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ICPR। ‘सभ्यता का गांधीवादी दर्शन’ विषयक व्याख्यान का आयोजन

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महात्मा गाँधी मात्र एक सैद्वांतिक दार्शनिक नहीं थे, बल्कि वे व्यावहारिक दार्शनिक एवं दूरदर्शी जननायक भी थे। उन्होंने अपने विचारों एवं कार्यों के जरिए पूरी दुनिया के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया  है।

यह बात भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. रमेशचन्द्र सिन्हा ने कही। वे 21 दिसंबर, 2020 (सोमवार) को टी. पी. एस. काॅलेज, पटना में भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित ‘सभ्यता का गाँधीवादी दर्शन’ विषयक व्याख्यान-माला में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे।

उन्होंने कहा कि गाँधी ने अपनी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ में आधुनिक सभ्यता की त्रासदी का चित्रण किया है, जो उत्तर आधुनिक समाज के लिए भी चरित्रार्थ होता है। गाँधी ने मानव की समग्र मुक्ति का उद्घोष किया है। उनके लिए स्वराज का अर्थ के राजनैतिक मुक्ति के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक दासता से भी मुक्ति थी।इस अवसर पर मुख्य वक्ता के रूप में प्रो. आई. एन. सिन्हा, पूर्व अध्यक्ष, दर्शनशास्त्र विभाग, पटना विश्वविद्यालय, पटना ने कहा कि आधुनिक दौर ज्ञान एवं सूचना क्रांति का दौर है। इस दौर मेें मानव नियति के ऊपर उसका अधिपत्य कायम नहीं रह गया है। उन्होंने गाँधी के हिन्द-स्वराज की चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय सभ्यता की प्राकृति मूलतः आध्यात्मिक एवं नैतिक रही है, किन्तु पश्चिमी सभ्यता मुख्यतः भौतिकवादी एवं उपभोगतावादी रही है। विकासवाद के दौर में उपभोगतावाद को ही सभ्यता का प्रयार्य मान लिया गया है। इसके कारण मानव-जीवन संकट में है।

उन्होंने कहा कि महात्मा गाँधी ने जिस वैकल्पिक सभ्यता का माॅडल पेश किया है, उसको जीवन में अपनाने की जरूरत है।

इस अवसर पर पटना विश्वविद्यालय के सेवानिवृत प्रो. एन. पी. तिवारी ने कहा कि गाँधी के सभ्यता-दर्शन का आधार उनका नैतिक विचार है, जो मूलतः सत्य एवं अहिंसा पर आधारित है। गाँधी वस्तुतः भारतीय सभ्यता के हिमायती थे और वे पाश्चात्य सभ्यता की कटू आलोचना करते थे।

पटना विश्वविद्यालय, पटना में दर्शनशास्त्र विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रो. पूनम सिंह ने कहा कि सभ्यता शरीर है, तो संस्कृति उसकी आत्मा है। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति समाज को एक सकारात्मक, प्रगतिशील एवं समावेशी विकास की ओर इंगित करती है।

टी. पी.एस. काॅलेज, पटना के प्रधानाचार्य प्रो. उपेन्द्र प्रसाद सिंह ने अध्यक्षीय भाषण देते हुए कहा कि आज 21वीं सदी में गाँधी के विचार बेहद प्रासंगिक हैं। उन्होंने युवाओं को गाँधी के विचारों को पढ़ने और उसका अनुसरण करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि मनुष्य का समाजिक जीवन सभ्यता एवं संस्कृति का समन्वय है।

इससेे पूर्व कार्यक्रम के आयोजक सचिव डाॅ. श्यामल किशोर ने बताया की सभ्यता वह आचरण है, जिससे मनुष्य अपना फर्ज अदा करता है। फर्ज अदा करने का मतलब नीति का पालन और नीति का पालन का अर्थ है मन एवं इन्द्रियों को बस में रखना। गाँधी ने कहा है कि हिन्दुस्तान की सभ्यता में सारी बातें मोजूद है। गाँधी भारतीय जनमानस में अपनी सभ्यता-संस्कृति के प्रति प्रेम एवं स्वाभिमान जगाना चाहते थे। उन्होंने बताया कि गाँधी नैतिकता पर आधारित भारतीय सम्यता के समर्थक थे तथा मशीन पर आधारित पश्चात् सभ्यता के घोर विरोधी थे। धन्यवाद ज्ञापन मनीष चौधरी ने किया।

इस अवसर पर प्रो. शैलेश कुमार सिंह, प्रो. आभास, प्रो. राजेश कुमार सिंह, प्रो. सत्या सिन्हा,  इस अवसर पर प्रो. अंजलि प्रसाद, प्रो. जावेद अख्यतर खाॅ, प्रो. अबू बकर रिजवी, प्रो. एस. ए.नूरी, प्रो. रधुवंश मणी, प्रो. विजय कुमार सिन्हा, डाॅ. उदय कुमार, डाॅ. पंकज कुमार, डाॅ. आशिष कुमार, डाॅ. दिवाकर कुमार पाण्डेय के अतिरिक्त श्री रोहन, विकास, सरोजनी सहित काफी संख्या में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक, शोधार्थी एवं विधार्थी उपस्थित थे। सभी प्रतिभागियों को सहभागिता प्रमाण-पत्र भी दिया गया।

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