प्रो. प्रेम प्रभाकर को नमन…
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आज भागलपुर में ‘परिधि’ की ओर से प्रो. प्रेम प्रभाकर जी की याद में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इसके लिए मैं ‘परिधि’ के संस्थापक-निदेशक आदरणीय श्री उदय भाईजी और उनकी पूरी टीम को बहुत-बहुत साधुवाद देता हूँ।
इस अवसर पर मैं भी श्रद्धांजलि स्वरूप अपने कुछ शब्द रखना चाहता हूँ-
मैं तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर में पढ़ाई के साथ-साथ पत्रकारिता तथा सामाजिक- साहित्यिक कार्यों में भी सक्रिय था। इसलिए मुझे अपने विषय दर्शनशास्त्र के अलावा भी कई अन्य विषयों के शिक्षकों का मार्गदर्शन एवं आशीर्वाद प्राप्त हुआ। इनमें विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के प्रो. परशुराम राय उर्फ प्रो. प्रेम प्रभाकर का नाम अग्रगण्य है। आप विश्वविद्यालय हिंदी विभाग के शिक्षक, विश्वविद्यालय अंगिका विभाग के अध्यक्ष (समन्वयक), पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा कार्यक्रम के संयोजक और विश्वविद्यालय सांस्कृतिक परिषद के पूर्व सचिव थे।
यूँ तो मुझे कभी भी प्रो. प्रेम प्रभाकर सर से किसी औपचारिक कक्षा में पढ़ने का अवसर नहीं मिला। लेकिन विभिन्न साहित्यिक- सांस्कृतिक तथा सामाजिक- राजनीतिक कार्यक्रमों के दौरान और आपसी बातचीत में आपसे मैंने बहुत कुछ सीखा। आप सामान्य बातचीत में भी कई महत्वपूर्ण बातें कह जाते थे और दुनियाभर के लेखकों को संदर्भित करना नहीं भूलते थे। ऐसे में आपसे बातचीत करते हुए हम अपने आपको काफी समृद्ध महसूस करते थे।
जब मैं टी. एन. बी. महाविद्यालय में स्नातक का छात्र था, तब भी आपसे और अन्य शिक्षकों से मिलने विश्वविद्यालय हिंदी विभाग आते रहता था। फिर जब मैंने विश्वविद्यालय दर्शनशास्त्र विभाग में दाखिल लिया, तो मुलाकातों का सिलसिला अधिक हो गया। मैं प्रायः दर्शनशास्त्र विभाग से लौटने के क्रम में हिंदी विभाग में कुछ देर ठहरता था। वहां मैं अन्य शिक्षकों के अलावा विशेष रूप से आपसे मिलता था। कई बार आप मुझे अपने विद्यार्थियों से भी मिलवाते थे और कहते थे कि “सुधांशु हिंदी पढ़ता तो बहुत अच्छा रहता।”
मुझे आपके साथ भागलपुर में दर्जनों कार्यक्रमों में भाग लेने का अवसर मिला और हमने मिलकर कई कार्यक्रमों का आयोजन भी किया। आपने मुझे अपनी संस्था ‘माध्यम’ के सह-संयोजक की जिम्मेदारी भी दी थी। इस संस्था के सौजन्य से हमने भागलपुर में कई कार्यक्रमों का आयोजन कराया था। इनमें आदरणीय श्री रामशरण जी के होटल ‘आमंत्रण ‘ में आयोजित कई गोष्ठियां और ‘आमंत्रण’ एवं ‘सुंदर वन’ में आयोजित वर्षांत कार्यक्रम आदि प्रमुख हैं।
आप कई बार उदारतापूर्वक कार्यक्रम के पूर्व मोटर साइकिल से मेरे केशव सिंह लॉज आ जाते थे और मुझे मोटर साइकिल पर अपने पीछे बिठाकर कार्यक्रम में ले जाते थे। फिर कार्यक्रम की समाप्ति के उपरांत मुझे लॉज तक छोड़ भी देते थे। इस बीच आप पूरे रास्ते कार्यक्रम की समीक्षा और उसमें दिए गए अपने वक्तव्य की मीमांसा भी करते थे।
