पुस्तक परिचर्चा के बहाने….
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दिल्ली के मेरे पसंदीदा अकादमिक विमर्श केंद्रों में एक है- India International centre. जब आपके किसी पसंदीदा अकादमिक विमर्श केंद्र पर आपकी लिखी दो पुस्तकों पर परिचर्चा होनी हो तो एक लेखक के लिए इससे अधिक खुशी की बात क्या हो सकती है। इस महीने 21 से 24 इस केंद्र पर हूं जहां वाणी प्रकाशन से प्रकाशित उन्मोचन ग्रंथ माला के पांच पुस्तकों पर परिचर्चा होनी है।
परिचर्चा में मैं अभय कुमार दूबे जी की पुस्तक उपनिवेशवाद का अलौकिक साम्राज्य और अपनी पुस्तक हन्ना आरेंट: हिंसा का स्थापत्य पर अपनी बात रखने वाला हूं। हमारी दूसरी पुस्तक अनागत गांधी पर हमारे सह लेखक प्रोफेसर अंबिका दत्त शर्मा जी अपनी बात कहेंगे।
हन्ना आरेंट के बारे में कहें तो वास्तव में बीसवीं शताब्दी के राजनीतिक अनुभवों ने यह स्पष्ट कर दिया कि तानाशाही केवल हिंसा या सैन्य बल के सहारे नहीं चलती, बल्कि वह अपने लिए एक “ऐतिहासिक अपरिहार्यता” का मिथक भी गढ़ती है। हर तानाशाह यह दावा करता है कि “इतिहास का यही क्षण निर्णायक है”, इसलिए असहमति, नैतिकता, संवैधानिकता और मानवीय विवेक को स्थगित किया जा सकता है। इस तर्क के भीतर एक प्रकार का ऐतिहासिक आतंक छिपा होता है, जहाँ वर्तमान को भविष्य के किसी कथित महान उद्देश्य के लिए बलिदान कर दिया जाता है। Hannah Arendt ने इसी मानसिकता की सबसे गहरी आलोचना प्रस्तुत की। उनके लिए आधुनिक सर्वसत्तावाद (totalitarianism) की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि वह इतिहास को एक जीवित, खुली और बहुवचन प्रक्रिया न मानकर उसे एक पूर्वनिर्धारित दिशा में प्रवाहित होने वाली शक्ति घोषित करता है, और फिर स्वयं को उस “ऐतिहासिक नियति” का प्रतिनिधि बताता है।
आरेंट का चिंतन मुख्यतः नाजीवाद और स्तालिनवाद के अनुभवों से निर्मित हुआ। उनकी प्रसिद्ध कृति The Origins of Totalitarianism में उन्होंने दिखाया कि आधुनिक तानाशाही परंपरागत निरंकुश शासन से भिन्न है। पारंपरिक अत्याचारी सत्ता केवल राजनीतिक नियंत्रण चाहती थी, जबकि सर्वसत्तावाद मनुष्य की चेतना, स्मृति और सामाजिक संबंधों तक को नियंत्रित करना चाहता है। इसीलिए वह अपने शासन को किसी तात्कालिक राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि “इतिहास के अंतिम सत्य” के रूप में प्रस्तुत करता है। नाजीवाद ने आर्य नस्ल की विजय को इतिहास का अंतिम उद्देश्य बताया, जबकि स्तालिनवाद ने वर्गहीन समाज की स्थापना को। दोनों ही व्यवस्थाओं ने वर्तमान को “निर्णायक ऐतिहासिक क्षण” कहकर हिंसा को वैधता प्रदान की।
आरेंट के अनुसार, सर्वसत्तावादी विचारधाराएँ इतिहास को गति (motion) के रूप में देखती हैं। उनका उद्देश्य किसी नैतिक व्यवस्था की रक्षा नहीं, बल्कि इतिहास की कथित गति को तेज करना होता है। इसी कारण वे व्यक्ति को केवल “इतिहास की सामग्री” में बदल देती हैं। आरेंट लिखती हैं कि totalitarian regimes “execute the laws of History or Nature” — अर्थात वे स्वयं को कानून का निर्माता नहीं, बल्कि इतिहास या प्रकृति के नियमों का क्रियान्वयनकर्ता घोषित करते हैं। यह अत्यंत खतरनाक स्थिति है, क्योंकि तब सत्ता अपने अपराधों के लिए उत्तरदायी नहीं रहती; वह कहती है कि वह केवल इतिहास की माँग पूरी कर रही है।
