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फादर्स डे पर डॉक्टर राठौर की कलम से….✍️ *फादर्स डे के बहाने ,,,,*   

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फादर्स डे पर डॉक्टर राठौर की कलम से….✍️

*फादर्स डे के बहाने ,,,,*

रिश्तों की दुनिया में पिता सृष्टि के आरम्भ से अभी तक रिश्तों के परिवर्तनों के कई-कई दौर से गुजरा है। मां के ममत्व की घनी छांह हर युग में लगभग एक-सी ही रही है, लेकिन पिता का अपनी संतानों के साथ जुड़ाव और व्यवहार सामाजिक परिवर्तनों और परिस्थितियों के साथ अलग अलग दौर में बदलता रहा । संतान के पालन-पोषण और उसे जीविका के लिए आत्मनिर्भर बनाने की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ मां की होती थी। संतान के पिता का आमतौर पर बाहरी चीजों खासकर घर चलाने से जुड़ी सामग्री की व्यवस्था की चिंता होती थी अगर पता हो भी तो पुरुषों का दिल अपनी संतानों के लिए शायद ही धड़कता रहा होगा। विकास की उस आरंभिक अवस्था में जीवन की बेहद कठिन और निर्मम परिस्थितियों के कारण पिता और संतानों के बीच किसी किस्म की भावुकता और संवेदनशीलता तब कल्पना से परे की बात थी। यह और बात है कि आगे भी हजारों सालों तक चले उस दौर में भी बच्चों से मतलब केवल मां को होता था जब निरंतर चलने रहने वाले युद्धों, सत्ता-संघर्ष, और शिकार की कठिन परिस्थितियों में पिता के पास उनके लिए समय नहीं होता था।चर्चित आईपीएस ध्रुव गुप्त अपने एक लेख में लिखते हैं कि पिता और संतानों के रिश्तों का तीसरा दौर कृषि की खोज और पशुपालन के आरंभ के बाद शुरू हुआ। परिवारों के सारे सदस्य कृषि के लिए नई-नई जमीन खोजने, उन्हें बीजारोपण के लिए तैयार करने, अनाज उगाने और कृषि, दूध या मांस के लिए पशुओं को पालने में एक दूसरे का सहयोग भी करते थे और एक दूसरे की चिंता भी। यही दौर था जब सही मायने में पारिवारिक रिश्तों की बुनियाद पड़ी और समाज में आपसी सहयोग और सामंजस्य के लिए जीवन मूल्य गढ़े जाने लगे लेकिन बच्चों के साथ पिता के एक नजदीकी रिश्ते की शुरुआत हो चुकी थी यह बड़ा बदलाव था। इससे बच्चों को विकास को बेहतर परिवेश मिला।

*वर्तमान दौर पिता और संतान के बीच का स्वर्णिम युग*

वहीं पिता और पुत्र के रिश्ते का एक बिल्कुल नया और अलग दौर पूंजीवाद के आगमन और शिक्षा के प्रसार के साथ शुरू हुआ। शहरों में रोजगार के बढ़ते विकल्प ,मिलती सुविधाएं,खेती पर लगातार बढ़ते बोझ की वजह से नौकरी की तलाश में गांवों से बड़े शहरों को निकले युवाओं के साथ एकल परिवार की शुरुआत हुई। घर के बड़े-बुजुर्ग अपने खेत, अपने पशुओं, अपने पैतृक घरों और अपने पारंपरिक जीवन मूल्यों के साथ गांवों में रह गए और आजादी को आतुर युवाओं ने शहरों में आकर *एकल परिवारों की एक नई व्यवस्था को जन्म दिया।* एकल परिवार की यह व्यवस्था आज के समय का सर्वमान्य सच है। इसकी अपनी अच्छाईयां और खामियां है। ऐसे परिवार ने घर के बुजुर्गों को जितना अकेला किया हो वहीं नए दौर के पिता और उसकी संतानों के बीच एक खुले रिश्ते की शुरुआत इस दौर में संभव हुई। अपने काम के बाद अब पिता के पास संतानों को देने के लिए वक्त आया परंपराओं का दबाव और घर के बड़े-बुजुर्गों का संकोच अब पत्नी और बच्चों के साथ उसके रिश्ते के आड़े नहीं आते। संतानों की परवरिश, चिंता और शिक्षा में अब मां के साथ पिता की भी बराबर की भूमिका है। खुलेपन के कारण पिता और संतानों के रिश्ते में आपसी समझदारी, संवेदना और भावुकता का समावेश हुआ है। अब पिता संतानों के लिए घर में एक असहज उपस्थिति नहीं रहा। उनके बीच सामान्यतः एक दोस्ताना संबंध शक्ल ले चुका है। बच्चे अब अपनी समस्याएं और उलझनें अपनी मां के अलावा पिता के साथ भी साझा कर सकते हैं। इस व्यवस्था में शिक्षित और समझदार पिता के पास बदली हुई परिस्थितियों में अपनी संतानों की समस्याओं, ख्वाहिशों, संघर्षों, जीवन शैली और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की कामना को समझने और उनके साथ सामंजस्य बिठाने का विवेक है। वह अपनी संतानों को वह स्थान देने को तैयार है जो संयुक्त पारिवारिक व्यवस्था में खुद उसे नहीं मिल पाया था।

