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राजकुमार शुक्ल को कैसे याद करें!

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“ हमारे समय में जो कुछ हो रहा है, उसे देखकर कभी-कभी मुझे सचमुच आशंका होती है कि कहीं इतिहास लिखने का काम भी धीरे-धीरे राजनेताओं के हाथ में न चला जाए। इतिहासकारों की भूमिका तब क्या रह जाएगी? कहीं ऐसा न हो कि बारात किसी और की हो, रास्ता कोई और तय करे, और इतिहासकार पीछे-पीछे झाल-मंजीरा और तुरही बजाते चलें। यह बात मैं कुछ तीखे ढंग से कह रहा हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि समय ऐसा आ गया है जब इतिहासकारों को अपने दायित्व के बारे में गंभीरता से सोचना होगा। यदि हम नहीं संभले तो केवल इतिहास ही हमारे हाथ से नहीं जाएगा, हमारी स्मृति भी हमारे हाथ से चली जाएगी।

और स्मृति की बपौती किसी की नहीं है।

अभी यहाँ एक बात कही गई कि किसी महापुरुष की स्मृति को बचाने के लिए साधन कौन देगा—सरकार ही तो देगी। प्रश्न यह है कि क्या हमारी स्मृति पर सरकार का ही अधिकार होना चाहिए? क्या हम अपने लोगों को तभी याद करेंगे जब सरकार उनकी प्रतिमा लगाएगी, सड़क का नाम रखेगी, कोई समारोह करेगी या किसी योजना के अंतर्गत उनकी जयंती मनाई जाएगी? राजकुमार शुक्ल के परिवार के लोग बिना किसी बड़े सरकारी सहयोग और बिना किसी से चंदा माँगे उनकी स्मृति को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन क्या राजकुमार शुक्ल ने अपना जीवन इसलिए लगाया था कि सौ वर्ष बाद केवल उनके परिवार के लोग उनकी स्मृति की रक्षा करें? यह दायित्व केवल परिवार का कैसे हो सकता है? जिन लोगों ने हमारे समाज के लिए संघर्ष किया, उनकी स्मृति समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

इसीलिए हमें सबसे पहले यह समझना होगा कि इतिहास और स्मृति एक ही चीज नहीं हैं। इतिहास में कुछ घटनाएँ होती हैं, कुछ व्यक्ति होते हैं, और कुछ ऐसे क्षण होते हैं जो धीरे-धीरे प्रतीक बन जाते हैं। 1857 का पूरा इतिहास कितने लोगों ने पढ़ा होगा? लेकिन मंगल पांडे का नाम लगभग हर व्यक्ति जानता है। मंगल पांडे हमारे सामने अपनी आत्मकथा नहीं छोड़ गए। उन्होंने कोई डिस्कवरी ऑफ इंडिया नहीं लिखी, कोई माई एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रुथ नहीं छोड़ी। फिर भी वे हमारी स्मृति में हैं। रानी लक्ष्मीबाई हमारी स्मृति में हैं। खुदीराम बोस हमारी स्मृति में हैं। भगत सिंह हमारी स्मृति में हैं।

मैं स्वयं इस समस्या से जूझ चुका हूँ। मुझे खुदीराम बोस की जीवनी लिखने का दायित्व मिला था। जब काम शुरू किया तो पाया कि उनके बारे में उस तरह की सामग्री उपलब्ध नहीं है जैसी किसी बड़े राजनीतिक नेता के बारे में होती है। उन्होंने लंबी डायरी नहीं छोड़ी, अपने राजनीतिक विचारों को पुस्तकों में व्यवस्थित नहीं किया। खोजते-खोजते उनके अपने हाथ की लिखी कुछ चीजें मिलती हैं, मुकदमे के दस्तावेज़ मिलते हैं, समकालीन अखबार मिलते हैं, दूसरे लोगों की स्मृतियाँ मिलती हैं। तब इतिहासकार को समझ में आता है कि इतिहास केवल उन्हीं लोगों का नहीं लिखा जा सकता जिन्होंने अपने पीछे बड़े-बड़े दस्तावेज़ छोड़े हैं।

