किताब जो मैने पढ़ी
आइए, मिलते हैं कथाकार Ranjan Kumar जी से।
जब आप उनसे पहली बार मिलेंगे, तो सामने एक एरिस्टोक्रेट, से व्यक्तित्व वाला, बेहद अनुशासित और गंभीर व्यक्ति दिखाई देगा। वे बहुत नपे-तुले शब्दों में अपनी बात रखते हैं। लेकिन जब आप उनकी लेखनी से गुजरेंगे, तो महसूस करेंगे कि उस टाईधारी, सख्त चेहरे के पीछे संवेदनाओं और शब्दों का एक गहरा समुद्र लहरा रहा है।
आम लोगों के बीच उनकी पहचान एक कथाकार से अधिक एक प्रतिष्ठित स्टूडियो के संचालक और ख्यात फोटोग्राफर के रूप में है। लेकिन उनकी रचनात्मक दुनिया इससे कहीं व्यापक है।
मैंने पहले उनकी दो पुस्तकें पढ़ी हैं—‘कुँवर नटुवा दयाल’ और ‘अंगिका लोक साहित्य’। दोनों पुस्तकों में अंग प्रदेश की लोकगाथाओं, लोकजीवन और लोकसंस्कृति का विस्तृत और गंभीर चित्रण मिलता है।
हाल ही में उनकी एक और महत्वपूर्ण रचना ‘बाढ़’ (लघुकथा)पढ़ी। इस पुस्तक ने उनके व्यक्तित्व के उस पक्ष से आपका परिचय कराएगा, जो उनके कठोर और अनुशासित बाहरी व्यक्तित्व के पीछे छिपा हुआ है—एक संवेदनशील मनुष्य और रचनाकार का पक्ष।
‘बाढ़’ अंग प्रदेश की उस नदी की कथा है, जिसे यहाँ के लोग माँ का दर्जा देते हैं, गंगा। तीन भागों में विभाजित यह पुस्तक बाढ़ की त्रासदी का वर्णन तो करती है, लेकिन कहीं भी गंगा के प्रति आक्रोश या विरोध का भाव पैदा नहीं करती। इसके विपरीत, पुस्तक में गंगा और अंग प्रदेश के लोगों के बीच के गहरे भावनात्मक और सांस्कृतिक संबंध दिखाई देते हैं। पुस्तक का मूल सवाल भी यही है, जब नदी हमारी जीवनदायिनी है, तो उससे बैर कैसा?
पहले खंड में बाढ़ की आहट, अपना सामान समेटते लोगों की मनःस्थिति और आने वाली विपदा के बीच जीवन को बचाने और उससे जूझने की उनकी कोशिशों का चित्रण है।
दूसरे खंड में बाढ़ के कारण विस्थापित होकर नई जगह पहुँचे लोगों की कथा है । ऐसे लोग, जो अपनी जमीन और घर से दूर होकर भी अँधेरे में जीवन की कोई नई रोशनी तलाशते हैं।
तीसरा खंड उन्हें फिर उसी उजड़े हुए गाँव और अपनी मिट्टी की ओर लौटते हुए दिखाता है।
इस पूरी यात्रा में एक बात विशेष रूप से ध्यान खींचती है, लोग नदी से लड़ते हुए दिखाई नहीं देते। वे गंगा का सम्मान करते हैं और बाढ़ को केवल नियति मानकर निष्क्रिय भी नहीं बैठते। उनके लिए बाढ़ उनके जीवन की कठिन वास्तविकता है, जिसका सामना उन्हें करना है।
पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष शायद यही है कि लेखक बाढ़ को केवल प्राकृतिक आपदा के रूप में नहीं देखते। वे इसके पीछे छिपे मानवीय हस्तक्षेप और नदी के स्वाभाविक प्रवाह को समझने की आवश्यकता की ओर भी संकेत करते हैं। अंत में एक परिशिष्ट के माध्यम से बाढ़ की समस्या से निपटने के कुछ उपाय भी सुझाए गए हैं।
‘बाढ़’ केवल बाढ़ की कहानी नहीं है। यह मनुष्य, नदी, मिट्टी और जीवन के बीच के रिश्ते की कहानी है। अंग प्रदेश के लोकजीवन को समझने के लिए यह एक महत्वपूर्ण और पढ़ने योग्य रचना है।
पुस्तक की अंतिम पंक्तियाँ इस पूरी रचना का सार जैसे हमारे सामने रख देती हैं—
“यदि हम इस मिट्टी से प्रेम करते हैं, तो हमें उसके लोगों की पीड़ा को ‘नियति’ मानकर चुप नहीं रहना होगा।
नदियाँ शत्रु नहीं हैं।
वे केवल तब विनाशक लगती हैं, जब मनुष्य उनका स्वभाव भूल जाता है।
और शायद—
जिस दिन हम नदी को रोकने की जगह उसके साथ जीना सीख लेंगे, उस दिन बाढ़ केवल त्रासदी नहीं रहेगी—वह फिर से जीवन-चक्र का हिस्सा बन सकेगी।”
गांधीवादी कार्यकर्ता डॉ. मनोज मिता जी के फेसबुक वॉल से साभार।














