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समाजवादी समागम के तत्वाधान में वैचारिक आभासी विचार गोष्ठी के आयोजन की गई जिसका विषय था “युवा आंदोलन, लोकतंत्र और शिक्षा के सवाल

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*समाजवादी समागम के तत्वाधान में वैचारिक आभासी विचार गोष्ठी के आयोजन की गई जिसका विषय था “युवा आंदोलन, लोकतंत्र और शिक्षा के सवाल“*.
– प्रिया कुमारी ,शोध-प्रशिक्षु,समता मार्ग

वैचारिक गोष्ठी में प्रथम सत्र की शुरुआत युवा आंदोलन और लोकतांत्रिक संघर्षों की वर्तमान स्थिति पर केंद्रित संवाद से हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता समाजवादी समागम के अध्यक्ष एवं प्रख्यात समाजशास्त्री प्रो. आनंद कुमार ने की। सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. अरुण कुमार त्रिपाठी तथा युवा आंदोलन (CJP) के प्रतिनिधि श्री अक्षय शिंदे शामिल हुए। देश के विभिन्न हिस्सों से अनेक सामाजिक एवं वैचारिक कार्यकर्ताओं ने भी कार्यक्रम में भाग लिया।
प्रारंभिक वक्तव्य में युवा आंदोलनों की बदलती भूमिका और लोकतंत्र को नई ऊर्जा देने में उनकी भूमिका पर चर्चा की गई। रणधीर गौतम ने विशेष रूप से कोकरोच आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि इस आंदोलन ने नागरिक समाज और लोकतांत्रिक आवाज को मजबूती देने का काम किया है। आंदोलन ने युवाओं और विद्यार्थियों के बीच नई ऊर्जा पैदा की तथा शिक्षा के प्रश्न को व्यापक लोकतांत्रिक सवालों से जोड़ने का प्रयास किया।
इसके बाद इस युवा आंदोलन से शुरुआती समय से ही से जुड़े अक्षय शिंदे को अपनी बात रखने के लिए आमंत्रित किया गया। उन्होंने आंदोलन की पृष्ठभूमि, उसके विस्तार और विभिन्न राज्यों में युवाओं तथा विद्यार्थियों के बीच बन रहे समर्थन के बारे में अपने अनुभव साझा किए।
अक्षय शिंदे ने बताया कि आंदोलन की शुरुआत एक छोटे प्रयास के रूप में हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे इसकी आवाज पूरे देश में पहुंचने लगी। उन्होंने जंतर-मंतर पर चले लंबे धरने का उल्लेख करते हुए कहा कि आंदोलनकारी युवाओं ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी संघर्ष जारी रखा। तेज गर्मी और लगभग 40–45 डिग्री तापमान के बावजूद आंदोलनकारी पीछे नहीं हटे।
उन्होंने बताया कि आंदोलन को उस समय व्यापक राष्ट्रीय स्तर पर गति मिली जब सोनम वांगचुक को हिरासत में लिया गया। उनके स्वास्थ्य को लेकर भी गंभीर चिंता व्यक्त की गई। इस घटना के बाद आंदोलन के प्रति देश के विभिन्न हिस्सों में व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली और बड़ी संख्या में युवा तथा नागरिक सड़कों पर आए।
आंदोलन का विस्तार और जनसमर्थन-
अक्षय शिंदे ने बताया कि आंदोलन का प्रभाव दिल्ली से बाहर भी दिखाई देने लगा है। उन्होंने रांची और मुंबई में अपने अनुभव साझा किए। उनके अनुसार, रांची में जंतर-मंतर के आंदोलन से प्रेरणा लेते हुए स्थानीय स्तर पर भी आंदोलन खड़ा करने का प्रयास हुआ। इसी प्रकार मुंबई में आवास और अन्य नागरिक समस्याओं को लेकर लोगों के बीच सक्रियता देखने को मिल रही है।उन्होंने कहा कि आंदोलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक यह है कि उसने युवाओं और विद्यार्थियों को अपने अधिकारों तथा सार्वजनिक प्रश्नों के लिए संगठित होकर आवाज उठाने का आत्मविश्वास दिया है।
शिक्षा के सवाल से व्यापक लोकतांत्रिक संघर्ष तक-
संवाद के दौरान यह बात विशेष रूप से सामने आई कि आंदोलन केवल शिक्षा से जुड़े किसी एक प्रश्न तक सीमित नहीं रह गया है। शिक्षा, रोजगार, नागरिक अधिकार, सार्वजनिक सेवाएं और लोकतांत्रिक जवाबदेही जैसे प्रश्न आपस में जुड़े हुए हैं। इसी कारण आंदोलन धीरे-धीरे व्यापक जनआंदोलन और लोकतांत्रिक दबाव समूह के रूप में विकसित होने की दिशा में बढ़ रहा है।
अक्षय शिंदे ने कहा कि आंदोलन को किसी चुनावी राजनीतिक दल के आंदोलन के रूप में नहीं, बल्कि जनता के सवालों पर लोकतांत्रिक दबाव बनाने वाले मंच एवं मोर्चे के रूप में आगे बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इसे एक गैर-दलीय प्रेशर ग्रुप की दिशा में विकसित करने की बात कही।
