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पण्डित गोपीनाथ कविराज की सारस्वत साधना 

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पण्डित गोपीनाथ कविराज की सारस्वत साधना 

– प्रो अंबिका दत्त शर्मा, अध्यक्ष,                  अखिल भारतीय दर्शन परिषद्, भारत।

 

इदं अंधं तमः कृत्स्नं जायेत भुवनत्रयम्। यदि शब्दाह्वयं ज्योतिरासंसारं न दीप्यते॥

भारत अध्ययन की परंपरा: व्यक्ति, विचार और संस्थाएं—इस विषय पर 15 दिनों की कार्यशाला का आयोजन भारत अध्ययन केंद्र और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित है। भारत अध्ययन केंद्र के निदेशक, मेरे अनन्य मित्र प्रोफेसर शर्तेंदु जी, अमित जी, सामने बैठे ज्ञानेंद्र राय जी, चक्रवर्ती मैडम, सशरीर उपस्थित प्रतिभागी और आभासी माध्यम से जुड़े सभी प्रतिभागियों का मैं अभिवादन करता हूं।

मैं शर्तेंदु जी और अमित जी के प्रति आभार और कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं कि आपने मुझे उस विश्वविद्यालय में बोलने के लिए बुलाया, जिसका स्वयं मैं अपने आप को एक उत्पाद समझता हूं। यदि मैं इस विश्वविद्यालय की ही निर्मिति हूं, तो यहां बोलने आते समय मैं एक आचार्य की भूमिका में नहीं आता। इस परिसर में प्रवेश पाने के पश्चात मेरा मन और मिजाज, चित्त और चेतना दोनों उसी विद्यार्थी जीवन में फिर से कायांतरित हो जाते हैं।

मित्रों, महामना मदन मोहन मालवीय जी को प्रणाम करते हुए मैं आज आपके सामने महामहोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज की सारस्वत साधना पर कुछ विचार साझा करने का प्रयास करूंगा। जब अमित जी ने मुझसे गोपीनाथ कविराज पर बोलने को कहा, तब से लेकर इस मंच पर खड़े होने तक मेरा मन अत्यंत भयभीत रहा। भय इतना था कि आज सुबह मैंने नवजीवन रस्तोगी जी को फोन किया, पर उन्होंने फोन नहीं उठाया। फिर मैंने प्रोफेसर पी. के. मुखोपाध्याय को फोन कर कहा—”सर, आप मुझे आशीर्वाद दीजिए। आज मुझे महामहोपाध्याय पंडित गोपीनाथ कविराज पर बोलना है और यह मेरे सामर्थ्य से बाहर की चीज है, मेरे लिए दुस्साहस है। आप आशीर्वाद दीजिए कि मेरी जिह्वा स्खलित न हो। मैं उनके विषय में कुछ अच्छा न कह पाऊं या उनकी सारस्वत साधना के अंतर्निहित अर्थ को प्रकट न कर पाऊं, तो कम से कम मेरे मुख से कोई अपसिद्धांत न निकले।”

मैं यह इसलिए बता रहा हूं क्योंकि महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज पर बोलना कोई साधारण बात नहीं है। वे ऊपर से तो हमारी-आपकी तरह एक साधारण गृहस्थ व्यक्ति थे, जो गृहस्थ जीवन की समस्त पीड़ाओं को झेलते थे और उसके सुखों का आस्वादन भी लेते थे। लेकिन क्या पंडित गोपीनाथ कविराज वही थे जो इन आंखों से दिखाई पड़ते थे? जो दिखाई पड़ते थे, वे केवल वही नहीं थे; और जो वे वास्तव में थे, उसे साधारण आंखों से देखा नहीं जा सकता था। यही कठिनाई उनके विषय में बोलने में है।

