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संस्कृत मनुष्य निर्माण की भाषा है, यह जीवन को संस्कार और दिशा प्रदान करती है : प्रो. मुरली मनोहर पाठक

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संस्कृत मनुष्य निर्माण की भाषा है, यह जीवन को संस्कार और दिशा प्रदान करती है : प्रो. मुरली मनोहर पाठक

लखनऊ। “संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, सनातन ज्ञान-परंपरा और मानवीय मूल्यों की जीवंत आत्मा है। यह मनुष्य को केवल शिक्षित नहीं करती, बल्कि उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हुए उसे संस्कारित, संवेदनशील, विवेकशील और उत्तरदायी नागरिक बनाती है। संस्कृत का उत्थान केवल भाषा का विकास नहीं, बल्कि ज्ञानसमृद्ध, संस्कारवान और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की आधारशिला है।”ये विचार श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान के अंतर्गत उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी द्वारा आयोजित ‘संस्कृत सेवाव्रती सम्मान’ समारोह को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।प्रदेशभर से आए सेवानिवृत्त संस्कृत शिक्षकों को उनके दीर्घकालीन शैक्षिक योगदान, संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार तथा भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन में उल्लेखनीय सेवाओं के लिए सम्मानित करते हुए प्रो. पाठक ने कहा कि गुरु केवल ज्ञान का संचारक नहीं होता, बल्कि वह समाज और राष्ट्र के चरित्र निर्माण का शिल्पी होता है। संस्कृत शिक्षकों ने दशकों तक अपने तप, त्याग और समर्पण से भारतीय संस्कृति की उस अखंड ज्योति को प्रज्वलित रखा है, जिसकी आभा आज भी समाज को दिशा प्रदान कर रही है।उन्होंने कहा कि संस्कृत विश्व की प्राचीनतम, वैज्ञानिक एवं सर्वाधिक परिष्कृत भाषाओं में से एक है। यह भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन, दर्शन, अध्यात्म, विज्ञान और जीवन-दर्शन का विराट कोश है। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भगवद्गीता, षड्दर्शन, आयुर्वेद, योग, गणित, ज्योतिष, नाट्यशास्त्र तथा साहित्य की अनमोल परंपरा संस्कृत के माध्यम से ही विश्व मानवता तक पहुँची है। इसलिए संस्कृत का संरक्षण वस्तुतः भारत की सांस्कृतिक चेतना और ज्ञान-विरासत की रक्षा का संकल्प है।प्रो. पाठक ने कहा कि आज जब विश्व नैतिक मूल्यों के संकट, मानसिक तनाव, सामाजिक विघटन और सांस्कृतिक असंतुलन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब संस्कृत साहित्य में निहित सार्वभौमिक जीवन-दृष्टि संपूर्ण मानवता के लिए आशा और समाधान का मार्ग प्रस्तुत करती है। संस्कृत हमें ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ और ‘लोकाः समस्ताः सुखिनो भवन्तु’ जैसे उदात्त आदर्शों से परिचित कराते हुए समरस, शांतिपूर्ण और मानवीय समाज की स्थापना का संदेश देती है।उन्होंने विशेष रूप से उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी के कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि अकादमी संस्कृत भाषा के संरक्षण, संवर्धन और लोकप्रियकरण की दिशा में अत्यंत प्रभावी एवं दूरदर्शी कार्य कर रही है। शोध, प्रकाशन, विद्वानों के सम्मान, संगोष्ठियों, कार्यशालाओं और सांस्कृतिक आयोजनों के साथ-साथ अकादमी ने संस्कृत शिक्षा को समाज के प्रत्येक स्तर तक पहुँचाने का उल्लेखनीय प्रयास किया है।प्रो. पाठक ने कहा कि उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी कक्षा 6 से लेकर स्नातकोत्तर (एम.ए.) स्तर तक अध्ययनरत संस्कृत विद्यार्थियों को छात्रवृत्तियों, पुरस्कारों, प्रोत्साहन योजनाओं, प्रतियोगिताओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों तथा विविध शैक्षणिक गतिविधियों के माध्यम से निरंतर प्रेरित कर रही है। यह केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि संस्कृत के उज्ज्वल भविष्य में किया जा रहा एक दूरदर्शी निवेश है। अकादमी की इन योजनाओं ने हजारों विद्यार्थियों में संस्कृत अध्ययन के प्रति नई ऊर्जा, नई प्रेरणा और नई आस्था का संचार किया है। उन्होंने कहा कि यदि संस्कृत को जन-जन तक पहुँचाना है तो विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और समाज के बीच सशक्त समन्वय स्थापित करना होगा, जिसमें उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी एक प्रेरक भूमिका निभा रही है।नई शिक्षा नीति का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान समय संस्कृत के पुनर्जागरण का काल है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने भारतीय ज्ञान-परंपरा को शिक्षा के केंद्र में स्थापित करने का जो दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है, उसमें संस्कृत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। आवश्यकता इस बात की है कि संस्कृत को आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अनुसंधान और नवाचार के साथ जोड़ते हुए युवाओं के लिए अवसरों की नई संभावनाएँ विकसित की जाएँ। संस्कृत को अतीत की धरोहर मानकर संग्रहालयों तक सीमित करने के बजाय भविष्य के ज्ञान-विज्ञान की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करना समय की माँग है।उन्होंने कहा कि ‘संस्कृत सेवाव्रती सम्मान’ केवल सम्मान समारोह नहीं, बल्कि उन मनीषी शिक्षकों के प्रति समाज की सामूहिक कृतज्ञता का प्रतीक है, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन संस्कृत शिक्षा, भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय मूल्यों के संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया। ऐसे शिक्षकों का सम्मान वास्तव में भारतीय ज्ञान-परंपरा का सम्मान है।समारोह की अध्यक्षता केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, भोपाल परिसर के निदेशक प्रो. आजाद मिश्रा ने की। उन्होंने कहा कि संस्कृत शिक्षक भारतीय संस्कृति के सच्चे प्रहरी हैं। उनके समर्पण ने भारतीय संस्कारों की जड़ों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुदृढ़ बनाए रखा है।

केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, लखनऊ परिसर के निदेशक एवं सारस्वत अतिथि प्रो. सुरेंद्र पाठक ने कहा कि संस्कृत केवल अतीत की गौरवगाथा नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं का भी सशक्त माध्यम है। उन्होंने संस्कृत को युवाओं के जीवन, शिक्षा और शोध से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के विभिन्न जनपदों से आए सेवानिवृत्त संस्कृत शिक्षकों को प्रशस्ति-पत्र, अंगवस्त्र एवं स्मृति-चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया। समारोह में विद्वानों, शिक्षकों, शोधार्थियों तथा संस्कृत प्रेमियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।समापन में प्रो. मुरलीमनोहर पाठक ने कहा कि संस्कृत का पुनरुत्थान केवल भाषाई आंदोलन नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय अस्मिता और वैश्विक ज्ञान नेतृत्व की पुनर्स्थापना का अभियान है। जब तक संस्कृत जीवंत रहेगी, तब तक भारत की आत्मा, उसकी संस्कृति और उसकी ज्ञान-परंपरा भी अक्षुण्ण बनी रहेगी।

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