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कुलपति चयन का असली संकट — योग्यता, लॉबिंग और राजनीतिक हस्तक्षेप?

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🎓 कुलपति चयन का असली संकट — योग्यता, लॉबिंग और राजनीतिक हस्तक्षेप?

🔸एक पुरानी लेकिन आज भी चौंकाने वाली खबर फिर सामने आई है—
“75% OF VCs UNFIT TO HOLD POST: STUDY”

खबर की हेडलाइन जितनी सनसनीखेज है, वास्तविक अध्ययन को उतनी ही सावधानी से पढ़ने की जरूरत है। रिपोर्ट के भीतर यह कहा गया था कि अध्ययन में देखे गए पिछले 15 वर्षों के दौरान विश्वविद्यालयों में 75% से अधिक प्रशासनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को “recognised academics” की श्रेणी में नहीं माना गया। इसलिए इसे यह कहकर प्रस्तुत करना ठीक नहीं होगा कि “आज भारत के 75% कुलपति अयोग्य हैं।”

लेकिन इस अध्ययन ने जो सवाल उठाए थे, वे आज भी कम महत्वपूर्ण नहीं हुए हैं।

अध्ययन पाँच पूर्व कुलपतियों और विभिन्न विश्वविद्यालयों के 20 प्रोफेसरों की टीम ने किया था। इसमें राजनीतिक हस्तक्षेप, प्रशासनिक पदों के लिए लॉबिंग, अकादमिक विशेषज्ञों पर ‘facilitators’ का प्रभाव और विश्वविद्यालयी नेतृत्व में दूरदृष्टि की कमी जैसी समस्याएँ रेखांकित की गई थीं।

सबसे गंभीर टिप्पणी शायद यह थी कि कई वास्तविक शिक्षाविद ऐसे पदों की दौड़ से इसलिए दूर रहना पसंद करते हैं क्योंकि वे “academic autonomy and self-respect” को पद, पैसे और सार्वजनिक प्रतिष्ठा से अधिक महत्व देते हैं।

यहीं से एक असहज सवाल पैदा होता है—

❓ क्या हमारे कुलपति चयन की व्यवस्था कभी-कभी उलटी छननी की तरह काम करने लगती है?

जो विद्वान अपने शोध, अध्यापन और अकादमिक प्रतिष्ठा के आधार पर पहचाना जाना चाहता है, वह लॉबिंग नहीं करता; और जो पद प्राप्त करने के लिए सही राजनीतिक-अफसरशाही संपर्क बनाने में अधिक कुशल है, वह कहीं अधिक सक्रिय दिखाई देता है।

निश्चित रूप से हर प्रभावशाली संपर्क वाला कुलपति अयोग्य नहीं होता और हर बड़ा विद्वान अच्छा प्रशासक भी नहीं होता। विश्वविद्यालय चलाने के लिए अकादमिक प्रतिष्ठा के साथ प्रशासनिक क्षमता, नेतृत्व, ईमानदारी और निर्णय लेने की योग्यता भी आवश्यक है।

लेकिन प्रश्न तब पैदा होता है जब academic merit और institutional leadership के ऊपर proximity to power, lobbying अथवा राजनीतिक स्वीकार्यता हावी होने लगे।

और यह केवल अतीत की चिंता नहीं है।

फरवरी 2025 में जारी NITI Aayog की State Public Universities पर विस्तृत रिपोर्ट 20 से अधिक राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के अधिकारियों तथा 50 State Public Universities के कुलपतियों और वरिष्ठ शिक्षाविदों सहित व्यापक consultations पर आधारित थी। उसमें भी Governance & Autonomy को उच्च शिक्षा के प्रमुख चुनौती-क्षेत्रों में रखा गया और विश्वविद्यालयों में बेहतर governance structures, transparency, accountability तथा academic leadership की क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता बताई गई।

नीति आयोग ने राज्यों को विश्वविद्यालयों के लिए अधिक administrative autonomy, स्पष्ट performance indicators और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में top-quality academicians की अधिक भागीदारी जैसे उपाय भी सुझाए हैं।

🎓 आखिर कुलपति होता कौन है?

कुलपति केवल फाइलों पर हस्ताक्षर करने वाला प्रशासक नहीं है।

वह विश्वविद्यालय की academic culture, faculty recruitment, research environment, Ph.D. standards, examinations, curriculum और institutional reputation को प्रभावित करने वाला सर्वोच्च अकादमिक नेतृत्व है।

यदि शीर्ष पर नियुक्ति ही योग्यता और पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े करे, तो नीचे पूरी अकादमिक व्यवस्था पर उसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।

इसीलिए कुलपति चयन में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि उम्मीदवार ने कितने प्रशासनिक पद संभाले हैं। यह भी देखा जाना चाहिए—

उसका मौलिक अकादमिक योगदान क्या है?
उसने कौन-सी संस्था बनाई या सुधारी?
उसकी academic integrity कैसी है?
क्या उसमें स्वतंत्र निर्णय लेने का साहस है?
और सबसे बढ़कर—क्या उसका चयन वास्तव में खुली, निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया से हुआ है?

हम विश्वविद्यालयों को विश्वस्तरीय बनाना चाहते हैं। लेकिन विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय केवल नई इमारतों, rankings और MoUs से नहीं बनते—वे विश्वसनीय academic leadership से बनते हैं।

शायद इसलिए इस पुरानी clipping का सबसे बड़ा संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है—

कुलपति का पद किसी शिक्षाविद के कैरियर का पुरस्कार नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय के भविष्य की जिम्मेदारी है।

और इसलिए असली प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि—
“कुलपति कौन बनेगा?”

असली प्रश्न होना चाहिए—

“कुलपति बनने के लिए सबसे योग्य कौन है—और क्या हमारी चयन प्रक्रिया उसे खोज पाने में सक्षम है?”

✍️ कृष्णगोपाल शर्मा

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[NITI Aayog की 2025 State Public Universities Policy Report](https://www.niti.gov.in/whats-new/expanding-quality-higher-education-through-states-and-state-public-universities-policy?utm_source=chatgpt.com)

(फेसबुक वॉल से साभार)

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