मैं आज गोपीनाथ कविराज की सारस्वत साधना पर कोई बहुत प्रतिपादनात्मक व्याख्यान देने नहीं जा रहा हूं, क्योंकि उसकी समझ में मेरी भी प्रौढ़ता नहीं है। मैं वैसा शिक्षक नहीं हूं जिसके लिए कालिदास ने कहा था कि जो अपनी विद्या को दूसरों में सहजता से संक्रांत कर सके। इसलिए मैं आपसे कुछ बातें साझा करना चाहता हूं, जिनका प्रयोजन आपके मन में उनके प्रति श्रद्धा और निष्ठा जगाकर भारत की ज्ञान परंपरा के प्रति निष्ठा उत्पन्न करना है।

अपने विद्यार्थी जीवन में मैं 3:30 बजे तक काशी हिंदू विश्वविद्यालय की कक्षाएं करता था और उसके बाद सीधे ठठेरी बाजार जाता था, जहां हमारे गुरु स्वामी योगेंद्र जी का आश्रम था। वहां भारतीय दर्शन के मूल ग्रंथों को पढ़ने के लिए मैं करीब 4:30 बजे पहुंच जाता था। पंडित गोपीनाथ कविराज के विषय में मैंने सबसे पहले अपने गुरुजी के मुख से ही सुना, क्योंकि वे कविराज जी को अपना सारस्वत गुरु मानते थे। स्वामी योगेंद्रानंद जी जो भी ग्रंथ लिखते थे, उन्हें दिखाने और शास्त्र की गुत्थियों को सुलझाने के लिए कविराज जी के पास जाते थे। गुरुजी ने एक बार बताया था कि वे मीमांसा, न्याय, वेदांत पर ग्रंथ लिखकर चर्चा करने जाते थे और शास्त्र के दुर्लभ संदर्भ रखते थे, लेकिन इतने लंबे सानिध्य के बावजूद वे कभी कोई ऐसी पंक्ति या संदर्भ नहीं रख सके जो कविराज जी को पहले से ज्ञात न हो। स्वामी योगेंद्र जैसे विशाल सारस्वत व्यक्तित्व वाले व्यक्ति का यह स्वीकारना अत्यंत आश्चर्यजनक है।

महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज के व्यक्तित्व के दो पक्ष हैं—एक भारतीय दर्शन के महान विद्वान का पक्ष और दूसरा गहन साधना का पक्ष। इन दोनों का विरला संयोग होता है। बहुत कम लोग होते हैं जो जितने धुरंधर विद्वान हों, उतने ही गहन साधक भी हों। प्रायः व्यक्ति या तो साधक हो पाता है या विद्वान बनकर बुद्धि के चाकचिक्य में उलझा रह जाता है। प्राचीन काल से अब तक देखें तो 19वीं-20वीं शताब्दी में गोपीनाथ कविराज अभिनवगुप्त के अवतार प्रतीत होते हैं, क्योंकि अभिनवगुप्त में भी यही वैशिष्ट्य था—अपार विद्वता और साधना की पराकाष्ठा।

अभिनवगुप्त ने अपने विषय में कहा था कि वे जन्म से अत्रिगोत्री हैं, लेकिन उनका सारस्वत गोत्र ‘अगस्त्य’ है। अगस्त्य कोई पारंपरिक गोत्र नहीं है, लेकिन इसके कहने का अभिप्राय यह था कि जैसे अगस्त्य मुनि ने पूरे समुद्र को पी लिया था, वैसे ही उन्होंने समस्त शास्त्रों को आचमन कर लिया था। गोपीनाथ कविराज पर भी यह बात पूरी तरह लागू होती है। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के सरस्वती भवन पुस्तकालय (जिसमें लाखों पांडुलिपियां व पुस्तकें हैं) के जब वे आर्थर वेनिस की सिफारिश पर अध्यक्ष बने, तो बनारस की न्याय परंपरा के मूर्धन्य विद्वान राजाराम शास्त्री द्रविड़ ने कहा था कि पंडित गोपीनाथ कविराज सरस्वती भवन की लाखों पुस्तकों और पांडुलिपियों को न केवल पढ़ चुके थे, बल्कि वे सब उनके वर्तमान स्मरण में भी विराजमान थीं। एक लाइब्रेरियन के पद पर रहते हुए ऐसा ज्ञान अर्जित करना अद्भुत है।

