लघुकथा-संग्रह ‘बाढ़’ पर आपकी इतनी विस्तृत, गंभीर और आत्मीय समीक्षा के लिए हृदय से आभार
आदरणीय दयानंद जायसवाल जी,
मेरे लघुकथा-संग्रह ‘बाढ़’ पर आपकी इतनी विस्तृत, गंभीर और आत्मीय समीक्षा के लिए हृदय से आभार।
आपने संग्रह को केवल प्राकृतिक आपदा की कहानियों के रूप में न देखकर लोकजीवन, विस्थापन, सामूहिक स्मृति, पर्यावरणीय संकट, मानवीय जिजीविषा और भीतर-बाहर की बाढ़ के व्यापक संदर्भ में पढ़ा है। विशेषतः मेरी चित्रकार-दृष्टि, कथाओं की दृश्यात्मकता, आंचलिक भाषा, लोक-संवेदना तथा “एक चूल्हा हमेशा बचा रहता है” जैसे जीवनधर्मी प्रतीकों को आपने जिस सूक्ष्मता से पहचाना है, वह आपकी गहरी आलोचनात्मक दृष्टि और संवेदनशील साहित्य-बोध का प्रमाण है।
‘पन्नी के घर की रोशनी’, ‘मिट्टी का अंतिम स्पर्श’, ‘पुरानी संदूक’, ‘पानी में गूँजती आँगन की आवाज़ें’ और ‘दीप बहाने की रात’ जैसी लघुकथाओं की आपने केवल व्याख्या नहीं की, बल्कि उनके भीतर छिपे सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय अर्थों को भी उद्घाटित किया है। आपकी समीक्षा ने मेरे रचनात्मक सरोकारों को अधिक व्यापक और स्पष्ट रूप में पाठकों के सामने रखा है। इसके लिए मैं आपका विशेष रूप से कृतज्ञ हूँ।
हाँ, इस आत्मीय समीक्षा को पढ़ते हुए मन में एक जिज्ञासा भी हुई—आपने संग्रह की भूमिका, संरचना और लघुकथाओं पर विस्तार से विचार किया, किंतु पुस्तक के महत्त्वपूर्ण अंग ‘उपसंहार’ और ‘परिशिष्ट : बाढ़ के पार’ समीक्षा में सम्मिलित होने से रह गए। संभवतः यह अनायास हुआ होगा। मेरा विनम्र अनुरोध है कि आप इन दोनों अंशों को भी अपनी आलोचनात्मक दृष्टि से देखें और समीक्षा में जोड़कर इसे पूर्णता प्रदान करने की कृपा करें। मुझे विश्वास है कि उपसंहार और परिशिष्ट पर आपका विवेचन संग्रह की समग्र रचनात्मक दृष्टि तथा उसके पर्यावरणीय और सभ्यतागत सरोकारों को और अधिक स्पष्ट करेगा।
आपकी यह समीक्षा मेरे लिए केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि अपनी रचनात्मक यात्रा को समझने और आगे सँवारने वाला एक महत्त्वपूर्ण आलोचनात्मक दस्तावेज है।
आपके इस आत्मीय श्रम, उदार प्रशंसा और मूल्यवान आलोचनात्मक दृष्टि के लिए पुनः हृदय से आभार।
सादर — रंजन
वरिष्ठ साहित्यकार रंजन कुमार के फेसबुक वॉल से साभार।














