*न्यायालय के हस्तक्षेप से मिली बड़ी राहत : 2020 नियुक्ति में लेटर या रेफरेंस नंबर नहीं रहने के कारण अनुभव प्रमाण -पत्र पर मिले शून्य अंक पर अभ्यर्थी की जीत। पांच साल बाद मिलेगी नौकरी।*
*Case No.😗 Civil Writ Jurisdiction Case No.18526 of 2022
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*1. आर्डर किस बारे में है?* (विषय)
यह फैसला पटना हाई कोर्ट (जस्टिस रितेश कुमार) का है. यह याचिका अवनीश कुमार अरिमर्दन नाम के अभ्यर्थी ने दायर की थी।
*मुद्दा:* बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग द्वारा दर्शनशास्त्र विषय में सहायक प्राध्यापक के पद पर भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है।
*याचिकाकर्ता की शिकायत:* याचिकाकर्ता (जो BC वर्ग से हैं) ने 5 साल के शिक्षण अनुभव (Teaching Experience) और शोध पत्रों का दावा किया था। उन्हें इंटरव्यू में बैठने से रोका जा रहा था और बाद में इंटरव्यू के बाद भी अंतिम परिणाम में उनके ‘H.S. कॉलेज, हवेली खड़कपुर’ में पढ़ाए गए अनुभव के अंक शून्य (0) कर दिए गए थे।
*हाई कोर्ट का अंतिम फैसला:* कोर्ट ने याचिकाकर्ता के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए BSUSC को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता के शिक्षण अनुभव के अंकों की पुनर्गणना करे। यदि पुनर्गणना के बाद उनके अंक BC वर्ग के कट-ऑफ (88 अंक) से अधिक या बराबर होते हैं, तो उन्हें आरक्षित रखे गए एक पद पर नियुक्त किया जाए और अन्य समकक्ष अभ्यर्थियों की तिथि से वरिष्ठता (Seniority) दी जाए।
*2. यह फैसला क्यों और किन कारणों से किया गया? (कारण)*
कोर्ट ने निम्नलिखित मुख्य बिंदुओं के आधार पर याचिकाकर्ता के हक में निर्णय दिया:
*विज्ञापन के नियमों का पालन:*
विज्ञापन के नियम 7.2 के तहत शिक्षण अनुभव के अंकों का लाभ पाने के लिए केवल यह शर्त थी कि अनुभव प्रमाणपत्र संबंधित विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित (Counter-signed) होना चाहिए। याचिकाकर्ता का प्रमाणपत्र रजिस्ट्रार द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित था।
*आयोग द्वारा अंक न देने की गलत वजह:*
BSUSC ने H.S. कॉलेज के 2013 से 2017 तक के शिक्षण अनुभव के लिए ‘0’ अंक दिए थे, क्योंकि उस प्रमाणपत्र के ऊपर लेटर/मेमो नंबर और तारीख अंकित नहीं थी।
*कॉलेज और यूनिवर्सिटी द्वारा सत्यापन (Verification):*
हाई कोर्ट के निर्देश पर तिलकामांझी भागलपुर यूनिवर्सिटी (TMBU) और H.S. कॉलेज के प्राचार्य ने लिखित सत्यापन कर कोर्ट को सूचित किया कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत अनुभव प्रमाणपत्र पूरी तरह से सही और वैध है।
*कोर्ट की टिप्पणी:*
न्यायालय ने माना कि जब विज्ञापन में मेमो नंबर न होने पर अंक काटने का ऐसा कोई सख्त नियम नहीं था और प्रमाणपत्र पर रजिस्ट्रार के हस्ताक्षर थे, तो आयोग को अभ्यर्थी को शून्य अंक देने से पहले कॉलेज या यूनिवर्सिटी से खुद सत्यापन करवा लेना चाहिए था। आयोग द्वारा एकतरफा अंक काटना उनके अपने विज्ञापन की शर्तों के खिलाफ था।