कुछ लोग अपने जीवन से दस्तावेज़ बनाते हैं।

कुछ लोग किताब नहीं लिखते, लेकिन एक ऐसा ऐतिहासिक क्षण पैदा कर देते हैं कि समाज उन्हें भूल नहीं सकता। इसलिए यह प्रश्न केवल यह नहीं है कि किसकी प्रतिमा सड़क पर लगी हुई है। असली प्रश्न यह है कि किसकी प्रतिमा लोगों के हृदय में है। सड़क की प्रतिमा बदली जा सकती है, हटाई जा सकती है, उसका नाम बदला जा सकता है। लेकिन जो व्यक्ति किसी समाज की गहरी स्मृति में प्रवेश कर गया, उसे इतनी आसानी से मिटाया नहीं जा सकता।

 

पिछले लगभग तीस वर्षों से मेरी दिलचस्पी ऐसे ही लोगों में रही है—वे लोग जिनकी चर्चा कम होती है, जिनके बारे में राष्ट्रीय इतिहास की किताबों में दो पंक्तियाँ भी नहीं मिलतीं, लेकिन अपने इलाके में लोग आज भी उनका नाम जानते हैं। आप भारत के किसी भी हिस्से में चले जाइए। गाँवों और कस्बों में आपको ऐसे लोग मिलेंगे जिनके बारे में बुजुर्ग कहेंगे—यहाँ एक आदमी था जिसने अंग्रेजों से लड़ाई की थी; यहाँ एक किसान था जिसने जमींदार का मुकाबला किया था; यहाँ एक स्त्री थी जिसने आंदोलनकारियों को छिपाया था; यहाँ किसी ने पुलिस के सामने झुकने से इनकार कर दिया था। गांव उन्हें याद रखता है, लेकिन इतिहास की किताब में उनका कोई नाम नहीं।

 

मैं लंबे समय से यह समझना चाहता हूँ कि ऐसा क्यों होता है।

 

इतिहास के वास्तविक संघर्षकर्ता इतिहास के पन्नों से गायब कैसे हो जाते हैं?

 

राजकुमार शुक्ल इस अर्थ में पूरी तरह गुमनाम व्यक्ति नहीं हैं। उनका नाम इतिहास में है। लेकिन वे मुख्यतः एक ही प्रसंग के कारण उपस्थित हैं—उन्होंने गांधी को चम्पारण आने के लिए राजी किया। मानो उनका ऐतिहासिक जीवन इसी एक काम के लिए था। वे गांधी के पास गए, उनके पीछे पड़े, उन्हें चम्पारण लेकर आए और इसके बाद इतिहास में उनकी भूमिका लगभग समाप्त हो जाती है।

 

कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारे लोकप्रिय इतिहास में उनकी स्थिति उस केवट जैसी बना दी गई है जिसने महापुरुष को नदी पार करा दी। गांधी चम्पारण पहुँच गए, भारतीय इतिहास ने नया मोड़ ले लिया और नाव पार कराने वाला व्यक्ति कहानी से बाहर हो गया।

 

लेकिन क्या राजकुमार शुक्ल की कहानी इतनी ही है?

 

यहाँ से हमें पीछे जाना होगा। गांधी के चम्पारण आने से बहुत पहले वहाँ किसान लड़ रहे थे। शेख गुलाब थे, शीतल राय थे, दूसरे स्थानीय कार्यकर्ता थे। नील की खेती, तीनकठिया और निलहों के अत्याचार के विरुद्ध प्रतिरोध की एक अपनी स्थानीय परंपरा थी। राजकुमार शुक्ल स्वयं 1907–08 के आसपास से इस संघर्ष में सक्रिय दिखाई देते हैं। अर्थात् वे 1916 के लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन में अचानक इतिहास में प्रकट नहीं हुए थे। जब गांधी अभी चम्पारण के राजनीतिक क्षितिज पर नहीं आए थे, तब भी शुक्ल संघर्ष कर रहे थे।

 

यहीं से राजकुमार शुक्ल हमारे लिए अधिक दिलचस्प हो जाते हैं।

 

