शिक्षा, सेवा और सर्वोदय के अग्रदूत
आज मैं एक ऐसे शख्सियत को याद करने जा रहा हूं जो शिक्षा, सेवा और सर्वौदय के अग्रदूत थे और मेरे नाना भी।
बिहार की पावन और ऐतिहासिक धरती कोसी अंचल सदा से संघर्षों, जनक्रांतियों और त्याग की भूमि रही है। मधेपुरा की माटी ने ऐसे अनेक सपूतों को जन्म दिया जिन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं को तिलांजलि देकर समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के जीवन को संवारने का कार्य किया। ऐसे ही महान विभूतियों में एक अग्रगण्य नाम है— सियाराम मंडल। वे एक युगद्रष्टा, त्यागी, स्वतंत्रता-युगीन मूल्यों के वाहक और सच्चे जनसेवक थे। उनका संपूर्ण जीवन ग्रामीण भारत में शिक्षा के प्रसार, सर्वोदय दर्शन और निःस्वार्थ लोकसेवा का अनुपम उदाहरण है।
सियाराम मंडल का जन्म 18 फरवरी 1884 को मधेपुरा के सिंहेश्वर प्रखंड के जगवनी गांव के प्रतिष्ठित और संभ्रांत परिवार में हुआ था। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में जब समूचा भारत ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी और सामाजिक विषमताओं से जूझ रहा था, उस दौर में उन्होंने समाज की नब्ज को पहचाना। ग्रामीण अंचल में अज्ञानता, अशिक्षा और संसाधनों के अभाव को देखकर उनके मन में बचपन से ही जनसेवा का बीज अंकुरित हुआ। सादा जीवन, उच्च विचार और परोपकार उनके स्वाभाविक गुण थे, जिसने आगे चलकर उन्हें एक बाबाजी के रूप में स्थापित किया। उन्होंने फलाहारी और दुध मिसरी उनका मुख्य आहार था। कालांतर में उनके ही प्रेरणा से श्रद्धेय कीर्ति नारायण मंडल ने भी अन्न विहीन आहार लेने की आदत लगाई।
1960 का ऐतिहासिक कदम स्वंतंत्रता प्राप्ति के बाद देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती ग्रामीण आबादी तक ज्ञान की रोशनी पहुँचाने की थी। उस समय कोसी क्षेत्र बाढ़, गरीबी और अशिक्षा के त्रिकोण में फंसा हुआ था। साधनहीन और मेधावी बच्चों के लिए आगे की पढ़ाई एक स्वप्न के समान थी। सियाराम मंडल जी यह भली-भांति समझते थे कि जब तक कलम और किताब किसान व मजदूर के बच्चों के हाथ में नहीं आएगी, तब तक वास्तविक आजादी अधूरी रहेगी।
इसी दूरदर्शी सोच के साथ, 1960 के दशक में उन्होंने जगबनी (मधेपुरा) और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी शिक्षा के विस्तार का बीड़ा उठाया। उन्होंने मिडिल स्कूल और हाई स्कूल स्तर की शिक्षा को सुलभ बनाने के लिए निजी संसाधनों और जनसहयोग से शिक्षण संस्थानों की नींव रखी।
उनकी इसी संकल्पशक्ति का परिणाम आज ‘सियाराम उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, जगबनी (मधेपुरा)’ के रूप में जीवंत है। इस विद्यालय की स्थापना का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि कोई भी मेधावी बालक या बालिका केवल गरीबी अथवा दूरी के कारण पढ़ाई से वंचित न रहे।
सुलभ और समतामूलक शिक्षा: उन्होंने विद्यालय संचालन में सदैव यह ध्यान रखा कि शिक्षा का वातावरण भेदभावमुक्त हो। उन्होंने गरीब छात्रों के लिए अध्ययन सामग्री और आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था की, जिससे उस दौर में अनेक प्रथम-पीढ़ी के शिक्षार्थियों ने अपनी पढ़ाई पूरी की और भविष्य में आत्मनिर्भर बने।
भूदान आंदोलन और अतुलनीय भूमि दान: सर्वोदय दर्शन का साक्षात रूप
महात्मा गांधी के ग्राम-स्वराज और समानता के विचारों को स्वतंत्रता के बाद यदि किसी ने धरातल पर उतारा, तो वे संत विनोबा भावे थे। 1950 के दशक में जब विनोबा भावे ने ‘भूदान आंदोलन’ का आह्वान किया, तो इसका मूल भाव यही था कि भूमि का स्वामित्व समाज के हित में पुनर्वितरित हो और भूमिहीनों को गरिमापूर्ण जीवन मिले।
सियाराम मंडल जी विनोबा भावे के इस अहिंसक सामाजिक क्रांति से अत्यधिक प्रभावित हुए। वे केवल सिद्धांतों के प्रचारक नहीं, बल्कि व्यवहार के धनी थे। जब समाज में जमीनों को लेकर संघर्ष और कानूनी मुकदमे आम बात थे, उस दौर में सियाराम जी ने एक मिसाल पेश की।
भूमि का स्वेच्छा से दान : उन्होंने अपनी निजी मिल्कियत की कई एकड़ उपजाऊ भूमि भूदान आंदोलन को सहर्ष समर्पित कर दी।
