एक कवरेज से शुरू हुई कहानी, जो किताब बन गई
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‘जीना सिखा दिया’ : 35 साल की पत्रकारिता यात्रा का वह अध्याय, जहां एक विराट अनुभव ने जन्म दिया एक जीवनी को
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बेंगलुरु के 25 लाख लोगों के उस जनसैलाब से लेकर ब्रह्मनाद के विश्व रिकॉर्ड तक—एक पत्रकार का संकल्प, दैनिक भास्कर की ऐतिहासिक फेलोशिप, छह महीने का शोध और पुस्तक को सेवा से जोड़ने की अनूठी कहानी
कुछ यात्राएं केवल खबर कवर करने के लिए नहीं होतीं।
कुछ यात्राएं जीवन की दिशा बदल देती हैं।
फरवरी 2006 में एक पत्रकार बेंगलुरु गया था। जिम्मेदारी थी—आर्ट ऑफ लिविंग की रजत जयंती समारोह की रिपोर्टिंग करना।
उसे तब शायद यह अंदाजा भी नहीं था कि यह यात्रा उसकी 35 वर्षों की पत्रकारिता में एक ऐसा अध्याय जोड़ने जा रही है, जो आगे चलकर एक पुस्तक का रूप लेगा।
जकूर एयरफील्ड पर उमड़ा विराट जनसैलाब
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बेंगलुरु का जकूर एयरफील्ड। भारतीय वायुसेना का एयरफील्ड। आसपास आर्ट ऑफ लिविंग का आश्रम।
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से लोग पहुंचे थे। करीब 25 लाख लोगों की मौजूदगी वाला वह विराट आयोजन अपने आप में असाधारण था। पुस्तक के प्रकाशित अंश में इस अनुभव का उल्लेख मिलता है और बताया गया है कि वर्षों की पत्रकारिता में अनेक बड़े राजनीतिक और सामाजिक आयोजन देखने के बावजूद यह दृश्य बिल्कुल अलग था।
वह केवल लोगों की भीड़ नहीं थी।
वह संगीत था।
ध्यान था।
आध्यात्मिकता थी।
सेवा थी।
और सबसे बढ़कर—दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आए लोगों के बीच एक अद्भुत मानवीय जुड़ाव था।
एक पत्रकार के लिए यह एक बड़ी खबर थी।
लेकिन उसके भीतर इससे कहीं बड़ी चीज जन्म ले रही थी।
फिर मंच पर आए डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
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समापन सत्र में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का भाषण हुआ।
भाषण ने पत्रकार के मन को गहराई से प्रभावित किया।
एक सवाल भीतर उठने लगा—
श्री श्री रवि शंकर के जीवन और विचारों से दुनिया के इतने लोग प्रभावित हैं, तो हिंदी में उनके जीवन की पूरी कहानी लोगों तक क्यों न पहुंचाई जाए?
यहीं से एक विचार ने संकल्प का रूप लिया।
श्री श्री रवि शंकर की जीवन-यात्रा को हिंदी में दुनिया के सामने लाने का संकल्प।
बेंगलुरु से लौटे पत्रकार के मन में जन्मा यह विचार धीरे-धीरे एक बड़े शोध और लेखन-प्रयास में बदल गया। पुस्तक के प्रकाशित अंश में इस यात्रा की पृष्ठभूमि दर्ज है।
जब एक अखबार ने अपने पत्रकार को किताब लिखने के लिए समय दिया
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उस समय लेखक दैनिक भास्कर, राजस्थान में संपादक थे।
एक पुस्तक लिखने के लिए लंबा समय चाहिए था। केवल इच्छा से काम संभव नहीं था। चाहिए था—अवकाश, अध्ययन और शोध के लिए पूरा समय।
यहीं दैनिक भास्कर की भूमिका सामने आती है।
संस्थान की ओर से उन्हें इस काम के लिए फेलोशिप और संस्थागत सहयोग मिला। यह किसी पत्रकार को सिर्फ खबर लिखने के लिए नहीं, बल्कि एक गंभीर पुस्तक के लिए समय और अवसर देने का असाधारण उदाहरण था।
इसके बाद शुरू हुई गहन शोध-यात्रा।
श्री श्री रवि शंकर के साथ निकट संपर्क और उनके जीवन को समझने की कोशिश।
लगभग छह महीने का सान्निध्य।
उनकी दिनचर्या, कार्यशैली, विचार, यात्राएं, लोगों से संवाद और जीवन-दृष्टि को करीब से देखने-समझने की कोशिश।
एक पत्रकार अब केवल घटनाओं का साक्षी नहीं था।