उनकी जीवनी पर प्रकाश डालें तो उनका जन्म वर्तमान बांग्लादेश के ढाका जिले के धामराई गांव में 7 सितंबर 1887 को हुआ था। उनके जन्म से पांच महीने पहले ही उनके पिता बैकुंठनाथ जी की मृत्यु हो गई थी, यानी वे अनाथ पैदा हुए। उनके पिता कलकत्ता विश्वविद्यालय में एम.ए. के छात्र थे और बृजेंद्रनाथ शील व नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद) उनके सहपाठी थे। उनका पालन-पोषण कालाचंद नामक एक निसंतान व्यक्ति ने किया। कालाचंद अपनी जायदाद गोपीनाथ के नाम करना चाहते थे, जिससे ईर्ष्यावश उनके रिश्तेदारों ने कालाचंद की हत्या कर दी। इस तरह वे पुनः अनाथ हो गए।

शिक्षा के लिए वे कलकत्ता, जयपुर और काशी की खाक छानते रहे, जबकि उनकी मां गांव में उनके विरह में कष्ट सहती रहीं। 1910 में स्नातक करने के बाद वे काशी आए और 12 जून 1976 को मृत्यु पर्यंत काशी में ही रहे। जीवन के अंतिम वर्षों में वे माता आनंदमई के सानिध्य में रहे। उनके निधन पर माता आनंदमई ने कहा था—”अब कोई दूसरा गोपीनाथ कविराज नहीं होगा।”

बनारस आने पर क्वींस कॉलेज के प्रिंसिपल आर्थर वेनिस से उनकी भेंट हुई, जो अत्यंत शिष्यवत्सल थे। वेनिस ने गोपीनाथ को अपना अंतवासी बना लिया और उनके अकादमिक निर्माण में बड़ी भूमिका निभाई। उन्हीं के कहने पर वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. करने गए और प्राचीन इतिहास, संस्कृति, मुद्राशास्त्र व अभिलेखीय साहित्य में उपाधि प्राप्त की। 1914 से 1920 तक वे संस्कृत कॉलेज (संपूर्णानंद) के सरस्वती भवन पुस्तकालय के अध्यक्ष रहे। इस देश में दो महान पुस्तकालय अध्यक्ष हुए—सरस्वती भवन के गोपीनाथ कविराज और दरभंगा महाराज की लाइब्रेरी के गंगानाथ झा। इन दोनों ने लाइब्रेरियन के पद को जो गरिमा और पहचान दी, वह अतुलनीय है।

नौकरी मिलने पर गोपीनाथ जी सबसे पहले अपनी माता को गांव से काशी ले आए और मातृभक्त की तरह रहे। यह प्रसंग आचार्य शंकर का स्मरण कराता है। गृहस्थ जीवन में उन्होंने बड़े बेटे की शादी की, लेकिन दुख ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। अल्पायु में ही उनके बड़े पुत्र का निधन हो गया, जिसके बाद पौत्र और पुत्रवधू की पूरी जिम्मेदारी उन्होंने उठाई। जीवन भर संघर्ष और दुख सहने के इस क्रम को देखकर पश्चिमी दार्शनिक कीर्केगार्ड की याद आती है। कीर्केगार्ड ने कहा था—”ईश्वर जिस पर प्रसन्न होता है, वह अपनी सबसे विश्वस्त परिचारिका ‘दुख’ को आदेश देता है कि जाओ और मेरे प्रिय को गले लगा लो।” अर्थात जीवन में दुख की भी एक सृजनात्मक प्रयोजनीयता होती है।

युवावस्था में जब राष्ट्रीय आंदोलन और बंग-भंग का दौर था, जब बंकिमचंद्र का ‘वंदे मातरम’ गूंज रहा था और अरविंदो की पत्रिका का प्रभाव था, तब गोपीनाथ जी ने अन्य युवाओं की तरह राजनीतिक आंदोलन में सक्रिय भाग नहीं लिया। इसका कारण यह था कि उनके लिए भारत की राजनीतिक स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण ‘ज्ञानात्मक स्वतंत्रता’ और ‘ज्ञानात्मक स्वराज’ था। उन्होंने भारत के अतीत, उसकी ज्ञान परंपरा और संस्कृति की उपासना में स्वयं को समर्पित कर दिया।

