आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी को ज्ञान, विचार और जनचेतना की भाषा बनाने का कार्य किया : डॉ. मयंक भार्गव
वाराणसी। भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला ‘भारत अध्ययन की परंपरा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ’ के अंतर्गत 22 अगस्त, 2026 को दो व्याख्यान का आयोजन किया गया।
‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी : भाषा, साहित्य और ज्ञान चेतना’ विषय पर व्याख्यान देते हुए हिन्दी विभाग, एम.एल.टी. कॉलेज, सहरसा (बिहार) के डॉ. मयंक भार्गव ने कहा कि महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान केवल हिंदी भाषा के परिमार्जन तक सीमित नहीं है। उन्होंने हिंदी को ज्ञान, विचार, इतिहास-बोध और जनचेतना की भाषा बनाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया।
डॉ. भार्गव ने कहा कि यदि 1857 को भारतीय नवजागरण का प्रथम चरण और भारतेन्दु युग को दूसरा चरण माना जाए, तो महावीर प्रसाद द्विवेदी और द्विवेदी युग को उसका तीसरा चरण माना जा सकता है। साहित्य के क्षेत्र में इतिहास ने पहली बार किसी एक व्यक्ति को इतना व्यापक उत्तरदायित्व सौंपा था। द्विवेदी जी ने इस दायित्व का सफलतापूर्वक निर्वहन करते हुए भाषा, साहित्य और ज्ञान-चेतना के निर्माण में असाधारण भूमिका निभाई।
उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी के लिए भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं थी, बल्कि उसमें व्याकरण, अनुशासन और व्यवस्था का होना आवश्यक था। उनका प्रयास था कि हिंदी में शब्दों के प्रयोग की एकरूपता और व्याकरणिक शुद्धता स्थापित हो। भारतेन्दु हरिश्चंद्र जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार की भाषा की आलोचना करते हुए भी वे पीछे नहीं हटे। उनके लिए व्यक्ति से अधिक महत्त्व भाषा और उसके विकास का था। आलोचनाओं और विरोध के बावजूद वे अपने विचार पर दृढ़ रहे।
डॉ. भार्गव ने कहा कि द्विवेदी जी का आत्मविश्वास उनके निरंतर स्वाध्याय से निर्मित हुआ था। वे केवल साहित्य के अध्येता नहीं थे, बल्कि अपने व्यावसायिक जीवन में भी अध्ययन और नवाचार के प्रति सजग थे। रेलवे सेवा के दौरान उन्होंने सिग्नल व्यवस्था से संबंधित नई पद्धति विकसित की और अंग्रेजी में पुस्तक भी लिखी। बाद में जब उनके वरिष्ठ अधिकारी ने उन्हें अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को अनुचित समय-संबंधी आदेश देने के लिए कहा तो उन्होंने उसका पालन करने से इनकार कर दिया और अंततः नौकरी छोड़ना स्वीकार किया। यह प्रसंग उनके स्वाभिमान और सिद्धांतनिष्ठा को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि 1857 के संघर्ष और द्विवेदी जी के पारिवारिक संस्कारों का भी उनके व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ा। उनके पिता रामसहाय द्विवेदी 1857 के संघर्ष से जुड़े सैनिकों में थे और अंग्रेजी सेना से बचते हुए सतलज नदी पार कर अपने प्राण बचाए थे। 1857 का संघर्ष भारतीय स्वाभिमान, अस्मिता और आत्मगौरव की रक्षा का संघर्ष था। संभवतः इसी ऐतिहासिक चेतना ने द्विवेदी जी के भीतर भारत के गौरव और आत्मभाव को साहित्य के माध्यम से प्रतिष्ठित करने की प्रेरणा को मजबूत किया।
