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अंग्रेज़ी विभाग में हिंदी दिवस समारोह: हिंदी को ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और रोजगार की भाषा बनाने पर जोर

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अंग्रेज़ी विभाग में हिंदी दिवस समारोह: हिंदी को ज्ञान-विज्ञान, तकनीक और रोजगार की भाषा बनाने पर जोर
“हिंदी को क्लिष्टता नहीं, सरलता और सहजता आगे बढ़ाएगी” — डॉ. विश्वनाथ विवेका
“भाषा विकास का माध्यम बने, विभाजन का कारण नहीं” — डॉ. फिरोज मंसूरी

14 सितम्बर 2026, विश्वविद्यालय परिसर।
हिंदी दिवस के अवसर पर विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग, उत्तरी परिसर में विभागाध्यक्ष डॉ. विश्वनाथ विवेका की अध्यक्षता में हिंदी दिवस समारोह का आयोजन किया गया। समारोह में हिंदी की संवैधानिक यात्रा, भारतीय भाषायी विविधता, राष्ट्रीय एकता तथा बदलते डिजिटल और वैश्विक परिदृश्य में हिंदी की भूमिका पर गंभीर एवं सार्थक विमर्श हुआ।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं बिहार सरकार की उर्दू सलाहकार समिति के सदस्य डॉ. फिरोज मंसूरी ने कहा कि 14 सितंबर 1949 भारतीय भाषायी इतिहास की एक ऐतिहासिक तारीख है। इसी दिन संविधान सभा ने हिंदी को देवनागरी लिपि में संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 343 का उल्लेख करते हुए कहा कि हिंदी की संवैधानिक स्वीकृति भारत की भाषायी विविधता को समाप्त करने का प्रयास नहीं, बल्कि एक व्यापक संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा थी।

डॉ. मंसूरी ने कहा कि संविधान सभा में भाषा का प्रश्न अत्यंत संवेदनशील था। आर.वी. धुलेकर, सेठ गोविंद दास, पुरुषोत्तम दास टंडन, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अबुल कलाम आज़ाद सहित अनेक सदस्यों ने भाषा के प्रश्न पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत ने भाषा के सवाल का समाधान टकराव से नहीं, बल्कि संवाद, सहमति और संवैधानिक संतुलन के माध्यम से खोजने का प्रयास किया।
उन्होंने स्पष्ट कहा
“हिंदी को मजबूत करने का अर्थ अन्य भारतीय भाषाओं को कमजोर करना नहीं है। हिंदी तभी सशक्त होगी, जब वह बहुभाषिक भारत में संवाद, समन्वय और राष्ट्रीय एकता की भाषा बने। भाषा जोड़ने का माध्यम होनी चाहिए, विभाजन का कारण नहीं।”
डॉ. मंसूरी ने कहा कि हिंदी दिवस केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं, बल्कि हिंदी के भविष्य पर आत्ममंथन करने का दिन भी है। उन्होंने कहा कि हिंदी को भावनात्मक आग्रह से आगे बढ़ाकर ज्ञान, विज्ञान, शोध, तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल मीडिया और रोजगार की भाषा बनाना होगा।
उन्होंने कहा, “यदि हिंदी को नई पीढ़ी की भाषा बनाना है तो उसे आधुनिक ज्ञान की भाषा बनाना होगा। वैज्ञानिक शोध, उच्च शिक्षा, तकनीकी ज्ञान और डिजिटल दुनिया में हिंदी की मजबूत उपस्थिति के बिना हिंदी का भविष्य अधूरा रहेगा।”

अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. विश्वनाथ विवेका ने कहा कि हिंदी भारत की विविध भाषायी और सांस्कृतिक परंपराओं के बीच संवाद स्थापित करने वाली महत्वपूर्ण भाषा है। उन्होंने कहा कि हिंदी का विकास तभी व्यापक होगा, जब उसे आम लोगों की भाषा के रूप में सरल, सहज और स्वाभाविक रूप से स्वीकार किया जाए।

उन्होंने कहा—

“भाषा को क्लिष्ट व्याकरण और अनावश्यक जटिलताओं से दूर रखना होगा। हिंदी जितनी सरल, सहज और जनसुलभ होगी, उसका विकास उतना ही व्यापक होगा। हिंदी को केवल किसी एक दिवस तक सीमित रखना, वास्तव में हिंदी की गरिमा और महत्त्व को सीमित करना है। हिंदी का सम्मान तभी सार्थक होगा, जब वह हमारे व्यवहार, शिक्षा, प्रशासन और दैनिक जीवन की जीवंत भाषा बने।”

उन्होंने आगे कहा कि हिंदी को केवल साहित्य और भाषणों तक सीमित रखने के बजाय शिक्षा, शोध, विज्ञान, तकनीक और प्रशासन के व्यावहारिक क्षेत्र में अधिक प्रभावी ढंग से स्थापित करने की आवश्यकता है।

समारोह में वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि हिंदी और भारतीय भाषाओं का विकास एक-दूसरे के विरोध में नहीं, बल्कि परस्पर सहयोग और सह-अस्तित्व के माध्यम से होना चाहिए। बहुभाषिक भारत में प्रत्येक भाषा अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और ज्ञान-परंपरा की प्रतिनिधि है।

कार्यक्रम में डॉ. राम नारायण साहू, डॉ. सियाराम यादव ‘मयंक’, डॉ. सुधीर कुमार ठाकुर, डॉ. लता अत्रेय, डॉ. रघुवर यादव, डॉ. परफुल्ल कुमार, सुधांशु प्रसाद यादव, विवेकानंद भारती, प्रिंस कुमार एवं रमन कुमार सहित विभाग के शिक्षक एवं अन्य प्रतिभागी उपस्थित रहे।

समारोह के अंत में हिंदी को सरल, सहज, आधुनिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और रोजगारपरक भाषा बनाने तथा भारतीय भाषाओं के बीच आपसी सम्मान और संवाद को मजबूत करने का संकल्प लिया गया।

  1. समारोह का मूल संदेश स्पष्ट था—हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि संवाद की शक्ति है; उसका भविष्य उसके अतीत के गौरव से जितना जुड़ा है, उतना ही ज्ञान-विज्ञान और तकनीक के आधुनिक संसार से भी।

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