सरस्वती भवन में योग और तंत्र की दुर्लभ पांडुलिपियों का अध्ययन करते हुए उनके भीतर साधना की उत्कंठा जगी। साधना के लिए गुरु की आवश्यकता होती है। कहा जाता है कि “कलाकार की रागिनी मर्मज्ञ कानों को खोज ही लेती है”—पात्रता होने पर गुरु स्वयं मिल जाते हैं। 1910 में उनकी मुलाकात शिवराम किंकर योगत्रयानंद से हुई, जिनसे 1917 तक उन्हें योग और तंत्र का प्रारंभिक प्रशिक्षण मिला। इसके बाद 1917 में उन्हें महायोगी विशुद्धानंद जी (जिन्हें बनारस में ‘गंध बाबा’ कहा जाता था) का सानिध्य मिला और उन्होंने उनसे दीक्षा ली।

विशुद्धानंद जी सूर्य विज्ञान के माध्यम से स्फटिक शीशे द्वारा सूर्य की किरणों को केंद्रित करके इच्छित सुगंध या पदार्थ उत्पन्न कर देते थे। विशुद्धानंद जी के प्रति गोपीनाथ जी की निष्ठा इतनी थी कि उनके मरणोपरांत उन्होंने बांग्ला में पांच खंडों में उनकी जीवनी लिखी। यदि गोपीनाथ कविराज को वास्तव में समझना हो, तो उनके द्वारा अपने गुरु पर लिखी गई यह जीवनी सबसे उपयुक्त माध्यम है, ठीक वैसे ही जैसे प्लेटो के लिखे संवादों के माध्यम से सुकरात को समझा जाता है। जब भगवती प्रसाद सिंह कविराज जी की जीवनी लिखने का प्रस्ताव लेकर गए, तो कविराज जी ने अंग्रेजी में कहा—”My picture in the hand of Divine” (ईश्वर के हाथों में मेरा चित्र)। उनका मानना था कि जीवन की छोटी से छोटी घटना में एक दैवीय प्रयोजनीयता (Teleology) निहित होती है।

अब प्रश्न उठता है कि भारत अध्ययन की परंपरा में गोपीनाथ कविराज को क्यों याद किया जाए? साधना तो व्यष्टिगत (व्यक्तिनिष्ठ) होती है, जो व्यक्ति को मुक्ति दिलाती है; परंतु किसी ज्ञान परंपरा और सभ्यता में उनका क्या योगदान है? तंत्रालोक पर जयरथ की ‘विवेक’ टीका में एक सच्चे अधिकारी और अध्येता की कसौटी बताई गई है:

योऽधीतनिखिलागमेषु पदविद्योगशास्त्रश्रमी

यो वाक्यार्थसमन्वये कृतमतिः श्रीप्रत्यभिज्ञान्वयी।

यस्तर्कान्तविश्रुतश्रुततया द्वैताद्वैतज्ञानवित्

सोऽस्मिन्नधिकारवान् कलकलप्रायं परेषाम वचः॥

अर्थात वही व्यक्ति शास्त्र विमर्श का वास्तविक अधिकारी है जो समस्त आगमों का अध्ययन कर चुका हो, व्याकरण और योगशास्त्र में जिसने परिश्रम किया हो, मीमांसा और प्रत्यभिज्ञा दर्शन का ज्ञाता हो, तथा तर्कशास्त्र के कौशल के साथ द्वैत और अद्वैत की समस्त विधाओं को जानता हो। यदि किसी में यह पात्रता नहीं है, तो उसके वचन केवल ‘कलकल’ यानी व्यर्थ की बड़बड़ाहट या झगड़े के समान हैं।

 