वे केवल किसान नहीं थे और न स्थापित अर्थों में बड़े राजनीतिक नेता थे। वे उन दो दुनियाओं के बीच खड़े व्यक्ति थे जिन्हें इतिहास अक्सर अलग-अलग करके देखता है। एक ओर गांव के किसान, रैयत और संघर्ष करने वाले लोग थे। दूसरी ओर पटना, कलकत्ता, इलाहाबाद और दूसरे नगरों के वकील, पत्रकार, नेता और पढ़े-लिखे लोग थे। शुक्ल इन दोनों के बीच आने-जाने लगे। उन्हें चिट्ठी लिखना आता था, वे मुहर्रिर का काम कर चुके थे, लोगों से मिल सकते थे, अर्जियाँ तैयार करा सकते थे, नेताओं तक पहुँचने की कोशिश कर सकते थे।

 

अर्थात् वे स्थानीय संघर्ष और आधुनिक राजनीति के बीच एक मध्यस्थ बन रहे थे।

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और यह मध्यस्थता इतिहास की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।

 

किसान वर्षों से लड़ रहा है। लेकिन वह सोचता है कि इलाहाबाद से कोई नेता आ जाए, पटना से कोई वकील आ जाए, कलकत्ता से कोई बड़ा आदमी आ जाए तो हमारी बात सुनी जाएगी। यही स्थिति हमें उत्तर प्रदेश के किसान आंदोलनों में भी दिखाई देती है। प्रतापगढ़ और अवध के किसान अपने स्तर पर संघर्ष करते हैं, लेकिन आंदोलन के एक चरण में बाहर के नेताओं के आने की प्रतीक्षा करने लगते हैं। चम्पारण में भी किसान पहले से लड़ रहे थे, लेकिन गांधी के आने के बाद उस संघर्ष को एक ऐसी राष्ट्रीय भाषा मिली जिसमें उसे पूरे देश के सामने प्रस्तुत किया जा सकता था।

 

समस्या यहीं पैदा होती है।

 

बड़ा नेता आता है। उसके साथ पढ़े-लिखे लोग आते हैं। वकील आते हैं। बयान दर्ज होते हैं। रिपोर्ट बनती है। पत्राचार होता है। अखबारों में खबरें आने लगती हैं। दस्तावेज़ बनने लगते हैं। और बाद में जब इतिहासकार इतिहास लिखने बैठता है तो उसके सामने सबसे अधिक सामग्री उन्हीं लोगों की होती है जो लिख सकते थे, पत्र लिखते थे, रिपोर्ट बनाते थे और जिनके कागजात सुरक्षित रह गए।

 

लेकिन जो दस वर्ष से जमीन पर लड़ रहा था, उसका इतिहास कहाँ है?

 

इतिहास लिखने वाले और इतिहास बनाने वाले हमेशा एक ही लोग नहीं होते।

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यह बात हमें बहुत गंभीरता से समझनी होगी। हमारा बहुत-सा राजनीतिक इतिहास नेताओं के इर्द-गिर्द लिखा गया है। क्योंकि नेताओं ने भाषण दिए, पत्र लिखे, आत्मकथाएँ छोड़ीं, अखबारों में उनका उल्लेख हुआ और उनके कागजात संस्थाओं में सुरक्षित रखे गए। लेकिन जो व्यक्ति खेत में नील बोने से इनकार कर रहा था, जो लगान के खिलाफ खड़ा हो रहा था, जो पुलिस की मार खा रहा था, जो गाँव-गाँव जाकर लोगों को इकट्ठा कर रहा था—उसने अपने संघर्ष की फाइल नहीं बनाई।

 

तो क्या वह इतिहास का विषय नहीं है?

