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पण्डित गोपीनाथ कविराज की सारस्वत साधना विषय पर प्रो अम्बिका दत्त शर्मा का व्याख्यान 

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पण्डित गोपीनाथ कविराज की सारस्वत साधना विषय पर प्रो अम्बिका दत्त शर्मा का व्याख्यान 

वाराणसी, 18 अगस्त 2026। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन केन्द्र एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पंद्रह दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला “भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ” के अंतर्गत  प्रथम सत्र में “पंडित गोपीनाथ कविराज की सारस्वत साधना” विषय पर हरि सिंह विश्वविद्यालय, सागर में दर्शनशास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. अंबिका दत्त शर्मा ने व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि पं. गोपीनाथ कविराज भारतीय ज्ञान-परंपरा में ऐसे विलक्षण मनीषी थे, जिनके व्यक्तित्व में शास्त्र की व्यापक विद्वत्ता और गहन साधना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने भारतीय दर्शन को केवल बौद्धिक चिंतन का विषय न मानकर जीवन के रूपांतरण और साधना का माध्यम माना।
प्रो. शर्मा ने कहा कि यदि गोपीनाथ कविराज को वास्तव में समझना है तो उनके जीवन और कृतित्व को केवल एक विद्वान के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। वे एक ओर न्याय, वेदान्त, सांख्य-योग, बौद्ध, तंत्र और अन्य भारतीय दार्शनिक परंपराओं के गंभीर अध्येता थे, वहीं दूसरी ओर उच्चकोटि के साधक भी थे। श्री श्री आनंदमयी माता की परंपरा से जुड़े स्रोत भी कविराज की व्यापक दार्शनिक विद्वत्ता और योग-तंत्र साधना की पुष्टि करते हैं।
उन्होंने कहा कि कविराज का जीवन स्वयं इस बात का उदाहरण है कि भारतीय परंपरा में विद्या और साधना अलग-अलग क्षेत्र नहीं हैं। उनके जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं में भी एक व्यापक प्रयोजन दिखाई देता है। इसी संदर्भ में उन्होंने कविराज के कथन “My picture in the hand of Divine” का उल्लेख करते हुए कहा कि वे अपने जीवन को दैवी प्रयोजन की व्यापक योजना का हिस्सा मानते थे।
प्रो. शर्मा ने कहा कि युवा गोपीनाथ कविराज ऐसे समय में सक्रिय हुए जब बंग-भंग आंदोलन और राष्ट्रीय चेतना अपने उत्कर्ष पर थी। इसके बावजूद उन्होंने राजनीतिक आंदोलन में प्रत्यक्ष भागीदारी के बजाय भारतीय ज्ञान-परंपरा के अध्ययन और साधना को अपना जीवन समर्पित किया। उनके अनुसार, कविराज के लिए राजनीतिक स्वराज्य से अधिक महत्त्वपूर्ण भारत का ज्ञानात्मक स्वराज्य था।
उन्होंने कहा कि भारत को समझने के लिए भारत की अपनी ज्ञान-परंपराओं, शास्त्रों और साधना-पद्धतियों के भीतर प्रवेश करना आवश्यक है। कविराज ने इसी दिशा में अपना पूरा जीवन लगाया।
प्रो. शर्मा ने सरस्वती भवन पुस्तकालय में कविराज की भूमिका को विशेष रूप से रेखांकित किया। वे लंबे समय तक सरस्वती भवन के पुस्तकालयाध्यक्ष रहे और इस अवधि में दुर्लभ ग्रंथों तथा पांडुलिपियों के अध्ययन के माध्यम से भारतीय दर्शन, योग और तंत्र की गहन साधना की। उनके शोध का विस्तार इतना व्यापक था कि उन्हें भारतीय दर्शन की अनेक शाखाओं का गहन ज्ञाता माना गया है।