वह एक जीवन को समझने और उसे शब्द देने की यात्रा पर था।
और जन्म हुआ—‘जीना सिखा दिया’ का
साल 2008।
मंजुल पब्लिशिंग हाउस से प्रकाशित हुई—
‘जीना सिखा दिया : श्री श्री रवि शंकर—एक जीवनी’
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385 पृष्ठों की यह पुस्तक 2008 में प्रकाशित हुई और इसका ISBN 9788183220910 है। प्रकाशकीय विवरण में स्वयं प्रकाश को लेखक के रूप में दर्ज किया गया है।
पुस्तक के आवरण पर मंजुल और दैनिक भास्कर के लोगो हैं।
लेकिन इस पुस्तक की कहानी केवल प्रकाशन तक सीमित नहीं रही।
क्योंकि जिस यात्रा ने इसे जन्म दिया था, उसका अगला पड़ाव भी साधारण नहीं था।
लोकार्पण भी इतिहास रचने वाले आयोजन में
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नवंबर 2008। नोएडा।
आर्ट ऑफ लिविंग का अनूठा संगीत आयोजन—‘ब्रह्मनाद’।
एक मंच पर दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आए सितारवादक।
आर्ट ऑफ लिविंग के आधिकारिक विवरण में इस आयोजन में 1,200 सितारवादकों के एक साथ प्रस्तुति देने का उल्लेख है। बाद में Guinness World Records ने 1,094 प्रतिभागियों के साथ इसे दुनिया के सबसे बड़े सितार ensemble के रूप में दर्ज किया। आयोजन 21 नवंबर 2008 को नोएडा में हुआ था।
और इसी ऐतिहासिक आयोजन में ‘जीना सिखा दिया’ का लोकार्पण हुआ।
एक अद्भुत संयोग था।
जिस संस्था के विराट आयोजन ने पुस्तक लिखने का विचार जन्म दिया था, उसी संस्था के एक अनूठे आयोजन में पुस्तक दुनिया के सामने आई।
कहानी जैसे अपना एक पूरा चक्र तय कर रही थी।
संगीत से बिहार की सेवा तक
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ब्रह्मनाद सिर्फ संगीत का आयोजन नहीं था।
आर्ट ऑफ लिविंग के आधिकारिक अभिलेख के अनुसार आयोजन से प्राप्त राशि बाढ़ से तबाह बिहार के राहत एवं पुनर्वास कार्यों के लिए समर्पित की गई थी।
यानी जिस मंच पर पुस्तक का लोकार्पण हुआ, वहां संगीत, संस्कृति और सेवा तीनों एक साथ उपस्थित थे।
और शायद यही इस पूरी यात्रा का सबसे सुंदर सूत्र भी है—
ज्ञान से संवेदना, संवेदना से सेवा।
किताब लिखने से पहले ही तय था—रॉयल्टी सेवा को जाएगी
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‘जीना सिखा दिया’ के बैक-कवर पर प्रकाशित एक महत्वपूर्ण संकल्प इस पुस्तक को दूसरी जीवनी पुस्तकों से अलग पहचान देता है।
पुस्तक लिखने से पहले ही यह तय कर लिया गया था कि लेखक को मिलने वाली पूरी रॉयल्टी आर्ट ऑफ लिविंग के सेवा प्रकल्पों के लिए समर्पित की जाएगी।
यानी पुस्तक से मिलने वाली आर्थिक आय को व्यक्तिगत लाभ के बजाय सेवा से जोड़ने का निर्णय शुरुआत में ही लिया गया।
बैक-कवर पर यह प्रतिबद्धता बाकायदा प्रकाशित है।
यहीं एक पत्रकार की कहानी लेखन से आगे निकलकर सेवा से जुड़ जाती है।
पाठकों ने पुस्तक को अपना लिया
किसी पुस्तक की असली परीक्षा उसके विमोचन के दिन नहीं होती।
वह वर्षों बाद होती है—जब पाठक उसे खोजते हैं।
‘जीना सिखा दिया’ के दस से अधिक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। पुस्तक कई बार बाजार से बाहर हुई और फिर नए संस्करण के साथ लौटी।
इसके प्रकाशकीय विवरण और विभिन्न पुस्तक-सूचियों में इसके संस्करण दर्ज हैं।
इसकी लोकप्रियता का सबसे विश्वसनीय प्रमाण शायद यही है कि पुस्तक लगातार पुनर्मुद्रित होती रही।
एक पत्रकार के लिए इससे बड़ा संतोष क्या हो सकता है कि वर्षों पहले लिखी गई पुस्तक आज भी पाठकों तक पहुंच रही है।
35 वर्षों की पत्रकारिता में एक अलग मुकाम
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साढ़े तीन दशक की पत्रकारिता में खबरें अनगिनत होती हैं।
