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“भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ” विषयक पन्द्रह दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला अंतर्गत दो व्याख्यान आयोजित

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भारत अध्ययन केन्द्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ” विषयक पन्द्रह दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला (10 से 31 अगस्त 2026) के अंतर्गत “एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल और भारतविद्या”विषय पर बोलते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के बांग्ला विभाग की सहायक आचार्य और वक्ता डॉ. संपन चक्रवर्ती ने कहा कि एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल ने भारत और एशिया की प्राचीन ज्ञान-परंपराओं, भाषाओं, साहित्य, इतिहास, कला, पुरातत्त्व और संस्कृति के व्यवस्थित अध्ययन को संस्थागत आधार प्रदान किया।

उन्होंने एशियाटिक सोसाइटी के इतिहास और अपनी शोध-यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 1784 में सर विलियम जोन्स द्वारा स्थापित यह संस्था भारतविद्या के विकास की महत्वपूर्ण आधारभूमि बनी। 15 जनवरी 1784 को कलकत्ता के सुप्रीम कोर्ट के ग्रैंड जूरी रूम में इसकी स्थापना हुई थी। सोसाइटी का प्रारंभिक उद्देश्य एशिया के इतिहास, पुरावशेष, कला, विज्ञान और साहित्य का अध्ययन करना था।

कार्यशाला में द्वितीय वक्ता के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के आचार्य प्रो. बलराम शुक्ल ने “भारतीय ज्ञान परंपरा: सातत्य और संवर्धन” विषय पर विचार व्यक्त किया।

प्रो. शुक्ल ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा किसी एकरूप, स्थिर अथवा जड़ व्यवस्था का नाम नहीं है, बल्कि यह निरंतर प्रवाहित होने वाली ऐसी परंपरा है, जिसमें विविध विचारधाराओं, ज्ञान-शाखाओं और सांस्कृतिक धाराओं का संवाद, समन्वय और संवर्धन होता रहा है। भारतीय परंपरा की शक्ति उसके सातत्य और परिवर्तनशीलता में निहित है।

उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा को समझने के लिए उसे केवल पश्चिमी अवधारणाओं और आधुनिक वर्गीकरणों के आधार पर देखना उचित नहीं होगा। भारतीय दृष्टि में पुराना और नया परस्पर विरोधी नहीं हैं। पुरानी ज्ञान-परंपराएँ समय और परिस्थितियों के अनुसार नए संदर्भों में पुनर्व्याख्यायित होती रही हैं और यही प्रक्रिया उन्हें जीवित एवं प्रासंगिक बनाए रखती है।

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