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प्रश्नों में व्यक्तित्व उत्तरों में युगबोध…

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आज मेरे लिए आत्मिक संतोष का दिन है।

अपनी नई पुस्तक—
**प्रश्नों में व्यक्तित्व
उत्तरों में युगबोध**
—की पांडुलिपि आज श्वेतवर्णा प्रकाशन को प्रकाशनार्थ भेज दी है।

यह पुस्तक डॉ. अमरेन्द्र के साक्षात्कारों का सार-संकलन अथवा सामान्य समीक्षा मात्र नहीं, बल्कि उनके प्रश्नों और उत्तरों के बीच निर्मित उस वैचारिक संसार का व्याख्यात्मक एवं आलोचनात्मक अध्ययन है, जहाँ एक साहित्यकार का व्यक्तित्व अपने समय, समाज और सांस्कृतिक चेतना से संवाद करता दिखाई देता है।
इस पुस्तक की एक विशेषता इसे मेरे लिए और भी महत्त्वपूर्ण बनाती है। मेरी जानकारी और उपलब्ध हिंदी आलोचनात्मक परंपरा के आधार पर, संभवतः आलोचना-साहित्य में यह पहला अवसर है, जब साक्षात्कार-साहित्य को केंद्र में रखकर एक स्वतंत्र आलोचनात्मक पुस्तक लिखी गई है। साक्षात्कारों पर भूमिकाएँ, समीक्षाएँ और प्रसंगानुकूल लेख अवश्य मिलते हैं, किंतु किसी साक्षात्कार-कृति का अध्यायबद्ध, व्याख्यात्मक और समग्र आलोचनात्मक अध्ययन स्वतंत्र पुस्तक के रूप में अत्यंत विरल है।

डॉ. अमरेन्द्र के उत्तरों में निजी संघर्ष की स्मृतियाँ हैं, रचना-प्रक्रिया की बेचैनी है, साहित्य-दर्शन की स्पष्टता है, भाषा के प्रति गहरी प्रतिबद्धता है और अंगिका की अस्मिता को लेकर सजग सांस्कृतिक दृष्टि भी। इन संवादों में परंपरा और आधुनिकता, व्यक्ति और समाज, सृजन और दायित्व—सभी एक-दूसरे से जुड़ते चले जाते हैं।

इस पुस्तक को लिखते हुए बार-बार अनुभव हुआ कि साक्षात्कार में केवल व्यक्ति नहीं बोलता—उसके माध्यम से उसका समय भी अपनी उपस्थिति दर्ज करता है। प्रश्न व्यक्तित्व की परतें खोलते हैं और उत्तर धीरे-धीरे युगबोध का रूप ग्रहण कर लेते हैं।

मैंने डॉ. अमरेन्द्र को किसी अंतिम निष्कर्ष में बाँधने के बजाय उनके विचारों, असहमतियों, संघर्षों और सृजनात्मक यात्राओं के बीच समझने का प्रयास किया है। आशा है, यह पुस्तक हिंदी साक्षात्कार-साहित्य, अंगिका चेतना और समकालीन आलोचना में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए एक सार्थक वैचारिक संवाद सिद्ध होगी।
आज पांडुलिपि मेरे हाथों से निकलकर प्रकाशन की यात्रा पर चली गई है। अब प्रतीक्षा है—इसके पुस्तकाकार होकर पाठकों तक पहुँचने की।

प्रश्नों से व्यक्तित्व तक,
उत्तरों से युगबोध तक—
यह उसी आलोचनात्मक यात्रा की पुस्तक है।

— रंजन
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18 अगस्त 2026

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