सरकार पर लोकतांत्रिक दबाव-
उन्होंने आंदोलन के दौरान सरकार की ओर से लिए गए कुछ निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि जनदबाव के कारण सरकार को कई मामलों में प्रतिक्रिया देनी पड़ी। उन्होंने विशेष रूप से स्कूलों से जुड़े अभियान का उल्लेख किया और बताया कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा स्कूलों की स्थिति सुधारने को लेकर आदेश जारी किए गए।
उनके अनुसार, आंदोलन की ताकत इसी में है कि जब नागरिक अपने सवालों को लेकर संगठित होते हैं, तो सरकारों को उनकी मांगों पर ध्यान देना पड़ता है।
राजनीतिक दल से दूरी और जनदबाव की राजनीति-
सत्र में यह महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठाया गया कि क्या युवा आंदोलनों का अंततः किसी राजनीतिक दल या चुनावी राजनीति में बदल जाना अनिवार्य है। चर्चा में इस धारणा से अलग एक रास्ते की संभावना सामने आई—स्वतंत्र जनआंदोलन और लोकतांत्रिक दबाव की राजनीति।
अक्षय शिंदे ने स्पष्ट किया कि आंदोलन को व्यापक स्तर पर ले जाने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन इसे किसी चुनावी राजनीतिक दल का प्रत्यक्ष मंच बनाने के बजाय जनता के मुद्दों पर सरकार और राजनीतिक व्यवस्था पर लोकतांत्रिक दबाव बनाने वाले प्रेशर ग्रुप के रूप में विकसित करने की कोशिश है।

प्रथम सत्र ने इस महत्वपूर्ण प्रश्न को सामने रखा कि आज का युवा केवल शिक्षा और रोजगार पाने वाला वर्ग नहीं है, बल्कि वह लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और सार्वजनिक जवाबदेही के सवालों पर सक्रिय नागरिक भूमिका निभा सकता है।
कोकरोच आंदोलन के अनुभवों के माध्यम से यह स्पष्ट हुआ कि जब युवा अपने सवालों को व्यापक सामाजिक और लोकतांत्रिक प्रश्नों से जोड़ते हैं, तो आंदोलन का प्रभाव स्थानीय सीमाओं से आगे बढ़ सकता है। जंतर-मंतर से लेकर रांची और मुंबई तक इसके विस्तार ने युवाओं की बढ़ती राजनीतिक-सामाजिक चेतना की ओर संकेत किया।
प्रथम सत्र में युवा आंदोलन की पृष्ठभूमि और उसके विस्तार पर चर्चा के बाद कार्यक्रम के दूसरे चरण में प्रो. अरुण कुमार त्रिपाठी ने कोकरोच आंदोलन के व्यापक सामाजिक, राजनीतिक और लोकतांत्रिक संदर्भों पर विस्तार से विचार रखा। उन्होंने इस आंदोलन को युवाओं की रचनात्मक प्रतिरोध क्षमता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों के सवाल से जोड़ते हुए देखा।
व्यंग्य से आंदोलन तक-
प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि यह आंदोलन एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी के प्रतिरोध से उभरा, लेकिन देखते-देखते एक व्यापक युवा आंदोलन का रूप ले लिया। उनके अनुसार, युवाओं ने अपमानजनक टिप्पणी का जवाब हिंसा के बजाय व्यंग्य, हास्य और रचनात्मक प्रतिरोध के माध्यम से दिया। उन्होंने दुष्यंत कुमार की प्रसिद्ध पंक्ति— “कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों”—का संदर्भ देते हुए कहा कि कभी-कभी एक छोटी-सी पहल भी बड़े सामाजिक परिवर्तन का आधार बन सकती है।
उन्होंने स्पेन के तानाशाह फ्रांको के दौर की एक घटना का उदाहरण देते हुए बताया कि व्यंग्य और हास्य सत्ता के लिए किस तरह चुनौती बन सकते हैं। उनके अनुसार, जब जनता किसी दमनकारी परिस्थिति का रचनात्मक ढंग से प्रतिरोध करती है तो उसका प्रभाव व्यापक हो सकता है।
आंदोलन का तेजी से विस्तार-
प्रो. त्रिपाठी के अनुसार, शुरुआत में सोशल मीडिया पर सीमित संख्या में लोगों की भागीदारी थी, लेकिन धीरे-धीरे पर्यावरण, लोकतांत्रिक सुधार और सामाजिक आंदोलनों से जुड़े लोग भी इससे जुड़ते गए। इस तरह आंदोलन ने दिल्ली से बाहर निकलकर देश के विभिन्न हिस्सों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
उन्होंने जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन का उल्लेख करते हुए कहा कि एक समय तक वहां अपेक्षाकृत कम लोग थे, लेकिन बाद में बड़ी संख्या में युवा वहां पहुंचने लगे। आंदोलनकारियों की बढ़ती संख्या ने सरकार और प्रशासन के सामने एक गंभीर लोकतांत्रिक चुनौती खड़ी कर दी।
पुलिस कार्रवाई और लोकतांत्रिक अधिकार-