यदि आप जयरथ की इस कसौटी को पंडित गोपीनाथ कविराज पर लागू करें, तो यह कसौटी उन पर सर्वांशतः लागू होती है। आप उनके द्वारा लिखे गए ग्रंथों को पढ़िए—उन्होंने तंत्र, भारतीय संस्कृति और साधना, न्याय दर्शन तथा सांख्य दर्शन पर जो लिखा है, उसका गहन अध्ययन करने पर समझ में आता है कि वे किन अद्भुत क्षमताओं से युक्त होकर लिखते थे।

इस बात को स्पष्ट करने के लिए कुल्लूक भट्ट की पंक्तियां अत्यंत प्रासंगिक लगती हैं। कुल्लूक भट्ट जब मनुस्मृति की टीका लिख रहे थे, तो मंगलाचरण के रूप में कहते हैं कि वे इतना महान कार्य करने जा रहे हैं, इसलिए सहायता की कामना करते हैं। वे किसी मनुष्य से सहायता नहीं मांगते, बल्कि शास्त्रों का आह्वान करते हैं:

मीमांसे बहुसेवितासि सुदृढा समस्तमेवेदिता परमार्थबोधगुरवो यूयं मयोपासिताः।

जाता व्याकरण बालसखिता युष्माभिरभ्युद्यतः प्राप्तोऽयं समयो मनूक्तविवृतौ सहायं कुरु॥

अर्थात, “हे मीमांसा! तुम मेरी दीर्घकाल से सेवित और गहनता से अधीत विद्या हो। समस्त तर्कशास्त्र मेरे सुहृद हैं। हे वेदांतगण! तुम परमार्थ तत्व का बोध कराने वाले मेरे गुरु हो और मैंने तुम्हारी श्रद्धापूर्वक उपासना की है। हे व्याकरण शास्त्र! तुम तो बाल्यावस्था से ही मेरे परम सखा रहे हो। अतः आज जब मैं मनु-प्रणीत शास्त्र की व्याख्या करने में प्रवृत्त हुआ हूं, तब कृपया आप सभी विद्या-रूपी सुहृद मेरी सहायता करें।”

पंडित गोपीनाथ कविराज जब भारतीय दर्शन के किसी विषय पर लिखते थे, तो कुल्लूक भट्ट की सहायता के लिए उपस्थित होने वाले ये सभी शास्त्र उनकी भी सहायता में सदा तत्पर रहते थे।

जब वे इस विशाल क्षमता के साथ भारतीय दर्शन परंपरा पर लिखने में प्रवृत्त होते हैं, तो उनके लिए दर्शन की अवधारणा एक नया रूप लेती है। स्वयं पंडित गोपीनाथ कविराज कहते हैं कि अपने सीमित अर्थ में दर्शन मानव जीवन के संस्करण की दिशा में मात्र एक चरण है। इस चरण को फलप्रद बनाने के लिए यह आवश्यक है कि दर्शन प्रातिभ-बोध (अंतःप्रज्ञा) द्वारा प्राप्त तथ्यों और अनुभूतियों की अधीनता में रहे, अन्यथा इसके भटक जाने की संभावना बनी रहती है।

पाश्चात्य अवधारणा में दर्शन को मुख्यतः ‘रीजन’ (बुद्धि) का उत्पाद माना जाता है, जिसकी सीमाएं केवल बौद्धिक जगत तक सीमित हैं। इसके विपरीत, गोपीनाथ कविराज का मानना था कि दर्शन को सदैव ऋषियों-मुनियों की उच्चस्तरीय प्रातिभ-अनुभूतियों (इन्ट्युशन) के साए में रहना चाहिए। हमारे ऐंद्रिक और बौद्धिक अनुभव में सत्ता और अस्तित्व की परिपूर्णता नहीं आ सकती; उसे प्राप्त करने के लिए अनुभूति के स्तर को उत्क्रमित करना पड़ता है, जो केवल प्रातिभ-बोध, आगम और श्रुतियों के माध्यम से संभव है।