भूमिहीनों का सशक्तिकरण : इस दान से प्राप्त भूमि को क्षेत्र के उन अत्यंत निर्धन, दलित और भूमिहीन परिवारों में वितरित किया गया, जिनके पास सिर छिपाने या आजीविका का कोई साधन नहीं था।
उनके इस कदम ने तत्कालीन समाज में संपत्ति के प्रति मोह को तोड़ा और त्याग का एक नया मानक स्थापित किया। उनका यह कार्य गांधीवादी ‘ट्रस्टीशिप’ (अमानतदारी) के सिद्धांत का साक्षात प्रकटीकरण था।
राजनीतिक शुचिता और कांग्रेस प्रखंड अध्यक्ष के रूप में जनसेवा
सियाराम मंडल जी के लिए राजनीति सत्ता हासिल करने का जरिया नहीं, बल्कि दीन-दुखियों की सेवा का एक साधन थी। वे लंबे समय तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े रहे और प्रखंड अध्यक्ष के रूप में संगठन व समाज की सेवा की।
गांधीवादी मूल्यों की राजनीति: उनका राजनीतिक आचरण पूरी तरह सादगी और शुचिता पर आधारित था। वे खादी, स्वदेशी और नैतिक आचरण के पक्के पैरोकार थे।
प्रखंड अध्यक्ष के पद पर रहते हुए उन्होंने ग्रामीणों के हक के लिए सरकारी तंत्र से निरंतर संवाद स्थापित किया। नहर, सड़क, पेयजल और किसानों से जुड़े मुद्दों को वे निर्भीकता से उठाते थे।
उन्होंने समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने की संस्कृति विकसित की। उनके दरवाजे हर जाति, वर्ग और संप्रदाय के व्यक्ति के लिए 24 घंटे खुले रहते थे। ग्रामीण विवादों को वे बिना अदालत गए, आपसी सहमति और न्यायपूर्ण तरीके से सुलझाने में पारंगत थे।
श्वेत वस्त्र, सौम्य मुस्कान और धवल दाढ़ी वाला उनका व्यक्तित्व पहली नजर में ही श्रद्धा और आदर का भाव जगा देता था। वे अहंकार से कोसों दूर थे। उनकी वाणी में कोसी की माटी की मिठास और हृदय में समूचे समाज के प्रति अपार करुणा थी। वे स्वयं भौतिक विलासिता से दूर रहते हुए दूसरों के कल्याण के लिए सतत प्रयत्नशील रहते थे।
अलौकिक संयोग रहा कि उनका जन्म और निर्वाण का पावन दिन समान रहा। सियाराम मंडल जी के जीवन का एक दुर्लभ और आध्यात्मिक संयोग यह रहा कि उनका जन्म और देहावसान एक ही तारीख को हुआ:
पूरे 85 वर्षों (जन्म तिथि: 18 फरवरी 1884 से पुण्य तिथि: 18 फरवरी 1969) की एक गौरवशाली, सार्थक और कर्मठ जीवन-यात्रा पूरी करने के बाद 18 फरवरी 1969 को उन्होंने इस नश्वर संसार से विदा ली। उनका जीवन-चक्र जिस तिथि से आरंभ हुआ, उसी तिथि पर पूर्णता को प्राप्त हुआ, मानो प्रकृति ने भी उनके इस संतुलित और निष्कलंक जीवन पर अपनी विशिष्ट मोहर लगाई हो।
सियाराम मंडल जी की विरासत और आज की प्रासंगिकता
वर्तमान समय में जब शिक्षा का बाजारीकरण हो रहा है और राजनीति में नैतिक मूल्यों का ह्रास देखने को मिलता है, स्व. सियाराम मंडल जी का जीवन और उनके आदर्श और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं।
उनका स्थापित किया गया विद्यालय आज भी मधेपुरा के सैकड़ों युवाओं के भविष्य को संवार रहा है। उस संस्थान में मुझे भी पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और संस्थान से पढ़कर निकले विद्यार्थी विभिन्न क्षेत्रों में प्रोफेसर , डॉक्टर, इंजीनियर शिक्षक बनकर देश व समाज की सेवा कर रहे हैं।
अपनी निजी जमीन को जनहित में दान कर देना आज के भौतिकतावादी युग में एक काल्पनिक कथा जैसा लग सकता है, किंतु सियाराम बाबाजी ने इसे यथार्थ बनाकर दिखाया।
वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के लिए एक संस्था थे। मधेपुरा और जगबनी की जनता आज भी बाबाजी के त्याग, उनकी उदारता और उनके निस्वार्थ योगदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण करती है।
सियाराम मंडल जी कोसी क्षेत्र के उन अमिट दीपकों में से हैं, जिनकी रोशनी समय बीतने के साथ धुंधली नहीं पड़ती, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को निःस्वार्थ सेवा, शिक्षा के प्रसार और सामाजिक समरसता के मार्ग पर चलने की निरंतर प्रेरणा देती रहती है।
-प्रो. नरेश कुमार, अध्यक्ष, विश्वविद्यालय रसायनशास्त्र विभाग, बीएनएमयू, मधेपुरा के फेसबुक वॉल से साभार।