प्रो. त्रिपाठी ने आंदोलन के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने आरोप लगाया कि आंदोलनकारियों को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किया गया और कई लोगों को चोटें आईं। उन्होंने पुलिस कार्रवाई में महिलाओं और अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार तथा छर्रों के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया।
उनके अनुसार, इस तरह की कार्रवाई ने आंदोलन को दबाने के बजाय उसके प्रति देशभर में सहानुभूति और समर्थन को बढ़ाया। उन्होंने इसे लोकतांत्रिक आंदोलनों के संदर्भ में राज्य की प्रतिक्रिया और नागरिक अधिकारों के बीच तनाव के रूप में प्रस्तुत किया।
युवाओं के भय का टूटना-
प्रो. त्रिपाठी ने इस आंदोलन को पिछले कुछ वर्षों के बड़े जनआंदोलनों की कड़ी में रखते हुए कहा कि इसने युवाओं के भीतर मौजूद भय को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अनुसार, जब विभिन्न राज्यों से युवा जंतर-मंतर पहुंचे और लंबे समय तक धरने पर बैठे रहे, तो उनमें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करने का आत्मविश्वास पैदा हुआ।
उन्होंने आंदोलन की तीन प्रमुख मांगों का उल्लेख किया—शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग, परीक्षा संबंधी गड़बड़ियों से प्रभावित युवाओं के परिवारों को मुआवजा तथा आंदोलनकारियों पर दर्ज मामलों की वापसी और उनकी जांच।
संसद और जवाबदेही का सवाल-
प्रो. त्रिपाठी ने आंदोलन के प्रभाव को संसद की कार्यवाही से भी जोड़कर देखा। उनके अनुसार, सड़कों पर उठ रही आवाज की गूंज संसद तक पहुंची और सरकार को कई मामलों में राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़ा।
उन्होंने विशेष रूप से कार्यपालिका की विधायिका के प्रति जवाबदेही के प्रश्न को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार, लोकतंत्र में सरकार को संसद के माध्यम से जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए और गंभीर घटनाओं पर संसद में स्पष्टीकरण देना लोकतांत्रिक व्यवस्था का आवश्यक हिस्सा है।
देशभक्ति और राष्ट्रवाद की पुनर्व्याख्या-
अपने वक्तव्य के महत्वपूर्ण हिस्से में प्रो. त्रिपाठी ने देशभक्ति के अर्थ पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवादी प्रतीकों का प्रदर्शन मात्र देशभक्ति का प्रमाण नहीं हो सकता। उनके अनुसार, वास्तविक देशभक्ति का अर्थ है—
लोगों की शिक्षा की चिंता करना,
नागरिकों के स्वास्थ्य की चिंता करना,
मानवाधिकारों की रक्षा करना,
युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करना,
और समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करना।
उन्होंने कहा कि यदि देश के करोड़ों युवाओं के भविष्य, शिक्षा और रोजगार की चिंता नहीं की जाती, तो केवल राष्ट्रवादी प्रतीकों का प्रदर्शन पर्याप्त नहीं है।
युवा आंदोलनों को बदनाम करने की कोशिश-
प्रो. त्रिपाठी ने आरोप लगाया कि उभरते हुए युवा आंदोलनों को कमजोर करने के लिए उन्हें अलग-अलग नामों से बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इसे क्रांति के समानांतर प्रतिक्रांति की प्रक्रिया के रूप में देखा।
उनके अनुसार, जब कोई व्यापक जनआंदोलन उभरता है तो उसे विभाजित करने, भ्रम पैदा करने और अलग-अलग समूहों के बीच संघर्ष पैदा करने की कोशिशें भी शुरू हो जाती हैं। इसलिए लोकतांत्रिक आंदोलनों के सामने केवल सत्ता से संघर्ष की चुनौती नहीं होती, बल्कि अपने स्वतंत्र चरित्र और सामाजिक विश्वसनीयता को बनाए रखने की चुनौती भी होती है।
युवाओं की स्थानीय मांगें और व्यापक आंदोलन-
उन्होंने लखनऊ की छात्राओं के आंदोलन का उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी विद्यालय में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, पंखे काम नहीं करते, स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है और शौचालयों की स्थिति खराब है, तो विद्यार्थियों द्वारा इन सुविधाओं की मांग करना लोकतांत्रिक अधिकार है।
