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भारत विद्या की परम्पराओं को समकालीन वैश्विक चुनौतियों से जोड़ने की आवश्यकता : दिव्यराज अमि

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भारत विद्या की परम्पराओं को समकालीन वैश्विक चुनौतियों से जोड़ने की आवश्यकता : दिव्यराज अमि

– “भारत विद्या और दक्षिण एशिया अध्ययन की वर्तमान प्रासंगिकता एवं अध्यापन की नई प्रविधि” विषय पर हुआ व्याख्यान
– पर्यावरण संकट, वृद्ध होती जनसंख्या, महिला सशक्तीकरण, आदिवासी विमर्श और तकनीकी परिवर्तन के संदर्भ में भारतीय परम्पराओं के अध्ययन पर जोर

वाराणसी, 12.08.2026- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारत अध्ययन केन्द्र एवं इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पन्द्रह दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला “भारत अध्ययन की परम्परा : व्यक्ति, विचार और संस्थाएँ” के तीसरे दिन बुधवार को “भारत विद्या और दक्षिण एशिया अध्ययन की वर्तमान प्रासंगिकता एवं अध्यापन की नई प्रविधि” विषय पर व्याख्यान आयोजित किया गया। कार्यशाला का आयोजन 10 से 31 अगस्त, 2026 तक हाइब्रिड माध्यम से किया जा रहा है। इस अवसर पर ट्यूबिंगन विश्वविद्यालय, जर्मनी के भारत विद्या विभाग के शिक्षण अध्येता दिव्यराज अमिय, एम.फिल. ने भारत विद्या के समकालीन महत्त्व, उसके अध्ययन की नई पद्धतियों तथा वर्तमान वैश्विक चुनौतियों के संदर्भ में भारतीय ज्ञान और परम्पराओं की प्रासंगिकता पर विचार व्यक्त किए।

दिव्यराज अमिय ने कहा कि आज जब पूरा विश्व अनेक सामाजिक, पर्यावरणीय और मानवीय समस्याओं से जूझ रहा है, उस समय भी भारत के अनेक ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ उनकी पारंपरिक जीवन-पद्धतियाँ और ज्ञान-परम्पराएँ आज भी जीवित हैं। उन्होंने कहा कि इन परम्पराओं में वर्तमान समय की अनेक चुनौतियों से निपटने के लिए महत्त्वपूर्ण अनुभव और ज्ञान निहित हो सकता है। इसलिए भारत विद्या का अध्ययन केवल अतीत को जानने का माध्यम न होकर वर्तमान और भविष्य को समझने का भी प्रभावी साधन बन सकता है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में यूरोप में विभिन्न आधुनिक मेथडोलॉजी का उपयोग करते हुए भारत विद्या के अध्ययन का कार्य किया जा रहा है। ऐसे में यह आवश्यक है कि भारत अपनी ज्ञान-परम्पराओं, लोकानुभवों और सांस्कृतिक दृष्टियों को स्वयं की दृष्टि से समझे और उन्हें वैश्विक अकादमिक विमर्श में प्रस्तुत करे। उन्होंने कहा कि भारत विद्या के अध्ययन में भारतीय समाज के जीवंत अनुभवों, स्थानीय समुदायों और लोकपरम्पराओं को भी पर्याप्त महत्त्व दिया जाना चाहिए।

दिव्यराज अमिय ने कहा कि भारत और दक्षिण एशिया को समझने के लिए केवल पुस्तकीय और शास्त्रीय स्रोत पर्याप्त नहीं हैं। विभिन्न समुदायों की जीवन-पद्धतियों, उनके पर्यावरण से संबंध, सामाजिक संरचनाओं और सांस्कृतिक अनुभवों का अध्ययन भी आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारत की विशेषता यह है कि आधुनिकता और वैश्वीकरण के व्यापक प्रभाव के बावजूद देश के अनेक क्षेत्रों में लोकज्ञान, पारंपरिक जीवन-पद्धतियाँ और सांस्कृतिक परम्पराएँ आज भी जीवित हैं।

उन्होंने कहा कि आज विश्व के सामने पर्यावरण संकट, वृद्ध होती जनसंख्या, महिला सशक्तीकरण, आदिवासी विमर्श और तकनीकी परिवर्तन जैसे अनेक प्रश्न हैं। इन समस्याओं को समझने और उनके समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए भारत और दक्षिण एशिया की विविध सामाजिक एवं सांस्कृतिक परम्पराओं का अध्ययन उपयोगी हो सकता है।

