“धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥”
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आज कई विश्वविद्यालय से तुलसी जयंती बनाने की सूचनाओं प्राप्त हुई हैं। इन सूचना ऑन के बीच मुझे अपने सभी दिनों की याद आई। मेरे श्रीकृष्ण उच्च विद्यालय, नयागांव (खगड़िया) में हमलोग तुलसी जयंती मनाते थे।
बचपन में मैं प्रत्येक दिन कुछ देर अपने स्वतंत्रता सेनानी नानाजी को तुलसीकृत रामचरित मानस सस्वर पाठ करके सुनाता था। इस क्रम में मुझे इस ग्रंथ को कई बार आद्योपांत पढ़ने का सुअवसर मिला।
जाहिर है कि मानस की कई चौपाइयां आज भी मुझे याद हैं और वे समय-समय पर मुझे मार्गं भी देती हैं। ऐसी ही एक चौपाल है, “धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥” (अर्थात् धैर्य, धर्म, मित्र और पत्नी (या जीवनसाथी)—इन चारों की परीक्षा विपत्ति के समय में ही होती है।)
गोस्वामी तुलसीदास जी को नमन!
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