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बिपन चंद्र के बारे में सोचते हुए

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[ यह बिपन चंद्र का मूल्यांकन परक आलेख नहीं है । उनके बारे में एक क्रिटिकल आलेख भी अलग से लिखा जा सकता है । इस समय अतीत के सभी महत्त्वपूर्ण में से जो कुछ अच्छा है उससे सीखने की कोशिश पर ज़ोर देने की ज़रूरत पर बल देना ज़रूरी लगता है । हमलोग राजनीतिक लोग नहीं हैं और किसी युद्ध में आर या पार की लड़ाई में नहीं लगे हैं । जो लोग इस भाव से लगे हैं उनके प्रति असम्मान नहीं रखता , लेकिन अपना वह रास्ता नहीं है । जो कुछ अच्छा है उसे बचाकर रखना है, हर किसी से सीखना है वाला भाव बचा रहेगा तो ही भारतीयता बची रहेगी ।]

 

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बिपन चंद्र के बारे में सोचते हुए

हितेंद्र पटेल

बिपन चंद्र को मैंने पहली बार 1991 में देखा था। एक सेमेस्टर उनकी कक्षाओं में बैठा और उन्हें सुनने का शायद ही कोई अवसर छोड़ा। कक्षा के भीतर और बाहर, कुल मिलाकर कम-से-कम बीस बार उन्हें सुनने का मौका मिला। निकट परिचय की अवधि वस्तुतः 1991-92 के दो वर्षों तक ही सीमित थी; कक्षा के बाहर उनसे कुल पाँच-छह बार संक्षिप्त बातचीत हुई और केवल एक बार कक्षा में कुछ लंबा संवाद हुआ। फिर भी आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि इतिहास पढ़ना शुरू करने के समय से ही मैं उनके संपर्क में रहा हूँ। उनके निधन के बाद जब कई जगहों पर उनके बारे में बोलने के लिए बुलाया गया, तब पहली बार ठीक से अनुभव हुआ कि मैं उनके काम और व्यक्तित्व के बारे में लगातार सोचता रहा हूँ। कुछ अध्यापक हमारे जीवन में अपने साथ बिताए समय से अधिक बड़ी उपस्थिति बन जाते हैं। बिपन ऐसे ही अध्यापक थे।

उनके निधन के बाद बार-बार कहा गया कि वे मार्क्सवादी इतिहासकार थे। यह परिचय गलत नहीं है, पर अपने-आप में अधूरा अवश्य है। एक प्रसिद्ध इतिहासकार ने यह भी लिख दिया कि कम्युनिस्ट होने के कारण उन्हें अमेरिका में कठिनाइयाँ हुईं और इसीलिए भारत लौटना पड़ा। यह बात मुझे असुविधाजनक लगी। मैंने एक मित्र से सही जानकारी माँगी। उन्होंने कृपा करके बिपन के अप्रकाशित आत्मकथात्मक लेखन का एक अंश भेजा। उसे पढ़ते हुए समझ में आया कि हम जैसे विद्यार्थियों के मन में उनके प्रति आदर केवल उनकी इतिहासकार वाली उपलब्धियों के कारण नहीं था। उनके व्यक्तित्व, सामाजिक अनुभव और अध्यापन के ढंग में कुछ ऐसा था जो उन्हें अनेक बड़े विद्वानों से अलग करता था। उनकी बौद्धिक यात्रा को किसी तैयार राजनीतिक लेबल में बंद कर देना इसलिए कठिन है। वे मार्क्सवाद से निकले थे, पर उसका अर्थ उनके लिए किसी पार्टी की हर सामयिक स्थापना को इतिहास में उतार देना नहीं था। राष्ट्रवाद की उनकी व्याख्या बदली, गांधी को समझने का उनका ढंग बदला और स्वतंत्र भारत की राजनीति पर उनकी राय भी विवादों से गुजरती हुई बनी। इन परिवर्तनों को अवसरवाद कह देना आसान है; उन्हें बिपन की बौद्धिक बेचैनी और भारतीय अनुभव से सिद्धांत को परखने की आदत के भीतर समझना अधिक उपयोगी है।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने लोकतांत्रिक अकादमिक संस्कृति के निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई, किंतु यह भी सच है कि उसके कुछ विभागों में एक खास किस्म का अभिजनवाद प्रभावी था। इतिहास विभाग भी इससे पूरी तरह मुक्त नहीं था। जिन विद्यार्थियों की अंग्रेजी कमजोर थी, उनके लिए प्रवेश पाना कठिन होता था और प्रवेश मिल जाने पर भी कई प्रतिष्ठित अध्यापकों के दरवाजे उनके लिए आसानी से नहीं खुलते थे। भाषा, क्षेत्र और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के आधार पर अदृश्य समूह बनते थे। बंगाल और दक्षिण भारत से आए अनेक छात्र अंग्रेजी और अकादमिक व्यवहार में अपेक्षाकृत सहज थे; बिहार और हिंदी क्षेत्र के छोटे शहरों से आने वाले विद्यार्थियों की स्थिति प्रायः अधिक कठिन होती थी। उनमें से बहुतों के बारे में पहले ही मान लिया जाता था कि वे इतिहास पढ़ने से अधिक सिविल सेवा की तैयारी के लिए आए हैं।

