समय के चाक पर भारत
भागलपुर में पढ़ाई के दौरान मेरा अपने विषय (दर्शनशास्त्र) के अतिरिक्त भी कई अन्य विषयों के शिक्षकों से भी संपर्क रहा, जिनमें प्रो. नृपेन्द्र प्रसाद वर्मा सर (हिंदी) का नाम भी शामिल है। आपने वहाँ हिन्दी विभाग के अध्यक्ष तथा पीजी डिपलोमा इन जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन के निदेशक की जिम्मेदारी बखूबी निभाई है।
संप्रति आप वर्ष 2015 में सेवानिवृत्त के उपरांत ज्यादा समय अपने गाँव खोड़ागंज (मधेपुरा) में बीता रहे हैं।खास बात यह है कि आप वर्ष 2019 में गाँव में सत्यभामा भुवनेश्वर’ पुस्तकालय एवं हिंदी शोध संस्थान की स्थापना की है, जिसका शुभ उद्घाटन उद्घाटन बीएनएमयू , मधेपुरा के तत्कालीन कुलपति प्रो. अवध किशोर राय और दिव्यशक्ति योगपीठ नवगछिया के संस्थापकपीठाधीश्वर परमहंस आगमानंद जी महाराज के कर-कमलों से हुआ है।
आपकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं। इनमें “पारिभाषिक शब्दावली’, ‘व्यावहारिक व्याकरण चन्द्रिका’, ‘पारिभाषिक शब्द- संग्रह-टिप्पण-प्रारूपण एवं पत्र-लेखन’, ‘प्रायोगिक व्याकरण और रचना : भाषा प्रयोग’, ‘पद्मावत का लोकतात्त्विक अध्ययन’, ‘अस्थिदान : एक अध्ययन’, ‘राष्ट्रभाषा हिन्दी : एक समीक्षा’, ‘आधुनिकता और हिन्दी गद्य साहित्य’, ‘आधुनिक हिन्दी कविता में संवेदना का स्वर वैविध्य’, ‘प्रयोजन मूलक हिन्दी : स्वरूप और प्रयोग’, ‘चलो गाँव की ओर’ (कविता-संग्रह), ‘वैशाली से विक्रमशिला’ तथा ‘भाषा-प्रयोग’ के नाम शामिल हैं। इसके अतिरिक्त आपकी कुछ पुस्तकें प्रखाशनाधीन भी हैं।
इधर, कुछ दिनों पूर्व आपने मुझे कृपापूर्वक अपनी पुस्तक ‘समय के चाक पर भारत’ उपलब्ध कराया है। इसमें लेखक ने भारत को केन्द्र में रखकर समास-शैली में इतिहास, भाषा, साहित्य-संस्कृति,समाज, धर्म, राजनीति एवं समसामयिक समस्याओं पर सुचिंचित विचारों की अभिव्यक्ति की है।
यह एक अत्यंत ही ज्ञानवर्धक एवं विचारोत्तेजक पुस्तक है। यह बात इसमें शामिल लेखों के शीर्षकों से भी स्पष्ट होता है। इसे सुविधा की दृष्टि से निम्न पांच खंडों में बांटकर समझा जा सकता है-
01. भारत का विभाजन एवं आजादी: इस पुस्तक की शुरुआत ‘भारत का विभाजन अप्राकृतिक था’ शीर्षक आलेख से हुई है। भारत में अंग्रेजी राज, विभाजन एवं आजादी से संबंधित कुछ अन्य आलेख भी उल्लेखनीय हैं। यथा- ‘जन-गण-मन’ रैयती मानसिकता का वाचक’, ‘भारत-विभाजन का असली जिम्मेदार कौन?’, ‘भारत की आजादी भीख या उपहार नहीं’ एवं ‘भारत में अंग्रेजी राज का कानून कब खत्म होगा’।
02. भारत की भाषायी एकता : लेखक की एक प्रमुख चिता भारत की भाषायी एकता और राष्ट्रभाषा हिन्दी की प्रतिष्ठा को लेकर भी है। इस क्रम में ‘हिन्दी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक एकता की कड़ी’, ‘हिन्दी-विरोधियों की अक्ल पर से पर्दा उठा दो’, ‘हिन्दी रोती है हिन्दुस्तान में’ एवं ‘भाषा किसी जाति की जागीर नहीं’ आदि आलेख काफी महत्वपूर्ण हैं।