 

यही हमारी इतिहास-दृष्टि की सबसे बड़ी चुनौती है।

 

बंगाल में नील विद्रोह का इतिहास हम जानते हैं। दीनबंधु मित्र का नीलदर्पण जानते हैं। लेकिन बिहार में नील की खेती, उसके विरुद्ध प्रतिरोध और चम्पारण में गांधी के आने से पहले की लंबी प्रक्रिया कितनी व्यापक स्मृति का हिस्सा है? हमारे अपने विद्वानों ने इस पर काम किया है। हेतुकर झा जैसे इतिहासकारों ने स्थानीय समाज को समझने की कोशिश की। सुरेंद्र गोपाल जैसे विद्वानों ने बिहार के इतिहास के उन पक्षों को सामने रखा जिन्हें मुख्यधारा की कथा में जगह नहीं मिलती। चम्पारण पर भी अनेक स्थानीय अध्येताओं ने ऐसे तथ्य जमा किए हैं जिनसे पता चलता है कि तीनकठिया अचानक पैदा हुई कोई व्यवस्था नहीं थी; नील की खेती के तौर-तरीकों, उसके अनुबंधों और किसान-निलहा संबंधों में समय के साथ परिवर्तन हुए थे।

 

लेकिन हम इन लोगों को कितना पढ़ते हैं?

 

हम अक्सर उस विद्वान को तभी बड़ा मानते हैं जब उसके नाम के साथ कोई अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा जुड़ जाए। पटना या बनारस में बैठा कोई व्यक्ति जीवन भर गांवों से सामग्री एकत्र करे, तो हम उसकी किताब को देखना भी जरूरी नहीं समझते। राघव शरण शर्मा जैसे लोगों ने गांव, आदिवासी समाज, छोटी जातियों और स्थानीय संघर्षों के नायकों को सामने लाने का काम किया है। ऐसे अध्ययनों की हमें आज पहले से अधिक आवश्यकता है।

 

इस समय आवश्यकता है कि हम अपने-अपने इलाकों के इतिहास में दबे हुए वास्तविक लोगों को सामने लाएँ।

 

यह काम केवल भाषण से नहीं होगा। दस्तावेज़ीकरण करना होगा।

 

मैं जहाँ जाता हूँ, कोशिश करता हूँ कि जो कुछ कहना चाहता हूँ उसका कोई छोटा पुस्तिका-रूप भी हो। भाषण सुना जाता है, तालियाँ बजती हैं और दो दिन बाद बहुत कुछ भूल जाता है। लेकिन लिखी हुई चीज बचती है। इसलिए प्रत्येक स्थानीय इतिहास-प्रयास का एक प्रश्न होना चाहिए—आपने क्या लिखा? आपने क्या सुरक्षित किया? उस व्यक्ति की चिट्ठियाँ कहाँ हैं? परिवार के पास क्या है? पुराने मुकदमे के कागजात कहाँ हैं? स्थानीय अखबार क्या कह रहे थे? गांव के बूढ़े लोग क्या याद करते हैं?

 

हमारे सामने राहुल सांकृत्यायन का उदाहरण भी है। कुछ ही समय पहले मैं उनके पुत्र से मिला। वे अस्वस्थ हैं, डायलिसिस पर हैं, फिर भी उन्होंने मुझसे लंबी बातचीत की। उनकी एक पीड़ा थी—उनके पिता की विरासत को लोग अपने-अपने ढंग से इस्तेमाल कर रहे हैं; उन्हें वह बनाया जा रहा है जो वे शायद कभी थे ही नहीं। उनकी सामग्री, उनके द्वारा जीवन भर खोजकर लाई गई चीजें, संग्रहालयों और संस्थाओं में पड़ी हैं। और परिवार को लगता है कि वह अपनी आँखों के सामने एक विरासत को बदलते हुए देख रहा है।

 

यह केवल राहुल सांकृत्यायन की समस्या नहीं है।

 

जब कोई समाज अपनी स्मृति की रक्षा करना छोड़ देता है, तब शक्तिशाली लोग उसकी स्मृति की नई व्याख्या करने लगते हैं।

 

इसलिए हमें स्मृति के सवाल को राजनीति से अलग समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। कौन याद किया जाएगा, किस रूप में याद किया जाएगा और किसे भुला दिया जाएगा—यह अपने-आप में राजनीति का प्रश्न है।

 

