बाबा नागार्जुन और भागलपुर
बहुत दिनों के बाद
डा. सामबे
बाबा नागार्जुन से मुलाकात भी एक अजीब इत्तेफाक रहा है। बात 1977 की है। हम इंटर में पढ़ते थे। भागलपुर बंबई जनता एक्स्प्रेस का उदघाटन 26 फरवरी को हुआ और हम उसमें सवार हो गए। पहले दिन, पहली यात्रा, जीवन को नई दिशा देने के लिए ओशो, जो उस समय भगवान श्री रजनीश बन गए थे, उनसे मिलने पूना पहुंचे। सुबह के प्रवचन में उन्होंने एक कविता का पाठ अपने प्रवचन में किया था-
बहुत दिनों के बाद
अबकी मैंने देखे मौलश्री के ताजे टटके फूल
बहुत दिनों के बाद
यह कविता सुनते ही मुझे अपने पाठ्यक्रम की याद आ गई थी। इंटर हिंदी के एक पेपर में यह कविता शामिल की गई थी और उसी का पाठ सुबह के प्रवचन में ओशो अपनी आकर्षक आवाज में कर रहे थे। वातावरण भी कविता के अनुकूल था। फूल ऑडिटोरियम के चारों तरफ खिल रहे थे। सुबह की नर्म मुलायम सूरज की किरणों से ऑडिटोरियम में उजाला फैल रहा था। चिड़ियों की चहचहाट के बीच कविता का पाठ कविता को इसकदर जीवंत कर दिया था कि कोई अलौकिक ध्वनि ब्रह्माण्ड से धरती पर उतर रही हो।
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ओशो के पास एक इंटर के स्टुडेंट् के रूप में गए थे और उधर से ओशो के सन्यासी के रूप में भागलपुर लौटे। मेरे इस रूप को देख कर मेरे इष्ट मित्र बंधु बांधव मुझे आश्चर्यचकित होकर देखने लगे थे।
इसी बीच भगवान पुस्तकालय में बाबा नागार्जुन के आने की सूचना मिली और मैं उनसे मिलने पहुंच गया। शहर के अनेक साहित्यकार वहाँ पहले से मौजूद थे। उसी साहित्यिक कार्यक्रम में मैंने बाबा को पहली बार देखा था। ओशो के मुख से उनकी कविता का पाठ सुन चुका था। पाठ्यक्रम में उनकी कविताओं को पढ़ चुका था। सो, जब उनसे मेरी बातचीत हुई, तब मैंने रजनीश आश्रम, पूना की पूरी बात उन्हें बतलाई। बाबा मेरी बात सुनकर खुश हो गए थे। उनकी कविता का पाठ और उसकी व्याख्या आचार्य रजनीश को करते जानकर बाबा अति प्रसन्न थे और यहीं से वे मुझे अपने साथ रहने के लिए कहा था।
भगवान पुस्तकालय से भागलपुर विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के एक साहित्यिक कार्यक्रम में उन्हें काव्य पाठ करना था। हम लोग साथ साथ विश्वविद्यालय की ओर चले। रास्ते में धूप बड़ी तेज थी। बाबा कोई ओशो थे नहीं, कि उनके पास राॅल्स राॅय कार हो। वे तो जनवादी थे। हमलोग पैदल चल रहे थे। मुझे पसीने से तरबतर देखकर उन्होंने कहा कि इस चिलचिलाती धूप को चांदनी मानकर चलो। मन प्रसन्न रहेगा। फिर क्या था? बाबा के साथ वर्षों रहे, प्रसन्न रहे।
उस दिन हिंदी विभाग के कार्यक्रम में मुझे श्रोताओं और दर्शकों से रूह- ब- रूह कराते हुए उन्होंने रजनीश का जिक्र करते हुए वही कविता का पाठ किया था-
बहुत दिनों के बाद
बहुत दिनों के बाद आज बाबा के भागलपुर आगमन की चर्चा कर रहे हैं। भागलपुर से बाबा का नाता बहुत पुराना रहा है। वह मैथिली, हिंदी, बांग्ला और संस्कृत यानी कई भाषाओं के कवि थे। अनेक भाषाओं में कविता लिखते थे। मुझसे अंगिका में भी धाराप्रवाह बात करते थे।














