बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-1976 में प्रस्तावित संशोधन का विरोध
बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-1976 में प्रस्तावित संशोधन को लेकर सभी तरफ से गंभीर सवाल उठ रहे हैं। इस संबंध में बीएनएमयू, मधेपुरा के सीनेटर एवं एवं एलएनएमएस कॉलेज, वीरपुर (सुपौल) में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. सुधांशु शेखर ने रविवार को मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर अपनी गहरी आपत्ति दर्ज कराई है।
उन्होंने बताया कि राज्य सरकार बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-1976 में संशोधन हेतु विधेयक लाने पर विचार कर रही है। इसके तहत विश्वविद्यालयों के अंगीभूत स्नातक महाविद्यालयों को विश्वविद्यालयों से अलग कर उच्च शिक्षा विभाग के अधीन किया जा सकता है। इससे पूरी उच्च शिक्षा ध्वस्त हो जाएगी।
उन्होंने बताया कि अंगीभूत महाविद्यालयों को विश्वविद्यालयों से अलग करने से दशकों में विकसित यह समन्वित शैक्षणिक ढांचा प्रभावित होगा और विश्वविद्यालयों की मूल भूमिका कमजोर हो जाएगी। इससे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, पूरी विश्वविद्यालय व्यवस्था दांव पर आ जाएगी और उच्च शिक्षा में नौकरशाही बढ़ेगी।
उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय केवल प्रशासनिक ढांचा या डिग्री प्रदान करने वाले निकाय नहीं हैं। यह शिक्षण, अनुसंधान एवं ज्ञान सृजन का केंद्र है और यहां से समाज एवं राष्ट्र को नई दिशा मिलती है। ऐसे में विश्वविद्यालय को नगर निगम या प्रखंड कार्यालय अथवा सचिवालय की तरह चलाने की बात नहीं सोचनी चाहिए।
डॉ. शेखर ने कहा है कि विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक, शैक्षणिक अथवा वित्तीय कमियां हैं। पिछले वर्षों में विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक, शैक्षणिक और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। इसके बावजूद गंभीर मामलों में कुलपतियों के विरुद्ध अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
डॉ. शेखर ने मांगा की है कि लोक भवन एवं राज्य सरकार को विश्वविद्यालय में व्याप्त अराजकता के वास्तविक कारणों की पहचान कर इसमें सुधार करे। कुलपति की निरंकुशता पर अंकुश लगाया जाए और सीनेट, सिंडिकेट एवं विश्वविद्यालय के विभिन्न निकायों को प्रभावी बनाया जाए। इससे विश्वविद्यालय में स्वस्थ लोकतांत्रिक माहौल बनेगा और यहां से सही मायने में समाज एवं राष्ट्र को रौशनी मिलेगी।












