षकों की सूची में शामिल नहीं था।
डॉ. देवराज बड़े विद्वान थे। उन्होंने मेरी थीसिस पढ़ी और उसका मूल्यांकन करने के बाद मुझे पत्र लिखकर मिलने के लिए आमंत्रित किया। मैं उन्हें पहले से जानता भी नहीं था, फिर भी उनके निमंत्रण पर उनसे मिलने लखनऊ चला गया।
उस मुलाकात के बाद मेरा बौद्धिक जीवन जैसे बदल गया। वे सच्चे अर्थों में दार्शनिक थे- ऐसे व्यक्ति, जिनसे किसी भी विषय पर खुलकर चर्चा की जा सकती थी और बिना किसी संकोच के अपने विचार व्यक्त किए जा सकते थे। उनके सामने प्रश्न उठाने, असहमति व्यक्त करने और अपने विचारों को तर्क के साथ रखने की स्वतंत्रता थी।
डॉक्टरेट पूरी होने के बाद भी उनसे मेरा संपर्क बना रहा। मैं नियमित रूप से लखनऊ स्थित उनके निवास पर उनसे मिलने जाता और उनके सान्निध्य में मार्गदर्शन तथा दार्शनिक दृष्टि प्राप्त करता रहा। उनके साथ हुई चर्चाएँ केवल बौद्धिक संवाद नहीं थीं; वे जीवन और विचार को नए ढंग से समझने के अवसर भी थीं।
डॉ. देवराज से मुलाकात ने विचारों की नई दुनिया खोली। थीसिस से पुस्तक तक : डॉक्टरेट पूरी हो जाने के बाद डॉ. देवराज ने मुझे सुझाव दिया कि मैं अपनी थीसिस प्रकाशित करवाऊँ। मैंने संकोच से कहा, “मेरे जैसे नए शोधार्थी की थीसिस कौन प्रकाशित करेगा?”
इस पर उन्होंने अपने लेटरहेड पर अपने प्रकाशक के नाम एक पत्र लिखा और मुझे दिल्ली जाकर उनसे मिलने को कहा। उन्होंने आश्वस्त किया कि मेरी पुस्तक अवश्य प्रकाशित हो जाएगी और सचमुच, वैसा ही हुआ। बाद में मुझे पता चला कि बहुत कम शोधार्थियों को यह सौभाग्य प्राप्त होता है कि उनकी डॉक्टरेट की थीसिस इतनी जल्दी पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो जाए।
मेरे लिए यह केवल पुस्तक का प्रकाशन नहीं था। यह उन वर्षों की मेहनत, असफलताओं, निराशाओं और सहयोग का एक मूर्त परिणाम था। जिस यात्रा की शुरुआत कभी बंद रास्तों और आत्म-संदेह से हुई थी, वह अब एक प्रकाशित पुस्तक के रूप में मेरे सामने थी।
डॉक्टरेट के बाद भी पूरी नहीं हुई साधना : मेरी शोध-यात्रा का समापन एक सुखद और संतोषपूर्ण पड़ाव पर हुआ, लेकिन मेरे पुराने शिक्षक डॉ. ओ. पी. मिश्र के बधाई-पत्र ने मुझे एक नई दृष्टि दी। उन्होंने लिखा था कि डॉक्टरेट की उपाधि से मुझे सरस्वती के मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार तो मिल गया है, किंतु अभी मेरी पूजा बाकी है- और यह पूजा आजीवन चलती रहनी चाहिए।
उनके ये शब्द मेरे लिए केवल बधाई नहीं थे। वे जीवनभर अध्ययन, साधना और ज्ञान की खोज में लगे रहने का संदेश थे। डॉक्टरेट की उपाधि शोध-यात्रा का अंत हो सकती है, लेकिन ज्ञान की साधना का नहीं।
थीसिस ने पुस्तक का रूप लिया-एक लंबे सपने की परिणति : पीछे मुड़कर देखता हूँ तो महसूस होता है कि मेरी शोध-यात्रा केवल एक अकादमिक उपलब्धि की कहानी नहीं है। यह निराशा से आशा तक, असफलता से आत्मविश्वास तक और अकेले प्रयास से सामूहिक सहयोग तक पहुँचने की कहानी है। इसमें मित्रों का साथ है, परिवार का स्नेह है, पुस्तकालयों का योगदान है और ऐसे गुरुओं का मार्गदर्शन है, जिन्होंने मुझे स्वतंत्र रूप से सोचने और अपने निष्कर्षों तक पहुँचने की प्रेरणा दी।
मैं विशेष रूप से अपने शोध-निर्देशक डॉ. हृदय नारायण मिश्र और उनके गुरु प्रो. नन्दकिशोर देवराज जी को कभी नहीं भूल सकता। उनके व्यक्तित्व, विद्वत्ता और स्नेह ने मेरे जीवन को नई दिशा प्रदान की। उनके सान्निध्य ने मेरी बौद्धिकता को सँवारा और मुझे नया जीवन-विश्वास दिया।
मेरी यात्रा यह भी बताती है कि शोधकार्य केवल किसी एक व्यक्ति का प्रयास नहीं होता। उसमें अध्यापकों, विद्वानों, मित्रों, पुस्तकालय- कर्मियों, सहकर्मियों और परिवार के लोगों का योगदान जुड़ा रहता है। हर व्यक्ति अपने अनुभवों, कठिनाइयों और सहयोग के सहारे अपनी यात्रा पूरी करता है। मेरी यात्रा भी अनेक ऐसे ही पड़ावों से गुजरकर पूरी हुई।
डॉक्टरेट एक पड़ाव है; ज्ञान-साधना आजीवन चलती है : आज जब मैं उस समय को याद करता हूँ, तो सबसे अधिक यही महसूस होता है कि जीवन में कोई सपना देर से पूरा हो, तो भी उसका मूल्य कम नहीं हो जाता। कभी-कभी देर से मिली मंजिल हमें रास्ते की कीमत, सहयोग का महत्त्व और ज्ञान के प्रति विनम्रता अधिक गहराई से सिखाती है।
मेरी डॉक्टरेट की यात्रा समाप्त हुई थी, लेकिन सीखने, पढ़ने, प्रश्न उठाने और विचार करने की यात्रा आज भी जारी है।
डॉक्टरेट की उपाधि ने मेरे लिए ज्ञान के मंदिर का द्वार खोला; लेकिन उस मंदिर में प्रवेश करके साधना करना आजीवन मेरा दायित्व बना रहा।