इस वातावरण में मैंने पाया कि हिंदी क्षेत्र और अपेक्षाकृत साधारण सामाजिक पृष्ठभूमि के कई विद्यार्थी बिपन अथवा उनके निकट के शिक्षकों के साथ काम करते थे। बाद में भगवान जोश जैसे अध्यापक, जिन्होंने स्वयं बिपन के निर्देशन में शोध किया था, ऐसे विद्यार्थियों के सहायक बने। विभाग में एक ‘वर्नाकुलर’ और एक ‘एलिट’ विभाजन कमोबेश मौजूद था, भले ही वह बाहर से साफ दिखाई न देता हो। बिपन पहले संसार के साथ खड़े दिखाई देते थे। वर्षों बाद अनेक लोगों से सुना कि यदि बिपन न होते तो वे इतिहासकार नहीं बन पाते। हैदराबाद के एक अत्यंत सम्मानित प्राध्यापक, जो गरीब किसान परिवार से आए थे, ने मुझसे कहा कि वे इतिहास के क्षेत्र में केवल इसलिए प्रवेश कर सके और टिक सके क्योंकि उन्हें बिपन जैसे शिक्षक मिले। इलाहाबाद से आए एक विद्यार्थी का प्रसंग भी सुनने में आया। वह प्रवेश-साक्षात्कार में न ठीक से अंग्रेजी बोल पा रहा था, न समझ पा रहा था। बिपन ने उसकी आँखों की चमक देखी और खराब साक्षात्कार के बावजूद उसे चुनने पर बल दिया। उसी विद्यार्थी ने बाद में अपने सत्र में सबसे अधिक अंक प्राप्त किए। ये प्रसंग बिपन के बारे में प्रचलित आत्मीय स्मृतियों का हिस्सा हैं; इनका महत्त्व इस बात में है कि वे उस शिक्षक की पहचान कराते हैं जो भाषा की असुविधा के पीछे छिपी मेधा को देख सकता था।

बिपन के अपने विद्यार्थी जीवन का एक प्रसंग इस संवेदनशीलता की पृष्ठभूमि समझाता है। जिस कॉलेज में वे पढ़ते थे वहाँ संपन्न परिवारों के अंग्रेजी बोलने वाले विद्यार्थियों का प्रभाव था, जबकि वे अंग्रेजी में सहज नहीं थे। एक अनुशासनप्रिय शिक्षक ने देखा कि वे पास बैठे सहपाठी से लगातार फुसफुसा रहे हैं। पूछने पर पता चला कि वे अपने सहपाठी से कह रहे थे कि वह उनकी ओर से अंग्रेजी में प्रश्न पूछ दे; स्वयं प्रश्न करने में उन्हें संकोच था। शिक्षक ने उन्हें हिंदी में पूछने की अनुमति दी। संभव है कि इस अनुभव ने उनमें उन विद्यार्थियों के प्रति विशेष सहानुभूति पैदा की हो जिनकी बौद्धिक क्षमता उनकी अंग्रेजी से बड़ी होती है। बिपन अंग्रेजी-विरोधी नहीं थे; उनका लगभग समूचा महत्त्वपूर्ण इतिहास-लेखन अंग्रेजी में है। लेकिन वे भाषा के प्रभुत्व और ज्ञान की क्षमता को एक वस्तु नहीं मानते थे। भारतीय विश्वविद्यालयों में यह भेद आज भी पूरी तरह समझा नहीं गया है।

