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विजय बहादुर सिंह की नई किताब ‘महाभारत : वर्ण, जाति और स्त्री’

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विजय बहादुर सिंह की नई किताब ‘महाभारत : वर्ण, जाति और स्त्री’

मृत्युंजय श्रीवास्तव

 

विजय बहादुर सिंह मूलतः कवि हैं, यह कहना उनके बहुआयामी साहित्यिक व्यक्तित्व के लिए अपर्याप्त है। वे हिंदी आलोचना की एक मूर्धन्य और विशिष्ट आवाज हैं। उन्होंने छायावादी कवियों से लेकर आधुनिक हिंदी कविता के अनेक महत्वपूर्ण रचनाकारों—प्रसाद, निराला, महादेवी वर्मा, नागार्जुन और भवानी प्रसाद मिश्र—की कविताओं की गंभीर और आलोचनात्मक पड़ताल की है।दुष्यन्त कुमार और अदम गोंडवी जैसे दुस्साहसिक प्रतिभाओं की गंभीर आलोचनात्मक पड़ताल की है । उपन्यास समीक्षा के क्षेत्र में भी उन्होंने स्वतंत्र दृष्टि अपनाते हुए उस जातीय कथा भूमि की याद दिलाई है जो केवल पश्चिम की देन नहीं है । उन्होंने नंददुलारे वाजपेयी की महत्त्वपूर्ण जीवनी ‘आलोचक का स्वदेश’लिखकर हिंदी में एक विशिष्ट योगदान दिया है।

 

ऐसे समय में विजय बहादुर सिंह ने जब चारों ओर एक प्रकार का ‘महाभारत’ मचा हुआ है महाभारत को अपने अध्ययन का विषय बनाया है। वह महाभारत, जो वैदिक और उत्तरवैदिक युग के बीच एक सेतु है; जो केवल कौरवों और पांडवों की कथा नहीं, बल्कि एक पूरे देश, समाज और कालखंड की कथा है। वह महाभारत, जिसके बारे में कहा गया है कि “जो वहां नहीं है, वह कहीं नहीं है।” वह महाभारत, जो यथार्थ का ऐसा पुराणपरक संस्करण है कि बहुचर्चित और बहुविज्ञापित जादुई यथार्थवाद भी उसके सामने फीका पड़ जाए।

 

ऐसी असंख्य वजहें हैं कि विचारक विजय बहादुर सिंह की दृष्टि व्यास-रचित महाभारत की ओर जाती है। और तब वे पाते हैं— “आज जब अपने समय के अत्यंत जटिल और परिवर्तनोन्मुख समाज को देखता हूं और महाभारतकालीन जीवन से उसकी तुलना करता हूं, तो लगता है कि मर्यादा की जड़ता और जीवन की उछाल लेती गतिशीलता का ऐसा प्रतिस्पर्धी और विस्फोटक प्रतिबिंबन वहीं है। व्यवस्था की कठोर क्रूरताएं यद्यपि वहां कम नहीं हैं, पर व्यक्तियों की अपनी विचित्रताएं और उनसे जन्म लेती विशिष्टताएं भी खूब हैं।” इसी आलोचनात्क प्राप्ति का परिणाम है उनकी सद्य: प्रकाशित पुस्तक ‘महाभारत कथा : वर्ण ,जाति एवं स्त्री ‘ । यह पुस्तक महाभारत को केवल एक महाकाव्य या मिथकीय आख्यान के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय समाज की वर्ण-व्यवस्था, जातिगत संरचना और स्त्री की स्थिति के जटिल इतिहास के रूप में देखने-समझने का एक गंभीर और विचारोत्तेजक आह्वान है।

 

हमारी चेतना पर दस्तक देते हुए लेखक ने उद्बुद्ध किया है— “महाभारतकालीन समाज को हम उत्तरवैदिक समाज कहें, या पौराणिक समाज या स्वतंत्र रूप से महाभारतकालीन समाज, इस विवाद को यहीं छोड़ते हुए यह तो सोच ही सकते हैं कि यह समाज कैसा सामाजिक जीवन जीता था। वहां वर्ण-व्यवस्था और जाति व्यवस्था क्या ठीक वैसी थी जैसी कि वैदिक काल और बाद के रामायण काल में थी? महाभारत काल में इस व्यवस्था में और अधिक कठोरता आई थी या फिर किसी तरह की उदारता ने जगह बना ली थी?”