उन्होंने राजस्थान, हमीरपुर, फतेहपुर, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल सहित विभिन्न स्थानों पर विद्यार्थियों और युवाओं द्वारा उठाए जा रहे स्थानीय प्रश्नों का उल्लेख किया। उनके अनुसार, जंतर-मंतर का आंदोलन केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने देश के अलग-अलग हिस्सों में युवाओं को अपने स्थानीय सवालों पर आवाज उठाने की प्रेरणा दी।
शिक्षा, परीक्षा और विश्वविद्यालय की स्वायत्तता-
दूसरे सत्र में शिक्षा व्यवस्था से जुड़े प्रश्न विशेष रूप से उभरकर सामने आए। युवाओं की मांगों में प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, पेपर लीक पर रोक, समय पर परीक्षा और परिणाम, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण तथा विश्वविद्यालयों की शैक्षणिक स्वायत्तता की बहाली जैसे मुद्दे प्रमुख बताए गए।
इसके साथ ही विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र विचार-विमर्श और विद्यार्थियों को अपनी बात रखने की स्वतंत्रता को लोकतांत्रिक शिक्षा व्यवस्था की आवश्यक शर्त के रूप में रेखांकित किया गया।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न-
प्रो. त्रिपाठी ने युवाओं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतंत्र का केंद्रीय प्रश्न बताया। उनके अनुसार, लोकतंत्र केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं है; लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ यह भी है कि नागरिक, विशेषकर युवा, सत्ता और संस्थाओं से प्रश्न पूछ सकें।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों, सड़कों, मीडिया और सोशल मीडिया सहित सार्वजनिक जीवन के विभिन्न मंचों पर स्वतंत्र अभिव्यक्ति की गुंजाइश लोकतांत्रिक समाज की बुनियादी आवश्यकता है।
प्रो. अरुण कुमार त्रिपाठी के वक्तव्य का केंद्रीय संदेश यह था कि युवा जब अपने व्यक्तिगत और शैक्षिक प्रश्नों को व्यापक सार्वजनिक हित से जोड़ते हैं, तो वे लोकतांत्रिक परिवर्तन की महत्वपूर्ण शक्ति बन सकते हैं। शिक्षा की गुणवत्ता, परीक्षा की पारदर्शिता, विश्वविद्यालय की स्वायत्तता, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। ये सभी प्रश्न एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।
इस दृष्टि से यह सत्र युवा आंदोलन को लोकतंत्र के पुनर्जीवन और नागरिक चेतना के विस्तार की प्रक्रिया के रूप में देखने का महत्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करता है।

युवा आंदोलन, लोकतंत्र और नए भारत की परिकल्पना-
सत्र 3 में समकालीन युवा आंदोलन, लोकतांत्रिक चेतना, शिक्षा, रोजगार, आर्थिक असुरक्षा और भारत के भविष्य की परिकल्पना पर गंभीर विचार-विमर्श हुआ। सत्र में प्रो. अरुण कुमार त्रिपाठी ने युवा पीढ़ी के उभार को व्यापक सामाजिक और लोकतांत्रिक परिवर्तन के संदर्भ में देखा, जबकि रणधीर गौतम के ओर से इस आंदोलन के प्रमुख मुद्दों और उसकी व्यापक सामाजिक पृष्ठभूमि को रेखांकित किया गया।
सार्वजनिक विमर्श और लोकतांत्रिक चेतना
प्रो. अरुण कुमार त्रिपाठी ने जर्मन दार्शनिक युर्गेन हाबर्मास की ‘पब्लिक स्फीयर’ की अवधारणा का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले कॉफी हाउसों, सैलूनों और साहित्यिक पत्रिकाओं के माध्यम से सरकारी नीतियों पर बहस और आलोचना होती थी तथा प्रमाणित जनमत के निर्माण में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। उनके अनुसार मास मीडिया और कॉरपोरेट जनसंपर्क के बढ़ते प्रभाव ने इस सार्वजनिक क्षेत्र को कमजोर किया।
उन्होंने भारत में पिछले एक दशक से अधिक समय में मीडिया के बदलते स्वरूप की चर्चा करते हुए कहा कि आज भी समाज में वैकल्पिक सार्वजनिक विमर्श के नए मंच उभर रहे हैं। विशेष रूप से युवा पीढ़ी इन मंचों के माध्यम से अपनी बात रख रही है और जनमत निर्माण की नई प्रक्रिया विकसित हो रही है।
नई पीढ़ी का विद्रोह और परिवर्तन-
प्रो. त्रिपाठी ने युवा पीढ़ी के वर्तमान प्रतिरोध को केवल सोशल मीडिया या तात्कालिक असंतोष का परिणाम मानने से इनकार किया। उन्होंने इसे सामाजिक परिवर्तन की स्वाभाविक प्रक्रिया बताया। उनके अनुसार जब भी समाज में परिवर्तन आता है, नई पीढ़ी पिछली पीढ़ी की मान्यताओं और अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं को चुनौती देती है।