उनके अध्यापन में प्रश्न और संवाद का केंद्रीय स्थान था। सहयोगियों और विद्यार्थियों की स्मृतियाँ बताती हैं कि वे निजी तथा आसपास के प्रसंगों को व्याख्यान में इस तरह ले आते थे कि औपचारिक कक्षा भी बातचीत जैसी लगती थी। उनके कई सहकर्मी व्यक्तिगत बातों को कक्षा से बाहर रखते थे; बिपन के यहाँ जीवन और इतिहास के बीच की दीवार इतनी कठोर नहीं थी। उनकी कक्षाएँ कई-कई घंटे चल सकती थीं। जेएनयू की ट्यूटोरियल प्रणाली ने शिक्षक और विद्यार्थियों को बिना घड़ी की चिंता के बहस करने का अवसर दिया। इस व्यवस्था ने विद्यार्थियों को केवल जानकारी नहीं दी, उन्हें तर्क करना, असहमति प्रकट करना और अपने कथन के लिए प्रमाण जुटाना सिखाया। विश्वविद्यालय की आरंभिक कल्पना में कुलपति और चपरासी के साथ बैठकर चाय पी सकने जैसी समानतामूलक संस्कृति की बात भी थी। बिपन ने अपने संस्मरण में इसका उल्लेख किया है और साथ ही उस आदर्श के अधूरा रह जाने की विडंबना भी दर्ज की है।

इन दिनों कभी-कभी कहा जाता है कि जेएनयू की स्थापना का प्रधान उद्देश्य सरकार द्वारा पढ़े-लिखे लोगों को अपने प्रभाव में लेना था। राज्य और बौद्धिक वर्ग के संबंध का प्रश्न निस्संदेह महत्त्वपूर्ण है, किंतु यह व्याख्या अधूरी है। स्वतंत्र भारत में विद्वानों को एक लोकतांत्रिक वातावरण देना, अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा तक पहुँचाना और विषय, समाज तथा समकालीन राजनीति के बीच संबंध बनाने की जगह तैयार करना भी इस प्रयोग का हिस्सा था। भारत 1947 में राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हुआ, पर बौद्धिक और अकादमिक स्वतंत्रता की वास्तविक परिस्थितियाँ अपने-आप पैदा नहीं हो गईं। विश्वविद्यालयों के बीच संसाधन, प्रतिष्ठा और अभिव्यक्ति की असमानता आज भी इतनी गहरी है कि लखनऊ, राँची, भोपाल या जयपुर में काम करने वाले विद्वान के लिए राष्ट्रीय अथवा अंतरराष्ट्रीय विमर्श में उसी स्वतंत्रता और प्रभाव के साथ हस्तक्षेप करना कठिन हो सकता है जो किसी प्रसिद्ध पश्चिमी विश्वविद्यालय में स्थित विद्वान को उपलब्ध है। जेएनयू के इतिहास अध्ययन केंद्र का महत्त्व यह था कि उसने भारत के विश्वविद्यालयों में पढ़े और शोध किए लोगों को साथ लेकर आधुनिक इतिहास के अध्ययन का प्रभावशाली केंद्र बनाया। बिपन इस सामूहिक उपक्रम के केंद्रीय व्यक्तित्वों में थे।

बिपन की पुस्तकों की सूची देना इस लेख का उद्देश्य नहीं है, फिर भी उनके बौद्धिक विकास को समझे बिना व्यक्ति और शिक्षक की चर्चा अधूरी रहेगी। उनकी आरंभिक और अब भी सबसे टिकाऊ कृतियों में द राइज़ एंड ग्रोथ ऑफ इकोनॉमिक नेशनलिज्म इन इंडिया है। इस पुस्तक ने दिखाया कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध के आरंभिक राष्ट्रवादी केवल याचना करने वाले नरमपंथी नहीं थे; उन्होंने औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था, धन-निष्कासन, विदेशी पूँजी, मुक्त व्यापार और भारतीय उद्योगों के प्रश्न पर एक व्यवस्थित आर्थिक आलोचना विकसित की। बिपन का योगदान उन विचारों को केवल व्यक्तियों की सूझ के रूप में देखने के बजाय औपनिवेशिक शासन की आलोचना और आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद के निर्माण के बीच संबंध स्थापित करने में था। इस अध्ययन में वर्ग और आर्थिक संरचना की मार्क्सवादी चिंता थी, लेकिन साथ ही राष्ट्रवादी विचार की स्वायत्तता के लिए भी जगह थी। उनके बाद के काम की दिशा इसी तनाव से निकली।

