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आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी को ज्ञान, विचार और जनचेतना की भाषा बनाने का कार्य किया : डॉ. मयंक भार्गव

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आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने हिंदी को ज्ञान, विचार और जनचेतना की भाषा बनाने का कार्य किया : डॉ. मयंक भार्गव

वाराणसी। भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला ‘भारत अध्ययन की परंपरा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ’ के अंतर्गत ‘आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी : भाषा, साहित्य और ज्ञान चेतना’ विषय पर व्याख्यान देते हुए हिन्दी विभाग, एम.एल.टी. कॉलेज, सहरसा (बिहार) के डॉ. मयंक भार्गव ने कहा कि महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान केवल हिंदी भाषा के परिमार्जन तक सीमित नहीं है। उन्होंने हिंदी को ज्ञान, विचार, इतिहास-बोध और जनचेतना की भाषा बनाने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

डॉ. भार्गव ने कहा कि यदि 1857 को भारतीय नवजागरण का प्रथम चरण और भारतेन्दु युग को दूसरा चरण माना जाए, तो महावीर प्रसाद द्विवेदी और द्विवेदी युग को उसका तीसरा चरण माना जा सकता है। साहित्य के क्षेत्र में इतिहास ने पहली बार किसी एक व्यक्ति को इतना व्यापक उत्तरदायित्व सौंपा था। द्विवेदी जी ने इस दायित्व का सफलतापूर्वक निर्वहन करते हुए भाषा, साहित्य और ज्ञान-चेतना के निर्माण में असाधारण भूमिका निभाई।

उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी के लिए भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं थी, बल्कि उसमें व्याकरण, अनुशासन और व्यवस्था का होना आवश्यक था। उनका प्रयास था कि हिंदी में शब्दों के प्रयोग की एकरूपता और व्याकरणिक शुद्धता स्थापित हो। भारतेन्दु हरिश्चंद्र जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकार की भाषा की आलोचना करते हुए भी वे पीछे नहीं हटे। उनके लिए व्यक्ति से अधिक महत्त्व भाषा और उसके विकास का था। आलोचनाओं और विरोध के बावजूद वे अपने विचार पर दृढ़ रहे।

डॉ. भार्गव ने कहा कि द्विवेदी जी का आत्मविश्वास उनके निरंतर स्वाध्याय से निर्मित हुआ था। वे केवल साहित्य के अध्येता नहीं थे, बल्कि अपने व्यावसायिक जीवन में भी अध्ययन और नवाचार के प्रति सजग थे। रेलवे सेवा के दौरान उन्होंने सिग्नल व्यवस्था से संबंधित नई पद्धति विकसित की और अंग्रेजी में पुस्तक भी लिखी। बाद में जब उनके वरिष्ठ अधिकारी ने उन्हें अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को अनुचित समय-संबंधी आदेश देने के लिए कहा तो उन्होंने उसका पालन करने से इनकार कर दिया और अंततः नौकरी छोड़ना स्वीकार किया। यह प्रसंग उनके स्वाभिमान और सिद्धांतनिष्ठा को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि 1857 के संघर्ष और द्विवेदी जी के पारिवारिक संस्कारों का भी उनके व्यक्तित्व पर प्रभाव पड़ा। उनके पिता रामसहाय द्विवेदी 1857 के संघर्ष से जुड़े सैनिकों में थे और अंग्रेजी सेना से बचते हुए सतलज नदी पार कर अपने प्राण बचाए थे। 1857 का संघर्ष भारतीय स्वाभिमान, अस्मिता और आत्मगौरव की रक्षा का संघर्ष था। संभवतः इसी ऐतिहासिक चेतना ने द्विवेदी जी के भीतर भारत के गौरव और आत्मभाव को साहित्य के माध्यम से प्रतिष्ठित करने की प्रेरणा को मजबूत किया।