गणेश शंकर विद्यार्थी को ही लीजिए। प्रताप केवल एक अखबार नहीं था। उसने किसानों, मजदूरों, क्रांतिकारियों और दबे हुए लोगों की अनेक आवाजों को जगह दी। लेकिन आज गणेश शंकर विद्यार्थी का नाम बहुत लोगों के मन में है, उनके वास्तविक पत्रकारिता-कर्म का विस्तृत इतिहास कितने लोग जानते हैं? हमें उन लोगों का भी इतिहास लिखना होगा जो संघर्ष और सार्वजनिक स्मृति के बीच सेतु का काम कर रहे थे।

 

राजकुमार शुक्ल की कहानी को इसी दृष्टि से देखना चाहिए।

 

वे गांधी को चम्पारण लाए—यह उनकी महान ऐतिहासिक भूमिका है। लेकिन प्रश्न वहीं समाप्त नहीं होना चाहिए। उससे बड़ा प्रश्न है कि गांधी को चम्पारण लाने से पहले वे क्या कर रहे थे और गांधी के चम्पारण से चले जाने के बाद उन्होंने क्या किया?

 

1917 के बाद भी शुक्ल लगभग बारह वर्ष जीवित रहे।

 

ये बारह वर्ष कहाँ हैं?

 

यह प्रश्न मुझे बहुत बेचैन करता है। एक व्यक्ति जिसने वर्षों तक संघर्ष किया, गांधी के पीछे-पीछे गया, उन्हें चम्पारण आने के लिए राजी किया और इस तरह भारतीय राजनीति के एक बड़े मोड़ का कारण बना—वही व्यक्ति बाद की राजनीतिक व्यवस्था में कोई बड़ा स्थान क्यों नहीं बना सका? क्या वह राजनीति नहीं जानता था? या राजनीति का ढाँचा ही ऐसा बदल गया था कि स्थानीय संघर्षकर्ता धीरे-धीरे किनारे हो गए और संगठन, संस्था, शिक्षा, संसाधन तथा बड़े राजनीतिक नेटवर्क वाले लोग केंद्र में आ गए?

 

हमें राजकुमार शुक्ल के अंतिम वर्षों की त्रासदी को भी समझना चाहिए।

 

वे अंततः फिर गांधी के आश्रम तक जाते हैं। इसका अर्थ क्या है? जिस व्यक्ति ने एक समय गांधी को अपने संघर्ष की भूमि तक पहुँचाया था, वही बाद में अपनी कठिनाइयों के साथ गांधी के पास पहुँच रहा है। इस दृश्य के भीतर भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की राजनीति का एक बहुत गहरा इतिहास छिपा हुआ है।

 

इसलिए राजकुमार शुक्ल की कहानी गांधी की कहानी का केवल एक अध्याय नहीं है। उसकी अपनी स्वतंत्र कथा है।

 

यहाँ एक और बात कहनी आवश्यक है। हमने चम्पारण सत्याग्रह को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के एक महान मोड़ के रूप में उचित ही देखा है। लेकिन किसी घटना को महान बताते-बताते हमें उसके पहले की दुनिया को शून्य नहीं बना देना चाहिए। गांधी 1917 में आए। इसका मतलब यह नहीं कि 1916 तक बिहार में लोग घास छील रहे थे। स्वदेशी आंदोलन के बाद से बिहार में बहुत कुछ हो रहा था। विभिन्न जगहों पर राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियाँ थीं। स्थानीय आश्रम बन रहे थे, कार्यकर्ता सक्रिय थे, बाहर के नेताओं से संपर्क स्थापित हो रहे थे। लेकिन बाद की स्मृति में उनमें से बहुत कुछ एक बड़ी गांधीवादी कथा के भीतर समाहित हो गया।

 

इतिहासकार का काम जयकारा लगाना नहीं है।

 

इतिहासकार का काम उस जयकारे के पीछे दब गई आवाजों को भी सुनना है।

 