 

इन प्रश्नों में ही इस पुस्तक की बौद्धिक बेचैनी और अनुसंधान-दृष्टि निहित है। लेखक किसी पूर्वग्रह या स्थापित निष्कर्ष से नहीं, बल्कि जिज्ञासा और ऐतिहासिक विवेक से महाभारत के समाज में प्रवेश करता है। संभव है कि इसी सरोकार ने उन्हें महाभारत के व्यापक अध्ययन के लिए आवाज लगाई हो।

 

लेखक का निष्कर्ष है कि ऋग्वैदिक समाज में वर्ण-व्यवस्था का वह कठोर और जन्मना स्वरूप नहीं था, जो आगे चलकर भारतीय समाज की पहचान बन गया। रामायण काल तक पहुंचते-पहुंचते वर्णों की सीमाएं अधिक स्पष्ट और नियंत्रित हो गईं। आरंभ में कर्माधारित रही यह व्यवस्था धीरे-धीरे जन्माधारित होती चली गई और अंततः सामाजिक गतिशीलता को सीमित करने वाली एक कठोर संरचना के रूप में स्थापित हो गई। लेखक के अनुसार महाभारत में कर्माधारित वर्ण-व्यवस्था के कुछ संकेत मिलते हैं, यद्यपि जन्माधारित वर्ण-व्यवस्था भी समानांतर रूप से मौजूद थी। अनुष्ठानों में सभी वर्णों की भागीदारी सुनिश्चित थी । मगर शूद्रों को समान अधिकार उपलब्ध नहीं थे । निषाद और रथकार के प्रति एक अलग नजरिया था । इस प्रकार महाभारतकालीन समाज एक ऐसी संक्रमणशील सामाजिक संरचना का परिचय देता है, जिसमें समानता और असमानता, लचीलापन और कठोरता—दोनों प्रवृत्तियां एक साथ विद्यमान थीं।

 

महाभारत को सीधे-सीधे स्त्री-मुक्ति का ग्रंथ नहीं कहा जा सकता। यह एक पितृसत्तात्मक समाज का महाकाव्य है, लेकिन इसके भीतर स्त्रियों की पीड़ा, प्रतिरोध, असहमति और आत्मसम्मान की शक्तिशाली अभिव्यक्ति मौजूद है।सत्यवती ने हस्तिनापुर की राजसत्ता की दिशा तय की।कुंती ने विपरीत परिस्थितियों में पांडवों को संगठित रखा।गांधारी ने पुत्रमोह और धर्म के बीच गहरे अंतर्द्वंद्व का अनुभव किया। द्रौपदी ने राजनीतिक घटनाओं को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। महाभारत में विवाह के अनेक रूप दिखाई देते हैं— स्वयंवर , गंधर्व विवाह, नियोग ,बहुपतित्व (द्रौपदी का पांच पांडवों से विवाह) और अंतर्वर्णीय विवाह ।इससे स्पष्ट है कि उस समय विवाह-संस्थाएं एकरूप नहीं थीं और सामाजिक व्यवहार में विविधता थी। महाभारत समय में स्त्रियों पर सामाजिक बंधन भी कम नहीं हैं। कन्या के विवाह का निर्णय प्रायः परिवार करता था। हालांकि स्वयंवर की परंपरा स्त्री को सीमित रूप में वर-चयन का अधिकार देती थी। स्त्री की सामाजिक पहचान पिता, पति या पुत्र से जुड़ी मानी जाती थी। बावजूद इसके कई स्त्रियां अपनी स्वतंत्र इच्छा और निर्णय-क्षमता का परिचय देती हैं।

 

विजय बहादुर सिंह की पुस्तक ‘महाभारत : वर्ण, जाति और स्त्री’ महाभारत के आधुनिक पुनर्पाठ की उस समृद्ध परंपरा का विस्तार है, जिसके विविध स्वर चिंतामणि विनायक वैद्य, वासुदेव शरण अग्रवाल, इरावती कर्वे, के. एम. मुंशी,बुद्धदेव बसु, विद्यानिवास मिश्र के साथ उन अनेक अतिख्यात पुराविदों और कोशाम्बी, रोमिला थापर आदि इतिहासकारों, समाज विज्ञानियों और धर्मशास्त्र का इतिहास लेखन करने वाले महामहोपाध्याय भारत रत्न काणे महोदय के कथनों से अपने लेखन को प्रामाणिकता दी है । अध्यायों की संदर्भ सूची यह बताने को पर्याप्त है कि अपने निष्कर्षों तक पहुंचने से पूर्व उन्होंने तथ्यों की कितनी बहुविधि जांच पड़ताल की है.