उन्होंने भारतीय परंपरा के उदाहरण देते हुए नचिकेता और प्रह्लाद से लेकर महात्मा गांधी और भगत सिंह तक की परंपरा का उल्लेख किया। उनके अनुसार नई पीढ़ी का दायित्व केवल पुरानी व्यवस्था को स्वीकार करना नहीं, बल्कि अन्याय और समझौतों को चुनौती देकर नए मूल्यों और नए विमर्श का निर्माण करना है।
‘दुनिया के युवाओं एक हो’ का आह्वान-
सत्र में यह बात विशेष रूप से सामने आई कि आज के युवा संघर्षों को केवल राष्ट्रीय सीमाओं में नहीं देखा जा सकता। प्रो. त्रिपाठी ने मार्क्स के प्रसिद्ध आह्वान ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ की तर्ज पर आज के समय में ‘दुनिया के युवाओं एक हो’ की आवश्यकता बताई।
उन्होंने गाजा, अमेरिका और भारत सहित विभिन्न स्थानों पर अन्याय के विरुद्ध चल रहे युवा आंदोलनों का उल्लेख किया। भारत में शिक्षा से जुड़े मुद्दों के खिलाफ युवाओं के लंबे अनशन और आंदोलनों को उन्होंने नई राजनीतिक चेतना का संकेत बताया। इन आंदोलनों में युवाओं द्वारा अंबेडकर और भगत सिंह जैसे प्रतीकों को अपनाने की चर्चा भी हुई।
गांधी, भगत सिंह और अंबेडकर की विरासत-
प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि वर्तमान युवा आंदोलन में गांधी, भगत सिंह और डॉ. भीमराव अंबेडकर—तीनों की विचारधारा के विरासत के तत्व दिखाई देते हैं।
अंबेडकर के संदर्भ में उन्होंने ‘शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो’ के संदेश को वर्तमान युवा आंदोलन से जोड़ा। उनके अनुसार आज के युवा शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ संगठित होकर अपने अधिकारों और सामाजिक परिवर्तन के लिए संघर्ष की राह पर आगे बढ़ रहे हैं।
उन्होंने दुष्यंत कुमार की पंक्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि उद्देश्य केवल हंगामा खड़ा करना नहीं, बल्कि परिस्थितियों को बदलना होना चाहिए। उनके अनुसार वर्तमान युवा आंदोलन में व्यवस्था और समाज को बदलने की आकांक्षा स्पष्ट दिखाई देती है।
चुनावी राजनीति से अलग दबाव समूह की भूमिका-
सत्र में युवा आंदोलन के राजनीतिक स्वरूप पर भी चर्चा हुई। प्रो. त्रिपाठी के अनुसार इस आंदोलन का उद्देश्य सीधे चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि एक प्रभावी दबाव समूह के रूप में काम करना है। उनका मानना था कि चुनावी राजनीति में प्रवेश करने से आंदोलन का व्यापक सामाजिक प्रभाव सीमित हो सकता है।
शिक्षा नीति और शिक्षा के बाजारीकरण का प्रश्न
शिक्षा व्यवस्था को युवा आंदोलन के प्रमुख मुद्दों में बताया गया। चर्चा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संदर्भ में शिक्षा के कथित भगवाकरण और व्यवसायीकरण, शिक्षा की बढ़ती लागत तथा पाठ्यक्रम में बदलावों पर चिंता व्यक्त की गई।
प्रो. त्रिपाठी ने कहा कि युवा शिक्षा नीति के मौजूदा स्वरूप को चुनौती दे रहे हैं और शिक्षा को अधिक लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक तथा समावेशी बनाने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण विश्लेषण की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष भारत की आकांक्षा-
प्रो. त्रिपाठी ने युवा आंदोलन को लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और वैज्ञानिक भारत की आकांक्षा से जोड़ते हुए कहा कि युवाओं में जातिगत संकीर्णता और नफरत के बजाय व्यापक लोकतांत्रिक दृष्टिकोण दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि युवाओं की कुछ टिप्पणियां भले ही तीखी या असंयमित हो सकती हैं, लेकिन आंदोलन का नेतृत्व करने वाले लोगों में गंभीरता, गरिमा और व्यापक दृष्टिकोण भी मौजूद है। उनके अनुसार युवाओं का सबसे बड़ा संसाधन जनता, उनकी बुद्धि और उनका विवेक है।
उन्होंने उम्मीद व्यक्त की कि नया भारत संकीर्णता, नफरत, हिंसा और ईर्ष्या से मुक्त होकर बुद्ध, महावीर और स्वतंत्रता संग्राम की गौरवशाली परंपराओं से प्रेरणा लेगा। साथ ही उन्होंने आंदोलन के लिए संयम, अनुशासन और व्यापक दृष्टि को आवश्यक बताया।
रणधीर गौतम की टिप्पणी-
प्रो. त्रिपाठी के वक्तव्य के बाद रणधीर गौतम की ओर से युवा आंदोलन के विभिन्न पहलुओं को सामने रखा गया। रणधीर गौतम ने इस आंदोलन को लोकतंत्र की आवाज और नागरिकता-बोध के पुनर्स्थापन की प्रक्रिया के रूप में रेखांकित किया।
बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा-
चर्चा में कहा गया कि युवा आंदोलन केवल रोजगार की मांग तक सीमित नहीं है। बेरोजगारी और आर्थिक असुरक्षा के पीछे मौजूद आर्थिक व्यवस्था के प्रति असंतोष भी आंदोलन में दिखाई देता है। डिग्री और प्रतियोगी परीक्षाओं के बाद भी सम्मानजनक रोजगार की गारंटी न होना युवाओं के असंतोष का एक प्रमुख कारण बताया गया।
परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और अवसर की असमानता
शिक्षा के बाजारीकरण के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था, पेपर लीक, भ्रष्टाचार और अवसरों की असमानता को भी महत्वपूर्ण मुद्दों के रूप में रेखांकित किया गया।
चर्चा में यह भी कहा गया कि राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता और समान अवसर की नीतियों के बीच राज्यों और युवाओं के सामने अवसरों से जुड़ी नई चुनौतियां पैदा हो रही हैं।
भय से प्रतिरोध तक-
रणधीर गौतम की टिप्पणी में युवा आंदोलनों के प्रतिरोध के स्वरूप को भी रेखांकित किया गया। लाठीचार्ज और दमन के बावजूद युवाओं का पीछे न हटना तथा भय के वातावरण को प्रतिरोध में बदलना आंदोलन की महत्वपूर्ण विशेषता के रूप में सामने आया।
डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया ने इस नई तरह की लामबंदी और आंदोलन को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जवाबदेही और भ्रष्टाचार विरोध-
आंदोलन में जवाबदेही, सूचना के अधिकार और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों की विरासत को भी महत्वपूर्ण बताया गया। चर्चा के अनुसार सार्वजनिक संस्थाओं और शासन व्यवस्था में जवाबदेही की मांग आज भी युवा आंदोलनों के केंद्र में है।
दक्षिण एशिया में युवा आंदोलनों की समानता
सत्र में भारत के साथ बांग्लादेश, नेपाल और केन्या जैसे देशों में उभरे युवा आंदोलनों का संदर्भ देते हुए कहा गया कि भ्रष्टाचार, असमानता और शासन व्यवस्था के सवालों के खिलाफ युवाओं की लोकतांत्रिक चेतना विभिन्न देशों में नए रूप में सामने आ रही है।
युवा आंदोलन, लोकतांत्रिक चेतना और विकल्प निर्माण-
सत्र 4 में युवा आंदोलन के विस्तार, उसकी संगठनात्मक प्रकृति, लोकतांत्रिक चेतना, शिक्षा के प्रश्न, संविधान, सामाजिक न्याय तथा आंदोलन के भविष्य को लेकर विस्तृत चर्चा हुई। सत्र में समाजवादी समागम के विभिन्न साथियों ने आंदोलन की उपलब्धियों, संभावनाओं और चुनौतियों पर अपने विचार रखे। चर्चा का केंद्रीय निष्कर्ष यह रहा कि यह आंदोलन किसी एक संगठन या विचारधारा तक सीमित न रहकर व्यापक सामाजिक सरोकारों से जुड़ता जा रहा है।
आंदोलन का व्यापक सामाजिक विस्तार-
सुभाष लोंगटे ने कहा कि वे आंदोलन को शुरुआत से ही देख रहे हैं और इसमें विभिन्न विचारधाराओं तथा संगठनों के लोग जुड़े हुए हैं। उनके अनुसार आंदोलन किसी एक संगठन या सीमित दायरे में नहीं रहा है। इसकी ऊर्जा और संदेश देश के गांवों तक पहुंचा है तथा स्थानीय समस्याओं को उठाने का माध्यम बना है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि गांवों में सड़क, स्कूल, पानी और बिजली जैसी समस्याओं को युवा अपने मोबाइल से रिकॉर्ड कर सोशल मीडिया पर प्रसारित कर रहे हैं। ऐसी स्थानीय समस्याओं को व्यापक स्तर पर सामने लाने से प्रशासन पर दबाव बना और कई मामलों में त्वरित कार्रवाई भी हुई। महाराष्ट्र में स्कूल जाने वाली तीन लड़कियों द्वारा खराब रास्ते का वीडियो बनाए जाने का उदाहरण दिया गया, जिसके वायरल होने के बाद संबंधित सड़क को दो दिन में ठीक किए जाने की बात कही गई।
विभिन्न संगठनों के बीच तालमेल-
सुभाष लोंगटे ने आंदोलन में शामिल अलग-अलग संगठनों के बीच दिखाई दे रहे तालमेल को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि अलग-अलग संगठन स्वाभाविक रूप से अपने संगठन के विस्तार के बारे में सोचेंगे, लेकिन आंदोलन के व्यापक हित में आपसी समन्वय बनाए रखना आवश्यक है।
उनके अनुसार अभी तक आंदोलन से जुड़े विभिन्न समूहों ने एक-दूसरे के खिलाफ सार्वजनिक टिप्पणी करने से परहेज किया है। इसे उन्होंने राजनीतिक परिपक्वता का सकारात्मक संकेत माना।
