ईशा फाउंडेशन के जग्गी वासुदेव ने जिस तरह पटना के श्मशान घाट का एक रुपए की लीज पर कथित ठेका लेकर अमीर- गरीब में फर्क किया है,उसे देखते हुए डॉ लोहिया से जुड़ी एक घटना की याद आ गई।
डॉ लोहिया रात के समय बनारस में गंगा नदी में नौका – विहार कर रहे थे। राजनारायण उनके साथ थे।
अचानक लोहिया जी की निगाह तट के किसी घाट पर जल रही चिताओं की ओर गई। उन्होंने देखा किसी चिता में आग की लपट ऊंची है, किसी में बहुत कम।
लोहिया जी ने राजनारायण से पूछा कि दोनों चिताओं की आंच में ऐसा अंतर क्यों है।
राजनारायण ने बताया कि जिस चिता में लपट ऊंची है उसमें घी ज्यादा डाला गया है , लकड़ी ज्यादा है। वह किसी संपन्न आदमी की चिता है।
जहां आग की लपटें छोटी हैं वह किसी गरीब आदमी की चिता है।
लोहिया ने कहा था – अपना यह देश कैसा है? यहां मरते दम तक अमीरी गरीबी का भेद खतम नहीं होता!
सबको मालूम ही होगा कि लोहिया का अंतिम संस्कार दिल्ली के निगमबोध घाट पर विद्युत शवदाहगृह में एक साधारण व्यक्ति की तरह हुआ था। दिनमान में उस अंतिम यात्रा का कवर पेज पर फ़ोटो छपा था और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की मार्मिक रपट भी। सर्वेश्वर की लोहिया की अंतिम यात्रा की वह कविता भी प्रसिद्ध हुई- जिसका शीर्षक था – ‘ एक चिंगारी और।’
पाटलिपुत्र में, यानी पटना के श्मसान में ईशा फाउंडेशन जो कुछ कर रहा है, जैसी चर्चा है, उस पर जग्गी वासुदेव के ईशा फाउंडेशन को स्पष्टीकरण देना चाहिए।
नहीं तो इतिहास के उस दौर की याद आयेगी जब पैसा लेकर स्वर्ग का टिकट दिया जाता था।
-समाजवादी चिंतक प्रो. जयंत तोमर जी के फेसबुक वॉल से साभार।