सत्तर के दशक से सांप्रदायिकता उनकी प्रमुख चिंताओं में आ गई। कम्युनलिज्म इन मॉडर्न इंडिया में उन्होंने सांप्रदायिकता को केवल धार्मिक कट्टरता, दंगे अथवा दो समुदायों के पारस्परिक वैमनस्य के रूप में नहीं देखा। उनके लिए वह एक आधुनिक राजनीतिक विचारधारा थी, जो यह मानती है कि एक धर्म को मानने वाले लोगों के सांसारिक, आर्थिक और राजनीतिक हित मूलतः समान हैं और दूसरे धर्मावलंबियों के हितों से अनिवार्यतः भिन्न अथवा विरोधी हैं। इस व्याख्या की शक्ति यह थी कि उसने धर्म और सांप्रदायिकता को अलग किया तथा दिखाया कि आधुनिक संस्थाएँ, प्रतिनिधित्व की राजनीति, औपनिवेशिक नीतियाँ और मध्यवर्गीय प्रतिस्पर्धाएँ धार्मिक पहचान को राजनीतिक समुदाय में बदल सकती हैं। इसकी सीमा यह थी कि कई बार जाति, स्थानीय समाज, धार्मिक अनुभव और अलग-अलग समुदायों के भीतर की असमानताओं को वह वैसी स्वतंत्र विश्लेषणात्मक जगह नहीं दे पाती थी जिसकी बाद के इतिहास-लेखन ने माँग की। फिर भी सांप्रदायिकता को विचारधारा के रूप में समझने का उनका आग्रह आज भी अत्यंत उपयोगी है।

राष्ट्रीय आंदोलन पर उनकी परिपक्व स्थापना ने अधिक विवाद पैदा किया। उन्होंने गांधी और कांग्रेस को बुर्जुआ नेतृत्व कहकर खारिज करने वाली यांत्रिक मार्क्सवादी व्याख्या से दूरी बनाई। अस्सी के दशक के मध्य तक वे ग्राम्शी की ‘हेजेमनी’ और ‘वार ऑफ पोजीशन’ जैसी अवधारणाओं की सहायता से राष्ट्रीय आंदोलन को एक दीर्घकालीन संघर्ष के रूप में पढ़ने लगे थे। उनकी दृष्टि में औपनिवेशिक राज्य केवल प्रत्यक्ष दमन पर टिका राज्य नहीं था; वह सीमित सहमति और वैधानिकता भी उत्पन्न करता था। इसीलिए उसके विरुद्ध संघर्ष केवल एक निर्णायक विद्रोह या सत्ता पर आकस्मिक धावे से सफल नहीं हो सकता था। गांधी के नेतृत्व में आंदोलन ने जनसाधारण को राजनीतिक बनाया, औपनिवेशिक शासन की वैधता को क्रमशः कमजोर किया, संघर्ष और विराम की लय के माध्यम से संगठन की शक्ति बचाए रखी और स्वतंत्रता के विचार को विस्तृत सामाजिक स्वीकृति दी। इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेंडेंस इसी दृष्टि का सर्वाधिक लोकप्रिय रूप बना। इससे राष्ट्रीय आंदोलन का एक व्यापक और सुसंगत आख्यान तैयार हुआ, लेकिन आलोचकों ने उचित रूप से पूछा कि क्या इस ढाँचे में कांग्रेस के बाहर की धाराओं, दलित राजनीति, अनेक क्षेत्रीय आंदोलनों, मुस्लिम राजनीतिक अनुभव और राष्ट्रीय नेतृत्व की विफलताओं को पर्याप्त जगह मिली। बिपन की व्याख्या का मूल्यांकन उसकी शक्ति और इन सीमाओं, दोनों के साथ होना चाहिए।