03. भारत की धार्मिक एकता: इस पुस्तक के कई आलेख भारत की धार्मिक एकता एवं सांप्रदायिक सौहार्द से संबंधित हैं। इनमें ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में वैर करना’, ‘धर्म एक विकसनशील प्रक्रिया है’, ‘साम्प्रदायिकता एक खतरनाक प्रवृत्ति’, ‘भारत धार्मिक एवं सांस्कृतिक बहुवचन का देश’, ‘भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने के खतरे’, ‘मत बाँटो सूरज चाँद को’, ‘अपने अन्दर के सत्य को जान लेना ही धर्म है’, ‘गद्दारों का कोई कौम और मजहब नहीं होता’, ‘धर्म-ग्रन्थ कानून का आधार नहीं हो सकता’, ‘साम्प्रदायिक फासीवाद और भारत’, ‘अल्लाह के दरबार में जबाब देना होगा’, ‘हिन्दू कहलाना हमारा जातीय सांस्कृतिक गौरव”, ‘काश्मीर से धारा 370 की वापसी की जरूरत’ एवं ‘एक मुसलमान की कृष्णभक्ति’ उल्लेखनीय हैं।
04. भारत की सामाजिक एकता : इस पुस्तक के कुछ आलेखों में भारतीय समाज को एकता के सूत्र में पिरोए रखने की चिंता जाहिर होती है। ऐसे आलेखों में ‘जाति-प्रथा और अछूत-समस्या राष्ट्र की प्रगति में बाधक”, ‘एससी-एसटी एक्ट संशोधन और विधायिका’, ‘दलित- राजनीति सर्कस के झूले का खेल’ उल्लेखनीय हैं।
05. राजनीतिक एकता : इस पुस्तक में भारत की राजनीति एकता और विशेषकर राजनीति में नैतिकता को लेकर संकलित कुछ आलेख काफी विचारोत्तेजक हैं। इनमें लोकतंत्र की ऐसी- तैसी, ‘भारतीय राजनीति भ्रष्टाचार का वेश्यालय’, ”भारत में राजनीतिक मूल्यों का संकट’, ‘पतनोन्मुख राजनीति और भारत’, “आजादी के साथ शुरू हो गया था छद्म राजनीति का खेल”, ‘नेताओं की बदजुबानी पर ताला लगाओ’, ‘राष्ट्रीय स्वचेतना साहित्य राजनीति का सम्बल होता है’, ‘नेता चरित्र से पूँजीवादी होते हैं’, ‘सत्ता की प्रवृत्ति हमेशा जन-विरोधी होती है’, ‘सत्ता में आने की चालाकी’, ‘सत्ता की खानदानी बन्दोबस्ती’ एवं ‘राजनीतिक क्रूरता’ प्रमुख हैं।
06. भारत राष्ट्र के नायक : पुस्तक के कुछ आलेख भारत राष्ट्र के नायकों से संबंधित हैं। इनमें ”शिव भारत की एकता के प्रतीक’, ‘नये भारत का श्लाका पुरुष’, ‘सन्तन को कहा सीकरी सों काम’, ‘कबीर व्यावहारिक ज्ञान की पाठशाला’, ‘भोगवादी राजनीति के विरोधी सुभाष”, ‘भारत को आज गांधी नहीं चन्द्रशेखर आजाद’ चाहिए’, ‘भगतसिंह व्यक्ति नहीं विचार धारा थे’ एवं ‘नक्षत्र मालाकार लौट आओ’ प्रमुख हैं।
07. समसामयिक संकट : पुस्तक के कुछ आलेख समसामयिक संकटों की ओर इशारा करते हैं। यथा-“विज्ञान पूर्ण ज्ञान नहीं है’, ‘प्रदूषण मनुष्य की देन’, ‘पर्यावरण- सन्तुलन के लिए ऋतु- परिवर्तन जरूरी’ , ‘सोशल मीडिया समसामयिक इतिहास रचना’, साईबर जनतंत्र के गुलाम हो रहे बच्चे’, महानगर में मजदूरों की दशा और दिशा’ एवं ‘युद्ध समस्याओं के समाधान का मार्ग नहीं’।
08. विविध समस्याएं : कुछ आलेखों में समसामयिक भारत की विविध समस्याओं की ओर हमारा ध्यान खींचा गया है। इनमें ‘मेरा गाँव मेरा देश’, ‘मेरे देश की माटी सोना उगले उगले हीरा-मोती’, ‘भारत माता की जय बोलना’, ‘काश! जनता की पीठ पर आँखें होती’, ‘वास्को-दि- गामा का नया संस्करण’, ‘ट्रोजन हॉर्स से सावधान’, ‘जिन्ना का भूत’, भारत दौरे पर है’, ‘सृजन की थकन भूल जा देवता”, “लेखक और कलाकार में आचरण की सभ्यता होनी चाहिए’, ‘विनम्रता मनुष्य का विशिष्ट गुण’, ‘चर्चिल की दृष्टि में भारतीय राजनेता”, ‘आर्थिक भ्रष्टाचार गरीबी का कारण’ एवं ‘सी. ए. बी. के बहाने मोदी पे निशाने’ (अंतिम आलेख) प्रमुख हैं।
अंत में, मैं बस इतना ही कहना चाहता हूँ कि भारत और इससे संबंधित विभिन्न ज्वलंत समस्याओं को जानने-समझने में रूचि रखने वाले शोधार्थियों एवं आम पाठकों के लिए भी यह पुस्तक पठनीय एवं संग्रहनीय है। बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं।