इसके लिए हमें स्रोतों की अपनी समझ को भी विस्तृत करना होगा। इतिहास-लेखन गंभीर काम है। तथ्य चाहिए, प्रमाण चाहिए, स्रोतों की आलोचना चाहिए। मैं यह बिल्कुल नहीं कह रहा कि जो कुछ गांव में किसी बुजुर्ग ने कह दिया वही इतिहास हो गया। स्मृति को भी जाँचना होगा। एक व्यक्ति की याद को दूसरे व्यक्ति की याद से मिलाना होगा। उपलब्ध दस्तावेज़ों से उसका परीक्षण करना होगा। समय के साथ स्मृति में आए परिवर्तनों को पहचानना होगा।

 

लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि केवल सरकारी अभिलेखागार में जो लिखा है वही इतिहास है।

 

तथ्य अभिलेखागार में मिल सकते हैं, लेकिन किसी समाज के अनुभव का तत्व कई बार साहित्य और स्मृति में मिलता है।

 

इसीलिए मेरा पहला प्रस्ताव है कि इतिहासकार साहित्य की तरफ जाए। साहित्य इतिहास का विकल्प नहीं है, लेकिन इतिहास का अत्यंत महत्वपूर्ण साथी है। इतिहास अगर साहित्य की तरफ मुड़ेगा तो समृद्ध होकर लौटेगा। उपन्यास, कहानी, कविता, लोकगीत, संस्मरण—ये हमें बताते हैं कि लोग अपने समय को किस तरह अनुभव कर रहे थे। सरकारी रिपोर्ट बताएगी कि किसी वर्ष कितने किसान गिरफ्तार हुए; लोकगीत शायद यह बताए कि गाँव ने उस गिरफ्तारी को किस रूप में याद रखा।

 

दूसरा प्रस्ताव है कि इतिहासकार स्थल पर जाए।

 

चम्पारण का इतिहास केवल पटना में बैठकर पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। चम्पारण जाइए। उन गांवों में जाइए जहाँ नील की खेती होती थी। लोगों से पूछिए कि वे किन लोगों को याद करते हैं। पुराने घरों में जाइए, परिवारों के संदूक देखिए, स्थानीय मंदिरों, मजारों और स्मारकों के बारे में पूछिए। आपको एक ऐसा चम्पारण दिखाई देगा जो राजधानी से दिखाई नहीं देता।

 

गाँवों की स्मृति में इतिहास की किताबों से अलग एक संसार सुरक्षित रहता है। मैं कभी-कभी मजाक में कहता हूँ कि गांव के बूढ़ों ने इतिहास की किताबें कम पढ़ी हैं, यह उनका सौभाग्य भी है। क्योंकि यदि वे भी केवल पाठ्यपुस्तक पढ़ते तो वही आठ-दस नाम दोहराते रहते जिन्हें हम सब जानते हैं। उनकी स्मृति में गांव के पहलवान हैं, पुराने विद्रोही हैं, किसी जमींदार से भिड़ जाने वाले किसान हैं, किसी स्त्री की बहादुरी है, किसी स्थानीय साधु या मौलवी की कथा है। उनमें तथ्य और कल्पना दोनों हो सकते हैं, लेकिन इतिहासकार का काम उस स्मृति को खारिज करना नहीं, उसकी तह तक जाना है।

 

जालियांवाला बाग को याद कीजिए।

 

लगभग हर भारतीय उस नाम को जानता है। लेकिन जालियांवाला बाग का ‘हीरो’ कौन है? वहाँ मारे गए सैकड़ों सामान्य लोगों के नाम कितनों को मालूम हैं? लोकप्रिय स्मृति में एक नाम सबसे तेजी से आता है—जनरल डायर, जिसने गोली चलवाई। लेकिन जो लोग मारे गए, वे कौन थे? कहाँ से आए थे? उनके परिवारों पर क्या बीती? उस घटना का सामाजिक इतिहास क्या था?

