जयंती की पूर्व संध्या पर डॉक्टर राठौर की कलम से…..
हर दौर में अमर रहेंगे कीर्ति नारायण मंडल
7 अगस्त 1911 को मधेपुरा के मनहरा सुखासन में जन्मे कीर्ति नारायण मंडल कर्तव्य एवं जीवन पथ पर वो लकीर एवं कीर्तिमान स्थापित कर गए जो सदैव आदर्श माना ही नहीं जाएगा बल्कि उसपर मधेपुरा की पावन धरा हमेशा इतरायेगी। जमींदार परिवार में जन्म के बाद भी जमीनी जिंदगी और सामाजिक उत्थान के प्रति चिंता कीर्ति बाबू को खास बनाती है। कोसी में उच्च शिक्षा ,बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के माहौल बनाने में इनकी भूमिका अग्रिम पंक्ति की रही जिसका सुखद परिणाम आज उच्च शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में मधेपुरा की बढ़ती साख और पहचान है।
*जहां कदम पड़े वहां कॉलेज का सपना साकार हुआ*
कीर्ति बाबू द्वारा आगे चलकर मधेपुरा को उच्च शिक्षा का केंद्र बनाने के लिए कॉलेज स्थापना की पहल शुरू हुई लेकिन पिता जमीन देने को तैयार नहीं थे लेकिन कीर्ति नारायण मंडल की जिद भी कच्ची न थी राष्ट्रीय छात्रावास में ही भूख हड़ताल शुरू कर दिया फिर मां के पहल पर पिता ठाकुर प्रसाद 52 बीघा जमीन देने को राजी हुए और इस तरह ठाकुर प्रसाद यानी टीपी कॉलेज की स्थापना का रास्ता साफ हुआ।वहीं लड़कियों के पंख को उड़ान देने के लिए बालिका स्कूल जो बाद में आज पार्वती साइंस कॉलेज के रूप में सामने है।इन दोनों कॉलेज की स्थापना मानों अंगराई थी इसके बाद तो कीर्ति बाबू ने शिक्षण संस्थानों के स्थापना की लाइन ही लगा दी ।लगातार समाज के सहयोग व विरोध की धारा में अपने चट्टानी निश्चय के सहारे मधेपुरा,सहरसा, सुपौल, अररिया, कटिहार कई शिक्षण संस्थानों की स्थापना अलग अलग प्रारूपों में की जो आज शिक्षा के क्षेत्र मे लगातार यहां की इंद्रधनुषी प्रतिभाओं को निखार रहा है।यह कहना गलत न होगा कि कीर्ति बाबू ने ईश्वर की सर्वोत्तम कृति मानव जीवन के कर्तव्य की वह परिभाषा गढ़ी जो जो हर दौर में समाज में एक नजीर के रूप में सम्मानित किया जाएगा।
*बड़ी से बड़ी हस्तियों ने कीर्ति बाबू के देनों को सराहा*
कीर्ति बाबू का योगदान इतना बड़ा था कि तत्कालीन लोक सभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ ने कोसी का मालवीय,मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय ने कोसी का संत तो मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र ने महान तपस्वी कह कर उनका सम्मान किया था। समाज ने भी अपने अनमोल रत्न कीर्ति को महान सपूत,शिक्षा जगत का विश्वकर्मा,विद्या का पुजारी और न जाने क्या क्या उपमा दी । समय के चलते चक्र के साथ सात मार्च 1997 को इस महामना ने इस दुनिया से विदा ली लेकिन आज भी समाज उनके योगदानों को याद कर रहा है। यकीनन उन्हें कोसी में शिक्षा जगत का विश्वकर्मा कहना गलत न होगा।