यहीं “इतिहास का निर्णायक क्षण” वाला तर्क निर्णायक बन जाता है। तानाशाह जनता को यह विश्वास दिलाता है कि राष्ट्र किसी अस्तित्वगत संकट से गुजर रहा है और इसलिए असाधारण कदम उठाना आवश्यक है। कार्ल श्मिट जैसे विचारकों ने भी “exception” की राजनीति में इसी विचार को सैद्धांतिक रूप दिया कि संकट की अवस्था में सामान्य विधि और नैतिकता को स्थगित किया जा सकता है। किंतु आरेंट के लिए यही वह बिंदु है जहाँ राजनीति का विनाश प्रारंभ होता है। राजनीति का सार बहुलता (plurality), संवाद और सार्वजनिक विवेक में है; जबकि तानाशाही इन सबको समाप्त कर इतिहास की एकमात्र व्याख्या थोप देती है।
आरेंट की दृष्टि में सर्वसत्तावाद की सफलता का एक बड़ा कारण “मास सोसाइटी” का उदय था। आधुनिक समाज में व्यक्ति अपने पारंपरिक सामाजिक संबंधों, समुदायों और राजनीतिक भागीदारी से कट गया। परिणामतः वह अकेला, असुरक्षित और दिशाहीन हो गया। ऐसी स्थिति में तानाशाह उसे एक महान ऐतिहासिक मिशन का हिस्सा होने का भ्रम देता है। यही कारण है कि आरेंट ने “loneliness” को totalitarianism की बुनियादी शर्त कहा। अकेला व्यक्ति सत्य की जटिलताओं से नहीं, बल्कि सरल और सर्वग्रासी विचारधाराओं से आकर्षित होता है।
राजनीतिक सिद्धांतकार Seyla Benhabib ने आरेंट की व्याख्या करते हुए लिखा कि उनके लिए totalitarianism केवल राज्य की संरचना नहीं, बल्कि “organized loneliness” की राजनीति है। इसी प्रकार Margaret Canovan ने कहा कि आरेंट की सबसे बड़ी अंतर्दृष्टि यह थी कि आधुनिक मनुष्य की जड़ों से कट चुकी स्थिति तानाशाही को संभव बनाती है। जब व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भागीदारी खो देता है, तब वह इतिहास के मिथकीय आख्यानों में शरण लेने लगता है।
आरेंट ने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि सर्वसत्तावादी शासन “तथ्य” और “सत्य” के बीच की दूरी मिटा देता है। तानाशाह के लिए वास्तविकता उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं होती जितनी उसकी विचारधारा। इसलिए वह निरंतर प्रचार, मिथ्या सूचना और भय का निर्माण करता है। Eichmann in Jerusalem में आरेंट ने “banality of evil” की अवधारणा प्रस्तुत करते हुए दिखाया कि आधुनिक तानाशाही केवल राक्षसी व्यक्तियों पर निर्भर नहीं करती; वह साधारण लोगों को भी प्रशासनिक मशीनरी का हिस्सा बनाकर अमानवीय कार्य करा सकती है। एडोल्फ आइखमन कोई असाधारण दानव नहीं था; वह एक साधारण नौकरशाह था जिसने “मैं केवल आदेश का पालन कर रहा था” कहकर अपनी नैतिक जिम्मेदारी से बचने की कोशिश की।
यहाँ आरेंट का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि उन्होंने बुराई को केवल दुष्ट इरादे से नहीं जोड़ा, बल्कि “सोचने की अक्षमता” से जोड़ा। जब व्यक्ति इतिहास, राष्ट्र या विचारधारा के नाम पर अपने नैतिक विवेक को स्थगित कर देता है, तब वह तानाशाही का उपकरण बन जाता है। इसलिए आरेंट के लिए स्वतंत्र चिंतन स्वयं में एक राजनीतिक क्रिया है।