संविधान को केंद्र में रखने की आवश्यकता-
सुभाष लोंगटे ने आंदोलन में संविधान को महत्वपूर्ण आधार मानते हुए कहा कि संविधान को हाथ में लेकर आगे बढ़ना देश को बचाने का रास्ता हो सकता है। उन्होंने रोजगार, मजदूरी, गरिमा, गुणवत्ता, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सद्भाव जैसे विभिन्न सवालों को संविधान से जोड़ते हुए कहा कि इन समस्याओं के समाधान के लिए संवैधानिक मूल्यों को केंद्र में रखना आवश्यक है।
आंदोलन के राजनीतिक प्रभाव पर सवाल-
प्रवीण श्रीवास्तव ने कहा कि शुरुआत में उन्हें आंदोलन को लेकर बहुत अधिक भरोसा नहीं था और आशंका थी कि कहीं यह सरकार का ध्यान भटकाने वाला प्रयास न हो। लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन आगे बढ़ा, उनका विश्वास बढ़ता गया।
उन्होंने आंदोलन की मजबूती को स्वीकार करते हुए एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया कि आने वाले चुनावों में इसका राजनीतिक प्रभाव क्या होगा और क्या यह कोई बड़ा परिवर्तन ला पाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि अभी तक आंदोलन से जुड़े युवाओं ने राजनीतिक परिपक्वता दिखाई है, लेकिन चुनाव के समय व्यक्तिगत और संगठनात्मक हितों की चुनौती सामने आ सकती है।
शिक्षा दर्शन और आंदोलन की दिशा-
भावेश कुमार ने आंदोलन के भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने संपूर्ण क्रांति आंदोलन का संदर्भ देते हुए कहा कि उस समय शैक्षणिक क्रांति एक केंद्रीय प्रश्न था। इसी प्रकार वर्तमान आंदोलन के सामने भी यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसकी शिक्षा-दृष्टि क्या है।
उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था को वर्तमान विकास मॉडल पर प्रश्न खड़ा करने में सक्षम बनाना होगा। साथ ही शिक्षा, सामाजिक न्याय, संविधान और लोकतंत्र के बीच संबंध को स्पष्ट करना आवश्यक है। उनका सवाल था कि शिक्षित व्यक्ति का संविधान और लोकतंत्र के प्रति दायित्व क्या होना चाहिए और शिक्षा के माध्यम से नागरिक चेतना का निर्माण कैसे हो।
भय से मुक्ति और लोकतांत्रिक जवाबदेही-
प्रो. शशि शेखर सिंह ने आंदोलन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में लोगों के मन से भय निकलने की बात कही। उनके अनुसार लंबे समय से बने भय के वातावरण को इस आंदोलन ने चुनौती दी है।
उन्होंने कहा कि आंदोलन ने सरकार से बड़े-बड़े वादे करने के बजाय जिम्मेदारी तय करने का प्रश्न उठाया। लोकतंत्र में चुनी हुई सरकार को संसद और जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि आंदोलन का प्रभाव युवाओं से निकलकर स्कूलों और विद्यार्थियों तक पहुंच रहा है। विद्यार्थी अपनी समस्याओं के लिए आवाज उठाने, संगठित होने और प्रशासन तथा सरकार से जवाब मांगने की चेतना विकसित कर रहे हैं। उनके अनुसार लोकतंत्र के लिए यह एक शुभ संकेत है कि नागरिक किसी ‘महानायक’ की प्रतीक्षा किए बिना स्वयं अपनी समस्याओं को उठाएं।
प्रो. आनंद कुमार का अध्यक्षीय वक्तव्य-
सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि किसी भी आंदोलन की समीक्षा करना उसके समर्थकों और विरोधियों दोनों का दायित्व है। उन्होंने स्पष्ट किया कि समर्थक होने का अर्थ आलोचना से बचना नहीं, बल्कि आंदोलन की कसौटियों और उसकी आलोचनाओं का उत्तर देने की जिम्मेदारी लेना भी है।
उन्होंने आंदोलन की एक विशेषता के रूप में उसके ऊपर और नीचे दोनों दिशाओं में फैलने की बात कही। महिलाओं की भागीदारी और विभिन्न छात्र संगठनों की सक्रियता का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आंदोलन में अलग-अलग सामाजिक और वैचारिक समूहों की भागीदारी दिखाई देती है।
समाजवादी धारा के लिए आत्ममंथन-
प्रो. आनंद कुमार ने समाजवादी धारा के सामने आत्ममंथन की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि समाजवादियों का युवाओं में प्रभाव कमजोर हुआ है और समाजवादी विचार की मूल भावना कई जगह जातिगत और राजनीतिक समीकरणों में धुंधली हो गई है। उन्होंने वर्तमान आंदोलन को समाजवादियों के लिए एक अवसर के रूप में देखा और कहा कि आंदोलन के साथ बिना उस पर कब्जा करने की कोशिश किए सहयोग करना चाहिए। उनके अनुसार समर्थन को सक्रिय सहयोग में बदलने की आवश्यकता है।