ऐसा कहकर वे औपनिवेशिक मानसिकता वाले उन विद्वानों को उत्तर देते हैं जो भारतीय दर्शन को केवल शब्द-प्रमाणवादी कहकर उसकी अवहेलना करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि आगम और श्रुतियों की सहायता के बिना बौद्धिक अनुभव की परिपूर्णता संभव नहीं है। भारतीय दर्शन केवल बौद्धिक जिज्ञासा तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां बुद्धि, श्रुति को पुष्ट करने की भूमिका निभाती है। इसीलिए मनु कहते हैं कि जो वेद और मूल ग्रंथों का अवमान करता है, वह बहिष्कार योग्य है।

भारतीय दर्शन केवल एक सिद्धांत (थ्योरी) नहीं है, बल्कि यह एक निदान (थेरेपी) भी है। औपनिवेशिक समझ ने भारतीय दर्शन की विभिन्न धाराओं—न्याय, मीमांसा, वेदांत, बौद्ध—को अलग-अलग संप्रदायों में बांटकर उनके आपसी खंडन-मंडन को ही प्रमुखता से दिखाया। परंतु पंडित गोपीनाथ कविराज ने विभिन्न संप्रदायों में अंतर्निहित एकत्व और समन्वय के सूत्र को खोजा। यद्यपि रुचियों की विचित्रता के कारण मार्ग अलग हो सकते हैं, किंतु सबका गंतव्य एक ही है।

भारतीय दर्शन अपनी एकांतिक स्थिति में किसी न किसी अद्वैत में परिणत होता है। उपनिषद परंपरा का अद्वैत, व्याकरण परंपरा का शब्दाद्वैत (भर्तृहरि), बौद्ध परंपरा का शून्याद्वैत व विज्ञानाद्वैत, तंत्र परंपरा का स्वातंत्र्य-अद्वैत (अभिनवगुप्त) और साहित्य शास्त्र का रसाद्वैत—इन सभी की परिणति अद्वैत में ही होती है। गोपीनाथ कविराज ने न्याय और सांख्य दर्शन की भी ऐसी व्याख्या प्रस्तुत की जिससे वे भी इस समन्वयात्मक स्वर से अलग न पड़ें।

जिस प्रकार रामकृष्ण परमहंस ने साधना के विभिन्न मार्गों की एकरूपता को सिद्ध किया और स्वामी विवेकानंद ने उसी आधार पर सार्वभौम धर्म की स्थापना की, ठीक वही कार्य पंडित गोपीनाथ कविराज ने दर्शन के क्षेत्र में चरितार्थ करके दिखाया।

तंत्र साधना में यह माना जाता है कि मानव शरीर इस संपूर्ण ब्रह्मांड का एक सूक्ष्म रूप (आर्किटाइप) है—यत पिंडे तद ब्रह्मांडे। गोपीनाथ कविराज ने इस पारंपरिक अवधारणा को नया आयाम दिया कि यदि साधना के बल से परम चेतना से संपर्क होता है, तो उसका रूपांतरण केवल व्यक्तिगत (व्यष्टि) न होकर वैश्वीय (समष्टि) होना चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने ‘अखंड महायोग’ की स्थापना की। उन्होंने माना कि साधना केवल स्वयं के रूपांतरण का माध्यम नहीं है, बल्कि साधक पूरे विश्व के रूपांतरण का निमित्त बनता है।

भारतीय साधना परंपरा में व्यक्तिगत मुक्ति पर तो बल था, किंतु सर्व-मुक्ति का सिद्धांत गौण था (जिसकी झलक बौद्धों की महायान परंपरा और बुद्ध की महाकरुणा में मिलती है)। इस अभाव को पंडित गोपीनाथ कविराज ने अखंड महायोग की अवधारणा से पूरा किया।

वेद, उपनिषद और दर्शन द्वारा प्रतिपादित मनुष्य के उदात्त स्वरूप का जीवंत और मूर्त प्रमाण गोपीनाथ कविराज जैसे मनीषियों में देखने को मिलता है। उन्हें देखकर ही भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रामाणिकता का साक्षात बोध होता है। आज के समय में ऐसे प्रमाणभूत पुरुषों का अकाल सा पड़ गया है, फिर भी उनके विचारों का स्मरण करना ज्ञान परंपरा को जीवंत रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

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