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कल 29 मई, 2026 को मशहूर शायर बशीर बद्र की अंतिम यात्रा में लगभग 20 लोग शामिल हुए।
सोचिए जिसके शेर लाखों लोगों की ज़ुबान पर रहते हैं, उन्हें ऐसी गुमनाम सी विदाई दे दी गई।
सोचिए, भोपाल साहित्य और संस्कृति का गढ़ माना जाता है। पता नहीं कितने, लेखक, कवि, शायर, पत्रकार, कलाकार भोपाल में हैं, मगर उनमें से कितनों को लगा कि इस मौक़े पर उन्हें वहाँ होना चाहिए था और कितने पहुँचे?
ये भी सोचिए कि भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी है। विभिन्न राजनीतिक दलों के तमाम लोग वहाँ रहते हैं। मान लेते हैं कि बीजेपी को मुसलमानों से एलर्जी है, नफ़रत है और वह उनके नायकों को भी पसंद नहीं करती, मगर बाक़ी दल क्या कहेंगे?
दरअसल, बशीर साहब पिछले कई सालों से डिमेंशिया से पीड़ित थे। इस वज़ह से भी वे अलगाव का शिकार हो गए थे। लोगों ने आना-जाना लगभग बंद कर दिया था, मगर ऐसा भी नहीं था कि वे हम सबकी स्मृतियों में भी नहीं थे। वे थे, मगर वे किसी के काम के नहीं रह गए थे, इसलिए लोगों को लगा कि अब क्या फ़ायदा।
यानी बशीर सही कहते थे- ये मतलबों के सलाम थे।
साभार : प्रोफेसर मुकेश कुमार जी के ट्विटर वॉल से।
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