प्रसिद्ध गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता श्री राजगोपाल जी कल दोपहर में कुछ समय के लिए जब जौरा के खादी भंडार में बैठे थे तब वे कह रहे थे कि हर कोई अगर खादी का बना एक कपड़ा भी बरतने लगे तो भी खादी से जुड़े लोगों का जीवन चलता रहे।
एक जमाने में कांग्रेस अध्यक्ष रहे यू एन ढेवर को उन्होंने याद किया। ढेवर जी का पूरा नाम था उच्छरंग राय नवलशंकर ढेवर। वे खादी ग्रामोद्योग आयोग के भी अध्यक्ष रहे। एक बार उन्होंने कहा था कि लोग अगर इतना भर संकल्प कर लें कि गमछा तो खादी भंडार से ही लेंगे, तो भी खादी ग्रामोद्योग की कठिन राह आसान हो जाए।
राजगोपाल जी की प्रेरणा से एकता परिषद ने संघर्ष के साथी रहे रन सिंह परमार की याद में खादी के रूमाल को लोकप्रिय बनाने का अभियान शुरू किया है। रूमाल की शक्ल में खादी का एक छोटा सा टुकड़ा भी हमारे पास रहेगा तो बुनकरों और कत्तिनों की याद हमें दिलाता रहेगा।
कारखाने से बने कपड़ों में जो केमिकल डाई इस्तेमाल होता है उससे चमड़ी को नुकसान भी होता है। खादी इन सबसे बचाती है। त्रिवेंद्रम में एक संस्था ऐसी है खादी के अलावा और कोई कपड़ा उपयोग में ही नहीं लाती। चादर से लेकर पर्दे तक सब खादी के।
गांधीवादी अर्थशास्त्र को फ़ैलाने का काम करते रहे जे सी कुमारप्पा को याद करते हुए राजगोपाल जी बोले – ‘ मधुमक्खियां फूलों से जरा जरा सा रस लेकर शहद बनाती हैं। खादी का काम भी ऐसा ही है। ‘
डॉ. जयंत सिंह तोमर जी के फेसबुक वॉल से साभार।














