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BNMU। मीडिया रिपोर्ट। 13 दिसंबर, 2020। मानव और पर्यावरण विषयक ऑनलाइन परिचर्चा

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मानव और पर्यावरण विषयक परिचर्चा का आयोजन

मानव जीवन अनमोल है और इसका लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है। यदि मनुष्य का आचरण पवित्र होगा, तभी प्रकृति-पर्यावरण का संरक्षण एवं संवर्धन हो सकेगा। यह बात भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली के अध्यक्ष प्रो. (डाॅ.) रमेशचन्द्र सिन्हा ने कही। वे शनिवार को मानव और पर्यावरण विषयक ऑनलाइन परिचर्चा का उद्घाटन कर रहे थे। यह परिचर्चा ठाकुर प्रसाद महाविद्यालय, मधेपुरा की राष्ट्रीय सेवा योजना इकाई-I के तत्वावधान में आयोजित सात दिवसीय विशेष शिविर के दूसरे दिन किया गया।

उन्होंने कहा कि हमने भोगवादी आधुनिक सभ्यता-संस्कृति और भौतिक विकास की होड़ में प्रकृति-पर्यावरण को नुकसान पहुंचाया। आज का पर्यावरण-संकट आधुनिक विकास की ही देन है। हमें यह समझना होगा कि पर्यावरण की सुरक्षा के बगैर विकास अनैतिक है। हमें वही विकास चाहिए, जो क्षणभंगुर नहीं हो, स्थाई हो। वैसा विकास, जिसकी कीमत हमें प्रकृति पर्यावरण अत्यधिक दोहन और मानव श्रम के शोषण के रूप में नहीं देना पड़े। अतः हमें प्राकृतिक जीवनशैली और सादगी, संयम एवं सदाचार को अपनाना होगा। हमें सनातन सभ्यता-संस्कृति एवं जीवन-दृष्टि को अपनाना होगा। एकात्मकता एवं समग्रता की जीवन दृष्टि को अपनाना होगा।

अखिल भारतीय दर्शन परिषद् के अध्यक्ष डाॅ. जटाशंकर ने कहा कि
मानव के साथ विशेषता यह है कि उसके पास आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकृति हैं। हम बाह्य प्रकृति का संरक्षण इसलिए करें, क्योंकि आन्तरिक प्रकृति उस पर निर्भर करती है। लेकिन हमें पहले आन्तरिक प्रदूषण को शुद्ध करना होगा। बाह्य पर्यावरण-संरक्षण के लिए मनुष्य के आंतरिक पर्यावरण की शुद्धि आवश्यक है। जब तक हमारा अंत:करण शुद्ध नहीं होता, तब तक बाह्य प्रकृति के साथ हमारा संबंध ठीक नहीं होगा। पर्यावरण संकट के लिए मनुष्य का अहंकार जिम्मेदार है। अहंकारवश मनुष्य पशु-पक्षियों, नदियों, पेड़-पौधों आदि को अपना भोग्य मानता है।

उन्होंने कहा कि हमारे चारों ओर जो हमें घेरे हुए है, वह हमारे लिए पर्यावरण है। ठीक उसी प्रकार से वृक्ष के लिए पर्यावरण हम भी हैं, क्योंकि हम वृक्ष को घेरे हुए हैं। हम जैसा अपने लिए सोचते है, वैसा हमें दूसरों के लिए सोचना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जड़ पदार्थ से लेकर जीव तक सब एक ही पदार्थ है। संपूर्ण चराचर जगत में ईश्वर या चेतना का वास है। मनुष्य एवं मनुष्येतर प्राणी और संपूर्ण चराचर जगत एक है। मानव इस चराचर जगत चेतनामय है। जीवन एवं जगत में सबों का अपना-अपना महत्व है। मनुष्य प्रकृति का मालिक नहीं है। मनुष्य को भी जीवन जीने का उतना ही अधिकार है, जितना पशु, पक्षी, पेड़, पौधों, पहाड़ों, नदियों तालाबों को है।