डॉ. भार्गव ने कहा कि द्विवेदी जी भारत की ज्ञान-परंपरा को व्यापक दृष्टि से देखते थे। उनका आग्रह था कि संस्कृत सहित भारतीय भाषाओं में हमारे पूर्वजों द्वारा अर्जित ज्ञान को हिंदी में लाया जाए। साथ ही विदेशी भाषाओं और विभिन्न सभ्यताओं में उपलब्ध उपयोगी ज्ञान को भी ग्रहण किया जाए। उन्होंने सिख, पारसी, मुस्लिम, अंग्रेज, चीनी और जापानी सभ्यताओं सहित विभिन्न परंपराओं के प्रभाव को भारतीय संस्कृति के विकास का हिस्सा माना। उनके लिए भारतीयता किसी संकीर्ण आग्रह का नाम नहीं थी, बल्कि विभिन्न ज्ञान-परंपराओं के सारवान तत्वों को ग्रहण करने की क्षमता थी।

उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी भारतीय परंपरा के मूल्यांकन में न तो अंध-परंपरावादी थे और न ही जड़तावादी। वे परंपरा के भीतर मौजूद सारवान ज्ञान को पहचानने के पक्षधर थे। पुराणों की ऐतिहासिक और दार्शनिक सामग्री, आर्यभट्ट की खगोलीय दृष्टि और भास्कराचार्य के गुरुत्वाकर्षण संबंधी विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि द्विवेदी जी भारतीय ज्ञान-परंपरा के वैज्ञानिक और तात्त्विक पक्षों को आधुनिक संदर्भ में सामने लाना चाहते थे।

जगदीश चंद्र बोस के वनस्पतियों में संवेदना संबंधी वैज्ञानिक अनुसंधान का उल्लेख करते हुए डॉ. भार्गव ने कहा कि द्विवेदी जी ने इसे भारतीय दर्शन के ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ सूत्र के संदर्भ में देखा। उनका मानना था कि हमारी परंपरा में व्यक्त अनेक सूक्ष्म सत्यों को आधुनिक विज्ञान भविष्य में नए रूपों में प्रमाणित कर सकता है। इसलिए भारतीय ज्ञान-परंपरा का अध्ययन पूर्वाग्रह के बजाय वैज्ञानिक और विवेकपूर्ण दृष्टि से किया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि द्विवेदी जी के लिए साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं था। साहित्य को वे समाज में ज्ञान, आत्मबोध और जनचेतना के विकास का माध्यम मानते थे। ‘सरस्वती’ के संपादन के माध्यम से उन्होंने साहित्य के साथ इतिहास, समाज, विज्ञान, संस्कृति और ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का कार्य किया।

डॉ. भार्गव ने कहा कि महावीर प्रसाद द्विवेदी को केवल भाषा-सुधारक या द्विवेदी युग के प्रवर्तक के रूप में देखना उनके व्यापक अवदान को सीमित करना होगा। उन्हें भारत के गौरव, आत्मभाव, इतिहास-बोध और जातीय चेतना की रक्षा करने वाले ऐसे चिंतक के रूप में देखना चाहिए, जिन्होंने हिंदी को आधुनिक ज्ञान और विचार-विमर्श की सक्षम भाषा बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई।

उन्होंने कहा कि आज भारत अध्ययन की परंपरा पर विमर्श करते समय द्विवेदी जी की दृष्टि अत्यंत प्रासंगिक है। उनके लिए भारतीय परंपरा का अर्थ अतीत का अंधानुकरण नहीं, बल्कि अपनी परंपरा में उपलब्ध श्रेष्ठ ज्ञान को पहचानना, उसका विवेकपूर्ण मूल्यांकन करना और उसे समकालीन समाज के लिए उपयोगी बनाना था। यही दृष्टि हिंदी साहित्य और भारतीय ज्ञान-परंपरा के बीच एक महत्त्वपूर्ण सेतु का निर्माण करती है।

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