डॉ. भार्गव ने कहा कि द्विवेदी जी भारत की ज्ञान-परंपरा को व्यापक दृष्टि से देखते थे। उनका आग्रह था कि संस्कृत सहित भारतीय भाषाओं में हमारे पूर्वजों द्वारा अर्जित ज्ञान को हिंदी में लाया जाए। साथ ही विदेशी भाषाओं और विभिन्न सभ्यताओं में उपलब्ध उपयोगी ज्ञान को भी ग्रहण किया जाए। उन्होंने सिख, पारसी, मुस्लिम, अंग्रेज, चीनी और जापानी सभ्यताओं सहित विभिन्न परंपराओं के प्रभाव को भारतीय संस्कृति के विकास का हिस्सा माना। उनके लिए भारतीयता किसी संकीर्ण आग्रह का नाम नहीं थी, बल्कि विभिन्न ज्ञान-परंपराओं के सारवान तत्वों को ग्रहण करने की क्षमता थी।
उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी भारतीय परंपरा के मूल्यांकन में न तो अंध-परंपरावादी थे और न ही जड़तावादी। वे परंपरा के भीतर मौजूद सारवान ज्ञान को पहचानने के पक्षधर थे। पुराणों की ऐतिहासिक और दार्शनिक सामग्री, आर्यभट्ट की खगोलीय दृष्टि और भास्कराचार्य के गुरुत्वाकर्षण संबंधी विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि द्विवेदी जी भारतीय ज्ञान-परंपरा के वैज्ञानिक और तात्त्विक पक्षों को आधुनिक संदर्भ में सामने लाना चाहते थे।
जगदीश चंद्र बोस के वनस्पतियों में संवेदना संबंधी वैज्ञानिक अनुसंधान का उल्लेख करते हुए डॉ. भार्गव ने कहा कि द्विवेदी जी ने इसे भारतीय दर्शन के ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ सूत्र के संदर्भ में देखा। उनका मानना था कि हमारी परंपरा में व्यक्त अनेक सूक्ष्म सत्यों को आधुनिक विज्ञान भविष्य में नए रूपों में प्रमाणित कर सकता है। इसलिए भारतीय ज्ञान-परंपरा का अध्ययन पूर्वाग्रह के बजाय वैज्ञानिक और विवेकपूर्ण दृष्टि से किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी के लिए साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं था। साहित्य को वे समाज में ज्ञान, आत्मबोध और जनचेतना के विकास का माध्यम मानते थे। ‘सरस्वती’ के संपादन के माध्यम से उन्होंने साहित्य के साथ इतिहास, समाज, विज्ञान, संस्कृति और ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का कार्य किया।
डॉ. भार्गव ने कहा कि महावीर प्रसाद द्विवेदी को केवल भाषा-सुधारक या द्विवेदी युग के प्रवर्तक के रूप में देखना उनके व्यापक अवदान को सीमित करना होगा। उन्हें भारत के गौरव, आत्मभाव, इतिहास-बोध और जातीय चेतना की रक्षा करने वाले ऐसे चिंतक के रूप में देखना चाहिए, जिन्होंने हिंदी को आधुनिक ज्ञान और विचार-विमर्श की सक्षम भाषा बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई।
उन्होंने कहा कि आज भारत अध्ययन की परंपरा पर विमर्श करते समय द्विवेदी जी की दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक है। उनके लिए भारतीय परंपरा का अर्थ अतीत का अंधानुकरण नहीं, बल्कि अपनी परंपरा में उपलब्ध श्रेष्ठ ज्ञान को पहचानना, उसका विवेकपूर्ण मूल्यांकन करना और उसे समकालीन समाज के लिए उपयोगी बनाना था। यही दृष्टि हिंदी साहित्य और भारतीय ज्ञान-परंपरा के बीच एक महत्त्वपूर्ण सेतु का निर्माण करती है।
पण्डिता रमाबाई ने स्त्री शिक्षा को आत्मनिर्भरता और सामाजिक समानता से जोड़ा
भारत अध्ययन की परम्परा में स्त्री के योगदान और स्त्री अस्मिता के प्रश्न को सामने रखते हुए डॉ. सुजाता तेवतिया, एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, श्याम लाल कॉलेज, नई दिल्ली ने “पण्डिता रमाबाई : ज्ञान परम्परा और स्त्री अस्मिता के सन्दर्भ” पर बोलते हुए कहा कि पण्डिता रमाबाई को केवल महिला शिक्षा की अग्रदूत के रूप में देखना उनके व्यापक व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। वे ज्ञान, स्त्री-स्वतंत्रता, सामाजिक समानता और आत्मनिर्भरता की ऐसी प्रखर चिंतक थीं, जिन्होंने अपने जीवन में इन विचारों को संस्थागत रूप देकर साकार किया।