रिश्तों की दुनिया में आज पिता कोई रहस्य नहीं रहा। संतानें भी अब अबूझ नहीं हैं पिता के लिए। न पिता संतानों के सामने खुद को व्यक्त करने से बचते हैं और न संतानों को उनके आगे दिल खोलने में किसी भय का अहसास होता है। उनके बीच के संबंध का यह शायद अबतक का सबसे बेहतरीन दौर है।

*एकल परिवार में संतान से नजदीक तो पिता से दूर हुआ इंसान*

एकल परिवारों के इस दौर की एक बड़ी खामी यह है कि खुद पिता के बुजुर्ग माता-पिता परिवार की मुख्यधारा से लगभग वहिष्कृत और अकेले खड़े हैं। पिता अपनी संतानों के साथ जितने सहज हैं, अपने पिता के साथ उतने ही असहज। देश के तमाम वृद्धाश्रमों और तीर्थस्थलों में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या एकल परिवारों के इसी अवांछित पक्ष का बयान है। लोग अपनी चिंताओं में अपने बच्चों के साथ मां-बाप को भी शामिल कर सकें तो पिता और संतानों के रिश्ते के इस दौर का जवाब नहीं वरना लाखों साल के बाद हमने इस रिश्ते में जितना कुछ हासिल किया है, उतना गंवा भी रहे हैं।

*बदलते दौर में परिवार संकट की ओर*

 

वैसे दौर कोई भी हो और कैसा भी हो, बदलता जरूर है क्योंकि यह प्रकृति का नियम ही है।यकीनन एकल परिवार का यह दौर भी बदलेगा। जीवन की जटिलताएं बढ़ने व्यक्तिगत आजादी की लगातार बढ़ती भूख के दबाव में अब मानवता की सबसे बड़ी उपलब्धियों में एक परिवार नाम की संस्था टूटने के कगार पर है। पश्चिमी देशों में इस टूटन में तेजी आई है। अपने देश में भी *’लिव इन रिलेशन’* के बढ़ते चलन ने इस आशंका को जन्म तो दे ही दिया है कि पिता और उसकी संतानों के बीच रिश्ते का एक और नया दौर अब शायद बहुत दूर नहीं है। यह दौर विकास के पहले दौर की तरह अराजक शायद न हो, लेकिन यह डर जरूर है कि अपनी मानसिक, भावनात्मक और कानूनी जटिलताओं के कारण वह दौर पिता और संतानों के बीच के रिश्ते के लिए ही नहीं, मनुष्यता के लिए भी शायद अबतक का सबसे भयावह दौर साबित हो। इसको गंभीरता से लेने अपनी संतानों के साथ हम जिनकी संतान हैं उनको भी साथ लेने की पहल समय की पुकार है ।

 

*पिता अपनी संतान का प्राणदाता है*

 

पिता किसी भी संतान का प्राणदाता होता है और वो सदैव अपनी संतान को अपने से ऊंचे स्थान पर ही देखना चाहता है।संतान और पिता के बीच का आज के बदलते दौर में संतानों का यह दायित्व है कि वो भी अपने पिता को एहसान दिलाए कि वो उनके सुख दुख हर दौर में साथ है।यह संबंध सदैव आदर्श रहे और इसकी महत्व स्वर्णिम यही कामना।सबों को *फादर्स डे* की अग्रिम बधाई।

*डॉक्टर हर्ष वर्धन सिंह राठौर*

प्रधान संपादक, युवा सृजन

सचिव, आजाद पुस्तकालय कतराहा

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