13 मई, 2026 की शाम। समय करीब 6:30 बजे। मैं ऑफिस से पैदल ही अपने कमरे पर जा रहा था। मधेपुरा मेन मार्केट स्थित शिव मंदिर के पास रोज की तरह बाजार में भीड़ थी। गाड़ियां गुजर रही थीं, लोग अपने-अपने काम में व्यस्त थे। लेकिन इसी भीड़ के बीच एक ऐसा दृश्य था, जिसने इंसानियत, प्रेम और संघर्ष की असली तस्वीर दिखा दी।
एक बुजुर्ग दंपति धीरे-धीरे सड़क पर आगे बढ़ रहे थे। लगभग 90 वर्षीय वृद्ध के एक हाथ में बांस की लंबी लाठी थी और दूसरे हाथ से वे अपनी पत्नी का हाथ थामे हुए थे। उनकी पत्नी, जिनकी उम्र करीब 85 वर्ष बताई गई, सिर पर सोनपापड़ी का झोला लिए नंगे पैर चल रही थीं। दोनों आपस में धीरे-धीरे बातें करते हुए आगे बढ़ रहे थे।
करीब 200 मीटर तक मैं उनके पीछे-पीछे चला। रास्ते में एक चप्पल की दुकान के पास दोनों रुके। ऐसा लगा जैसे वृद्ध अपनी पत्नी के लिए चप्पल खरीदना चाहते हों। उन्होंने कांपते हाथों से अपनी पैंट की जेब टटोली, लेकिन जेब में सिर्फ 2-3 सिक्के ही थे। दोनों एक पल के लिए मायूस हुए और फिर आगे बढ़ गए।
कुछ दूर जाकर वे फिर एक दूसरी चप्पल दुकान पर रुके। तब तक मैं आगे बढ़ चुका था। भीड़ के कारण वे नजरों से ओझल हो गए। जब मैं वापस जाकर देखा गया, तो वृद्ध महिला के पैरों में लाल रंग की हवाई चप्पल थी। शायद किसी तरह उन्होंने अपनी पत्नी के लिए वह चप्पल खरीद ही ली थी। उस पल में गरीबी हार गई थी और पति का प्रेम जीत गया था।
आगे बढ़ते हुए महिला एक सब्जी दुकान के पास रुक जाती थीं। वृद्ध फिर अपनी जेब टटोलते, लेकिन हर बार हाथ में वही कुछ सिक्के आते। तभी मैंने पास जाकर पूछा गया- बाबा, कुछ लेना है क्या ? पहले दोनों ने मना कर दिया। फिर वृद्ध महिला धीरे से बोलीं- सब्जी लेतीय… लेकिन पैसे ने छै…
बस यही शब्द दिल को अंदर तक छू गए। इसके बाद मैंने उनकी कुछ आर्थिक मदद की। बातचीत में वृद्ध महिला ने बताया कि उनका घर पुरानी बाजार में है। दोनों पति-पत्नी सोनपापड़ी बेचकर अपना जीवन चलाते हैं। उस दिन दोपहर में घर से सोनपापड़ी लेकर निकले थे, लेकिन एक भी बिक्री नहीं हुई। इसलिए खाली हाथ घर लौट रहे थे।
जब पूछा गया कि परिवार में और कौन है, तो वृद्ध ने धीमी आवाज में कहा- बेटा-बहू, पोता-पोती सब है… बेटा कोलकाता में रहता है… हम दोनों सोनपापड़ी बेच कर ही गुजर-बसर करते हैं…
उस वक्त तक पानी टंकी चौक आ चुका था। वहां एक किराना दुकान से उनके लिए बिस्किट और ब्रेड खरीदा गया। सामान हाथ में लेते ही बुजुर्ग की आंखों में जो चमक और सुकून था, वह शायद शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।
फिर रास्ते अलग हो गए। एक तरफ जिंदगी की भागदौड़ थी, दूसरी तरफ दो बूढ़े हाथ- जो अब भी एक-दूसरे का सहारा बने हुए थे। वे दोनों फिर उसी तरह हाथ थामे धीरे-धीरे आगे बढ़ गए…
युवा पत्रकार भाई मनीष कुमार, दैनिक भास्कर, मधेपुरा के फेसबुक वॉल से साभार।