डॉ. तेवतिया ने कहा कि उन्नीसवीं सदी के भारतीय नवजागरण को यदि स्त्री के दृष्टिकोण से देखा जाए तो उसका एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष सामने आता है। भारतीय समाज में सुधार की चर्चा तो हुई, लेकिन स्त्री को अक्सर सुधार की ‘विषय-वस्तु’ के रूप में देखा गया। पण्डिता रमाबाई इस स्थिति को बदलती हैं। वे स्वयं परिवर्तन की सक्रिय कर्ता बनती हैं और स्त्रियों के लिए शिक्षा, रोजगार तथा आत्मनिर्भरता की व्यवस्था खड़ी करती हैं।
उन्होंने कहा कि रमाबाई के जीवन को समझने के लिए उनके बचपन और पारिवारिक संस्कारों को देखना आवश्यक है। उनके पिता अनंत शास्त्री डोंगरे संस्कृत के विद्वान थे और उन्होंने अपनी पत्नी तथा संतानों को संस्कृत की शिक्षा दी। सामाजिक विरोध के बावजूद परिवार ने स्त्री शिक्षा को स्वीकार किया। इसी वातावरण में रमाबाई का बौद्धिक विकास हुआ और आगे चलकर संस्कृत पर उनकी असाधारण पकड़ ने उन्हें सार्वजनिक जीवन में विशिष्ट पहचान दिलाई।
डॉ. तेवतिया ने कहा कि रमाबाई का जीवन सामान्य सामाजिक ढाँचे में फिट नहीं बैठता था। वे सार्वजनिक मंचों पर बोलती थीं, संस्थाएँ बनाती थीं और अपने विचारों को निर्भीकता से व्यक्त करती थीं। उस समय किसी स्त्री का सार्वजनिक रूप से भाषण देना भी उसके चरित्र पर प्रश्न खड़े करने के लिए पर्याप्त माना जाता था। इसके बावजूद रमाबाई ने सार्वजनिक वक्तृत्व को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया।
उन्होंने कहा कि पण्डिता रमाबाई के विचारों में स्त्री शिक्षा का अर्थ केवल विवाह योग्य बनाना नहीं था। उनका लक्ष्य था कि स्त्री शिक्षित हो, रोजगार प्राप्त करे, अपनी आय अर्जित करे और अपने जीवन के निर्णय स्वयं ले। इसी कारण उनके संस्थानों में शिक्षा के साथ-साथ खेती, दुग्ध-कार्य, मुद्रण, सिलाई, हस्तकौशल और अन्य व्यावसायिक प्रशिक्षण भी दिया जाता था। उनके आश्रम की लड़कियाँ स्वयं कार्य करती थीं और आगे चलकर दूसरी लड़कियों को प्रशिक्षित करती थीं। रमाबाई के कार्य में शिक्षा से कौशल, कौशल से रोजगार और रोजगार से आत्मनिर्भरता का एक पूरा चक्र दिखाई देता है।
डॉ. तेवतिया ने कहा कि आज जिस अवधारणा को ‘इंटरसेक्शनल फेमिनिज्म’ या अंतर्संबंधी स्त्रीवाद कहा जाता है, उसका व्यावहारिक रूप पण्डिता रमाबाई के काम में बहुत पहले दिखाई देता है। उनके संस्थानों में विधवा, अनाथ, दलित, दृष्टिबाधित, निराश्रित और सामाजिक रूप से वंचित लड़कियों के लिए स्थान था। वे स्त्री को केवल एक जाति या वर्ग के संदर्भ में नहीं देखती थीं, बल्कि उसकी सामाजिक परिस्थितियों को समग्रता में समझती थीं।
उन्होंने बताया कि रमाबाई ने बाल-विधवाओं की स्थिति को निकट से देखा और उनके लिए शिक्षा तथा पुनर्वास की व्यवस्था विकसित की। उनकी पुस्तक The High-Caste Hindu Woman में बाल विवाह, विधवा जीवन और उच्च जाति की स्त्रियों की सामाजिक स्थिति का गंभीर विश्लेषण मिलता है। इसी वैचारिक दृष्टि ने आगे चलकर शारदा सदन जैसी संस्थाओं को जन्म दिया। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत भी शारदा सदन को विधवाओं और निराश्रित महिलाओं की शिक्षा तथा आत्मनिर्भरता से जोड़ते हैं।