वे वामपंथी विचारों और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े विद्वानों के निकट थे। पार्टी के सदस्य न होते हुए भी लंबे समय तक उन्हें उसी बौद्धिक संसार का व्यक्ति माना गया। आरंभिक लेखन में उस समय की वाम धारणाओं की निकटता भी दिखाई देती है। किंतु राष्ट्रीय आंदोलन और गांधी-नेहरू की भूमिका पर उनके पुनर्विचार से संगठित वाम के एक हिस्से को लगा कि वे कांग्रेस के निकट जा रहे हैं। सुमित सरकार की मॉडर्न इंडिया ने 1980 के दशक के आरंभ में राष्ट्रीय आंदोलन के इस पुनर्मूल्यांकन की आलोचनात्मक ओर संकेत किया था। आगे चलकर ‘कांग्रेसी इतिहासकार’ का लेबल बिपन के साथ जुड़ गया। इस आरोप में उनकी व्याख्या के वास्तविक झुकाव की पहचान तो थी, पर अक्सर तर्क का स्थान राजनीतिक संबद्धता के अनुमान ने ले लिया। गांधी और नेहरू की ऐतिहासिक भूमिका को सकारात्मक मानना तथा कांग्रेस नेतृत्व की रणनीतिक क्षमता को स्वीकार करना अपने-आप में कांग्रेस पार्टी की सदस्यता या सत्ता से निजी निकटता का प्रमाण नहीं है। उसी तरह, कांग्रेस-केंद्रित आख्यान की आलोचना को केवल वैचारिक शत्रुता कहकर टाला भी नहीं जा सकता।

बिपन के विचारों की सबसे कठिन परीक्षा स्वतंत्र भारत की राजनीति के प्रश्नों पर हुई। मंडल आयोग की सिफारिशों और आरक्षण के प्रश्न पर उनका विरोध जेएनयू में व्यापक रूप से चर्चा का विषय था। जब मैं वहाँ पहुँचा, आंदोलन का सबसे उग्र दौर बीत चुका था, लेकिन परिसर पर उसकी छाया बनी हुई थी। कौन पक्ष में था और कौन विरोध में, इसके आधार पर लोगों की राजनीतिक तथा नैतिक पहचान तय की जा रही थी। बिपन को ‘अपर कास्ट’ दृष्टि का प्रतिनिधि और आरक्षण-विरोधियों में मुखर व्यक्ति कहा जाता था। इस आलोचना को हल्के में नहीं लिया जा सकता। आर्थिक और वर्गीय प्रश्नों को प्राथमिक मानने वाली उनकी पीढ़ी के अनेक मार्क्सवादी विद्वान जाति को सत्ता, प्रतिनिधित्व और ऐतिहासिक अन्याय की स्वतंत्र संरचना के रूप में पर्याप्त गहराई से नहीं समझ सके। आरक्षण के प्रश्न पर बिपन की स्थिति भी उनकी दृष्टि की एक वास्तविक सीमा थी। उनके समावेशी अध्यापन और सामाजिक रूप से वंचित विद्यार्थियों के प्रति निजी उदारता को संस्थागत प्रतिनिधित्व के प्रश्न पर उनकी राजनीतिक राय का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। व्यक्ति की उदारता और सामाजिक न्याय की नीति दो अलग स्तर हैं।

इसके साथ यह भी याद रखना चाहिए कि वे अपने मत के कारण किसी पक्ष की भीड़ में पूरी तरह शामिल नहीं हुए। जेएनयू परिसर में जब शरद यादव को बुलाया गया और विरोध कर रहे विद्यार्थियों ने उन्हें बोलने नहीं दिया, तब बिपन ने इस घटना की स्पष्ट आलोचना की। उनकी दृष्टि में असहमति वक्ता की आवाज बंद करने का अधिकार नहीं देती थी। वे क्षेत्र, धर्म और जाति के गणित पर बनने वाले छात्र-राजनीतिक पैनलों का भी उपहास करते थे। स्मृति के आधार पर कह सकता हूँ कि उन्होंने एक कक्षा में कहा था कि वामपंथी पैनल में भी एक मुसलमान, एक दक्षिण भारतीय और एक ओड़िया को किसी-न-किसी तरह रखने का हिसाब चलता है। उनका कथन उस प्रतिनिधित्व का विरोध भर नहीं था; वे पहचान के स्थिर खाँचों और राजनीतिक अवसरवाद के मेल को लेकर असहज थे। किंतु यह असहजता उन्हें जाति-आधारित वंचना के ऐतिहासिक औचित्य तक पूरी तरह नहीं ले गई। उनके विचार की शक्ति और सीमा दोनों यहीं दिखाई देती हैं।