खास बात यह है कि आपसे मिलते हुए मुझे एक नैसर्गिक आत्मियता महसूस होती थी, जिसमें औपचारिकता का नामोनिशान नहीं होता था। हमें विभाग में आवंटित आपके विभागीय कक्ष ही नहीं, बल्कि गोदावरी अपार्टमेंट के आपके अध्ययन कक्ष एवं शयन कक्ष में प्रवेश करते हुए भी कभी मुझे कभी असहज नहीं होना पड़ा। मैं जब कभी भी आपके आवास पर जाता था, वहां से आपकी धर्मपत्नी उर्वशी मैडम मुझे कभी भी बिना कुछ खाए-पीए जाने नहीं देती थीं। कई बार तो मैंने आपके साथ बैठकर उनके हाथ का बना स्वादिष्ट भोजन भी किया है -बिना किसी औपचारिक निमंत्रण के और बिना किसी खास ‘ओकेजन’ के।
वैसे मैंने भी केशव सिंह लॉज स्थिति अपने कमरे को किताबों से भर रखा था और उसमें पैर पसारने की भी जगह नहीं थी। लेकिन वह आपके ‘कलेक्वन’ की तुलना में काफी न्यून था। ऐसे में मुझे आपके किताबों के कलेक्शन से सहज ही ईर्ष्या होती थी। इसके साथ ही आपकी हेंड-राइटिंग भी मुझे अपने आपको आपसे ईर्ष्या करने को मजबूर करती थीं।आप साधारण से आमंत्रण पत्र पर भी जब मेरा नाम लिखते थे, तो मुझे उसे बार-बार चु्मने का जी करता था।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि आप लिखने के मामले में बहुत कंजूस थे। इसके बावजूद आपने मेरे अनुरोध पर मेरी पुस्तक ‘लोकतंत्र : मिथक एवं यथार्थ’ (अग्रज डॉ. मुकेश कुमार के साथ संपादित) के लिए एक आलेख लिखा था -‘खोए हुए लोकतंत्र की तलाश’। आगे आपने मेरी पुस्तक ‘गांधी-विमर्श’ की एक समीक्षा लिखने की भी कृपा की थी।
आप एक बड़े ही निर्मम संपादक थे और अपनी पत्रिका ‘अंग-चम्पा’ के लिए आईं हुई रचनाओं को बड़ी बारिकी से देखने-परखने के बाद ही प्रकाशित करते थे। इसके बावजूद आपने मेरे द्वारा गुरुवर प्रो. श्रीभगवान सिंह जी की एक पुस्तक की लिखी गई समीक्षा को ‘अंग-चम्पा’ में स्थान दिया था। मेरे ख्याल से यह उस समीक्षा की गुणवत्ता को मिला पुरस्कार से अधिक, अपने प्रिय समीक्षक को दिया गया प्रोत्साहन था।
अंत में यह भी उल्लेखनीय है कि वर्ष-2017 में मैं असिस्टेंट प्रोफेसर बनकर मधेपुरा आ गया। लेकिन आपसे मेरा टेलीफोनिक संपर्क बना रहा। आप जब कभी भी किसी कार्य से मधेपुरा आते थे, तो यहां मेरे आवास पर जरूर आते थे। अपनी अंतिम मधेपुरा यात्रा में आपने हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विनय कुमार चौधरी जी के आवास पर हमारे यू-ट्यूब चैनल बीएनएमयू संवाद के लिए अपनी एक कहानी ‘कोरोना…’ का पाठ किया था और ‘साहित्य और समाज विषय पर एक सारगर्भित व्याख्यान भी दिया था।
आज आप सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन आपका हंसता हुआ नुरानी चेहरा, आपकी सुमधुर वाणी से आने वाली खुशबू, आपके सुनहरे अक्षर और इन सबके अधिक आपकी आत्मियता हमेशा हमारी स्मृतियों में बनी रहेंगी। हम आपको याद करते हुए अपने आपको उर्जावान महसूस करते रहेंगे…। सादर नमन!














