वाराणसी। 21 अगस्त 2026
भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला ‘भारत अध्ययन की परंपरा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ’ के अंतर्गत 21 अगस्त 2026 को द्वितीय सत्र में ‘आर्य समाज और भारत का सांस्कृतिक पुनर्जागरण’ विषय पर प्रसिद्ध आर्य समाज के प्रसिद्ध आचार्य डॉ. ज्वलंत कुमार शास्त्री ने व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण को केवल धार्मिक सुधार के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा, सामाजिक समरसता, शिक्षा, आत्मसम्मान और राष्ट्रीय चेतना के व्यापक जागरण के रूप में देखने की आवश्यकता है।
डॉ. शास्त्री ने कहा कि भारत अध्ययन का उद्देश्य भारत को केवल बाहर से प्राप्त विवरणों के आधार पर समझना नहीं, बल्कि उसकी अपनी ज्ञान-परंपरा, ग्रंथों, सामाजिक अनुभवों और सांस्कृतिक चेतना के आधार पर समझना है। इस दृष्टि से उन्नीसवीं शताब्दी का भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। राजा राममोहन राय से आरंभ हुई सुधारवादी चेतना को महर्षि दयानंद सरस्वती ने वैदिक आधार देते हुए व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप दिया। महर्षि दयानंद सरस्वती ने भारतीय समाज को उसकी मूल वैदिक चेतना से जोड़ने के साथ-साथ सामाजिक विषमता और रूढ़ियों के विरुद्ध भी व्यापक संघर्ष किया। उन्होंने कहा कि राजनीतिक पराधीनता के उस दौर में भारत के सामने केवल विदेशी शासन की चुनौती नहीं थी। समाज के भीतर भी अनेक ऐसी रूढ़ियाँ और विकृतियाँ विकसित हो गई थीं, जो भारतीय संस्कृति के मूल मानवीय स्वर से मेल नहीं खाती थीं। दयानंद सरस्वती ने इन विकृतियों की समीक्षा के लिए वेदों को आधार बनाया और ‘वेदों की ओर लौटो’ का आह्वान किया।
डॉ. शास्त्री ने कहा कि दयानंद का सबसे महत्वपूर्ण योगदान ज्ञान के सार्वजनीकरण का था। वेद किसी एक वर्ग की निजी संपत्ति नहीं हैं। वैदिक परंपरा में ज्ञान को व्यापक समाज तक पहुँचाने की भावना रही है। उन्होंने महिलाओं तथा समाज के व्यापक वर्गों को वेदाध्ययन का अधिकार देने की वकालत की। वैदिक साहित्य में ऋषिकाओं की परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जिस परंपरा में महिलाएँ ज्ञान की सर्जक रही हैं, उसमें उन्हें ज्ञान से वंचित करने का कोई औचित्य नहीं हो सकता।
उन्होंने बताया कि आर्य समाज ने शिक्षा को सांस्कृतिक जागरण का प्रमुख माध्यम बनाया। विद्यालयों, गुरुकुलों और शिक्षण संस्थाओं के माध्यम से वैदिक ज्ञान तथा आधुनिक शिक्षा को समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँचाने का प्रयास हुआ। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार और बंगाल सहित अनेक क्षेत्रों में इस शैक्षिक आंदोलन का प्रभाव पड़ा।
डॉ. शास्त्री ने कहा कि दयानंद और आर्य समाज का सामाजिक सुधार केवल बाल-विवाह, अनमेल विवाह, सती-प्रथा और अन्य रूढ़ियों के विरोध तक सीमित नहीं था। दलितोद्धार और सामाजिक समरसता भी उनके कार्य का महत्वपूर्ण पक्ष था। उन्होंने ऐसी परिस्थितियों में काम किया जब दलित समुदाय के लोगों को शिक्षा, सार्वजनिक संसाधनों और सामाजिक जीवन से दूर रखा जाता था।
उन्होंने कहा कि आर्य समाज के कार्यकर्ताओं को सामाजिक रूढ़ियों के समर्थकों के विरोध का भी सामना करना पड़ा। दलित बस्तियों में जाना, उनके बीच शिक्षा का कार्य करना, विद्यालय खोलना, उनके साथ भोजन करना और उन्हें सार्वजनिक कुओं से पानी लेने का अधिकार दिलाने जैसे कार्य उस समय सामाजिक दृष्टि से अत्यंत साहसिक थे। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल किसी समुदाय का उद्धार करना नहीं, बल्कि समूचे भारतीय समाज में सामाजिक समानता और आत्मसम्मान की स्थापना करना था।