बिपन अक्सर बहुमत के विरुद्ध अपनी राय रखने का साहस दिखाते थे। इसी स्वभाव के कारण वे धीरे-धीरे संगठित वाम से दूर हुए और विभाग में भी उनकी पुरानी नेतृत्वकारी स्थिति कमजोर हुई। उनका सम्मान बहुत था, किंतु सरकार के निकट माने जाने, सेवानिवृत्ति के करीब पहुँचने और नई इतिहासलेखन प्रवृत्तियों के उभार के कारण उनके विरुद्ध भीतर ही भीतर आलोचना भी थी। उनके व्याख्यानों में कभी-कभी उपस्थिति कम होती थी। रामजन्मभूमि आंदोलन के दौर की एक सभा में वे मेरी सीट के पीछे बैठे थे। बातचीत में उन्होंने उस आंदोलन को ‘जन आंदोलन’ कहा। मैं चौंका और पूछा कि क्या वे सचमुच उसे जन आंदोलन मानते हैं। उन्होंने बच्चों जैसी मुद्रा में दोनों हथेलियों से गोली चलाने का संकेत करते हुए कहा कि यदि वह जन आंदोलन न होता तो उसे ‘ठाँय-ठाँय’ करके समाप्त कर दिया जाता। वे उसका समर्थन नहीं कर रहे थे; वे आगाह कर रहे थे कि जिस राजनीति से हम घृणा करते हैं, उसके वास्तविक सामाजिक आधार से इनकार करके उसे समझा या पराजित नहीं किया जा सकता।

आंदोलनों की भूमिका पर उनका विशेष जोर था। वे विचारधारा और आंदोलन के संयोग से पैदा हुई सामाजिक शक्ति को इतिहास को आगे बढ़ाने वाली शक्ति मानते थे। वे बार-बार कहते थे कि जब राष्ट्रीय आंदोलन तेज था तब सांप्रदायिक शक्तियों का प्रभाव घटा और आंदोलन के ठहराव में सांप्रदायिक विचारधाराओं को बढ़ने की जगह मिली। इस स्थापना को यथावत स्वीकार करना आवश्यक नहीं; राष्ट्रीय आंदोलन के भीतर भी सांप्रदायिक भाषाएँ और तनाव मौजूद थे। फिर भी उनका मूल संकेत महत्त्वपूर्ण था कि सांप्रदायिकता का मुकाबला केवल उपदेश या प्रशासन से नहीं, एक व्यापक वैकल्पिक राजनीति और लोगों को सक्रिय नागरिक बनाने वाले आंदोलन से किया जा सकता है। बाद के दशकों में हिंदू राष्ट्रवाद के विस्तार ने इस चेतावनी को और प्रासंगिक बनाया।

उस समय मेरे आसपास कई लोग बिपन के पूरे ढाँचे को पुराना और कांग्रेसी मतवाद से बुरी तरह प्रभावित मानते थे। कुछ तेजतर्रार विद्यार्थी उनकी कक्षा में बैठना भी समय की बर्बादी समझते थे। मुझे भी सलाह दी गई थी कि उनके ‘लॉबी’ से दूर रहूँ। आज इसे लिखते हुए कुछ शर्मिंदगी होती है कि बिपन को बड़ा इतिहासकार मानने के बावजूद उनसे जुड़े अनेक विद्वानों को मैं समूहबाजी से प्रभावशाली बने दोयम दर्जे के इतिहासकार समझता रहा। अपने छह वर्षों के जेएनयू जीवन में उनके समूह के किसी विद्वान से संवाद करने का प्रयास नहीं किया। आदित्य मुखर्जी से पहली बार ठीक से तब बात हुई जब 2006 में थीसिस जमा करने गया। यह स्मृति केवल आत्मस्वीकृति नहीं है; विश्वविद्यालयी जीवन में बौद्धिक निर्णय किस तरह समूहों, प्रतिष्ठाओं और फुसफुसाहटों से बनते हैं, उसका उदाहरण भी है।