आरेंट की राजनीति की अवधारणा भी इसी संदर्भ में समझी जानी चाहिए। उनकी पुस्तक The Human Condition में “action” और “speech” को मानवीय स्वतंत्रता का केंद्र माना गया है। मनुष्य तब राजनीतिक होता है जब वह दूसरों के साथ संवाद करता है, असहमति प्रकट करता है और सार्वजनिक क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करता है। तानाशाही इसी सार्वजनिक क्षेत्र को नष्ट करती है, क्योंकि बहुलता उसके लिए खतरा है। इसलिए वह हर असहमति को राष्ट्रविरोध, इतिहासविरोध या व्यवस्था-विरोध घोषित करती है।
यह बात समकालीन राजनीति में भी प्रासंगिक दिखाई देती है। आज भी अनेक शासन यह दावा करते हैं कि राष्ट्र एक “निर्णायक मोड़” पर है, इसलिए नागरिक स्वतंत्रताओं, आलोचना और संस्थागत संतुलन को सीमित करना आवश्यक है। आरेंट हमें चेतावनी देती हैं कि जब भी कोई सत्ता स्वयं को इतिहास की अंतिम अभिव्यक्ति बताने लगे, तब लोकतंत्र संकट में है। इतिहास कभी एकरेखीय नहीं होता; वह बहुवचन अनुभवों और मानवीय क्रियाओं से निर्मित होता है।
Jürgen Habermas ने आरेंट की प्रशंसा करते हुए कहा कि उन्होंने राजनीति को शक्ति के प्रशासनिक तंत्र से मुक्त कर पुनः संवाद और सार्वजनिकता के क्षेत्र के रूप में स्थापित किया। वहीं George Kateb के अनुसार आरेंट का सबसे बड़ा संदेश यह है कि मनुष्य की गरिमा उसकी स्वतंत्र निर्णय क्षमता में निहित है, न कि किसी ऐतिहासिक परियोजना में विलीन हो जाने में।
अंततः, “इतिहास का यही क्षण निर्णायक है” — यह कथन केवल एक राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि तानाशाही की वैचारिक रणनीति है। यह वर्तमान को भय और आपातकाल की भावना से भर देता है ताकि नागरिक स्वतंत्रता और नैतिकता को अस्थायी रूप से निलंबित किया जा सके। आरेंट का चिंतन इस मिथक का प्रतिरोध करता है। उनके लिए इतिहास का कोई अंतिम क्षण नहीं होता; राजनीति का अर्थ ही यह है कि मनुष्य लगातार नए आरंभ (new beginnings) कर सकता है। यही कारण है कि उन्होंने “natality” अर्थात जन्म और नवीनता की अवधारणा को स्वतंत्रता का आधार माना।
इस प्रकार आरेंट का दर्शन केवल सर्वसत्तावाद की आलोचना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जीवन की पुनर्स्थापना का भी प्रयास है। वह हमें सिखाती हैं कि जब सत्ता इतिहास के नाम पर भय पैदा करे, तब सबसे बड़ा प्रतिरोध स्वतंत्र चिंतन, सार्वजनिक संवाद और बहुलता की रक्षा करना है। क्योंकि इतिहास का कोई भी क्षण इतना निर्णायक नहीं हो सकता कि मनुष्य अपनी स्वतंत्रता और नैतिक विवेक को त्याग दे।
इस परिचर्चा में अशोक बाजपेई जी, नंद किशोर आचार्य जी, बलराम शुक्ल जी, आचार्य राधा बल्लभ त्रिपाठी जी, पुरुषोत्तम अग्रवाल जी,उदयन वाजपेई जी, मनिंद्र नाथ ठाकुर जी, रमाशंकर जी, कमल नयन जी, राजकुमार जी, सब्यसाची जी, आलोक टंडन जी, अभय जी और कई अन्य विद्वान सहभागी हैं।
इस अवसर को उपलब्ध कराने के लिए मैं अभय जी और रजा फाउंडेशन का आभारी हूं।
मेरी जो इसके पहले की यात्राएं इस केंद्र पर रही हैं वह ज्ञान वर्धक रही हैं। कुछ सार्थक बोल पाऊं तो यह यात्रा भी रोचक होगी।
सुप्रसिद्ध लेखक प्रो. विश्वनाथ मिश्र जी के फेसबुक वॉल से साभार।












