परम आदरणीय अभिभावक सुप्रसिद्ध अधिवक्ता एवं जनवादी नेता श्री भुवनेश्वरी सिंह ‘भुवन’ जी को सादर नमन।
जब मैं प्रभात खबर, भागलपुर में कार्य करता था, तो उस दौरान मेरी आदरणीय भुवन जी से कार्यालय और विभिन्न कार्यक्रमों में कई मुलाकातें हुईं। आपसे मिलकर पूरे तन-मन में एक नई उर्जा का संचार होता था। आपने मुझे अपनी एक ‘कविता संग्रह’ भेंट की थीं, जिसकी एक कविता की कुछ पंक्तियां मुझे आज भी याद हैं, “डायर के वंशज के फेनु सुनबै पड़तै इतिहास। जे जनता पे जुल्म करै छै, निश्चित होय छै ओकरो नाश।”
उपयुक्त पंक्तियां आज भी प्रासंगिक हैंं- हमारे परिवार-समाज, कार्य-स्थल, प्रदेश-देश एवं दुनिया के परिप्रेक्ष्य में।
आज चर्चित पत्रकार एवं अधिवक्ता मित्रवर भाई श्री रूप कुमार जी ने अपने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से हम सबों को आदरणीय भुवन बाबू की याद दिलाई। मैंने यह पोस्ट पढ़ते ही, तुरंत रुप भाई को फोन किया और उनको साधुवाद दिया। हमने आपस में आदरणीय भुवन जी के साथ अपने साझे संस्मरण को याद किया। मैंने उनसे अनुरोध किया है कि वे मुझे आदरणीय भुवन जी के बारे में और भी जानकारी उपलब्ध कराने का कष्ट करें। जानकारी मिलने के बाद विस्तार से लिखूंगा।
फिरवक्त प्रिय रुप भाई को पुनः बहुत-बहुत साधुवाद देते हुए आप सबों के लिए उनका पोस्ट प्रस्तुत कर रहा हूँ-यादों के झरोखे से– नामी अधिवक्ता, कवि, न्याय पथ के अडिग सिपाही थे अधिवक्ता श्री भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’
रूप की कलम से :
“Advocate भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनके कर्म आज भी याद किए जाते हैं। भुवनेश्वर शब्द का अर्थ होता है ‘संसार के स्वामी’ या ‘भुवन (दुनिया) के ईश’। और भूवन’इसका शाब्दिक अर्थ है ‘संसार’, ‘दुनिया’ या ‘समस्त जगत’। जिस प्रकार उनके नाम का अर्थ बहुत व्यापक और विशाल था, ठीक वैसा ही उनका व्यक्तित्व भी ज्ञान, साहित्य और न्याय के विस्तार से परिपूर्ण था।
भागलपुर के प्रख्यात अधिवक्ता होने के साथ-साथ स्वर्गीय भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ जी अंगिका भाषा के महान और प्रतिष्ठित कवियों में गिने जाते थे।उन्हें अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं का संपूर्ण और गहरा ज्ञान था। इसके बावजूद, उनका अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा के प्रति प्रेम ऐसा था कि वे हमेशा अदालतों की कार्यवाही में हिंदी को ही बढ़ावा (प्रमोट) देते थे।
किताब उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा था। साहित्य के प्रति उनका अनुराग अगाध था। उनकी प्रसिद्ध अंगिका कविता संग्रह ‘खोरना’ आज भी अंग प्रदेश के साहित्यिक इतिहास में एक मील का पत्थर और अत्यंत यादगार कृति है। अपनी निडरता, ओजस्वी स्वभाव और सरल व्यक्तित्व के कारण वे उस दौर के तमाम नामी कवियों, लेखकों और साहित्यकारों के बीच बेहद प्रिय और आदरणीय हुआ करते थे।
वे सचमुच न्याय पथ के ऐसे सिपाही थे जिनकी कलम और जुबान दोनों ने हमेशा अन्याय के खिलाफ बगावत की। अपनी वकालत और जीवन को समाज तथा लोक-कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। वे न्याय पथ के अडिग सिपाही और जन-जन की आवाज़ थे।
मूल रूप से खरीक (भागलपुर) के ऐतिहासिक तेलघी गांव के निवासी, भागलपुर के नामी अधिवक्ता स्वर्गीय भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ जी की गिनती उन विरले व्यक्तित्वों में होती है जिन्होंने कभी असत्य और अन्याय से समझौता नहीं किया। अंग्रेजों के शासनकाल में फिरंगियों की हुकूमत से लोहा लेने का अदम्य साहस उनमें बचपन से ही कूट-कूट कर भरा था।
वे केवल एक कुशल वकील ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और स्वाभिमान की मिसाल थे। अदालत के प्रांगण में वे सदैव निर्बल, गरीब और असहाय लोगों की मजबूत ढाल बने। सच का साथ देना और समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज़ बनना ही उनके जीवन का परम ध्येय था। उन्होंने सिर्फ खुद न्याय की लड़ाई नहीं लड़ी, बल्कि युवा पीढ़ी को एक सच्चा, ईमानदार और निर्भीक अधिवक्ता बनने की प्रेरणा भी दी।
आज भी भागलपुर और आसपास के इलाकों में उनके अदम्य साहस, निर्भीकता और न्यायप्रियता के किस्से बड़े गर्व और आदर के साथ सुने व सुनाए जाते हैं। न्याय, सत्य और साहस के इस महान योद्धा को शत-शत नमन।”
-श्री रूप कुमार, सुप्रसिद्ध अधिवक्ता एवं कानूनी सलाहकार, भागलपुर (बिहार) के फेसबुक वॉल से साभार।