 

विजय बहादुर सिंह इन विविध परंपराओं से संवाद करते हुए महाभारत को वर्ण, जाति और स्त्री के प्रश्नों के माध्यम से पुनर्पाठित करते हैं। उनके लिए महाभारत केवल राजवंशों के संघर्ष का आख्यान नहीं है, बल्कि सामाजिक सत्ता-संबंधों, असमानताओं, वर्चस्व और प्रतिरोध की जटिल प्रक्रियाओं का भी महाग्रंथ है। इस दृष्टि से उनकी यह पुस्तक महाभारत के सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्पाठ की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सिद्ध होती है, जो प्राचीन आख्यान को समकालीन विमर्शों से जोड़ते हुए नए प्रश्नों और नई संभावनाओं का उद्घाटन करती है।

 

विजय बहादुर सिंह की यह पुस्तक महाभारत को केवल अतीत के एक महाकाव्य के रूप में नहीं रखती , बल्कि उसे भारतीय समाज की निर्मिति, उसके अंतर्विरोधों और उसके दीर्घकालिक सांस्कृतिक प्रभावों के एक जीवंत दस्तावेज के रूप में देखने का आग्रह करती है। वर्ण, जाति और स्त्री जैसे प्रश्नों के माध्यम से लेखक महाभारत के भीतर छिपे उन सामाजिक तनावों को सामने लाता है, जो आज भी भारतीय समाज में अनेक स्तरों पर सक्रिय हैं। पुस्तक का महत्व इस बात में है कि वह महाभारत को श्रद्धा और संशय, दोनों दृष्टियों से एक साथ देखती है। वह न तो उसे केवल धर्मग्रंथ मानकर उसकी आलोचनात्मक जांच से बचती है और न ही उसे मात्र मिथकीय आख्यान समझकर उसके सांस्कृतिक प्रभाव को कम करके आंकती है। इस प्रकार यह पुस्तक महाभारत के आधुनिक पुनर्पाठ की परंपरा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है, जो पाठक को प्राचीन आख्यान के भीतर समकालीन समाज की अनेक गूंजें सुनने के लिए प्रेरित करती है।

 

पुस्तक की एक बड़ी विशेषता इसका व्यापक स्रोत-सामग्री पर आधारित होना है। विजय बहादुर सिंह ने चिंतामणि विनायक वैद्य, वासुदेव शरण अग्रवाल, बुद्धदेव बसु, इरावती कर्वे, विद्यानिवास मिश्र, पाण्डुरंग वामन काणे, डी. डी. कोसांबी, रामशरण शर्मा और रोमिला थापर सहित अनेक इतिहासकारों, पुराविदों और समाजचिंतकों के विचारों से संवाद स्थापित किया है। प्रत्येक अध्याय की संदर्भ-सूची इस बात का प्रमाण है कि उनके निष्कर्ष व्यापक अध्ययन और बहुआयामी तथ्य-परीक्षण पर आधारित हैं।

 

विजय बहादुर सिंह इन विविध परंपराओं से संवाद करते हुए महाभारत को वर्ण, जाति और स्त्री के प्रश्नों के माध्यम से पुनर्पाठित करते हैं। उनके लिए महाभारत केवल राजवंशों के संघर्ष का आख्यान नहीं है, बल्कि सामाजिक सत्ता-संबंधों, असमानताओं, वर्चस्व और प्रतिरोध की जटिल प्रक्रियाओं का भी महाग्रंथ है। इस दृष्टि से उनकी यह पुस्तक महाभारत के सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्पाठ की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सिद्ध होती है, जो प्राचीन आख्यान को समकालीन विमर्शों से जोड़ते हुए नए प्रश्नों और नई संभावनाओं का उद्घाटन करती है।

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