डॉ. शास्त्री ने कहा कि आर्य समाज ने जातीय पहचान से जुड़े सामाजिक भेदभाव को कम करने का भी प्रयास किया। अनेक क्षेत्रों में लोगों को जातिसूचक उपाधियों के स्थान पर ‘आर्य’ जैसे व्यापक सामाजिक संबोधन अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। इससे सामाजिक पहचान को जन्माधारित विभाजन से ऊपर उठाकर एक व्यापक सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने का प्रयास हुआ।
उन्होंने कहा कि भारत की स्वतंत्रता केवल राजनीतिक संघर्ष का परिणाम नहीं थी। इसके पीछे लंबे समय तक चला सांस्कृतिक और सामाजिक जागरण भी था। जिस समाज के बड़े हिस्से को शिक्षा और सम्मान से वंचित रखा गया हो, उसे स्वतंत्रता के लिए एकजुट करना संभव नहीं था। इसलिए दलितोद्धार, महिला शिक्षा, सामाजिक समरसता, स्वदेशी और वैदिक ज्ञान का प्रसार—ये सभी राष्ट्रीय जागरण की व्यापक प्रक्रिया के अंग थे।
डॉ. शास्त्री ने स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के संदर्भ में भी महर्षि दयानंद के विचारों को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि अपने देश की वस्तुओं, अपनी भाषा, अपनी शिक्षा और अपनी ज्ञान-परंपरा के प्रति सम्मान का भाव राजनीतिक स्वतंत्रता की मानसिक भूमि तैयार करता है। दयानंद ने भारतीयों में यह विश्वास जगाने का प्रयास किया कि भारत अपनी ज्ञान-परंपरा और सामाजिक शक्ति के आधार पर स्वयं अपना भविष्य निर्धारित कर सकता है।
उन्होंने कहा कि दयानंद सरस्वती का सांस्कृतिक पुनर्जागरण अतीत की अंधस्वीकृति नहीं था। वे परंपरा के भीतर आई विकृतियों को चुनौती देते थे और मूल वैदिक दृष्टि के आधार पर समाज का पुनर्निर्माण करना चाहते थे। इसलिए उनके चिंतन में धार्मिक सुधार, शिक्षा, सामाजिक समरसता, महिला अधिकार, दलितोद्धार, स्वदेशी और राष्ट्रीय चेतना एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। भारत अध्ययन की दृष्टि से दयानंद सरस्वती का महत्व इसी समग्रता में है। उन्होंने भारत को उसके अपने ज्ञान-स्रोतों के आधार पर समझने का आग्रह किया और भारतीय समाज को यह आत्मविश्वास दिया कि अपनी संस्कृति पर गर्व करना और अपनी संस्कृति के भीतर मौजूद विकृतियों का विरोध करना परस्पर विरोधी नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि आर्य समाज ने भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण को सामाजिक धरातल प्रदान किया। वेदों और भारतीय ज्ञान-परंपरा को समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँचाने, शिक्षा का विस्तार करने, सामाजिक भेदभाव को चुनौती देने और राष्ट्रीय आत्मसम्मान जगाने की प्रक्रिया ने आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन के लिए अनुकूल मानसिक और सामाजिक वातावरण तैयार किया।
डॉ. ज्वलंत कुमार शास्त्री ने कहा कि भारत अध्ययन के संदर्भ में दयानंद सरस्वती को केवल धार्मिक सुधारक के रूप में देखना उनके व्यापक योगदान को सीमित करना होगा। वे भारतीय ज्ञान-परंपरा के पुनर्पाठ, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय आत्मबोध के ऐसे चिंतक थे, जिनका प्रभाव आधुनिक भारत के सांस्कृतिक निर्माण तक दिखाई देता है।