उन्होंने कहा कि पर्यावरण के बिना मानव का जीवन अधूरा है। आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित एवं संतुलित पर्यावरण देने के लिए हमें प्रकृति के साथ जीना होगा। हमें प्राकृति से जो भी संसाधन मिला है, उसका समुचित उपयोग करना चाहिए, दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।

इस अवसर पर उत्तराखंड की डाॅ. इंदु पाण्डेय खंडूरी ने कहा कि पर्यावरण को बचाए रखना मानव का प्रथम कर्तव्य है। अतः हम प्रकृति के साथ रहने का प्रयास करें। उसके साथ किसी भी प्रकार का छेड़छाड़ ना करें। हमें प्रकृति के साथ दोस्ती का रिश्ता बनाए रखना होगा। पर्यावरण-संरक्षण के सतत विकास के लिए भी जरूरी है।

उन्होंने बताया कि हमें प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित दोहन नहीं करना चाहिए। महात्मा गाँधी ने भी कहा है कि यह प्रकृति हम सबों की आवश्यक आवश्यकताओं को पूरा कर सकती है। लेकिन यह हममें से किसी एक के भी लोभ-लालच को पूरा नहीं कर सकती है।

कोलकाता की डाॅ. गीता दुबे पांडेय ने कहा कि मानव और पर्यावरण एक दूसरे के पूरक हैं। लेकिन आज मानव ने प्रकृति-पर्यावरण के साथ अपना संबंध बिगाड़ लिया है। मानव अपनी सुख-सुविधाओं की पूर्ति के लिए अंधाधुन वृक्षों की कटाई कर रहा है और विभिन्न तरीकों से प्रकृति-पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। हमें पर्यावरण का दोहन करने वाली विकास नीति को छोड़ना होगा।

उन्होंने कहा कि हमें भोग की हद बांधनी होगी। हमें अपनी तृष्णा को नियंत्रित करना होगा।

राँची की सीएस पूजा शुक्ला ने कहा कि आज मानव विकास के नाम पर पर्यावरण के साथ दुर्व्यवहार कर रहा है। प्रकृति-पर्यावरण की सुरक्षा को भूलकर मानव भोग-विलास की दुनिया मे खो चुका है। अधिकांश प्राकृतिक आपदाएं इसी का परिणाम हैं। जब प्रकृति-पर्यावरण मानव को अपना रौद्र रूप दिखाने लगता है ,
तब मानव भगवान को याद करने लगता है। लेकिन वास्तव में प्रकृति-पर्यावरण की सुरक्षा की जिम्मेदारी इंसान की है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रधानाचार्य डाॅ. के. पी. यादव ने की। संचालन कार्यक्रम पदाधिकारी डॉ. सुधांशु शेखर ने किया।

इस अवसर पर अभिषद् सदस्य डाॅ. जवाहर पासवान, डाॅ. वीर किशोर सिंह, डाॅ. वीणा कुमारी, डाॅ. प्रकृति राय, अधिषद् सदस्य रंजन यादव, शोधार्थी सारंग तनय, डेविड यादव, सौरभ कुमार चौहान, मणीष कुमार, शांतनु यदुवंशी आदि उपस्थित थे।

मालूम हो कि सात दिवसीय विशेष शिविर के दौरान सभी दिन अलग-अलग विषयों पर परिचर्चा का आयोजन होगा। इसके लिए क्रमशः कोरोना : कारण एवं निवारण, मानव और पर्यावरण, पोषण एवं स्वास्थ्य, आपदा प्रबंधन और सामाजिक दायित्व, भारत की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विरासत, मानसिक स्वास्थ्य और युवा वर्ग तथा राष्ट्र-निर्माण में युवाओं की भूमिका विषय निर्धारित किया गया है।

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