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BNMU पीएच. डी. अध्यादेश एवं अधिनियम 2026 की मनमानी व्याख्या करने वाले पत्र को वापस लेने की मांग

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*पीएच. डी. अध्यादेश एवं अधिनियम 2026 की मनमानी व्याख्या करने वाले पत्र को वापस लेने की मांग*

 

बीएनएमयू, मधेपुरा में राज्यपाल सचिवालय, लोक भवन, पटना द्वारा जारी पीएच. डी. अध्यादेश एवं अधिनियम 2026 (पीएच. डी. डिग्री प्रदान करने के लिए न्यूनतम मानक एवं प्रक्रिया) के आलोक में शुरू की गई नामांकन की प्रक्रिया विवादों में घिर गई है। सीनेट सदस्य डॉ. सुधांशु शेखर ने इस संबंध में विश्वविद्यालय द्वारा 28 जुलाई, 2026 (मंगलवार) को जारी पत्र में केवल पीजी विभाग, पीजी सेंटर एवं पीजी शिक्षण महाविद्यालयों के शिक्षकों को ही शोध-निदेशक बनने का प्रावधान करने का विरोध किया है।‌ उन्होंने मंगलवार की देर शाम कुलसचिव को पत्र लिखकर विधिवत अपना विरोध दर्ज कराया है और इस मामले में सभी शिक्षकों एवं शोधार्थियों को एकजुट होकर आवाज उठाने की अपील की है।

 

डॉ. शेखर का कहना है कि विश्वविद्यालय द्वारा जारी यह पत्र राज्यपाल सचिवालय द्वारा जारी पीएच. डी. अध्यादेश एवं अधिनियम के विरुद्ध है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि जब इस अध्यादेश एवं अधिनियम को बीएनएमयू की विद्वत परिषद द्वारा हूबहू अंगीकृत कर लिया गया है, तो इसकी व्याख्या करते हुए अलग से पत्र जारी करने का क्या औचित्य है?

 

डॉ. शेखर ने बताया कि पीएच. डी. अध्यादेश एवं अधिनियम 2026 की कंडिका संख्या- 8.1.1. (ए) में पीएच. डी. शोध-निदेशक की योग्यता से संबंधित प्रावधान है। इसमें सभी शिक्षकों को विश्वविद्यालय शिक्षक माना गया है। शोध-निदेशक बनने के मामले में विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभाग, स्नातकोत्तर संचालित महिविद्यालयों तथा स्नातक महाविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों में कोई भेदभाव नहीं किया गया है। यहां तक कि इसी कंडिका में आगे विशेष परिस्थितियों में संबद्ध महाविद्यालयों के शिक्षकों को भी शोध-निदेशक बनाने का प्रावधान किया गया है।

 

उन्होंने इस बात पर दुख प्रकट किया है कि विश्वविद्यालय के पत्र में पीएच. डी. अध्यादेश एवं अधिनियम 2026 को संदर्भित करते हुए कहा गया है कि केवल पीजी विभागों, पीजी केन्द्रों एवं पीजी महाविद्यालयों के शिक्षक ही शोध-निर्देशक बन सकते हैं। यह संदर्भित अधिनियम के विपरीत है। इस तरह के अनावश्यक एवं गैरजिम्मेदाराना पत्र से शिक्षकों एवं विद्यार्थियों को मानसिक आघात लगा है।

 

डॉ. शेखर ने बताया कि बीएनएमयू, मधेपुरा सहित बिहार के सभी विश्वविद्यालयों में विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभागों, स्नातकोत्तर संचालित महिविद्यालयों एवं स्नातक स्तरीय महिविद्यालयों के लिए शिक्षकों का चयन एक ही चयन प्रक्रिया, एक ही विज्ञापन और एक ही आयोग द्वारा किया जाता है। आयोग द्वारा सभी शिक्षकों को विश्वविद्यालय के लिए चयनित किया जाता है और चयनित शिक्षकों की सूची संबंधित विश्वविद्यालयों को भेज दी जाती है। ऐसे में एक ही सूची में शामिल शिक्षकों के बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता है।