शिक्षा और गांव की ओर लौटने का आह्वान-
प्रो. आनंद कुमार ने शिक्षा को समाज के नवनिर्माण का सबसे महत्वपूर्ण साधन बताया। उन्होंने शिक्षा के निजीकरण के दबाव और सरकारी स्कूलों की स्थिति पर चिंता व्यक्त की।
उन्होंने आंदोलन के उस आह्वान को महत्वपूर्ण बताया जिसमें लोगों से अपने गांव के स्कूल की स्थिति देखने और उसे बेहतर बनाने के लिए सक्रिय होने की बात कही गई। उनके अनुसार आंदोलन का गांवों तक पहुंचना और शिक्षा को अपना प्रमुख मुद्दा बनाना उसकी सफलता की महत्वपूर्ण शर्त है।
विरोध के साथ विकल्प निर्माण-
प्रो. आनंद कुमार ने कहा कि केवल व्यवस्था की कमियों को बताना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा, रोजगार और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर वैकल्पिक व्यवस्था कैसी होगी, इसका उत्तर भी तैयार करना होगा। उन्होंने संविधान सभा का उदाहरण देते हुए कहा कि विकल्प निर्माण गंभीर बौद्धिक श्रम और विशेषज्ञता की मांग करता है। आने वाले समय की वैश्विक चुनौतियों को देखते हुए भारत को शिक्षा, रोजगार, लोकतंत्र और विकास के प्रश्नों पर ठोस विकल्प प्रस्तुत करने होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि केवल दावों और प्रचार के आधार पर देश का निर्माण नहीं किया जा सकता। वास्तविक परिवर्तन के लिए नए विश्वास, नए तरीकों और ठोस सामाजिक कार्यक्रमों की आवश्यकता है।
आंदोलन की उपलब्धि और भविष्य-
प्रो. आनंद कुमार ने आंदोलन से उत्पन्न राजनीतिक प्रभाव को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि आंदोलन ने यह दिखाया है कि नागरिक दबाव लोकतांत्रिक व्यवस्था में परिवर्तन ला सकता है। उन्होंने आगे संवाद की प्रक्रिया जारी रखने और आंदोलन से जुड़े सवालों पर लगातार चर्चा करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
धन्यवाद ज्ञापन और समापन-
धन्यवाद ज्ञापन में अनिल ठाकुर ने चर्चा को सकारात्मक और स्पष्टता प्रदान करने वाली बताया। उन्होंने कहा कि आंदोलन ने लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक निराशा को चुनौती दी है और नई पीढ़ी ने यह संदेश दिया है कि यदि पुरानी पीढ़ी परिवर्तन नहीं करेगी तो युवा स्वयं परिवर्तन की पहल कर सकते हैं।
उन्होंने आंदोलन के शहरों से गांवों तक पहुंचने को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि परिवर्तन की राजनीति के साथ खड़ा होना आवश्यक है। समाजवादी समागम की ओर से आंदोलन के साथ शुरुआत से जुड़े रहने और आगे भी सहयोग जारी रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई।
अंत में सभी वक्ताओं, प्रतिभागियों, अध्यक्षता कर रहे प्रो. आनंद कुमार तथा कार्यक्रम की मीडिया टीम का आभार व्यक्त किया गया और कार्यक्रम का समापन हुआ।
निष्कर्ष
सत्र 4 ने युवा आंदोलन को केवल एक तात्कालिक राजनीतिक घटना के रूप में देखने के बजाय उसे लोकतांत्रिक चेतना, शिक्षा, संविधान, जवाबदेही, स्थानीय समस्याओं और विकल्प निर्माण से जोड़कर समझने की कोशिश की।
सत्र की चर्चा से पांच प्रमुख बातें उभरकर सामने आईं—
1. आंदोलन का विस्तार किसी एक संगठन तक सीमित नहीं है।
2. स्थानीय समस्याओं को डिजिटल माध्यम से उठाने की नई संस्कृति विकसित हो रही है।
3. संविधान, लोकतंत्र और जवाबदेही आंदोलन के महत्वपूर्ण आधार हैं।
4. शिक्षा को आंदोलन के केंद्रीय मुद्दे के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है।
5. सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, भ्रष्टाचार और विकास के सवालों पर ठोस विकल्प निर्माण भी जरूरी है।
इस प्रकार सत्र 4 ने युवा आंदोलन की उपलब्धियों के साथ-साथ उसके सामने मौजूद वैचारिक, संगठनात्मक और राजनीतिक चुनौतियों को भी सामने रखा। चर्चा का व्यापक संदेश था कि लोकतांत्रिक परिवर्तन को स्थायी बनाने के लिए युवाओं की ऊर्जा, सामाजिक संगठनों का सहयोग, बौद्धिक विमर्श और ठोस वैकल्पिक कार्यक्रम – इन सभी को एक साथ आगे बढ़ाना होगा।

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