पुस्तक-चर्चा-१
(नवचार्वाककारिकावली)
अपने यहाँ संस्कृत और उससे सम्बन्धित ज्ञान परम्परा, जिसे भारतीय ज्ञानपरम्परा कहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, पर कितने ही उल्लेखनीय ग्रन्थ लिखे जा रहे हैं। इन ग्रन्थों के अवलोकन से भारत के विशाल स्वरूप के विविध आयामों के दर्शन होते हैं जिन्हें हम अन्यथा-केवल अपने तर्क के घोड़े दौड़ाने से नहीं जान पाते हैं- “कुतो वा शक्यमुन्नेतुं स्वतर्कमनुधावता” (भर्तृहरि)।
तीन साल देश से बाहर ईरान रहने के दौरान जो महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ अपने यहाँ प्रकाशित हुए उन्हें मैं देख नहीं पाया। मिलने पर भी समयाभाव से नाते उनकी चर्चा नहीं हो पायी। अच्छी पुस्तकों का अधिकार है कि उनका नाम लिया जाये, उनकी चर्चा हो। इससे विमर्श-विशेष का प्रचार करने वाली एकांगी पुस्तकों का हतोत्साहन भी होता है। ये किताबें छूटती हुई ट्रेनें हैं जिन्हेँ दौड़कर पकड़ लेना चाहिए। बहुत बार “ठीक से पढ़कर कुछ लिखने” के लोभ या बहाने से देर हो जाती हैं। जिनकी करणीय कार्यों में देर की जाती है उनका रस सूख जाता है। वह रस कहाँ जाता है? सूक्ति कहती है- समय ही पी लेता है उनके रस को- “आदानस्य प्रदानस्य कर्तव्यस्य च कर्मणः। क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम्॥”
तो मैं इन ट्रेनों पर दौड़कर चढने की कोशिश कर रहा हूँ, और जो भी इनके बारे में प्रथमदृष्ट्या समझा है, अध्येताओं से साझा करना उचित समझता हूँ।
इस चर्चा शृंखला की पहली पुस्तक २०२३ में छपी “नवचार्वाककारिकावली” है। इसके रचयिता भारतीय दर्शन परम्परा में परिनिष्ठित यविष्ठ वाराणसेय विद्वान् प्रो. सच्चिदानन्द मिश्र हैं। यह ग्रन्थ अपने आप में एक शास्त्र है। संस्कृत की परिनिष्ठित शास्त्र शैली में रचित २८५ कारिकाएँ हैं और उनपर ग्रन्थकार की विशद वृत्ति है। चार्वाक दर्शन हर समय में और हर भूगोल में सबसे अधिक फैला दर्शन रहा है , इसीलिए तो इसे ‘लोकायत’ कहते हैं। जो लोग अन्यान्य सम्प्रदायों और आस्तिक दीखने वाले मतवादों से अपनी सम्बद्धता का दावा करते हैं, वे भी गुप्त या स्पष्ट रूप से लोकायती होते हैं। व्यावहारिकता इसकी बड़ी विशेषता है। इस दर्शन का अपना सुदृढ नैतिक आसन है। इसके प्रथम प्रवक्ता बृहस्पति माने गये हैं। इसलिए इस ग्रन्थ का अपर नाम “अभिनवबार्हस्पत्य दर्शन” है। यह ग्रन्थ उस चार्वाक दर्शन का प्रस्थानीकरण करता है सभी दर्शन जिसका केवल खण्डन के लिए उपयोग करते हैं। कोई नहीं जानता कि चार्वाक मत के लोग उठकर उन खण्डनों का उत्तर क्या देते रहे होंगे? लेखक शास्त्रीय शैली में चार्वाकों के मूक स्वर को पुरस्कृत करते हैं। ग्रन्थ में चार्वाक के मन्तव्यों का विशदीकरण किया