डॉ. तेवतिया ने कहा कि रमाबाई ने अपने कार्य के लिए आर्थिक संसाधन जुटाने में भी असाधारण साहस दिखाया। उन्होंने अमेरिका में व्याख्यान दिए और भारतीय महिलाओं की शिक्षा के लिए आर्थिक सहयोग जुटाया। उनके लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता केवल संस्था की आवश्यकता नहीं थी, बल्कि स्त्री की स्वतंत्रता की बुनियादी शर्त थी। वे चाहती थीं कि स्त्री किसी पुरुष, परिवार या दानदाता की दया पर निर्भर न रहे।
उन्होंने कहा कि रमाबाई की दृष्टि केवल भारत तक सीमित नहीं थी। उनका संपर्क अंतरराष्ट्रीय महिला आंदोलन से भी हुआ। उन्होंने दुनिया की महिलाओं के सहयोग को भारतीय स्त्री शिक्षा के लिए उपयोग किया। इस अर्थ में उनका स्त्रीवाद ‘वैश्विक बहनापा’ और सामाजिक समावेश की भावना से जुड़ा हुआ था।
डॉ. तेवतिया ने कहा कि रमाबाई की विशेषता यह भी थी कि उन्होंने किसी एक सत्ता के सामने समर्पण नहीं किया। उन्होंने ब्राह्मणवादी पितृसत्ता और स्त्री-विरोधी रूढ़ियों की आलोचना की तथा बाद में ईसाई धर्म स्वीकार करने के बावजूद चर्च की संस्थागत सत्ता से भी प्रश्न किए। उनके लिए धार्मिक पहचान से अधिक महत्वपूर्ण मनुष्य का स्वतंत्र विवेक था। इसलिए उनके जीवन को केवल धर्म परिवर्तन के प्रश्न तक सीमित करके देखना उनके व्यापक सामाजिक और बौद्धिक व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि पण्डिता रमाबाई का राष्ट्रबोध भी समावेशी था। वे ऐसे भारत की कल्पना करती थीं जहाँ धर्म, जाति और वर्ण के आधार पर मनुष्य की श्रेष्ठता निर्धारित न हो। उनके राष्ट्र के सपने में लोकतंत्र, समानता और नागरिक स्वतंत्रता का विचार शामिल था। उनके लिए भारत से प्रेम किसी एक धार्मिक पहचान का प्रश्न नहीं था।
डॉ. तेवतिया ने कहा कि रमाबाई अपने आप में एक ‘प्रशिक्षण शाला’ थीं। उन्होंने लड़कियों को केवल किताबें नहीं पढ़ाईं, बल्कि उन्हें जीवन जीने की कला सिखाई—शिक्षा, स्वच्छता, श्रम, कौशल, रोजगार, आत्मसम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रशिक्षण दिया। उन्होंने अपने जीवन के संघर्ष से जो रास्ता बनाया, उसे अपने तक सीमित नहीं रखा, बल्कि हजारों महिलाओं के लिए उस रास्ते को खोल दिया।
उन्होंने कहा कि पण्डिता रमाबाई को भारतीय ज्ञान परम्परा के संदर्भ में देखने का अर्थ यह भी है कि ज्ञान को केवल ग्रंथों और शास्त्रों तक सीमित न माना जाए। रमाबाई ने ज्ञान को जीवन, श्रम और सामाजिक मुक्ति से जोड़ा। संस्कृत की विदुषी होने के साथ-साथ उन्होंने शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का उपकरण बनाया। कलकत्ता में संस्कृत विद्वानों के बीच उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर उन्हें ‘पंडिता’ की उपाधि मिली थी।
डॉ. तेवतिया ने निष्कर्षतः कहा कि पण्डिता रमाबाई को केवल उन्नीसवीं सदी की समाज सुधारक या महिला शिक्षा की अग्रदूत कहना पर्याप्त नहीं है। वे ज्ञान, स्त्री अस्मिता, आत्मनिर्भरता, सामाजिक समावेश और लोकतांत्रिक राष्ट्रबोध को एक साथ देखने वाली प्रखर चिंतक थीं। उनका जीवन यह सिखाता है कि अपने संकीर्ण सामाजिक दायरों को पार करके भी व्यक्ति अपने समाज और राष्ट्र के प्रति गहरी प्रतिबद्धता निभा सकता है। यही पण्डिता रमाबाई की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है।