राजनीति से लेकर समाज तक।
शासन से लेकर जनजीवन तक।
हजारों रिपोर्टें, सैकड़ों यात्राएं और अनगिनत मुलाकातें।
लेकिन कुछ काम ऐसे होते हैं, जो पेशे से आगे निकलकर जीवन की पहचान बन जाते हैं।
‘जीना सिखा दिया’ ऐसा ही एक पड़ाव है।
इसका जन्म किसी व्यावसायिक योजना से नहीं हुआ था।
किसी प्रकाशक के आग्रह से नहीं।
यह जन्मा था एक अनुभव से।
एक विराट जनसमुदाय को देखकर।
एक असाधारण आयोजन को करीब से देखकर।
और डॉ. कलाम के भाषण से भीतर तक प्रभावित होकर।
फिर उस अनुभव ने एक सवाल पैदा किया।
सवाल ने संकल्प का रूप लिया।
संकल्प ने शोध का।
शोध ने लेखन का।
लेखन ने पुस्तक का।
और पुस्तक ने अपनी रॉयल्टी को सेवा का माध्यम बना दिया।
आज, 45 वर्ष बाद—कहानी फिर उसी शहर में लौट आई है
समय का संयोग देखिए।
2026 में आर्ट ऑफ लिविंग अपनी स्थापना के 45 वर्ष पूरे कर रहा है और गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर का 70वां वर्ष भी मनाया जा रहा है।
आर्ट ऑफ लिविंग के आधिकारिक स्रोत के अनुसार संस्था की स्थापना 1981 में हुई थी और 2026 में उसकी 45 वर्षों की सेवा-यात्रा पूरी हुई। मई 2026 में बेंगलुरु में इस अवसर पर विशेष वैश्विक समारोह भी आयोजित हुए।
उसी वर्ष गुरुदेव के 70वें जन्मवर्ष को भी विशेष रूप से मनाया गया। बेंगलुरु में आयोजित समारोहों में देश-विदेश से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
और अब सितंबर 2026।
बेंगलुरु फिर एक नई कहानी का साक्षी है—‘बिहार महोत्सव 2026’ का।
बिहार की कला, संस्कृति, विरासत, खान-पान, हस्तशिल्प, पर्यटन, उद्योग, योग, आयुर्वेद और आध्यात्मिक परंपरा एक ही मंच पर प्रस्तुत हो रही है।
यानी वही शहर।
वही आश्रम।
वही आध्यात्मिक परिवेश।
लेकिन करीब दो दशक बाद कहानी का संदर्भ बदल गया है।
तब एक पत्रकार गया था, आज एक कहानी लौट आई है
2006 में एक पत्रकार बेंगलुरु गया था—एक आयोजन की खबर लिखने।
वहां उसने ऐसा कुछ देखा, जिसने उसके भीतर एक पुस्तक लिखने का संकल्प पैदा कर दिया।
2008 में वह संकल्प पुस्तक बनकर सामने आया।
ब्रह्मनाद के मंच पर उसका लोकार्पण हुआ।
पुस्तक की रॉयल्टी सेवा को समर्पित हुई।
पाठकों ने उसे अपनाया।
दस से अधिक संस्करण निकले।
और वर्षों बाद वही बेंगलुरु फिर सामने है—आर्ट ऑफ लिविंग के 45 वर्ष और गुरुदेव के 70वें वर्ष के ऐतिहासिक पड़ाव पर बिहार महोत्सव की मेजबानी करते हुए।
इस पूरे घटनाक्रम को शायद एक ही पंक्ति में सबसे बेहतर ढंग से कहा जा सकता है—
एक पत्रकार बेंगलुरु गया था खबर लिखने;
वहां उसे एक ऐसी कहानी मिली, जिसे लिखते-लिखते वह कहानी उसकी अपनी पत्रकारिता यात्रा का सबसे यादगार अध्याय बन गई।
‘जीना सिखा दिया’ की असली कहानी यही है—एक खबर से जन्मा संकल्प, संकल्प से निकली किताब और किताब से जुड़ी सेवा।
समापन
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35 वर्षों की पत्रकारिता में पुरस्कार और सम्मान अपनी जगह हैं। उन्हें उपलब्धि के रूप में दर्ज किया जा सकता है। लेकिन इस यात्रा का सबसे मानवीय पक्ष कुछ और है—
एक पत्रकार ने किसी व्यक्ति को केवल खबर के विषय के रूप में नहीं देखा। उसने उसके जीवन को समझने की कोशिश की।
और उस कोशिश से निकली पुस्तक ने लेखक से आगे जाकर पाठकों के बीच अपना जीवन बनाया।
शायद किसी लेखक के लिए इससे बड़ी उपलब्धि यही है—कि उसकी किताब उसके बाद भी लोगों के जीवन में अपना अर्थ खोजती रहे।
और इसीलिए ‘जीना सिखा दिया’ केवल एक जीवनी नहीं है।
**यह एक पत्रकार के अनुभव, एक लेखक के संकल्प और सेवा के प्रति एक प्रतिबद्धता की कहानी है।**
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