झारखंड के असुर समुदाय का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इस समुदाय के पास अपने समय से आगे की तकनीकी दक्षता और धातुकर्म से संबंधित ज्ञान रहा है। इसके बावजूद समुदाय ने एक समय पर स्वेच्छा से उस तकनीक को छोड़ने का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि यह उदाहरण हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि तकनीकी प्रगति को केवल अधिक से अधिक तकनीक प्राप्त करने की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। तकनीक का संबंध समाज, प्रकृति, संसाधनों और जीवन-मूल्यों से भी है।

उन्होंने कहा कि असुर समुदाय का उदाहरण वर्तमान पर्यावरणीय संकट के संदर्भ में विशेष महत्त्व रखता है। आधुनिक दुनिया के सामने यह प्रश्न है कि तकनीकी विकास और प्राकृतिक संसाधनों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। भारत के विभिन्न आदिवासी और स्थानीय समुदायों की परम्पराओं में प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व के ऐसे अनुभव मिलते हैं, जिनका गंभीर अध्ययन वर्तमान समय में वैकल्पिक दृष्टि प्रदान कर सकता है।

उन्होंने कहा कि इसी प्रकार वृद्ध होती जनसंख्या, महिला सशक्तीकरण और आदिवासी समाजों के प्रश्नों को केवल आधुनिक नीतिगत दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि स्थानीय समाजों के अनुभवों और उनकी अपनी सांस्कृतिक संरचनाओं के संदर्भ में भी समझने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत विद्या इन विविध अनुभवों को एक साथ देखने और उनके बीच अंतर्सम्बन्धों को समझने का अवसर प्रदान करती है।

दिव्यराज अमिय ने कहा कि भारत विद्या का अध्ययन केवल प्राचीन ग्रंथों, इतिहास और दर्शन तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसमें वर्तमान समाज और भविष्य की चुनौतियों को भी शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने पर्यावरण, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सामाजिक परिवर्तन, जाति, लैंगिकता और बदलते मानवीय संबंधों जैसे विषयों को भारत विद्या के व्यापक अध्ययन से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने भारत विद्या और भविष्य के अध्ययन के संदर्भ में प्रतिभागियों को यह कल्पना करने के लिए प्रेरित किया कि यदि किसी एक कहानी को 1990, 2030 और 2060 के दशकों में लिखा जाए तो उसमें मनुष्य, तकनीक और समाज के संबंध किस प्रकार बदलेंगे। उन्होंने कहा कि 1960 के दशक के पारंपरिक औजारों से लेकर 1990 के दशक की आधुनिक मशीनों और वर्तमान समय में स्मार्टफोन, वीडियो कॉल तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक तकनीक ने मानव जीवन को लगातार बदला है। इसी प्रकार भविष्य की तकनीक भी मनुष्य के काम करने, सीखने, संवाद करने और सामाजिक संबंधों को प्रभावित करेगी।

उन्होंने कहा कि अध्यापन की नई प्रविधि का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल तथ्यों और घटनाओं को याद कराना नहीं होना चाहिए। उन्हें नए प्रश्न पूछने, अतीत के अनुभवों को वर्तमान समस्याओं से जोड़ने और भविष्य की संभावनाओं पर विचार करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि तकनीक शिक्षा का महत्त्वपूर्ण माध्यम बन सकती है, लेकिन उसे ज्ञान का विकल्प नहीं बल्कि ज्ञान के विस्तार का साधन मानना चाहिए।

दिव्यराज अमिय ने कहा कि भारत विद्या के अध्ययन की नई प्रविधि में शास्त्र और लोक, परम्परा और आधुनिकता, अतीत और भविष्य तथा स्थानीय अनुभव और वैश्विक विमर्श के बीच संवाद स्थापित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत विद्या को जीवंत और प्रासंगिक बनाने के लिए विभिन्न विषयों और ज्ञान-विधाओं के बीच अंतर्विषयी संवाद आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि भारत की अनेक जीवित परम्पराएँ आज वैश्विक स्तर पर सामने आ रही समस्याओं को देखने के लिए वैकल्पिक दृष्टि प्रदान कर सकती हैं। ऐसे में भारत विद्या का दायरा केवल अतीत की व्याख्या करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे वर्तमान और भविष्य के लिए उपयोगी ज्ञान की खोज का माध्यम भी बनाना चाहिए।

कार्यशाला में भारत अध्ययन केन्द्र, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय एवं विभिन्न संस्थानों के शिक्षक, शोधार्थी, विद्यार्थी तथा भारत अध्ययन में रुचि रखने वाले प्रतिभागी हाइब्रिड माध्यम से शामिल हुए।

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