गत 26 जून, 2026 को परम आदरणीय अग्रज डॉ. संजीव कुमार सिंह जी (माननीय विधान पार्षद, कोसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र) की अत्यंत ही मेधावी सुपुत्री डॉ. सुरभि जी का शुभ-विवाह पटना में संपन्न हुआ था। अपरिहार्य कारणों से मैं इस शुभ-घड़ी का प्रत्यक्ष साक्षी नहीं बन सका था।
आज डॉ. संजीव बाबू के पटना स्थित सरकारी आवास पर जाकर उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएं दिया और अत्यंत ही स्वादिष्ट गुलाब जामुन खाकर मुंह मीठा किया। आनंद से भरे इस पारिवारिक माहौल में परम आदरणीय प्रो. जंग बहादुर पांडेय जी (सेवानिवृत्त अध्यक्ष, हिंदी विभाग, रांची विश्वविद्यालय, रांची) की गरिमामयी उपस्थिति से चार चांद लग गया।
प्रस्तुत है प्रो. पांडेय जी द्वारा तैयार किए गए अभिनंदन पत्र-
श्रीगणेशाय नम:
सौ० सुरभि
सुपुत्री श्रीमती स्मिता सिंह एवम् डा संजीव कुमार सिंह सदस्य बिहार विधान परिषद्, पटना(बिहार )
*मंगलं भगवान् विष्णु:, मंगलं गरूडध्वज:।*
*मंगलं पुण्डरीकाक्ष, मंगलाय तनो हरि:।*
संग
चि सत्यम्
सुपुत्र:- श्रीमती गीतांजलि सिंह एवम् श्री दिलीप कुमार सिंह-पटना (बिहार )
सौ० सुरभि और चि० सत्यम् की मांगलिक और सुललित परिणयोत्सव की मधुर बेला में सुप्रवीण और लोकप्रिय समधी श्री दिलीप कुमार सिंह एवं मधुर मनोहर समधीन श्रीमती गीतांजलि सिंह ,सम्मानित परिजन, पुरजन और वरयात्री गण के कर कमलों में समर्पित
अभिनन्दन पत्र
*महानुभाव!*
आज की मांगलिक बेला में आप लोगों का शुभागमन हम सबों में नई चेतना, नई प्रेरणा और नवीन उत्साह का सृजन कर रहा है। वस्तुतः आपके सुपदार्पण से पाटलिपुत्र की धरती चिन्मयी होकर थिरक रही है। आप सभी आए, हम धन्य-धन्य हुए। प्रतीक्षा की लंबी घड़ियां बीतीं, सुमधुर मिलन के क्षण आए, दो अधूरी अपरिचित आकांक्षाएँ एक बिंदु पर आ मिलीं। आप सबों का स्वागत करते हुए हम गौरवान्वित हो रहे हैं और दसों दिशाएं सौंदर्य बोध से सुंदरतम् हो रही हैं। ऐसी सुखद एवं सुसंस्कृत बेला में आप सबों का शुभ स्वागतम्, शुभाभिनंदन और शतश: नमन, वंदन एवम् अभिनंदन है।
*परमादरणीय समधी!*
अनेक मानवीय गुणों से समलंकृत समधी के चुंबकीय व्यक्तित्व से हम सभी अभिभूत हो रहे हैं और अपने को धन्य धन्य मान रहे हैं। आपके परिवार की सादगी एवं शालीनता से हम सभी प्रभावित हैं। निश्चय ही आप लोगों ने जिस अति उदारता, संवेदनशीलता, अनुरागरंजित, मानवीयता एवं कृपालुता का परिचय दिया है, हम सब उसे पाकर गदगद हो उठे हैं और विश्वास है कि आप सबों के सहज स्वभाव से हम सब सदैव ही अनुप्रेरित और अनुरंजित होते रहेंगे। पुनः लक्षश: नमन वंदन एवं अभिनंदन है।
*पारस व्यक्तित्व के धनी!*
आपका व्यक्तित्व पारसमणि की तरह है। जिसके संस्पर्श से लोहा भी सोना बन जाता है। आपके व्यक्तित्व के संस्पर्श से हम स्वर्णवत् हो गए हैं। महाकवि तुलसी ने सच ही कहा है कि
*सठ सुधरहिं सत्संगति पाई।* *पारस परस कुधातु सुहाई।।*
हम अपने पारस व्यक्तित्व के धनी समधी जी का कोटिश: हार्दिक नमन वंदन एवम् अभिनंदन करते हैं।
*परमादरणीय अतिथि-गण!*
आप सभी इस पाणि-ग्रहण संस्कार से संबद्ध सारी प्रक्रियाओं के साक्षी एवं अभिकर्त्ता रहे हैं। आप लोगों के स्नेह की छत्र-छाया में जो कृपा अमृत वर्षण हुआ, क्या उसे हम कभी भूल सकते हैं? कदापि नहीं। अतिथि देवो भव: की परिकल्पना साकार हो उठी है। हमारी अकिंचनता का बोध आप सभी सहज ही कर रहे होंगे। हमारी सेवा में यदि कुछ त्रुटि रह गई हो, तो उसे नजर अंदाज करने में ही आपका बड़प्पन होगा। आशा है, हमारी मनोदशा का अनुभव कर अपूर्ण सत्कार को पूर्ण मानकर अपनी उदारता का परिचय देंगे। एतदर्थ अरबश: नमन वंदन एवम् अभिनंदन है।
कुशल अभिभावक!
