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प्रिय लेखक हरिशंकर परसाई की याद

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कल से ही न जाने क्यों मुझे अपने एक प्रिय लेखक हरिशंकर परसाई की याद आ रही है. वैसे वे लिख तो हिन्दी में रहे थे पर चिंताएँ उनकी अखिल भारतीय और राष्ट्रीय थीं.इसलिए मैं अगर उन्हें इसी कारण एक भारतीय लेखक कहूँ तो कोई अपराध नहीं माना जाएगा.पर यह भी स्पष्ट कर दूँ कि कि ऐसा कहते हुए मैं उन्हें वाल्मीकि, वेदव्यास, या कालिदास की पाँत में नहीं बिठाने जा रहा,पर अपने समय के एक अत्यंत प्रामाणिक,निर्द्वन्द्व और सचेत लेखक की पाँत में बिठाने कीआकांक्षा से प्रेरित अवश्य हूँ.

हरिशंकर परसाई भी म. प्र. के होशंगाबाद (नया और हिन्दू नाम —

नर्मदापुरम्) जिले के जमानिया गाँव की पैदाइश(22अगस्त 1922यूं स्कूली रजिस्टर में1924)थे जिस क्षेत्र के -पुष्प की अभिलाषा- वालेऔर राष्ट्रीय आन्दोलन के बहुस्मृत कवि माखनलाल चतुर्वेदी तथा कवि श्री भवानी प्रसाद जी थे.दादा माखनलाल चतुर्वेदी के नाम से तो पत्रकारिता का बहुप्रतिष्ठित विश्वविद्यालय राजधानी भोपाल में स्थापित हैऔर कवि भवानी प्रसाद मिश्र इसलिए अविस्मरणीय हैं कि वे इसी होशंगाबादकेक्ष टिगरिया गाँव के सपूत थे. दूसरा सप्तक के पहले कवि जिन्होंने हिन्दी कविता को एक अत्यंत प्राणवंत भाषा -दृष्टि और सतपुड़ा के जंगल, सन्नाटाऔर गीतफरोश जैसी कई अमर कविताएँ दीं.

जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख ‘यह किसी और की नही भवानी प्रसाद मिश्र की 1930 में सोची, महसूस की गई और रची हुई पंक्ति है. इसी की कुछेक और भी निर्देशक पंक्तियाँ हैं–

 

यह कि तेरी भर न हो तो कह

और सादे ढंग से बहते बने तो बह.

 

परसाई की ज्यादा निकटता इन्हीं भवानी भाई से थी जिन्हें वे अपने सीनियर उस्तादों के अखाड़े का सदस्य माना करते थे.जीवन को देखने और समझने की इन सबों की अपनी जो निगाह थी उसमें दिप् दिप करती साधारणता में ही कहींअसाधारणता की कौंध और लपट छिपी हुई थी.

नर्मदा का यह अंचल हम हिन्दी वालों के लिए बेशक इसीलिए अविस्मरणीय हो उठा है.

परसाई का अधिकांश जीवन इसी नर्मदा तट पर बसे एक और शहर जबलपुर के नेपियर टाउन में बीता जहाँ वे अपने जिंदगी भर राह खोजते और बार बार पटरी से उतर उतर जाते छोटे भाई गौरीशंकर और विधवा हो चुकी बहन सीता और उसके बेटी -बेटों के साथ गुजारा करते थे. अपने इसी धर्मनिर्वाह और दायित्व पालन के लिए उन्होंने जीवन भर कुँवारा रहना ही तय किया यद्यपि उनके जीवन में प्रेमिका के रुप में शकुन्तला तिवारी आ चुकी थीं जो उनके प्रेमी परसाई के लिए उनकी प्रिय कुन्तल थीं.