 

उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय स्तर पर शिक्षकों का विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभाग, स्नातकोत्तर संचालित महिविद्यालयों अथवा स्नातक महाविद्यालयों में रिक्तियों की उपलब्धता के आधार पर पदस्थापन किया जाता है। अनेक ऐसे शिक्षक हैं, जिनको चयन सूची में उच्च स्थान होने के बावजूद स्नातक महाविद्यालयों में पदस्थापित किया गया है, जबकि दूसरी ओर कई कम रैंक वाले शिक्षक यदि पीजी विभाग अथवा पीजी महाविद्यालय में पदस्थापित किए हैं। अब तक दोनों में कोई अंतर नहीं है।

 

उन्होंने बताया कि अब विश्वविद्यालय का संदर्भित आदेश लागू होने से स्नातक महाविद्यालयों के शिक्षकों को दोयम दर्जे का मानते हुए उन्हें शोध-निदेशक बनने से वंचित कर दिया गया है। फिर शोध- निदेशक नहीं बनने वाले शिक्षकों के लिए एसोसिएट प्रोफेसर पद पर पदोन्नति हेतु निर्धारित पात्रता “शोध- निदेशन का प्रमाण” की शर्त को पूरा करना भी असंभव हो जाएगा। भला जब किसी शिक्षक को शोधार्थी के मार्गदर्शन का अवसर ही नहीं दिया जाएगा, तब वे इस अनिवार्य शर्त को कैसे पूरा करेंगे? इस तरह संदर्भित पत्र के लागू होने से एक बार फिर केवल पदस्थापन के आधार विभिन्न शिक्षकों के बीच भेदभाव होगा और संविधान प्रदत्त समानता के अधिकारियों की अवहेलना होगी।

 

डॉ. शेखर ने बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा जारी संदर्भित पत्र के लागू होने से स्नातक महाविद्यालयों में कार्यरत वैसे शिक्षक, जो शोध-निदेशक बनने के योग्य हैं, वे शोध-निदेशक बनने से वंचित हो जाएंगे। इसके विपरीत विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभागों तथा स्नातकोत्तर संचालित महिविद्यालयों के कई शिक्षक, जिन्हें शोध-निदेशक बनने का अवसर दिया गया है, उनमें से कई इसके योग्य हैं ही नहीं। इससे शोधार्थियों के लिए शोध निदेशक की उपलब्धता सीमित हो जाएगी।

 

उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभागों में चक्रानुक्रम से विभागाध्यक्ष बनाने का प्रावधान है। इसके तहत पहले संबंधित विषय के चार सबसे वरीय शिक्षक को विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभाग में स्थानांतरित-पदस्थापित करना है। फिर उनके बीच चक्रानुक्रम से ही विभागाध्यक्ष की नियुक्ति की जानी है। लेकिन बीएनएमयू, मधेपुरा में इस नियम को आधे-अधूरे रूप में लागू किया गया है। यहां चक्रानुक्रम से विभागाध्यक्ष बदलते रहते हैं, लेकिन चार सबसे वरीय शिक्षकों को विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर विभाग में स्थानांतरित- पदस्थापित नहीं किया गया है।

 

डॉ. शेखर ने कहा है कि विश्वविद्यालय द्वारा जारी संदर्भित पत्र राज्यपाल सचिवालय द्वारा जारी पीएच. डी. अधिनियम 2026 के विपरीत है। विश्वविद्यालय के पत्र में स्नातक स्तरीय अंगीभूत महाविद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों को दोयम दर्जे का माना गया है और संबद्ध महाविद्यालयों का कोई जिक्र भी नहीं है। अतः पीएच. डी. अध्यादेश 2026 को हूबहू लागू किया जाए और उसकी मनमानी व्याख्या करने वाले विश्वविद्यालय द्वारा जारी संदर्भित पत्र को वापस लिया जाए।

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