राजर्षि विदेह राज जनक ने अपनी शक्तिस्वरूपा कन्या वैदेही को कौशलेश दशरथ के चरण कमलों में समर्पित करते हुए क्षमा, स्नेह और संरक्षण की याचना की थी। अतः हम भी उसी याचक परंपरा की कड़ी में जुड़ते हुए अबोध किंतु सौम्यरूपा, चंचला किंतु अनुशासिता, लाडली किंतु कर्तव्यपरायणा सुरभि को आपकी कुल-वधू के रूप में समर्पित कर आग्रहशील हैं कि यदि इससे कदाचित् बाल सुलभ अपराध हो जाए,तो अपने स्नेहिल अभिभावकत्व की भावना से क्षमा प्रदान करते हुए एवं अपने अनुकूल बनाते हुए उसे उचित मार्गदर्शन देते रहेंगे। चक्रवर्ती सम्राट दशरथ ने अपनी रानियों को जनकपुर से आईं पुत्र-वधुओं को पलक की भांति नयन रक्षा का आग्रह करते हुए कहा था, “वधू लरकिनी पर घर आईं।* *राखहूं नयन पलक की नाई।।’
हम भी आपसे ऐसी ही अपेक्षा चाहेंगे। हम सबों की परमपिता परमेश्वर से यही प्रार्थना है कि सत्यम् एवम् सुरभि की मंजुल युगल जोड़ी सुखद एवं सौम्यपूर्ण रहे ,दोनों का दांपत्य जीवन सुखमय, समृद्धिमय एवं आनंदमय रहे -यही हमारी मनोकामना है। त्रुटियों के लिए क्षमा याचना।
*युग युग के अरमान हृदय की चिर संचित अभिलाषा।*
*जुड़ा रही है आज हमारी प्यासी-प्यासी आशा।।*
*नाच रहे मन मोर धड़कने सहसा थिरक उठी हैं।*
*आज हमारे रोम-रोम में खुशियाँ चमक उठी हैं।।*
*जुड़ा रही है आज हमारी प्यासी-प्यासी आशा।।*
*नाच रहे मन मोर धड़कने सहसा थिरक उठी हैं।*
*आज हमारे रोम-रोम में खुशियाँ चमक उठी हैं।।*
स्थान -पटना, दिन-शुक्रवार
तिथि- 26.6.2026
दर्शनाभिलाषी : सर्व श्री प्रो समर कुमार सिंह, अशोक कु. सिंह, शैलेन्द्र कु. सिंह, अमर कु. सिंह, ऋतेश राणा, सौरभ, सुंदरम्, सिद्धार्थ एवं समस्त सिंह परिवार, मदरौनी, पटना
(बिहार )
प्रस्तुति : प्रो. जंग बहादुर पाण्डेय, पूर्व अध्यक्ष,
हिंदी विभाग, रांची विश्वविद्यालय, रांची
चलभाष -9431595318
प्रेरक एवं मार्गदर्शक : प्रो. अरविन्द कुमार,
पूर्व कुलपति, एसकेएमयू, दुमका,
पूर्व कुलपति, बीभीयू, हजारीबाग,
पूर्व कुलपति, मगध विश्वविद्यालय, बोधगया,
एवं पूर्व कुलपति, केंद्रीय विश्वविद्यालय, अरुणाचल प्रदेश।