यों परसाई ने अपने जीवन की शुरुआत फारेस्ट गार्ड की नौकरी से की पर जल्दी ही वे खंडवा के एक स्कूल में अध्यापक हो गए जहाँ उनकी कक्षा में एक ऐसा भी विद्यार्थी मिला जिसका नाम आभास कुमार गाँगुली था और बाद में देश ने उसे एक अभिनेता और अनूठे महानगायक किशोर कुमार के रूप में जाना. जो परवर्ती दिनों में अपने शिक्षक परसाई के पीछे जिदपूर्वक लगा रहा कि वे जबलपुर की जिंदगी को अलविदा कह महानगर मुंबई आ जायं और एक आलीशान जीवन जिएँ. छोटे भाई के अत्यधिक दबाव पर वे गए भी पर अपने प्रिय छात्र को किसी तरह यह समझा बुझाकर वापस लौट आए कि उनके लेखक को जिंदा रहने के लिए जिस हवा पानी और खाद की जरूरत पड़ती है, वो तो उनके योग्य जबलपुर में ही है.

 

तो परसाई ऐसे ही लेखक थे जिसका एक बिम्ब हम आषाढ़ का एक दिन (मोहन राकेश की ख्यात नाट्यकृति)के नायक कालिदास में पाते हैं जो काशमीर का अपना राजपद त्याग अपने प्रिय अंचल वापस लौटकर अपनी प्रिया मल्लिका से कहता है — क्योंकि सत्ता और प्रभुता का मोह छूट गया था.किसी और के लिए वह वातावरण और जीवन स्वाभाविक था किन्तु मेरे लिए नहीं.

इन पंक्तियों को पढ़ते हुए लगता है जैसे ये परसाई जैसे लेखकों के लिए ही लिखी गई हों.

एक ओर दायित्व पालन के प्रति ऐसी निष्ठा और दूसरी और ऐसी निस्पृहता.

लेखकों को लेकर जो हम पढ़ते हैं और कभी कभार सुनते और जानते हैं तो परसाई हमें विरल और अपवाद लगते हैं. ऐसा भी नहीं कि वे अकेले और अद्वितीय हैं.पर कोई ऐसी सूची अगर खोजी और बनाई जाय तो बेशक उनके बिना अधूरी और असंभव होगी.

हम उन्हें अपने समय के एक आक्रामक लेखक के रूप में जानतेऔर याद करते हैं. पता नहीं आक्रामक शब्द सटीक ही होगा परअपने लेखन से वे कई माने जाने सफल और सुप्रतिष्ठितों के लिए जरूरत से ज्यादा भय पैदा किया करते थे..इसकी वजह चीजों, व्यापारों, घटनाओं और व्यक्तियों को देखने की उनकी वह दृष्टि थी जो हद तक बेखौफ और बेलिहाज थी.पर इसका कारण यह नहीं इसका कारण यह नहीं कि उन्हें अपने देश और उसके लोगों को लेकरकोई द्वेष या घृणा थी बल्कि उनका वह गहरा प्यार और लगाव थाजिसके लिए वे किसी भी हद तक जाने को हर पल तैयार थे.उससे भी कहीं अधिक उनकी करुणा और वह प्यार त्था जो उनकी प्रत्येक रचना में बेहद मुखर होकर अपने पाठकों को न केवल झकझोर डाला करता था बल्कि उनकी नींद और चैन भी छीन लिया करता था. कभी कभी वे हड़बड़ा ही नहीं उठते थे बल्कि अचानक हुए इस हमले से विकल होकर यह भूल ही जाया करते थे कि समाज में इतना सफल जीवन जीकर भी वे इस लेखक की किन्हीं भी कसौटियों पर खरे उतरने योग्य क्यों नहीं बचे?

परसाई आखिर कैसे इंसानी समाज और इंसानीपन की कल्पना में डूबे हुए थे जो उनके अपने सपनों का समाज हो और वह कभी किसी दिन अपनी साकारता पा सके?

इसकी चर्चा तो बाद में पर जो उनके आसपास का, कहें चतुर्दिक का समाज था, यद्यपि वह इन ‘अच्छे’ दिनों वाले समाज से कई कई गुना बेहतर और मूल्यजीवी और सहिष्णुताधर्मी समाज था फिर भी आजादी के बाद जिन मूल्यों की ओर बढ़ने लगा था, वे लोकघाती तो थे ही आत्मघाती भी क्या कम थे.