गया है। उन मन्तव्यों के अन्य दार्शनिकों द्वारा किये गये खण्डनों में जो दोष हैं उन्हें भी दिखाया गया है जिससे चार्वाकों के तर्कों का ‘प्रतिप्रसव’ हुआ है और वे फिर उठ खड़े हुए हैं। इतना ही नहीं, अन्यान्य दर्शनों के सिद्धान्तों का चार्वाक मत के आलोक में खण्डन भी किया गया है। इसके लिए ग्रन्थ में लेखक ने चार्वाक दर्शन के छूटे-छिटके मूल तर्कों का संकलन तो किया ही है साथ ही साथ उनके पक्ष में अनेक सिद्धान्तों का पल्लवन भी किया गया है। इससे चार्वाक का स्वर (कम से कम) प्रबल पूर्वपक्षी के रूप में फिर से बुलन्द हो उठा है। यह पुस्तक अन्य दर्शनों को पुनः एक आह्वान देती है कि वे अपने तर्कों को और तीखा बनायें। खण्डन-मण्डन की इस प्रक्रिया से अंततः भारतीय विचार पद्धति का लाभ होता है।
संस्कृत का यह स्वभाव रहा है कि उसमें अनेक ज्ञानधाराएँ परिपोष पाती रही हैं। सभ्यता के बीजों को सुरक्षित रखने का कार्य संस्कृत के माध्यम से होता रहा है। संस्कृत में रचित वाङ्मय में भारतीय ज्ञान परम्परा के महत्त्वपूर्ण तत्त्व सुरक्षित हैं। इनमें से बहुतों की अभिव्यक्ति पहली बार संस्कृत में हुई। साथ ही सजातीय–विजातीय भाषिक परम्पराओं से लाकर दूसरी बहुत सारी सामग्रियाँ भी इसमें एकत्र कर दी गयीं। भारत के लोक तथा शास्त्र दोनों परम्पराओं को अबूझ होने से बचाने का और उन्हें सदियों तक सुरक्षित रखने का काम संस्कृत के माध्यम से होता रहा है। यह पुस्तक इस तथ्य का बहुत उज्ज्वल उदाहरण है। प्रो. मिश्र की कारिकाएँ सुगठित हैं जिसमें प्राचीन शास्त्रकारों की सुगन्ध आती है। मैं तो उनकी निम्नोक्त कारिका में अनायास आये निदर्शना अलंकार से रीझ गया। बौद्धों का खण्डन करते हुए चार्वाकाचार्य कहते हैं –
आत्मदृष्टिं निराकृत्य पुनर्जन्मादिकल्पना।
षण्डमुद्वाह्य कन्यायाः सन्ततीच्छैव केवलम्॥
[= आत्मा का खण्डन करके पुनर्जन्म आदि की बौद्धों की कल्पना ऐसी ही है जैसे कोई कुवाँरी कन्या विवाह तो नपुंसक से कर ले और सन्तानों का सपना देखती रहे। ]
प्रो. मिश्र नैयायिक के रूप में प्रसिद्ध हैं। नैयायिक ईश्वरवाद के सबसे प्रबल समर्थक रहे हैं। वे “चैतन्य जड से उत्पन्न होता है” ऐसा उद्घोष करने वाले चार्वाक दर्शन के शास्त्रीकरण में कोई गुरेज़ नहीं रखते। भारत और इसकी संस्कृत भाषा तो ईश्वर की वह पौधशाला है जिसमें वह भविष्य में उत्पन्न होने वाली सभ्यताओं के बीज और पौधे तैयार करता है और उन्हें सुरक्षित रखता है।
प्रो. मिश्र को बधाई एक श्लोक के साथ –
सच्चिदानन्दरूपोऽपि मिश्रः, नैयायिकोऽपि सन्।
समदृभ्नात् स्वमाहात्म्यात् नवचार्वाककारिकाः॥
भारतीय ज्ञान परम्परा के परिनिष्ठित विद्वान् प्रिय मित्र बलराम शुक्ल जी के फेसबुक वॉल से साभार













