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क्रान्तिवीर नाना पाटेकर को श्रद्धांजलि

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क्रान्ति के नाम पर आज पूरे देश में अराजकता फैली हुई है। इसकी खास वजह यह है कि इस मुल्क का मस्तिष्क आजादी के ७९वें वर्ष के बाद भी अपने हित के लिए तैयार नहीं है। आजादी के बाद से जो भी सरकार आई सभी देश के प्रमुख विचारशील लोगों को आंकड़े और ब्योरों के हिसाब -किताब में उलझाकर रखती रही। मौलिक रूप से सोचने का अवसर और अधिकार दरअसल किसी को नहीं दिया गया। आज क्रान्ति के नाम पर जो उछल -कूद हो रही है उसमें आगे की पंक्ति में उग्र युवाओं एवं युवतियों की उदण्डता यह दर्शाती है कि ये लोग किराये का मस्तिष्क लेकर क्रान्ति के मैदान में फसाद करने के लिए जुटाए गए हैं असल सूत्रधार तो पीछे खड़ा है जो इन्हें दिग्भ्रमित कर राजनीति की दूकान खुली रखना चाहते हैं। इस तरह की क्रान्ति से ऐसा नहीं लगता है कि सौ साल के बाद भी क्रान्ति की मशाल जलाने वाला साफ दिमाग का आदमी भारत में पैदा होगा।इनके पास क्रान्ति का मस्तिष्क है ही नहीं जो कुछ किया जा रहा है वह उधार का है। यही कारण है कि यह क्रान्ति अब उपद्रव का रूप लेती जा रही है। यहां मुल्क के मस्तिष्क से तात्पर्य नौजवानों और विचारशील लोगों से है जिनका मस्तिष्क यदि साफ हो जाएगा तो क्रान्ति का रास्ता स्वत: प्रशस्त हो जाएगा और वह भी अहिंसक । मगर गौरतलब बात है कि यह कोई नहीं चाहता है। यदि सब लोग एकमत हो जाएं कि इस मकान को गिरा देना है तो मकान गिरेगा और हिंसा भी नहीं होगी। लेकिन मतैक्य न बन पाने की स्थिति में मकान तो नहीं गिरेगा और मतभेद से हिंसा भी होगी।यह कहने में कोई हिचक नहीं कि मुल्क में थोड़े से लोग हैं जिन्हें इस क्रान्ति की वजह समझ में आती है शैष सारे लोगों की समझ में बात आती ही नहीं है। उनकी स्थिति अब भी गुलाम जैसी है जिसकी स्टेयरिंग नेताओं के हाथों में है।चाहिए तो यह कि क्रान्ति के पहले मानसिक हवा बनायी जाती , उनके मस्तिष्क को साफ किया जाता फिर क्रान्ति के मैदान में उतारा जाता। पर देखा तो यह भी जा रहा है विदेश से संस्कारित और प्रशिक्षित होकर एक परिन्दाअहले सुबह भारत की सीमा में प्रवेश करते ही भड़कीले भाषण एवं राशन से भीड़ जुटा क्रान्ति का आगाज़ कर जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर देता है।इन सिरफिरे युवाओं और युवतियों की त्रासदी यह है कि इनके मस्तिष्क अभी तक साफ नहीं है। आज जरूरत है इनके मस्तिष्क को साफ करने की जिससे कि सृजनमूलक और अहिंसक क्रान्ति का वातावरण मुल्क में तैयार हो सके।ये देश के वर्तमान भी हैं और भविष्य भी।जिस दिन इनका मस्तिष्क साफ हो जाएगा उस दिन उन्हें राष्ट्रीय जीवन मूल्यों की समझदारी आ जाएगी हालांकि तब तक बहुत देर हो चुकी होगी।साफ मस्तिष्क लेकर क्रान्ति करने वाले को सफलता भी मिलती है और देश को सही दिशा भी जिसकी सर्वाधिक जरूरत इस समय भारत को है।

ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं जिसे लिखने के अनन्तर एक मर्माहत कर देने वाली खबर कि मशहूर कलाकार नाना पाटेकर अब इस दुनियां में नहीं रहे।नाना साहब फिल्म के पर्दे से लेकर वास्तविक जीवन में साफ मस्तिष्क के इन्सान थे। राजनीति से दूर रहकर मुल्क के सभी तबके के लोगों की प्रेरणा के लिए उनके अल्फाज़ कभी नहीं मरेंगे। वे दिग्भ्रमित हो रहे देश के युवाओं, किसानों, राजनेताओं और धर्म की ठेकेदारी लेकर मुल्क को बांटने वालों पर से पर्दा उठाने वाले कलाकार थे। आज के तथाकथित क्रान्तिवीरों को उनके अल्फाज़ को पर्दे का डायलॉग नहीं बल्कि क्रान्ति -पथ का पाथेय मानकर आगे की यात्रा करनी चाहिए। मेरा विश्वास है बिना हिंसा और अराजकता फैलाये उनकी क्रान्ति भी सफल होगी और मुल्क भी अधिक मजबूत होगा।नाना साहब को विनम्र श्रद्धांजलि! जय हिन्द!

-प्रो. नृपेन्द्र प्रसाद वर्मा, पूर्व अध्यक्ष, विश्वविद्यालय हिंदी विभाग, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर (बिहार) (फेसबुक वॉल से साभार)

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