 

फिर भी जालियांवाला बाग हमारी राष्ट्रीय स्मृति में एक अत्यंत शक्तिशाली प्रतीक है। वह आज भी हमें विचलित करता है क्योंकि उसमें निहत्थे लोगों पर औपनिवेशिक सत्ता की हिंसा का अनुभव संघनित है। इतिहासकार वी. एन. दत्ता ने उस पर अत्यंत विस्तृत काम किया। कितने लोग उसे पढ़ते हैं? हम कई बार इतिहास के तथ्य नहीं चाहते; हम इतिहास से अपने लिए केवल प्रतीक निकाल लेना चाहते हैं।

 

यही खतरा है।

 

इतिहास को केवल राजनीतिक उपयोग के लिए प्रतीकों की खेती में बदल देना इतिहास के साथ अन्याय है।

 

इसलिए मैं आप सबसे आग्रह करना चाहता हूँ—इतिहास को गंभीरता से लीजिए। अपनी स्मृति का सम्मान कीजिए। अपने गांव, अपने शहर, अपने जिले और अपने क्षेत्र के उन लोगों को खोजिए जो इतिहास के कालक्रम में कहीं छूट गए। उनके दस्तावेज़ खोजिए। उनके बारे में बुजुर्गों से बात कीजिए। स्थानीय अखबारों को देखिए। पत्र और डायरी खोजिए। साहित्य को पढ़िए। लोकगीत सुनिए। स्मारकों और स्थलों को समझिए।

 

और सबसे बढ़कर किसी सरकार, किसी दल या किसी बड़े नेता पर अपनी स्मृति की पूरी जिम्मेदारी मत छोड़िए।

 

राजकुमार शुक्ल हमारे हैं इसलिए नहीं कि किसी सरकार ने उनका नाम स्वीकार कर लिया है। मंगल पांडे हमारे हैं इसलिए नहीं कि कहीं उनकी मूर्ति लगी हुई है। खुदीराम बोस, भगत सिंह, 1942 के शहीद और असंख्य अज्ञात किसान और कार्यकर्ता हमारी स्मृति में इसलिए जीवित हैं कि उनके संघर्ष ने हमारे समाज के अनुभव में कोई निशान छोड़ा है।

 

वही निशान इतिहास की असली जमीन है।

 

सरकारें बदलेंगी। राजनीतिक प्राथमिकताएँ बदलेंगी। प्रतिमाएँ लगेंगी, हटेंगी और नए नाम सामने आएँगे। लेकिन किसी समाज को यदि अपनी ऐतिहासिक चेतना बचानी है तो उसे अपने अतीत की जिम्मेदारी स्वयं लेनी होगी।

 

इतिहासकार का काम सत्ता के पीछे चलना नहीं है। उसका काम स्मृति और साक्ष्य के बीच संवाद स्थापित करना है; प्रसिद्ध और गुमनाम के बीच संतुलन बनाना है; बड़े नेता के साथ उस साधारण कार्यकर्ता को भी देखना है जिसके बिना वह आंदोलन संभव ही नहीं होता।

 

मैं आज राजकुमार शुक्ल के बहाने यही कहना चाहता हूँ कि हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि गांधी को चम्पारण कौन लाया। हमें यह भी पूछना चाहिए कि गांधी के आने से पहले चम्पारण में कौन लड़ रहा था; गांधी के आने के समय स्थानीय संघर्ष और राष्ट्रीय नेतृत्व के बीच संबंध कैसे बने; और गांधी के चले जाने के बाद उन स्थानीय लोगों का क्या हुआ जिन्होंने जमीन तैयार की थी।

 

जब हम ये प्रश्न पूछना शुरू करेंगे तभी राजकुमार शुक्ल का पूरा इतिहास हमारे सामने आएगा।

 

और शायद तभी हम अपने देश के असंख्य दूसरे राजकुमार शुक्लों को भी खोज पाएँगे।

 

इतिहास को बचाइए। अपनी स्मृति को बचाइए। क्योंकि जिस दिन कोई समाज अपनी स्मृति की जिम्मेदारी दूसरों को सौंप देता है, उसी दिन से कोई दूसरा उसके अतीत का अर्थ तय करने लगता है।… “

( गांधी संग्रहालय , पटना २३ अगस्त , २०२६)

चर्चित इतिहासकार प्रो. हितेंद्र पटेल जी के फेसबुक वॉल से साभार।

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