मैं बिपन से बात करने से जान-बूझकर नहीं बचता था। अपने शोध-विषय, सांप्रदायिकता, पर उनसे लंबी बातचीत करने की इच्छा भी थी। उन्होंने मेरे बारे में कुछ अच्छी बातें कही थीं और पाठ्यक्रम में बहुत अच्छा ग्रेड दिया था। जेएनयू के प्रवेश-साक्षात्कार के दिन का एक प्रसंग याद है। बिहार से आए एक युवक की तरह उस समय तक ‘पैरवी’ की उपयोगिता पर मेरा विश्वास था। लिखित परीक्षा में सफल होने के बाद मैं जगदीश्वर चतुर्वेदी और विमल वर्मा की चिट्ठियाँ लेकर पहुँचा था। उनके कारण कुछ छात्र नेताओं से संपर्क हुआ और सूरजभान जी मुझे बिपन के घर ले गए। आधुनिक भारत के बारे में मेरी पढ़ाई पर तब उन्हीं का सबसे अधिक प्रभाव था; उन्हें देखना भी उपलब्धि जैसा लगा। उनकी एक बात याद रह गई: “एवरीबडी इज़ टॉकिंग अबाउट यू।” मुझे लगा, शायद नामवर सिंह ने उनसे मेरे बारे में कहा होगा। पैरवी का कोई लाभ मिला या नहीं, नहीं जानता; तबीयत खराब होने के कारण बिपन उस दिन साक्षात्कार में आए ही नहीं। लेकिन उस एक वाक्य ने मुझे बहुत बल दिया। अनजान अथवा युवा व्यक्ति को उत्साहित करने की उनकी क्षमता के अनेक किस्से सुनने को मिलते थे। बिहार के एक स्कूल में पढ़ाने वाले शोधकर्ता ने मुझे बताया था कि बिपन ने उनकी थीसिस पढ़कर प्रशंसा का पोस्टकार्ड भेजा था। प्रतिष्ठित विद्वान का ऐसा छोटा-सा संकेत किसी दूर-दराज काम कर रहे अध्यापक के लिए वर्षों की ऊर्जा बन सकता है।

एक सभा में बिपन और मन्मथनाथ गुप्त साथ वक्ता थे। श्रोता कम थे और हॉल बड़ा। गुप्तजी ने भगत सिंह, क्रांतिकारी होने की कसौटी और शचींद्रनाथ सान्याल की क्रांति-दृष्टि पर कुछ ऐसी बातें कहीं जिनसे मैं असहमत था। प्रश्नोत्तर में मैंने बिपन से गुप्तजी के वक्तव्य पर टिप्पणी माँगी। मेरे प्रश्न में अपेक्षा छिपी थी कि वे उनसे असहमति प्रकट करेंगे। बिपन ने मृदुता से लगभग झिड़कते हुए कहा, “मैंने जो कुछ सीखा है, उनके चरणों में ही सीखा है।” वे चाहते तो अपनी विद्वत्ता का उपयोग कर वृद्ध क्रांतिकारी को सुधार सकते थे; उन्होंने सार्वजनिक मंच पर उनके जीवनानुभव का सम्मान करना चुना। पुराने स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति उनका आदर गहरा था।

इसी संबंध में उनका स्वतंत्रता सेनानियों के साक्षात्कारों वाला दीर्घकालीन उपक्रम महत्त्वपूर्ण है। मौखिक साक्ष्यों ने उन्हें आंदोलन को केवल प्रस्तावों, नेताओं के भाषणों और सरकारी अभिलेखों से नहीं, कार्यकर्ताओं की स्मृतियों और राजनीतिक अनुभवों से भी देखने का अवसर दिया। यह कहना अतिसरलीकरण होगा कि इस परियोजना से पहले वे कम्युनिस्ट थे और उसके बाद राष्ट्रवादी हो गए। अधिक उचित यह है कि इन साक्षात्कारों ने उनके भीतर पहले से उपस्थित प्रश्न को गहरा किया: किस तरह एक बहुवर्गीय, वैचारिक रूप से विषम और लंबे समय तक चलने वाला आंदोलन औपनिवेशिक सत्ता की वैधता को समाप्त कर सका? इस प्रश्न के उत्तर की खोज ने उन्हें गांधी और कांग्रेस की रणनीति को नए ढंग से पढ़ने की ओर धकेला।

नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष बनने के बाद भी उनके बारे में दो तरह की बातें सुनने को मिलीं। एक ओर सहयोगी उनकी असाधारण ऊर्जा, नए लेखकों को प्रोत्साहन और गंभीर सामाजिक विज्ञान को सस्ते संस्करणों में व्यापक पाठक तक पहुँचाने की कोशिश को याद करते हैं। प्रभात पटनायक ने लिखा है कि उनके कार्यकाल में इरफान हबीब, अमित भादुड़ी और सुनंदा सेन जैसे विद्वानों से आम पाठक के लिए पुस्तकें लिखवाने की पहल हुई और एनबीटी की लोकप्रिय सामाजिक विज्ञान की गतिविधियों का विस्तार हुआ। दूसरी ओर, कुछ लोग मानते थे कि अपने स्थापित ढाँचे से बाहर की ऐतिहासिक सामग्री के प्रति वे पर्याप्त उत्सुक नहीं रहते थे। एक प्राध्यापक ने बताया कि सखाराम गणेश देउस्कर की देशेर कथा को प्रकाशित करने का प्रस्ताव उन्होंने यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि देउस्कर ने नौरोजी और दूसरे आर्थिक आलोचकों की बातों को ही एक जगह रखा है। इस प्रसंग की स्वतंत्र पुष्टि मेरे पास नहीं है, इसलिए इसे एक समकालीन की स्मृति की तरह ही लिया जाना चाहिए। फिर भी यह उस आलोचना को व्यक्त करता है कि बिपन कभी-कभी विचार की मौलिकता को सामग्री, प्रसार और भाषायी-सांस्कृतिक प्रभाव से अधिक महत्त्व देते थे।

उनकी सबसे विवादास्पद कृतियों में इन द नेम ऑफ डेमोक्रेसी: जेपी मूवमेंट एंड द इमरजेंसी है। बिपन ने जेपी आंदोलन के भीतर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और अन्य दक्षिणपंथी शक्तियों की भूमिका, राजनीतिक अस्थिरता तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं के संकट पर जोर दिया। उनकी आशंका थी कि कांग्रेस-विरोध अपने-आप में लोकतांत्रिक अथवा प्रगतिशील राजनीति नहीं बन जाता। 1977 के बाद हिंदू राष्ट्रवादी शक्तियों के क्रमिक विस्तार को देखते हुए उनकी चेतावनी को निरर्थक नहीं कहा जा सकता। किंतु इससे आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं के दमन, गिरफ्तारियों, प्रेस सेंसरशिप, जबरन नसबंदी और सत्ता के केंद्रीकरण की गंभीरता कम नहीं होती। आलोचकों को उनकी व्याख्या में इंदिरा गांधी के शासन के प्रति ऐसी नरमी दिखाई दी जो लोकतंत्र की उनकी घोषित चिंता के साथ असंगत लगती है। जेपी के प्रति अपने युवावस्था के आकर्षण के कारण मैं इस विषय में अतिरिक्त संवेदनशील रहा हूँ, पर अब मुझे लगता है कि बिपन की आशंका और उनकी चूक दोनों को साथ पढ़ना चाहिए। उन्होंने कांग्रेस-विरोधी आंदोलन के भीतर दक्षिणपंथ की दीर्घकालीन संभावना को पहचाना; वे राज्यसत्ता के तत्काल अधिनायकवाद को उतनी कठोरता से नहीं देख सके।

उनके ‘कांग्रेस की ओर चले जाने’ की धारणा ने इतिहासकार के रूप में उनकी प्रतिष्ठा पर कुछ प्रतिकूल प्रभाव डाला। मेरे लिए यह अप्रिय था। बीए के दिनों में रविवार पत्रिका में स्वतंत्रता संघर्ष पर उनके लेख धारावाहिक रूप से छपते थे। मैं पन्ने काटकर फाइल में रखता था। बाद में इन्हीं विचारों का विकसित रूप फ्रीडम स्ट्रगल और राष्ट

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