आज इसे दुबारा समझना चाहें तो सर्वैश्वर दयाल सक्सेना की इस कविता से समझ सकेंगे—

उपलब्धि के नाम पर मेरे पास एक झोला है

जिसमें कुछ खंडित मूर्तियाँ हैं

यह मूर्ति प्रेम की है

जिसकी भुजाएँ

किसी कंचन काया की विवशता

उठाने में उखड़ गईं हैं

यह मूर्ति करुणा की है

जिसकी आँखें

स्वार्थ की भट्ठी के सामने रहते

गल गई हैं

और यह मूर्ति ईश्वर की है

जिसकेअब केवल पेट ही पेट बचा है

(कविता के अंतिम बिंब को महसूस करने के लिए हाल ही

मेंअयोध्या के राममंदिर में हुई लूट को याद करिए)

परसाई का सारा लेखन इसी विपरीत सामाजिक प्रवाह वाले जीवन को लेकर किया गया लेखन है. वे उस

लोक विरोधी शासन तंत्र और जड़तावादी सामाजिकता को लेकर एक ऐसा जागरणकारी लेखन कर रहे थे जो अपने पाठकों को न केवल सचेत करता था वरन् उन्हें उन बदलावों की ओर ले जाने के संकल्पों से भरा था , जो शताब्दियों की जड़ताओं और समकालीन जीवन की बिडम्बनाओं, सामाजिक रूढ़ियों- पाखंडों ही नहीं उन अंध मुगालतों से भी उसे मुक्ति दिला सके जो उसे शताब्दियों से जकड़े और घेरे हुए हैं. वे सत्ता तंत्र और नौकरशाही के उन अनाचारों दुराचारों को भी अपने लेखन के निशाने पर लिए हुए थे जिनसे समूचा जनजीवन बेहाल और त्रस्त था. उनकी भोलाराम का जीव और इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर जैसी रचनाएँ किसने नहीं पढ़ी होंगी.

एक सजग और सचेत लेखक के रूप में उनकी जैसीविश्वसनीयताऔर माँग थी कि कई कई साहित्यिक पत्रिकाओं और बड़े हिन्दी अखबारों के तयशुदा कालमों के लिए भी भी लिखना पड़ता था और परसाई जैसे लेखकों की उपस्थिति उनकी प्रसार संख्या बढ़ा दिया करती थी.

इससे और कुछ समझ में आए या नहीं पर यह तो आता ही कि लेखन का सत्कर्म क्या है. वह जो जनसंवादकारी हो. वह जो नग्न सत्यवादी हो. वो जो बहलाने या फुसलाने या बरगलने के लिए नहीं, प्रत्युत लोक को उसकी हकीकतों का बोध करा सके, साथ ही उन मूल्यों की पहचान करा सके जो नए होकर जीवनविरोधी और लोकविरोधी न हों, न ही ऐसे अतार्किक हों कि अपने ही पाठकों को छलने का काम करे.

परसाई की प्रतिष्ठा का रहस्य ही यही था कि वे एक लोकधर्मी और लोकसेवी लेखक थे. अपने लोगों और अपने समाज और देश को हर कीमत पर प्यार करने वाले लेखक. न केवल प्यार करने बल्कि उसकी कोई भी कीमत चुकाने को तैयार रहना. और वे इसे करते भी रहे जैसे कोई भीष्म प्रतिज्ञा निभा रहे हों.

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने जीवन के अंतिम दिनों में अपने एक निबंध— भीष्मपितामह को भी क्षमा नहीं किया गया — में लिखा है कि महानता अवसरों पर चुप्पी साधने में नहीं, मुखर होकर बोलने में रही है. समाज ऐसी चुप्पियों कभी भी क्षमायोग्य नहीं मानता…

(अधूरा)….

 

वरिष्ठ साहित्यकार एवं आलोचक श्री विजय बहादुर जी के फेसबुक वॉल से साभार।

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