हिंदी दिवस पर महाराजा मर्नीद्र चंद्र कॉलेज में अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
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कोलकाता, 14 सितंबर। महाराजा मर्नीद्र चंद्र कॉलेज, कोलकाता के हिंदी विभाग द्वारा एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी पश्चिम बंगाल राष्ट्रभाषा प्रचार समिति एवं आइक्यूएसी महाराजा मर्नीद्र चंद्र कॉलेज के सहयोग से संपन्न हुई। “ग्राम बंगाल की लोक संस्कृति और हिंदी लोक साहित्य की संवेदना एवं अभिव्यक्ति : भारतीय ज्ञान परंपरा विषय पर आयोजित संगोष्ठी में देश-विदेश के विद्वानों ने हिस्सा लिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ मंगलाचरण एवं वंदे मातरम् से हुआ। इस अवसर पर माननीय श्री तापस रॉय, सम्माननीय श्रीमती पूर्णिमा चक्रवर्ती तथा सम्माननीय श्री रितेश तिवारी ने जल अर्पण कर कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किया।इस अवसर पर हिंदी विभाग के विद्यार्थियों ने ‘प्रयास’ वार्षिक दीवार पत्रिका और ‘हिंदी लोक साहित्य’ प्रदर्शनी लगाई। कलकत्ता विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी प्राप्त करने वाले मेधावी विद्यार्थियों को मेडल एवं प्रमाण-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। श्री तापस रॉय, मंत्री, सार्वजनिक उद्यम एवं औद्योगिक पुनर्निर्माण विभाग ने अपने वक्तव्य में हिंदी भाषा और साहित्य के सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित किया।
श्रीमती पूर्णिमा चक्रवर्ती, मंत्री, सूचना, संस्कृति एवं पर्यटन विभाग ने कहा लोक संस्कृति भारतीय समाज की जीवंत सांस्कृतिक धरोहर है और उसके संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता पर बल दिया। श्री रितेश तिवारी, अध्यक्ष, गवर्निंग बॉडी, महाराजा मनींद्र चंद्र कॉलेज ने कहा कि महाविद्यालय में शैक्षणिक गतिविधियों के साथ भारतीय लोक संस्कृति और लोक साहित्य को जोड़ना विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। काॅलेज के प्राचार्य डॉ. गौतम कुमार घोष ने अपने वक्तव्य में हिंदी भाषा एवं साहित्य के सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि लोक साहित्य समाज की जीवंत सांस्कृतिक स्मृति है।
आइक्यूएसी की समन्वयक डॉ. झूमा भौमिक ने लोक साहित्य एवं लोक संस्कृति को समाज की सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण अंग बताया ।श्री शांबा दत्ता, शिक्षक सचिव ने हिंदी भाषा, लोक साहित्य और भारतीय सांस्कृतिक परंपरा के महत्व को रेखांकित किया।
संगोष्ठी में श्रीलंका के सबरागमुवा विश्वविद्यालय के डॉ. ब्रेसिल नगोडा भिताना, एवं प्रो. ची झिलोंग, स्कूल आफ इंटरनेशनल कम्युनिकेशन यूनिवर्सिटी ऑफ चीन ने ऑनलाइन माध्यम से सहभागिता की। दोनों वक्ताओं ने क्रमशः श्रीलंका और चीन की लोक साहित्यिक एवं लोक-सांस्कृतिक परंपराओं पर प्रकाश डालते हुए उनकी विशेषताओं तथा भारतीय लोक परंपराओं के साथ उनके संबंधों और तुलनात्मक पक्षों पर विचार व्यक्त किया। कलकत्ता विश्वविद्यालय के डॉ. शांतनु पाल ने भारतीय ज्ञान परंपरा और प्रकृति के बीच गहरे संबंध को रेखांकित किया। उन्होंने विशेष रूप से भारत की पारंपरिक औषधीय ज्ञान-परंपरा का उल्लेख किया। चटगांव विश्वविद्यालय, बांग्लादेश के श्री प्रदीप घोष ने बंगाल की लोक संस्कृति पर सारगर्भित वक्तव्य रखते हुए लोकजीवन, लोक अभिव्यक्ति और दृश्य माध्यमों के संबंध पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बंगाल की लोक परंपराओं, कथाओं और सांस्कृतिक स्मृतियों को साहित्य के साथ-साथ सिनेमा एवं अन्य कलामाध्यमों के द्वारा भी नई पीढ़ी तक पहुँचाया जा सकता है। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के डॉ. अनिर्बाण घोष ने अपने व्याख्यान में भाषा, संस्कृति और लोक परंपरा के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती, बल्कि उसमें उस समाज की ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक चेतना और लोकज्ञान भी सुरक्षित रहता है।
विद्यासागर विश्वविद्यालय के डॉ. संजय जायसवाल ने कहा भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण परंपराएं लोक साहित्य और लोक संस्कृति से निर्मित हुई हैं।लोक के बिना भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल्यांकन संभव नहीं है। भारतीय ज्ञान परंपरा के केंद्र में समावेशिकता है ।इस अवसर पर श्रीमती जयिता सेन बराट, क्षेत्रीय निदेशक, पश्चिम बंगाल राष्ट्रभाषा प्रचार समिति ने हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार तथा लोक साहित्य और लोक संस्कृति के संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. सुमिता चट्टोराज ने ग्राम बंगाल की लोक संस्कृति तथा हिंदी-बांग्ला लोक साहित्य की परस्पर संबद्धता पर प्रकाश डाला। हिंदी और बांग्ला लोक साहित्य के बीच संवाद भारतीय सांस्कृतिक एकता और विविधता का महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस अवसर पर विभाग के विद्यार्थियों ने नृत्य, संगीत और नाटक का मंचन किया। कार्यक्रम को सफल बनाने में नसीमा खातून, जसमीन खातून, विनीता शॉ, संध्या कुमारी, स्नेहा मौर्या, संजना शॉ, खुशी शॉ, प्रवीर महतो, आदित्य शॉ, आयुष प्रसाद, नंदिनी शर्मा, निशा यादव, पूर्णिमा कोहार, सलोनी सिंह, निशा मल्लिक आदि ने विशेष सहयोग दिया। कार्यक्रम का संयोजन और संचालन डॉ सुमिता चट्टोराज ने किया।














