सेवा में,
माननीय मुख्यमंत्री जी, बिहार सरकार, पटना।
विषय : वित्त रहित शिक्षा नीति की समाप्ति के उपरांत परीक्षाफल आधारित वेतनानुदान से आच्छादित माध्यमिक, इंटरमीडिएट एवं डिग्री महाविद्यालयों के शिक्षकों एवं शिक्षकेत्तर कर्मियों के बकाया वेतनानुदान के एकमुश्त भुगतान तथा सम्मानजनक नियमित वेतन-संरचना निर्धारित किए जाने के संबंध में अनुरोध ।
महोदय !
सादर विदित है कि बिहार में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विस्तार में वित्त रहित माध्यमिक विद्यालयों, इंटरमीडिएट महाविद्यालयों एवं डिग्री महाविद्यालयों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। राज्य के अनेक क्षेत्रों में जब सरकारी स्तर पर पर्याप्त संख्या में शिक्षण संस्थानों की आधारभूत संरचना उपलब्ध नहीं थी, उस समय निजी प्रबंधन द्वारा स्थापित इन संस्थानों ने सीमित संसाधनों में विद्यालय एवं महाविद्यालय संचालित कर हजारों-लाखों विद्यार्थियों को शिक्षा उपलब्ध कराने का महत्वपूर्ण दायित्व निभाया है।
वित्त रहित शिक्षा नीति की समाप्ति के पश्चात सरकार द्वारा यह व्यवस्था स्वीकार की गई कि जिन संस्थानों में आवश्यक आधारभूत संरचना एवं निर्धारित मापदंडों के अनुरूप शैक्षणिक व्यवस्था उपलब्ध है, वहां रिक्ति एवं मांग के आधार पर कार्यरत शिक्षकों एवं कर्मियों को परीक्षाफल आधारित वेतनानुदान प्रदान किया जाएगा। यह निर्णय इन संस्थानों में वर्षों से कार्यरत शिक्षकों एवं कर्मियों के योगदान को सरकारी स्तर पर मान्यता प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था।
किन्तु अत्यंत खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि वित्त रहित शिक्षा नीति समाप्त हुए लगभग 20 वर्ष बीत जाने के बावजूद आजतक वेतनानुदान की राशि में कोई वृद्धि नहीं की गई है और वास्तविक परीक्षाफल आधारित अनुदान की राशि से भी वंचित रखा जा रहा है।अतः यह अत्यंत ही आवश्यक है कि अनुदान की अधिसीमा संबंधी शर्तों को शिथिल करते हुए व्ययगत सभी शैक्षणिक सत्रों के वर्षों से लंबित वास्तविक बकाये वेतनानुदान का एक मुश्त भुगतान किया जाय, क्योंकि अत्यल्प अथवा अनिश्चित आय के बीच वर्षों तक सेवा देने वाले अनेक शिक्षक एवं कर्मी आर्थिक कठिनाइयों से जूझते हुए सेवानिवृत्त हो चुके हैं तथा कई असमय ही दिवंगत हो गए। ऐसी स्थिति केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि वर्षों की सेवा, श्रम एवं मानवीय गरिमा से जुड़ा अत्यंत गंभीर प्रश्न है।
महोदय, इस विषय का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष आर्थिक एवं व्यावहारिक भी है। इन शिक्षण संस्थानों के पास पहले से ही व्यापक आधारभूत संरचना एवं आवश्यक शैक्षणिक संसाधन उपलब्ध हैं। अनेक संस्थानों में भूमि, भवन, खेल मैदान, प्रयोगशाला, पुस्तकालय तथा अन्य संस्थानोपयोगी संसाधन वर्षों के प्रयास एवं निजी प्रबंधन के माध्यम से विकसित किए गए हैं। ‘यदि सरकार इन संस्थानों के कार्यरत शिक्षकों एवं कर्मियों के लिए सम्मानजनक एवं नियमित वेतन-संरचना निर्धारित करती है, तो इसके लिए सरकार को जो अतिरिक्त वित्तीय भार वहन करना पड़ेगा, उसकी तुलना में राज्य को पहले से उपलब्ध इतनी विशाल शैक्षणिक आधारभूत संरचना का लाभ प्राप्त होगा। दूसरे शब्दों में, सरकार को नए संस्थानों के निर्माण एवं आधारभूत संरचना के विकास पर होने वाले अत्यधिक व्यय की आवश्यकता काफी हद तक कम हो सकती है।’
तीसरा और सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य समानता एवं सामाजिक न्याय से संबंधित है। बिहार में समान अथवा मिलती-जुलती प्रबंधकीय व्यवस्था के अंतर्गत संचालित अल्पसंख्यक विद्यालयों, मदरसा एवं संस्कृत विद्यालयों के शिक्षकों एवं कर्मियों को नियमित शिक्षकों की भांति वेतनमान एवं अन्य सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं। ऐसी स्थिति में वर्षों से राज्य की शैक्षणिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में योगदान दे रहे माध्यमिक, इंटरमीडिएट एवं डिग्री महाविद्यालयों के शिक्षकों एवं कर्मियों के लिए परीक्षाफल आधारित वेतनानुदान की व्यवस्था को स्थायी समाधान क्यों न प्रदान किया जाए- यह एक स्वाभाविक एवं न्यायसंगत प्रश्न है।