उन्होंने कहा कि कविराज के लिए पुस्तकालय केवल पुस्तकों का संग्रह नहीं था, बल्कि वह भारत की ज्ञान-संपदा में प्रवेश का द्वार था। इसी अध्ययन के क्रम में उनके भीतर योग और तंत्र-साधना के प्रति गहरी जिज्ञासा विकसित हुई।
प्रो. शर्मा ने गोपीनाथ कविराज के दर्शन की व्याख्या करते हुए कहा कि भारतीय दर्शन को केवल पश्चिमी अर्थ में बौद्धिक जिज्ञासा का परिणाम मानना उचित नहीं है। भारतीय दर्शन में ऋषियों की अनुभूति, श्रुति, आगम और साधना से प्राप्त उच्चतर ज्ञान का भी महत्त्व है।
उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन सिद्धांत भी है और साधना भी, Theory भी है और Therapy भी। इसका उद्देश्य केवल संसार की व्याख्या करना नहीं, बल्कि मनुष्य के जीवन का रूपांतरण करना है। उन्होंने कहा कि कविराज की दृष्टि में दर्शन को प्राचीन अनुभूतियों के आलोक में समझना चाहिए। इस दृष्टि से भारतीय दर्शन में शब्द प्रमाण, श्रुति और आगम की भूमिका को भी समझा जा सकता है।
प्रो. शर्मा ने कहा कि गोपीनाथ कविराज का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान भारतीय दर्शन की विभिन्न धाराओं में अंतर्निहित समन्वयकारी स्वर को पहचानना है। जिस प्रकार श्रीरामकृष्ण परमहंस ने विभिन्न धार्मिक साधना-पद्धतियों के माध्यम से एक ही परम लक्ष्य की अनुभूति का प्रतिपादन किया और स्वामी विवेकानंद ने उसे धर्म के सार्वभौमिक स्वरूप के रूप में प्रस्तुत किया, उसी प्रकार कविराज ने भारतीय दर्शन की विविध परंपराओं में अंतर्निहित एकता को सामने रखा। उन्होंने कहा कि भारतीय दर्शन की विभिन्न धाराओं—वेदान्त, व्याकरण, बौद्ध, तंत्र और साहित्यशास्त्र में विभिन्न रूपों में अद्वैत या अभेद की ओर उन्मुखता दिखाई देती है। कविराज ने इसी व्यापक दार्शनिक समन्वय को समझने का प्रयास किया।
प्रो. शर्मा ने गोपीनाथ कविराज की अखंड महायोग की अवधारणा को विशेष महत्त्व दिया। उन्होंने कहा कि सामान्यतः साधना को व्यक्ति की मुक्ति और आध्यात्मिक उन्नति का साधन माना जाता है, लेकिन कविराज की दृष्टि इससे आगे जाती है। यदि मानव शरीर समस्त सृष्टि का एक प्रतिरूप है और साधना के माध्यम से उसमें परात्पर चेतना का अवतरण होता है, तो उसका परिणाम केवल व्यक्तिगत नहीं हो सकता। उसका प्रभाव समष्टि और विश्व पर भी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अखंड महायोग का मूल भाव यही है कि साधना केवल व्यक्ति की उन्नति का माध्यम न बने, बल्कि उसके माध्यम से समस्त विश्व की उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो।

प्रो. शर्मा ने निष्कर्ष रूप में कहा कि पं. गोपीनाथ कविराज को याद करना केवल एक महान विद्वान को याद करना नहीं है, बल्कि भारत को उसकी अपनी ज्ञान-दृष्टि से समझने की परंपरा को याद करना है। उनके जीवन में शास्त्र, साधना, दर्शन, अनुभूति और समष्टि-कल्याण एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। गौरतलब है कि पं. गोपीनाथ कविराज की विद्वत्ता का विस्तार भारतीय दर्शन की अनेक शाखाओं तक था और उनके लेखन में योग, तंत्र, भारतीय साधना, दर्शन तथा साहित्य सहित विविध विषयों पर गंभीर चिंतन मिलता है।

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