मालूम हो कि कीर्ति बाबू द्वारा अपने पिता के नाम पर स्थापित टीपी कॉलेज बीएनएमयू के स्थापना की आधारशिला बनी थी जो कभी सात जिलों में फैला आज उससे भी अलग हो एक अन्य पूर्णिया विश्वविद्यालय बन चुका है। दरभंगा विश्वविद्यालय में उन पर शोध सुखद संकेत है लेकिन अपने ही क्षेत्र में उनके प्रति वो सम्मान का माहौल लंबे समय तक नहीं बन पाया जो बनना था वैसे टीपी कॉलेज में विगत कुछ वर्षों से उनके नाम पर आयोजनों की कड़ी सुखद संकेत देते हैं अन्य स्तरों पर भी पहल नितांत आवश्यक है।
*जयंती व पुण्यतिथि विवाद के पटाक्षेप में टीपी कॉलेज की भूमिका रही कारगर*
कीर्ति बाबू जैसे महामना की जयंती और पुण्यतिथि पर उनके द्वारा स्थापित कॉलेजों में ही कुछ समय तक चली विवाद दुखद और शर्मनाक रही। टीपी कॉलेज और संत अवध कॉलेज में स्थापित प्रतिमा स्थल पर जहां जयंती पुण्यतिथि में मतभेद रहा वहीं पार्वती साइंस कॉलेज में इसका उल्लेख भी नहीं था जिससे हर साल उहापोह की स्थिति में व्यापक स्तर पर आयोजन नहीं हो पाता था। लेकिन विगत साल में टीपी कॉलेज ने वाम युवा संगठन एआईवाईएफ द्वारा स्पष्ट स्थिति के मांग को गंभीरता से लेते हुए कीर्ति बाबू के परिजन से संपर्क कर समाधान निकाला और वास्तविक तिथि टीपी कॉलेज परिसर में अंकित हुई इससे व्यापक स्तर पर जयंती और पुण्यतिथि का आयोजन का मार्ग प्रशस्त हुआ जिसमें टीपी कॉलेज के वर्तमान प्रधानाचार्य प्रो. कैलाश प्रसाद यादव सर की विशेष रुचि एवं गम्भीरता संग कॉलेज के ही निवर्तमान दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष अग्रज डॉक्टर सुधांशु शेखर जी के प्रयास सर्वाधिक अहम रहे। खास कर डॉक्टर सुधांशु शेखर जी द्वारा अपने प्रधानाचार्य के नेतृत्व में कीर्ति बाबू पर पूर्व एवं वर्तमान में रचित समस्त रचनाओं को एक स्मारिका का रूप दे प्रकाशित करना भविष्य को अमूल्य पूंजी दे गई। कीर्ति बाबू की जयंती विश्वविद्यालय स्तर पर भी जरूर मनें यही उनके जयंती और पुण्यतिथि पर सच्ची श्रद्धांजलि होगी।स्थानीय एनएसएस स्वयंसेवको की मांग पर तत्कालीन कुलपति प्रो. आर पी श्रीवास्तव के कार्यकाल में विश्वविद्यालय परिसर के अतिथिशाला के सामने बनी कीर्ति वाटिका की वर्तमान उपेक्षा चिंतनीय है लेकिन यह विश्वास भी है कि समय के धार में कोई ऐसा तारणहार जरूर आयेगा जो कीर्ति वाटिका की उपयोगिता को निखारेगा और तब यह वाटिका कीर्ति बाबू को जानने की एक मजबूत कड़ी बन सकेगी।परिस्थितियां जो भी हो लेकिन कीर्ति बाबू का कृतित्व और व्यक्तित्व उन्हें हर दौर का वो सिरमौर स्वीकार करेगा जिसकी चमक समय के साथ और निखरेगी, इस कड़ी में टीपी कॉलेज एवं पार्वती साइंस कॉलेज के प्रधानाचार्य रहे केपी यादव सर द्वारा अपने कार्यकाल में कीर्ति नारायण मंडल की प्रतिमा कॉलेज परिसर में स्थापित करना एवं उनके नाम पर वृहद स्तर पर कार्यक्रम के आयोजन ,स्मारिका प्रकाशन की शुरुआत सदैव स्मरणीय एवं वर्तमान आयोजनों की आधारशिला मानी जाएगी। शिक्षा जगत के विश्वकर्मा एवं इस धरती के अनमोल रत्न स्मृतिशेष कीर्ति बाबू को उनकी जयंती पर शत शत नमन आपके लिए बस इतना ही हे कीर्ति बाबू आपका कृतित्व आपको हर दौर में अमरत्व देगा,,,,,,नमन
*डॉक्टर हर्ष वर्धन सिंह राठौर*
*संपादक, युवा सृजन*
*सचिव , आजाद पुस्तकालय, कतराहा