यह भी विचारणीय है कि जो शिक्षक एवं कर्मी लगभग पाँच दशकों से उसी संस्थान में रहकर विद्यार्थियों को शिक्षित करते रहे हैं, तथा इन अनुदानित शिक्षण संस्थानों का राज्य के सकल नामांकन अनुपात (GER) में अत्यंत ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनके भविष्य को अनिश्चित वेतनानुदान की व्यवस्था पर अनंतकाल तक निर्भर रखना न तो मानवीय दृष्टि से उचित है और न ही शिक्षा व्यवस्था के दीर्घकालिक हित में। इससे न केवल शिक्षकों एवं कर्मियों में असुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है, बल्कि योग्य एवं अनुभवी शिक्षाकर्मियों के मनोबल पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
अतः उपर्युक्त तथ्यों के आलोक में आपसे विनम्र अनुरोध है कि राज्यहित, शिक्षाहित एवं मानवीय संवेदना को ध्यान में रखते हुए-
क. माध्यमिक, इंटरमीडिएट एवं डिग्री शिक्षण संस्थान के शिक्षकों एवं शिक्षकेत्तर कर्मियों का वर्षों से लंबित वास्तविक परीक्षाफल आधारित बकाया वेतनानुदान का एकमुश्त भुगतान किया जाय;
ख. इन संस्थानों की वास्तविक उपयोगिता, उपलब्ध आधारभूत संरचना, शिक्षकों की आवश्यकता एवं इनकी वर्षों की सेवा को ध्यान में रखते हुए परीक्षाफल आधारित वेतनानुदान की वर्तमान व्यवस्था के स्थान पर अन्य समान प्रबंधकीय श्रेणी के शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों एवं कर्मियों को प्राप्त वेतन-सुविधाओं के अनुरूप समानता एवं न्याय के सिद्धांत पर सम्मानजनक एवं नियमित वेतन-संरचना निर्धारित किये जाने हेतु स्पष्ट एवं स्थायी नीति बनाई जाए;
ग. संबद्ध डिग्री महाविद्यालयों में वर्ष 19.04.2007 के बाद विधिवत नियुक्त एवं अद्यतन कार्यरत शिक्षकों के सेवा नियमितीकरण हेतु आवश्यक कार्रवाई के लिए विभाग को निर्देश दिये जाने तथा 19.04.2007 के पूर्व के शेष वंचित शिक्षकों के नियमितीकरण की कार्रवाई पूर्ण कराने का अनुरोध अपेक्षित है; महोदय ! इन शिक्षकों एवं कर्मियों ने संसाधनों के अभाव के बावजूद कई दशकों तक राज्य की शिक्षा व्यवस्था का दायित्व निभाया है। आज आवश्यकता केवल लंबित वेतनानुदान के भुगतान की नहीं, बल्कि उनके सम्मान, सुरक्षा, भविष्य एवं सेवा की गरिमा को स्थायी आधार प्रदान करने की है। आज की तिथि में एक यही वर्ग शेष रह गया है, जिन्हें नियमित वेतनमान का स्वाद नहीं मिल पाया है। आपसे ही इन्हें न्याय की उम्मीद है।
दूसरी ओर, वित्त रहित शिक्षा नीति समाप्त होने के पश्चात् मान्यताप्राप्त एवं संबद्ध गैर-वित्त अनुदानित तीनों कोटि के शिक्षण संस्थानों में कार्यरत शिक्षक एवं कर्मी स्पष्ट वेतनानुदान नीति के अभाव में नीति-विहीन स्थिति में हैं, अतः इनके हित में भी न्यायपूर्ण वेतनानुदान नीति का अविलंब लागू किया जाना शिक्षा व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ करेगा।
अतः समस्त संबंधित शिक्षक समुदाय को आपकी राजनीतिक इच्छाशक्ति पर पूर्ण विश्वास है कि वर्षों से लंबित इस समस्या के स्थायी समाधान हेतु गठित उच्चस्तरीय समिति द्वारा समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करते हुए आगामी 5 सितंबर, शिक्षक दिवस के अवसर पर इस नीति के स्थायी समाधान के संबंध में सरकार द्वारा स्पष्ट एवं सकारात्मक घोषणा की जाएगी, जिससे संबंधित शिक्षकों एवं कर्मियों को आर्थिक अनिश्चितता से मुक्त कर ‘सबका साथ, सबका विकास’ एवं ‘न्याय के साथ विकास’ की भावना को वास्तविक रूप में सार्थक किया जा मके।
आदर सहित ।
भवदीय
संजीव कुमार सिंह
(डॉ. संजीव कुमार सिंह)














